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  • हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 12 अगस्त, 2018

    हिन्दोस्तान के शहर और गांव मज़दूरों और किसानों के बढ़ते विरोध संघर्षों से गूंज रहे हैं। देश के मज़दूर-किसान संघर्ष कर रहे हैं ताकि भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण के समाज-विरोधी कार्यक्रम को रोका और वापस लिया जाये। वे मांग कर रहे हैं कि सभी लोगों की सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तुरंत क़दम उठाये जाएं। मज़दूरों और किसानों के खून पसीने से पैदा की गयी दौलत को हिन्दोस्तान के 150 इजारेदार पूंजीपति घराने हड़प रहे हैं। ये इजारेदार पूंजीपति घराने अधिकतम मुनाफ़ों की अपनी लालच को पूरा करने के लिए, हिन्दोस्तानी राज्य पर अपने नियंत्रण और दबदबे का इस्तेमाल कर रहे हैं।
  • Dharna front of Bank_9 Aug187 अगस्त, 2018 को रामगढ़ उपतहसील के किसानों ने दिल्ली-गंगानगर हाइवे का चक्का जाम किया। किसान यह क़दम उठाने को इसलिये मजबूर हुये, क्योंकि उनकी जायज़ मांगों को लेकर प्रशासन के साथ चल रही वार्ता संतोषजनक नतीजे पर नहीं पहुंची। रामगढ़ उपतहसील के आप-पास के गांवों के 1350 किसान लगातार मांग करते आये हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के अंतर्गत उनको मिलने वाले मुआवज़े का भुगतान किया जाये, लेकिन सरकार बहाने बनाकर किसानों को भुगतान का लाभ देने से वंचित कर रही है। जबकि किसान अपनी बीमा राशि की प्रीमियम लगातार भारतीय स्टेट बैंक में जमा करते आये हैं। जब किसानों ने बैंक से अपनी फ़सल खराबी के बाद मुआवजे़ के भुगतान के लिये दावा किया तो बैंक पैसा देने से मुकर गया। भारतीय स्टेट बैंक और निजी बीमा कंपनी की मिली-भगत से किसानों के 8 से 10 करोड़ रुपये के मुआवजे़ के भुगतान को रोका गया है। किसान मांग कर रहे हैं कि सरकार अपनी ज़िम्मेदारी मानकर तुरंत उनके मुआवजे़ का भुगतान करे।

  • हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 8 अगस्त, 2018

    30 जुलाई, 2018 को असम के नागरिकों के रजिस्टर (एन.आर.सी.) की दूसरी सूची जारी की गयी जिसमें “हिन्दोस्तानी नागरिकों” का संपूर्ण मसौदा है। 3.29 करोड़ आवेदकों में से 40 लाख महिलाओं, पुरुषों और बच्चों के नाम इस सूची में नहीं हैं। एक ही झटके में 40 लाख लोगों को “गैर-नागरिक”, “घुसपैठिये” और “विदेशी” घोषित कर दिया गया है। मतदान और जायदाद के अधिकार सहित, एक नागरिक बतौर उनके तमाम अधिकार उनसे छीन लिए गए हैं। उनको 30 अगस्त से 28 सितम्बर के बीच का समय दिया गया है, जिसके दौरान हिन्दोस्तानी राज्य को उन्हें यह साबित करना है कि उनका नाम किसी गलती से निकाल दिया गया है, ताकि उनके अधिकार वापस बहाल किये जाएं।

  • पिछले कुछ वर्षों में देश के विभिन्न प्रांतों से भीड़ द्वारा अचानक बेगुनाह लोगों की बेरहमी से हत्या की खबरें लगातार आ रही हैं। ऐसी हत्याओं को लिंचिंग कहा जा रहा है। ऐसी हत्याओं को सही ठहराने के लिये मारे गये व्यक्ति पर कोई न कोई झूठा आरोप लगाया जाता है - जैसे कि वह गाय तस्करी कर रहा था, या फिर गाय का मांस खा रहा था, या फिर “लव जिहाद” कर रहा था। इस हत्याकांड का विडियो बनाकर हत्यारे सोशल मीडिया के ज़रिये पूरे समाज में उसका प्रचार करते हैं। इन दिनों, लिंचिग का शिकार ज्यादातर मुसलमान समुदाय के लोग और खाल उतारने वाले दलित हो रहे हैं।

  • हिन्दोस्तान के किसानों ने अपनी रोज़ी-रोटी की सुनिश्चिति के लिए केंद्र और राज्य सरकारों को झुकाने के लिये उनके ख़िलाफ़ जबरदस्त संघर्ष शुरू कर दिया है। अलग-अलग राज्यों में बढ़ते पैमाने पर किसानों के संगठन अपने अधिकारों के संघर्षों में शामिल हो रहे हैं। देश के अलग-अलग इलाकों से किसानों के संघर्षों की ख़बरें रोज़ आती रहती हैं।

  • हमारे देश में मज़दूरों के एक बहुत ही छोटे हिस्से को औपचारिक रूप से सामाजिक सुरक्षा की सुविधायें मिलती हैं: जैसे कि भविष्य निधि, ई.एस.आई., चिकित्सा सुविधा, मातृत्व सुविधा, दुर्घटना मुआवज़ा, ग्रेच्यूटि और पेंशन, इत्यादि। हमारे देश में जो लोग बेरोज़गार हैं, काम पर घायल हुए हैं, बीमार या वृद्ध हैं, उनके लिये कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। उनको और उनके परिवारों को खुद के हाल पर छोड़ दिया जाता है।

  • केंद्र सरकार ने औद्योगिक संबंधों की एक संहिता का मसौदा तैयार किया है जो तीन मौजूदा कानूनों की जगह लेगा। ये कानून हैं - औद्योगिक विवाद अधिनियम, ट्रेड यूनियन अधिनियम और औद्योगिक रोज़गार (स्थायी आदेश) अधिनियम। प्रस्तावित नयी संहिता के तहत जो भी पूंजीपति 300 से कम स्थायी मज़दूरों को काम पर रखता है, वह उन मज़दूरों को अपनी मर्जी से किसी भी वक्त नौकरी से निकाल सकता है, और इसके लिए उसे सरकार से इजाज़त लेने की ज़रूरत नहीं होगी। मौजूदा औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत ऐसा केवल 100 से कम मज़दूरों वाली फक्ट्रियों में ही किया जा सकता है। यह नयी संहिता हड़तालों पर करीब-करीब पूरी तरह से प्रतिबंध लगाती है और जो कोई हड़ताल आयोजित करता है या उसमें हिस्सा लेता है उस पर भारी जुर्माना लगाया जायेगा। इस संहिता के तहत कंपनी मालिक किसी भी वक्त अपनी मनमर्ज़ी से एक तरफा तरीके से मज़दूरी की शर्तों को बदल सकता है। 

  • जबरदस्ती से किये जा रहे भूमि अधिग्रहण के खि़लाफ़ देशभर के किसानों और जनजातियों के विशाल विरोध के चलते कांग्रेस-नीत संप्रग सरकार को बस्तीवादी भूमि अधिग्रहण अधिनियम को वापस लेना पड़ा था और 2013 में भूमि अधिग्रहण के लिए एक नया कानून बनाना पड़ा था। यह नया कानून पूंजीपतियों को मंजूर नहीं था जो अपनी मुनाफ़ेदार परियोजनाओं के लिए जल्दी से जल्दी भूमि का आधिग्रहण करने को उत्सुक थे। भाजपा-नीत राजग सरकार ने इस 2013 के कानून को बड़े पूंजीपतियों के हित में बदलने की कई बार कोशिश की लेकिन किसानों और मज़दूरों के एकजुट संघर्ष के चलते उनको इसमें क़ामयाबी नहीं मिल पाई है।

  • माडर्न फूड इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड और भारत अल्यूमिनियम लिमिटेड कंपनियों की जनवरी 2000 में बिक्री के बाद, एक के बाद एक सरकारों ने लगातार  सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों को निजी इजारेदार कंपनियों को बेचने का रास्ता तेज़ी से अपनाया है। कांग्रेस पार्टी की सरकार ने अपने दस वर्षों के शासन में (2004-2014), 1,00,000 करोड़ रुपयों से ज्यादा की सार्वजनिक संपत्ति को निजी कंपनियों को बेचा। पिछले चार वर्षों में (2014-18), भाजपा सरकार ने करीब 2,00,000 करोड़ रुपयों की सार्वजनिक संपत्ति को बेचा है।

  • राज्य की नीति के निदेशक तत्व उद्घोषित करते हैं कि “राज्य उपयुक्त विधान या आर्थिक संगठन द्वारा या किसी अन्य रीति से कृषि के, उद्योग के या अन्य प्रकार के सभी कर्मकारों को काम, निर्वाह मज़दूरी, शिष्ट जीवनस्तर और अवकाश का संपूर्ण उपभोग सुनिश्चित करने वाली काम की दशाएं तथा सामाजिक और सांस्कृतिक अवसर प्राप्त कराने का प्रयास करेगा ...।”

  • संपादक महोदय,
    हिन्दोस्तान की आज़ादी की 71वीं सालगिरह के अवसर पर एक बार फिर हिन्दोस्तान के मजदूर, किसान और तमाम दबे-कुचले और शोषित लोगों के लिए इसके असली मायने क्या हैं, इस बात को इतनी स्पष्टता से पेश करने के लिए मैं हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति को उसके गहन अध्ययन और सटीक विश्लेषण पर बधाई देता हूं। इस महत्वपूर्ण बयान में, 1947 से लेकर वर्तमान समय तक दुनिया में एक बड़ी पूंजीवादी ताक़त बनने की हिन्दोस्तान के इजारेदार पूंजीपतियों की रणनीति का सटीक विश्लेषण पेश किया है। यह विश्लेषण हिन्दोस्तान के आर्थिक और राजनीति के बदलते हालात की हक़ीक़त के आधार पर किया गया है, और उन तमाम विश्लेषणों से बिलकुल भिन्न है, जो सरमायदारी राजनीतिक विश्लेषक और उनके हिमायती पेश करते हैं। इसका मुख्य कारण है कि यह विश्लेषण मज़दूर वर्ग के दृष्टिकोण और हितों के आधार पर किया गया है।

  • 29 जून को केन्द्र सरकार ने यह घोषणा की कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यू.जी.सी.) को ख़त्म करके, उसकी जगह पर एक नये भारतीय उच्च शिक्षा आयोग (एच.ई.सी.आई.) का गठन किया जाएगा, जो देश में उच्च शिक्षा का अब नया नियामक बनेगा। एच.ई.सी.आई. की ज़िम्मेदारी होगी सिर्फ शिक्षा संबंधी मामलों पर ध्यान देना। उसके पास कालेजों और विश्वविद्यालयों को अनुदान प्रदान करने की ताक़त नहीं होगी। इसके साथ-साथ, एच.ई.सी.आई. को ढेर सारी और ताक़तें दी गयी हैं, जैसे कि उच्च शिक्षा के संस्थानों में शिक्षा, जांच-मूल्यांकन व शोध के मापदंडों को निर्धारित करना तथा संस्थानों के काम-काज का मूल्यांकन करना। एच.ई.सी.आई. “संस्थानों को बंद करने” का आदेश दे सकता है। अगर कोई विश्वविद्यालय एच.ई.सी.आई. द्वारा निर्धारित किसी नियम को तोड़ता है, तो उसे जुर्माना भरना पड़ेगा। जुर्माना न देने पर, उस संस्थान के प्रमुख को तीन साल तक की जेल की सज़ा हो सकती है।

  • Raj teachers agitation6 अगस्त, 2018 को उदयपुर में शिक्षकों ने राजस्थान शिक्षक संघ प्रगतिशील के झंडे तले आंदोलन शुरू किया। शिक्षक अपनी 10 सूत्रीय मांगों को हासिल करने के लिये संघर्ष कर रहे हैं। इसमें एक प्रमुख मांग है कि नई पेंशन स्कीम को रद्द करके पुरानी पेंशन स्कीम को लागू किया जाये। प्रशासन ने उसी दिन मुख्यमंत्री का उदयपुर दौरा होने के बहाने मुख्यालय पर प्रदर्शन करने की पाबंदी लगाई दी थी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में शिक्षकों ने प्रदर्शन में भाग लिया। राजस्थान शिक्षक संघ प्रगतिशील के प्रदेश अध्यक्ष गिरीश कुमार शर्मा के अनुसार, यह आंदोलन पूरे प्रांत में तेज़ किया जायेगा। 

  • हमारे शासक हिन्दोस्तान की उच्च आर्थिक विकास की दर के बारे डींग मारते हैं। लेकिन, इसके फलस्वरूप पूंजी में हुई वृद्धि एक बहुत छोटे समूह में ही केंद्रित रही है। यह उच्च आर्थिक विकास की दर अपने साथ मेहनतकशों के लिए बढ़ती ग़रीबी और व्यापक विपदा भी साथ लायी है। 13 जुलाई को समाचार मिला कि रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी एशिया के सबसे अमीर पूंजीपति बन गए हैं। उनकी संपत्ति 2017 में 31.3 अरब डॉलर (2,00,000 करोड़ रुपये) से बढ़कर 2018 में 44.3 अरब अमरीकी डॉलर (3,00,000 करोड़ रुपये) हो गई, मतलब एक साल में 50 प्रतिशत की वृद्धि।

  • Meeting withe lebore minister20 जुलाई, 2018 को सभी मज़दूर यूनियनों द्वारा दिल्ली में आयोजित संयुक्त औद्योगिक हड़ताल सफलतापूर्वक हुई। हड़ताल का आह्वान 11 ट्रेड यूनियनों और कई मज़दूर संगठनों ने किया था। इसमें उद्योगों और सेवाओं के अलग-अलग क्षेत्रों से लाखों-लाखों मज़दूरों ने भाग लिया था।

  • हिन्दोस्तान सच्चे मायने में आज़ाद तब होगा जब उसकी शासन-सत्ता लोगों के हाथ में होगी

    हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 1 अगस्त, 2018

    हर साल, स्वतंत्रता दिवस पर सुनाये गए झूठे वादों से हमारे लोग तंग आ चुके हैं। जवाहरलाल नेहरू के “समाजवादी नमूने का समाज” से लेकर इंदिरा गाँधी का “ग़रीबी हटाओ”, मनमोहन सिंह के “मानवीय चेहरे वाला पूंजीवाद” से लेकर नरेन्द्र मोदी का “सब का विकास”, एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री हर 15 अगस्त को खोखले सपने बेचते रहे हैं। लोग जो सुनना चाहते हैं वही कहना पर करना वही जो टाटा, बिरला, अम्बानी और दूसरे इजारेदार पूंजीवादी घराने चाहते हैं, यही इन नेताओं का प्रशिक्षण है।

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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