आर्थिक सुधार कार्यक्रम पर मजदूर-मेहनतकशों के विचार

मजदूर वर्ग और मेहनतकशों की हिमायत करने वाले अखबार और संगठन बतौर, हम मेहनतकशों के नेताओं से यह सवाल कर रहे हैं कि 20 वर्ष पहले शुरू किये गये सुधारों के परिणामों के बारे में हिन्दोस्तान के मेहनतकशों का क्या विचार है। क्या उन सुधारों से मजदूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय को फायदा हुआ है या नुकसान? 16-31 अक्तूबर, 2011 के अंक में हमने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह से साक्षात्कार के साथ इस श्रृंखला की शुरुआत की थी। पिछले अंकों में हमने अर्थव्यवस्था के बैंक, पोर्ट, रेल चालकों, डाक कर्मचारी यूनियनों, बीमा क्षेत्र, एअर इंडिया इंजीनियर्स एसोसियेशन, वेस्टर्न रेलवे मोटरमैंस एसोसियेशन के नेताओं, वोल्टास एम्प्लॉईज फेडरेशन तथा मेहनतकशों के विभिन्न संगठनों के नेताओं के साक्षात्कार प्रकाशित किये थे। इस अंक में अर्थव्यवस्था के एक और क्षेत्र के मजदूर नेता से साक्षात्कार प्रकाशित कर रहे हैं।

मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट डॉक एन्ड जनरल एम्पलॉइज़ यूनियन के जनरल सेक्रेटरी, कॉ. एस.के. शेटये के साथ बातचीत

म.ए.ल. : क्या आप बताएंगे कि गोदी के मज़दूरों का किस प्रकार का काम होता है?

कॉ. शेटये : गोदी में आये हुए ज़हाज़ों से हम आयात-निर्यात का माल उतारते-चढ़ाते हैं।

म.ए.ल. : मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट के पास कितनी ज़मीन है?

कॉ. शेटये : इसके पास 180 एकड़ ज़मीन है, लेकिन वह पूरी ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करता। वह व्यवसायियों को पट्टे पर या किराये पर भूमि देता है। मिसाल के तौर पर, ताज महल होटल, मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट की ज़मीन पर है। ऐसा बहुत बार होता है कि किरायेदार निर्धारित तरीके से उस ज़मीन का इस्तेमाल नहीं करते। वे ज़मीन पर बड़े-बड़े टॉवर्स खड़े करके बहुत ज्यादा कमाते हैं। मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट ने ऐसे दुरुपयोग के ख़िलाफ़ अनेक मुकदमे दर्ज़ किये हैं, लेकिन वे सब उच्च या सर्वोच्च न्यायालयों में फंस गये हैं। किरायेदार ज़मीन वापस नहीं करना चाहते। नये डीसी (विकास नियंत्रण) नियम तो मालिकों के फ़ायदे के लिए ही बनाये गये हैं। सरकार पूंजीपतियों के लिए काम करती है, और इसीलिए सार्वजनिक जायदाद का दुरुपयोग होता है।

म.ए.ल. : 1991में नरसिंह राव सरकार ने जो उदारीकरण तथा निजीकरण द्वारा वैश्वीकरण की नीति लागू की है, उसके क्या असर हुए हैं?

कॉ. शेटये : उस समय सरकार का दावा था कि उद्योग बढ़ेगा, ज्यादा नौकरियां पैदा होंगी, और हिन्दोस्तान आगे बढ़ेगा। बड़े टॉवर्स और मॉल्स आये हैं, हाईवे और पुल बांधे गये हैं। लेकिन इन सब से आम जनता का फ़ायदा नहीं हुआ है। चंद पूंजीपतियों का ज़रूर फ़ायदा हुआ है और सरकार की मदद से वे और बड़े हो गये हैं।

म.ए.ल. : इस नीति का आप के क्षेत्र पर क्या असर पड़ा है?

कॉ. शेटये : हमारे क्षेत्र पर और हमारे मज़दूरों पर बहुत बड़ा असर हुआ है। 1984 के बाद नयी भर्ती बंद कर दी गयी है। परिणामत: 11 गोदियों में पहले जहां 3 लाख मज़दूर काम करते थे, अब सिर्फ़ 57000 बचे हैं। सेवानिवृत्ति, इत्यादि की वजह से जितने पद रिक्त हो जाते थे, उन्हें एक साल के बाद मिटा दिया जाता था। पहले पोर्ट ट्रस्ट के चेयरमैन टेक्निकल पदों के लिए मज़दूरों को नियुक्त कर सकते थे। अब सिर्फ़ मंत्री ही कर सकते हैं। अब सहानुभूति के आधार पर भर्ती बंद कर दी गयी है।

मुम्बई के मज़दूरों पर 3 बार - 1992, 2001 तथा 2003 में - मज़दूरों पर  वी.आर.एस. की स्कीम ज़बरदस्ती लागू की गयी। उससे मज़दूरों की संख्या 40,000 से 17,000 हो गयी। अब वे चाहते हैं कि और 3000 मज़दूरों की छंटनी करने के लिए एक और वी.आर.एस. की स्कीम लागू करें।

मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट के तहत जो विक्टोरिया डॉक थे, उन्हें बंद कर दिया गया है। वहां ज़हाज़ों की मरम्मत हुआ करती थी। उसके बाद प्रिंसेस डॉक को बंद कर दिया गया। वहां गोदाम थे और माल के स्टोरेज के लिए उन का इस्तेमाल किया जाता था।

जवाहरलाल नेहरू पोर्ट ट्रस्ट के 4 टर्मिनल हैं, जिनमें से 3 निजी कंपनियों के हवाले कर दिये गये हैं। ये कंपनियां मुनाफ़े का आधा हिस्सा मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट को देती हैं। मुम्बई पोर्ट ट्रस्ट के पास अब सिर्फ़ एक ही टर्मिनल बचा है - इंदिरा बंदर। उसमें गुड्स कॅरीयर और समुंदर का कीचड़ निकालना यही दो महत्वपूर्ण काम थे वह काम अभी इंदिरा कंन्टेनर टर्मिनल प्रा. लि. इस निजी कंपनी को 23साल के लिये चलाने को दिया है।

ठेका मज़दूरों से काम करवानेवाली निजी कंपनियों के हवाले महत्वपूर्ण कार्य दिये गये हैं। सरकारी नीति तो निजीकरण तथा ठेकेदारी प्रणाली को बढ़ावा देने के लिये है। इस के तहत मज़दूरों को न्याय नहीं मिलेगा।

हम वी.आर.एस. तथा ठेकेदारी प्रणाली के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं। अगर किसी पर्याप्त कारण के लिए वी.आर.एस. दी जाती है, तो हमारी मांग है कि उसकी जगह नये मज़दूर की स्थायी नियुक्ति की जाए। हम लड़ तो रहे हैं, लेकिन सरकार को झुका नहीं रहे हैं, और वह इसलिए कि हम मज़दूरों की फ़ौलादी एकता नहीं है।

म.ए.ल. : ''एक पर हमला यानि सब पर हमला!'' इस घोषणा पर फोकस करके, एक समान मांगपत्र, समान कार्यक्रम के इर्द सब संगठित तथा असंगठित मज़दूरों की, भूमिहीन किसानों की, खेत मज़दूरों की और सब श्रमिकों की फ़ौलादी एकता बनाने के लिए आप की सोच में क्या करना चाहिए?

कॉ. शेटये : अगर हम सही मायने में ऐसी एकता बना सकेंगे, तो दमन-शोषण करने वाले वर्ग को भागने के लिए कोई जगह ही नहीं बचेगी। बिना समझौते के संघर्ष से हम अपनी मांगें जीत सकते हैं। लेकिन आज की राजनैतिक परिस्थिति देखते हुए यह सब मुमकिन नहीं है। इसके लिए राजनैतिक पार्टियां ज़िम्मेदार हैं। उनमें से हर एक की अपने खुद की मज़दूर और मेहनतकषों की यूनियन हैं। इसलिये पार्टी राजनीति में मज़दूर, किसान बंट गये हैं। मज़दूरों और किसानों को इन राजनैतिक पार्टियों को दूर रख कर अपनी एकता बांधने का काम करना चाहिये। लेकिन राजनैतिक पार्टियों के नेतागण ऐसा नहीं होने देते हैं। इसलिये अभी तक मज़दूर-किसान अंदोलन को सफ़लता नहीं मिली है।

म.ए.ल. : धन्यवाद, कॉ. शेटये, हम आप के शुक्रगुज़ार हैं।

Tag:   

Share Everywhere

सार्वजनिक    वी.आर.एस.    विकास नियंत्रण    यानि सब पर हमला    प्रिंसेस डॉक    पोर्ट ट्रस्ट    टेक्निकल    जायदाद    चेयरमैन    गोदी    एक पर हमला    Aug 16-31 2012    Struggle for Rights    Economy     Popular Movements     Privatisation    Rights    

पार्टी के दस्तावेज

thumb

 

पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

thumbnail

इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)