गोरखपुर : जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ किसानों का संघर्ष पूरी तरह जायज है!

18 जुलाई से, हरियाणा के गोरखपुर इलाके के सैकड़ों परिवारों ने अपने-अपने गांवों के तपते खेतों में तम्बू लगा लिये हैं। सरकार द्वारा वहां परमाणु ऊर्जा संयंत्र के लिये भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़, महिलायें, पुरुष व बच्चे आंदोलन चला रहे हैं।

किसान संघर्ष समिति के नेतृत्व में, इस इलाके की आम जनता ने यह ठान लिया है कि परमाणु परियोजना, जिससे उनके और आने वाली पीढ़ियों के लिये भी ख़तरा है, इसके लिये वे अपनी उपजाऊ भूमि नहीं देंगे।

प्रस्तावित परमाणु संयंत्र के लिये भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़, 16 जुलाई, 2012 से गोरखपुर के किसानों व लोगों का संघर्ष एक नये स्तर पर पहुंच गया है। याद होगा कि अब यह संघर्ष दो वर्षों से भी अधिक पुराना हो गया है, और हरियाणा के फतेहाबाद लघु सचिवालय के सामने इसके नेतृत्व में लगातार धरना चल रहा है। इस लंबे संघर्ष के दौरान, वहां के लोगों ने जिला अधिकारियों, राज्य व केन्द्रीय सरकारों, परमाणु ऊर्जा प्रशासन के अधिकारियों को, और साथ ही इस इलाके के सांसदों व विधायकों को यह साफ तौर पर बता दिया है कि वे भूमि अधिग्रहण तथा वहां परमाणु ऊर्जा संयंत्र बनाने का पूरा विरोध करते हैं। 2011 में हुये फुकोशीमा भीषण दुर्घटना के बाद वहां के लोग और भी दृढ़ता से इसका विरोध कर रहे हैं।

वहां दो मुद्दे उलझे हुये हैं। पहला, कि वहां के किसान उपजाऊ ज़मीन के जबरदस्ती अधिग्रहण का विरोध करते हैं। दूसरा, इस इलाके के मज़दूर, किसान व सभी लोग प्रस्तावित परमाणु ऊर्जा संयंत्र का विरोध करते हैं, जिससे उनकी जिन्दगी को खतरा है और भविष्य में रोजीरोटी खोने का अंदेशा है, क्योंकि इस परियोजना के चारों तरफ के बड़े इलाके में उद्योग खोलने की अनुमति नहीं मिल सकेगी।

एकताबध्द और शक्तिशाली विरोध के बावजूद, केन्द्र व राज्य के अधिकारियों ने अपनी कार्यवाइयां जारी रखी हैं। वे आशा कर रहे हैं कि किसानों के विरोध को मुआवजे की मात्रा बढ़ाने से खत्म किया जा सकेगा।

गोरखपुर किसान संघर्ष समिति की एक महत्वपूर्ण सभा 16 जुलाई को की गयी, जिसमें विभिन्न गांवों के किसान अपने आगे की कार्यवाइयों को तय करने के लिये इकट्ठा हुये। उन्होंने दो तरफा योजना बनाई। पहला, परिवार के सदस्य खेतों में पहरा देंगे ताकि भूमि अधिग्रहण को न होने दिया जा सके। और दूसरा, ''जन सुनवाई'' के ज़रिये सरकार के बेईमान दावों का पर्दाफाश किया जायेगा। किसान इन दोनों लक्ष्यों को हासिल करने में सफल हुये।

बहुचर्चित ''जन सुनवाई'' 17 जुलाई, 2012 को आयोजित की गयी। फतेहाबाद एक विशाल पुलिस छावनी में तब्दील हो गया ताकि हजारों प्रदर्शनकारियों को सुनवाई के स्थान तक पहुंचने से रोका जा सके। जो लोग वहां पहुंच पाये थे, उन्होंने देखा कि अधिकारी और परमाणु ऊर्जा निगम के वैज्ञानिक या तो उनके प्रश्नों के जवाब देना नहीं चाहते थे या वे इनके जवाब देने में असमर्थ थे। मात्र 70 मिनट में, यह कह कर कि, जनविरोध की हालत में सुनवाई करना असंभव है, इसको खत्म कर दिया गया।

18 जुलाई को सरकार ने प्रस्तावित 1500 एकड़ भूमि अधिग्रहण के लिये ''पुरस्कारों'' की घोषणा की और बहुत शोर मचाया कि अब एक एकड़ जमीन के लिये सरकार 30 लाख रुपये भरपाई देगी। परन्तु न उस दिन और न ही उसके बाद के दिनों में, कोई भी किसान अपनी ज़मीन का हरजाना लेने के लिये आगे आया। अधिकारी अपने पंडालों में हाथों में चेकबुक लिये बैठे हैं कि कब कोई आये और वे हरजाने का चेक लिखें, परन्तु कोई भी नहीं आया। दूसरी तरफ, किसानों के परिजन अपने खेतों में पारी में पहरा दे रहे हैं। सरकार द्वारा उनकी रोजीरोटी व अधिकारों पर हमलों का लोगों ने एकजुट विरोध दिखाया है।

अखबार प्रेस में छपाई के लिये जाने तक, जिला मुख्यालय और फतेहाबाद के लघु सचिवालय पर धरना जारी है। किसान नेता, हंसराज सिवाच ने कई बार घोषणा की है कि वे अपना संघर्ष तब तक जारी रखेंगे जब तक सरकार खुले रूप से भूमि अधिग्रहण की योजना को त्याग नहीं देती।

गोरखपुर या देश में किसी भी और हिस्से में, जबरदस्ती से किसानों से भूमि अधिग्रहण करने का सरकार को कोई अधिकार नहीं है। अनिच्छुक लोगों पर परमाणु ऊर्जा संयंत्र लादने का भी सरकार को कोई अधिकार नहीं है। अत: गोरखपुर के किसान व लोग, सभी प्रगतिशील राजनीतिक ताकतों के समर्थन के पात्र हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
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