शिक्षा का अधिकार कानून की हक़ीक़त

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एक अप्रैल 2010, को शिक्षा का अधिकार कानून लागू हुआ था। उसके एक साल बाद इस कानून के पीछे हिन्दोस्तान की सरकार के असली इरादे स्पष्ट हो रहे हैं - समानता या इंसाफ की चिन्ता किये बिना, मुख्यतः पूंजीवादी बाजार की मांगें पूरी करना।

2009की एक दोपहर को पूरे जोश से मेजों को थपथपाते हुये, हमारे सांसदों ने एक कानून पास किया, जिसमें यह वादा किया गया कि 6 और 14 वर्ष की उम्र के बीच के प्रत्येक बच्चे को मुफ्त और बाध्यकारी स्कूल जाने का अधिकार मिलेगा।

बच्चों को मुफ्त और बाध्यकारी शिक्षा का अधिकार कानून, जिसे आम तौर पर शिक्षा का अधिकार कानून के नाम से जाना जाता है, यह 2002 में संविधान में किये गये एक संशोधन को कानूनी रूप देता है, जिसके जरिये स्कूल जाने के अधिकार को मूल अधिकारों की सूची में जोड़ दिया जायेगा। परन्तु यह अधिकार - जिसे सरकार अपने महान सामाजिक दायित्व की पूर्ति बताकर इतना ढिंढोरा पीट रही है - यह वास्तव में मूल अधिकार बनने से बहुत दूर है।

कानून के प्रावधानों से यह सुनिश्चित किया जाता है कि नागरिकों को अपने अधिकार पाने के लिये उन्हीं अफसरों और सरकारी केन्द्रों के चक्कर काटने पड़ेंगे और उन्हीं पर निर्भर होना पड़ेगा, जिन्होंने इतने सालों तक बच्चों को शिक्षा से वंचित किया है। मिसाल के तौर पर कानून के दफा 36 में कहा गया है कि शिक्षा के अधिकार का हनन होने पर किसी भी सरकारी अफसर या निजी स्कूल प्राधिकरण के खिलाफ़ कार्यवाही करने के लिये, एक विशेष नियुक्त सरकारी अफसर की अनुमति की जरूरत है।

दूसरे मूल अधिकारों से भिन्न, 6-14 वर्ष के बीच के बच्चे को स्कूल जाने के लिये अधिकार से वंचित करना अपने में गैर कानूनी नहीं माना जायेगा। इसे गैर कानूनी तभी माना जायेगा अगर यह शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधानों के विपरीत हो। इसीलिये, हालांकि 2002 में ही शिक्षा के अधिकार को मूल अधिकार घोषित करने वाला संविधानीय संशोधन किया गया था, पर 1 अप्रैल, 2010 तक, यानि इस कानून के पास होने तक बच्चों को शिक्षा का अधिकार नहीं मिला।

संसद में जिस रूप में शिक्षा का अधिकार कानून को पास किया गया, उसमें सबसे पहले एक समान सार्वजनिक सरकारी स्कूल व्यवस्था की मांग को खारिज़ कर दिया गया। जबकि दुनिया के अनेक अगुवा औद्योगिक देशों में, जहां स्कूली शिक्षा का अधिकार एक मूल अधिकार माना जाता है, वहां एक समान सार्वजनिक सरकारी स्कूल व्यवस्था ही इसका आधार है। मिसाल के तौर पर, ब्रिटेन में 95 प्रतिशत माध्यमिक स्कूली छात्र सरकारी स्कूलों में जाते हैं जहां समान पाठ्यक्रम, शिक्षा मापदंड और फीस होती है।

हिन्दोस्तान में अधिकतम सार्वजनिक सरकारी स्कूलों में शिक्षा के मापदंडों और ढांचागत सुविधाओं की जानबूझ कर उपेक्षा की गई है, जबकि निजी स्कूलों - जिनकी फीस अधिकतर मजदूर-मेहनतकशों की पहुंच से बाहर है - को विस्तार करने की पूरी इज़ाज़त और प्रोत्साहन दी गई है।

शिक्षा का अधिकार कानून के मसौदे को तैयार करने के दौरान जिन शिक्षाविदों से परामर्श किया गया, उनमें से अनेकों ने सरकार से यह कहा था कि अगर सभी के लिये अच्छी गुणवत्ता की शिक्षा सुनिश्चित करनी है तो सार्वजनिक सरकारी स्कूल व्यवस्था ही एकमात्र रास्ता है। परन्तु इस विचार को खारिज कर दिया गया था, इस आधार पर कि सार्वजनिक सरकारी स्कूल व्यवस्था लागू करने से संविधान के तहत निजी स्कूलों के अधिकारों का हनन होगा! परन्तु जो सरकार निजी स्कूलों के अधिकारों के बारे में इतना सोचती है, इसी सरकार ने बीते एक वर्ष में शिक्षा का अधिकार कानून की उन सभी शर्तों को एक-एक करके हटाने का काम किया है, जिन शर्तों का उद्देश्य था इन निजी स्कूलों में सभी बच्चों के लिये समान अधिकार सुनिश्चित करना।

जब संसद में शिक्षा का अधिकार कानून पास किया गया था और 1 अप्रैल, 2010 को जब उसे सूचित किया गया था, तब उसमें यह कहा गया था कि बच्चों की भर्ती के लिये कोई भी स्कूल किसी प्रकार का परीक्षण नहीं कर सकता और सिर्फ लाटरी ड्राके जरिये ही भर्ती की जायेगी। इसका यह मतलब है कि हर निजी स्कूल को कक्षा एक में भर्ती की सभी अर्जियों को एक डब्बे में डालना पड़ेगा और सीटों की संख्या के आधार पर लाटरी के ड्रा के जरिये भर्ती की जायेगी। इसका हनन होने पर स्कूलों को भारी फाईन देनी पड़ेगी और स्कूल अपनी मान्यता भी खो सकता है।

उच्च स्तरीय निजी स्कूलों के दबाव में आकर, अब सरकार ने कानून की शर्तों में कुछ बदलाव सूचित किये हैं। अब प्रत्येक निजी स्कूल को यह इजाज़त दी गई है कि वह खुद उन मापदंडों को तय करे, जिसके आधार पर वह बच्चों को भर्ती करना चाहता है, और जो बच्चे उन मापदंडों के अनुसार नहीं होंगे उन्हें भर्ती करना निजी स्कूल के लिये बाध्यकारी नहीं होगा। निजी स्कूल अपने पुराने छात्रों के बच्चों, लड़कियों आदि के लिये कोटा भी निर्धारित कर सकते हैं और स्कूल मैंनेजमेंट की इच्छा के अनुसार सीटों का आरक्षण भी कर सकते हैं। स्कूल को सिर्फ इतना ही सुनिश्चित करना होगा कि हरेक कोटा के अन्दर (जिनकी सीटों की संख्या स्कूल खुद तय कर सकता है) छात्रों को लाटरी ड्राके आधार पर भर्ती किया जायेगा।

इसका यही नतीजा होगा कि निजी स्कूल आगे भी बच्चों को उसी तरह भर्ती करते रहेंगे जिस तरह अब तक करते आये हैं, हालांकि यह प्रक्रिया उन लाखों मेहनतकश अभिभावकों के हितों के खिलाफ़ जाती है, जो डोनेशन नहीं दे सकते या जिनका मैनेजमेंट कोटा सीट हासिल करने का सामाजिक संपर्क नहीं है। निजी स्कूलों ने सुप्रीम कोर्ट में शिक्षा का अधिकार कानून के एक और दफा को भी चुनौती दी है, जिसके तहत स्कूलों के लिये आर्थिक तौर पर कमजोर छात्रों के लिये 25 प्रतिशत सीट निर्धारित करना जरूरी था। मुख्यतः समाज के ऊंचे तबकों के लिये चलाये जाने वाले निजी स्कूलों - बड़े-बड़े बोर्डिंग स्कूलों - को इसके बारे में भी चिन्ता करने की जरूरत नहीं होगी। सरकार उन्हें आर्थिक तौर पर कमजोर छात्रों के लिये 25 प्रतिशत सीट निर्धारित करने की शर्त से पूरी छूट देने की योजना बना रही है।

शिक्षा का अधिकार कानून के साथ-साथ, केन्द्र सरकार ने माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में व्यवसायिक पाठ्यक्रम लागू करने की शानदार योजना बनायी है। इस योजना का उद्देश्य यही है कि बड़ी संख्या में छात्रों को उन कलाओं में प्रशिक्षण दिया जायेगा जिनकी आधुनिक उद्योग और विशेष प्रकार की सेवाओं के क्षेत्र में पूंजीपतियों को अधिक जरूरत है।

केन्द्र सरकार अपने इन कदमों के जरिये यह सुनिश्चित कर रही है कि मजदूर वर्ग के बच्चों के लिये उसी स्तर की शिक्षा पाना बहुत कठिन होगा, जिस स्तर की शिक्षा पूंजीपतियों के बच्चों को मिल सकती है, बल्कि मजदूरों के बच्चों को अच्छे मैकेनिक, प्लंबर, नर्स इत्यादि बनने का प्रशिक्षण दिया जायेगा।

मूल अधिकारकी नकाब के पीछे, हिन्दोस्तान की शिक्षा व्यवस्था को और भी ज्यादा वर्गों में बंटा हुआ बनाया जा रहा है। शिक्षा समेत हर सामाजिक गतिविधि से अधिकतम मुनाफे बनाने के पूंजीपतियों के अधिकारके सामने सरकार झुक रही है। शिक्षा का अधिकार कानून का असली इरादा पूंजीवादी लालच को पूरा करना है, न कि मजदूरों, किसानों और उनके बेटों-बेटियों को शिक्षा पाने का मूल अधिकार दिलाना।

Location

New Delhi