परमाणु परियोजनाओं का विरोध

22 अगस्त को दिल्ली के गांधी शांति प्रतिष्ठान में परमाणु ऊर्जा के बारे में जनसुनवाई आयोजित की गयी थी। कुडनकुलम (तमिलनाडु), जैतापुर (महाराष्ट्र), चुटका (मध्य प्रदेश), गोरखपुर (हरियाणा), बांसवाड़ा (राजस्थान), हरिपुर (पश्चिम बंगाल), मीठी विरदी ( गुजरात), कोव्वाड़ा (आंध्रप्रदेश), और रावतभाटा (राजस्थान) आदि जगहों से परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं का विरोध करने वाले कार्यकर्ता बड़ी संख्या में जनसुनवाई में शामिल हुए।

कुडनकुलम से आये कार्यकर्ताओं ने बताया कि किस तरह से सरकार परमाणु परियोजना के विरोधकों को कुचलने के लिए हर तरह से कोशिश कर रही है। सरकार ने 7,000 से ज्यादा कार्यकर्ताओं पर देश से गद्दारी करने का इल्जाम लगाया है, 55,700 एफ.आई.आर. तमिलनाडु सरकार ने दर्ज किये हैं, और 100 से ज्यादा अगुवा कार्यकर्ताओं पर वे इल्जाम लगाये गए हैं जो अंग्रेजों ने आज़ादी के लिए लड़ने वाले देशभक्तों पर लगाये थे। विरोधकों को विदेश से पैसा मिलता है इस तरह का झूठा प्रचार प्रधानमंत्री के दफ्तार से किया जा रहा है। उसका खंडन करते हुए एक महिला कार्यकर्ता ने बताया कि किस तरह महिलायें और बच्चे हाथ से बीड़ी बनाकर आंदोलन के लिए आर्थिक मदद कर रहे हैं।

मध्यप्रदेश के चुटका से आये लोगों ने बताया कि “पेसा” कानून के तहत सभी ग्रामवासियों ने परमाणु परियोजना को नकारा है, मगर सरकार खुद के ही कानून को मानने से इंकार कर रही है। उन्होंने बताया कि किस तरह चुटका में इससे पहले 6.5 रिक्टर पैमाने की क्षमता के भूचाल का झटका हुआ है और इसीलिए वहाँ पर परमाणु परियोजना बनाने का मतलब बहुत बड़ा खतरा उठाना है।

राजस्थान से आये लोगों ने बताया कि हाल ही में मौजूदा परमाणु परियोजना में काम करने वाले 38 अस्थाई कर्मचारियों को परमाणु के घातक रेडीयेशन से काफी गंभीर नुकसान हुआ था। इससे तो ऐसा लगता है कि मौजूदा परमाणु प्रकल्प भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। बाँसवाड़ा से आये लोगों ने बताया कि 1000 से ज्यादा विरोधकों पर सरकार ने एफ.आई.आर. दर्ज किये हैं और “नक्सलवादी” होने का लेबल उन पर थोपा जा रहा है ताकि दूसरे आम लोगों को गुमराह किया जा सके।

जनसुनवाई में सहभाग किये कई नामी हस्तियों ने भी जनविरोध को फासीवादी तरीके से कुचलने के लिए केन्द्र तथा राज्य सरकारों को दोषी बताया तथा उनकी भत्र्सना की। उन सभी ने बहादुरी से संघर्ष करने वाले लोगों को अपना समर्थन दिया।

मजदूर एकता लहर ने भी हमेशा, जनविरोध के बावजूद परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं को सरकार जिस तरह जबरदस्ती से लागू कर रही है उसका विरोध किया है और जनसंघर्ष की हिमायत की है।

जन सुनवाई में उपस्थित लोगों का गुस्सा यह दर्शाता है कि सरकार ने स्थानीय लोगों, जो परमाणु के प्रकल्प के आस-पास रहते हैं उनकी चिंताओं, रोजी-रोटी, पर्यावरण के खतरे के बारे में कभी संतुष्ट नहीं किया है, बल्कि सरकार ने परमाणु प्रकल्प के लिये उन लोगों के प्रति दमनपूर्ण रास्ता अपनाया है। मजदूर एकता लहर इसकी कड़ी निन्दा करती है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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