मनमोहन सिंह की सरकार ने जी.ए.ए.आर. के मसौदे को ठुकराया

जुलाई 2012 में वित्त मंत्रालय संभालने का काम शुरू करने के बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा लिये गये प्राथमिक मुख्य फैसलों में से एक था जनरल एंटी-एवोयडेंस रूल्स (जी.ए.ए.आर.) के मसौदे को खारिज़ करना और सभी ''हिस्सेदारों'' से सलाह करके एक नये मसौदे का प्रस्ताव करने के लिए एक नयी कमेटी बिठाना। जी.ए.ए.आर. का प्रस्ताव 2012 के केन्द्रीय बजट में किया गया था। इसका मकसद है उन तमाम तौर-तरीकों पर रोक लगाना, जिनके ज़रिये बड़े पूंजीवादी संस्थान अपने विदेशी पूंजी निवेश से किये गये सौदों पर प्रतिवर्ष अरबों डालरों के टैक्स देने से बचते हैं। जैसे ही बजट में जी.ए.ए.आर. का प्रस्ताव घोषित किया गया, वैसे ही बड़े वैश्विक वित्त संस्थानों ने अपनी नाखुशी दिखाने के लिए एक ही महीने के अंदर हिन्दोस्तानी शेयर बाजार से 8 अरब डालर निकाल लिये, जिसकी वजह से शेयर कीमतों में भारी गिरावट हुई।

फिक्की, जो हिन्दोस्तानी बड़े पूंजीपतियों का संस्थान है, उसने जी.ए.ए.आर. के मसौदे का खुलेआम विरोध किया और यह मांग की कि जी.ए.ए.आर. को तब तक न लागू किया जाये जब तक ऐसे नये कानून न बनाये जायें जो विदेशी और हिन्दोस्तानी इजारेदार पूंजीपतियों को मंजूर हों। उसने ऐलान किया कि जी.ए.ए.आर. के लागू होने से देश में विदेशी पूंजी का प्रवेश घट जायेगा और विदेशी पूंजी के अधिक प्रवेश को प्रोत्साहित करने के लिए 'सुधारों' की जरूरत है। विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के पक्ष में सिंगापुर के प्रधानमंत्री ली सियन और मोरीशस के विदेश मंत्री ने हिन्दोस्तानी सरकार पर जोर दिया कि प्रस्तावित जी.ए.ए.आर. को लागू न किया जाये। हिन्दोस्तान के पूंजी बाजार में अधिकतम विदेशी पूंजी निवेश इन दोनों देशों से होते हुए आते हैं और हमारे देश में विदेशी पूंजी के संपूर्ण प्रवेश का 51 प्रतिशत इन दोनों देशों से होते हुए आता है।

जब ली सियन ने इस महीने की शुरुआत में हिन्दोस्तान की यात्रा की, तब उन्होंने पत्रकारों को बताया कि हिन्दोस्तान में कारोबार चलाने का वातावरण पूंजी निवेशकों के लिए (जी.ए.ए.आर. की घोषणा के कारण) ''जटिल'' हो गया है। उससे पहले मोरीशस के विदेश मंत्री ने यह शिकायत की थी कि प्रस्तावित जी.ए.ए.आर. एकतरफा है और हिन्दोस्तान-मोरीशस के बीच प्रत्यक्ष कर से बचने के लिए किये गये समझौते (डी.टी.ए.ए.) की शर्तों के खिलाफ़ है। हिन्दोस्तान और मोरीशस के बीच डी.टी.ए.ए. के अनुसार, कंपनी जिस जगह पर स्थित है, वहीं उसे अपने मुनाफों पर टैक्स देना पड़ेगा। तो अगर हिन्दोस्तान में मुनाफा बनाया जाये, फिर भी उस कंपनी को यहां टैक्स नहीं देना पड़ेगा। इसके अलावा, मोरीशस की सरकार पूंजी पर प्राप्त मुनाफे पर शून्य टैक्स वसूलती है। अत: हिन्दोस्तान में पूंजी निवेश करने की इच्छुक विदेशी कंपनी मोरीशस में अपना पंजीकरण करती है और इस तरह मोरीशस में स्थित बन जाती है। उसके बाद, हिन्दोस्तान में कारोबार से उसे जो भी मुनाफा मिलता है, वह टैक्स मुक्त बन जाता है। विदेशी पूंजीपति निश्चित रूप से मोरीशस जैसे टैक्स मुक्त स्थानों के ज़रिये पूंजी निवेश करना पसंद करते हैं, ताकि वे दूसरे देशों में बनाये गये मुनाफों पर कोई भी टैक्स देने से बच सकते हैं। हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों ने विदेशों में जो धन जमा कर रखा है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा भी इस तरह हिन्दोस्तान में प्रवेश कर लेता है परंतु टैक्स के जाल में फंसने से बचता है।

जी.ए.ए.आर. के लागू होने से कर विभाग के लिए यह बाध्यकारी हो जाता है कि हिन्दोस्तानी बाजार में सभी विदेशी पूंजी निवेशकों से, पूंजी से मुनाफा कमाने के लिए, टैक्स वसूला जाये। अत: दोनों विदेशी और हिन्दोस्तानी पूंजीपति चाहते हैं कि जी.ए.ए.आर. को पूरी तरह खारिज किया जाये या इतना हल्का बना दिया जाये ताकि वे अपने मुनाफों पर शून्य टैक्स का आनंद उठाते रह सकते हैं। विदेशी और हिन्दोस्तानी पूंजीपतियों के दबाव की वजह से तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को जी.ए.ए.आर. पर कई छूट घोषित करने पड़े, जैसे कि उसे लागू करने की तारीख को बदलकर 1 अप्रैल 2012 से 1 अप्रैल 2013 कर देना और टैक्स से बचने का सबूत प्राप्त करने का दायित्व कर विभाग पर डालना। परंतु पूंजीपति इससे संतुष्ट नहीं हुए। जी.ए.ए.आर. के पुराने मसौदे को खारिज करके पूंजीपतियों ने यह सुनिश्चित किया है कि एक नया मसौदा अपनाया जायेगा जो उनके पक्ष में होगा, ताकि वे अपने मुनाफों पर कर देने से बचते रहें, जबकि ऊंचे करों और जरूरी चीजों की बढ़ती कीमतों का पूरा बोझ मजदूर वर्ग पर लाद दिया जाये।

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