मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित सम्मेलन : पूंजीपतियों का अजेंडा बनाम लोगों का अजेंडा

“एक के बाद एक सरकारें जो अजेंडा लागू कर रही हैं, वह टाटा, अंबानी, बिड़ला और अन्य बड़े इजारेदार घरानों के नेतृत्व में पूंजीपतियों का अजेंडा है। ...लोगों का अजेंडा है एक नयी राजनीतिक नींव रखना, फैसले लेने वाला बनना और अर्थव्यवस्था की दिशा बदलना, ताकि सभी की समृद्धि और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके! ”

21 अक्टूबर, 2012 को नयी दिल्ली में, मज़दूर एकता कमेटी द्वारा आयोजित “पूंजीपतियों का अजेंडा बनाम लोगों का अजेंडा” विषय पर सम्मेलन में हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रवक्ता, कॉमरेड प्रकाश राव की यह प्रारंभिक टिप्पणियां थीं।

इस सम्मेलन में विभिन्न क्षेत्रों के मेहनतकश लोगों ने सक्रियता से भाग लिया, जिनमें मज़दूर वर्ग के अनुभवी नेता व संगठनकर्ता तथा बड़ी संख्या में नौजवान और कार्यशील महिलायें शामिल थीं। सभागृह शानदार बैनरों से सुसज्जित था जिन पर - “हम हैं इसके मालिक, हम हैं हिन्दोस्तान, मज़दूर किसान औरत और जवान!”, “देश की दौलत पैदा करने वालों को देश का मालिक बनना होगा!”  तथा “एक पर हमला, सब पर हमला!” के नारे लिखे थे, जो समुचित रूप से सम्मेलन में हो रही चर्चा के भावार्थ को दर्शाते थे।

सुबह के सत्र की अध्यक्षता श्री हनुमान प्रसाद शर्मा ने की, जो राजस्थान के शिक्षकों व दूसरे सरकारी कर्मचारियों के सम्मानित और अनुभवी संगठनकर्ता हैं। सम्मेलन की शुरुआत मज़दूर एकता कमेटी के एक संस्थापक सदस्य, कॉमरेड जसवीर सिंह की उद्घाटन टिप्पणियों से हुयी। उन्होंने 90 के दशक में देश भर के मज़दूर वर्ग के संघर्षों, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के पूंजीपतियों के अजेंडे के विरोध के संघर्षों, इन संघर्षों के साथ संसदीय कम्युनिस्ट पार्टियों व उनसे जुड़े ट्रेड यूनियनों द्वारा विश्वासघातों की याद दिलायी और उन परिस्थितियों की याद दिलायी, जिनमें मज़दूर एकता कमेटी के झंडे तले, विभिन्न मज़दूर यूनियनें अपने अधिकारों की रक्षा में आगे आयी थीं। उन्होंने 22 फरवरी, 1993 की ऐतिहासिक रैली पर विशेष ध्यान दिलाया, जिसमें केन्द्र में कांग्रेस पार्टी की सरकार व उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकारों द्वारा बाबरी मस्जिद के गिराये जाने के पश्चात की हालतों में सभी ज़मीर वाले पुरुषों व स्त्रियों से आह्वान किया गया था कि लोगों को सत्ता में लाने के लिए संघर्ष किया जाये। उस रैली से कमेटी फॉर पीपुल्स एम्पावरमेंट का जन्म हुआ था (जिसे बाद में लोक राज संगठन का नाम दिया गया), और उस रैली के आयोजकों में मज़दूर एकता कमेटी की एक अहम भूमिका थी।

मज़दूरों व नौजवानों के संगठनकर्ता और मज़दूर एकता कमेटी के एक प्रमुख कार्यकर्ता, कॉमरेड संतोष ने अब तक के मज़दूर एकता कमेटी के संघर्षों पर ध्यान दिलाया, जो हमेशा बिना समझौते किये मज़दूरों के हित में रहे हैं। खास तौर पर उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के सबसे पहले निजीकरण किये गये उद्यमों में से एक, मॉडर्न फूड्स, के कर्मचारियों के मज़दूर एकता कमेटी के नेतृत्व में किये बहादुर संघर्ष पर ध्यान आकर्षित किया। उस वक्त मज़दूर एकता कमेटी के नेतृत्व में मॉडर्न फूड्स के कर्मचारियों ने इस बात का पर्दाफाश किया था कि निजीकरण का कार्यक्रम लोगों की मेहनत से बनाये करोड़ों रुपयों की सम्पत्ति को इजारेदार पूंजीपतियों के हाथ कौडि़यों के दाम देने के सिवाय और कुछ नहीं था; ऐसा कार्यक्रम जिसका मकसद मेहनतकश लोगों के खून-पसीने की मेहनत से इजारेदार पूंजीपति घरानों को मालामाल करना। संतोष ने जोर दिया कि बिना हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के नेतृत्व व मार्गदर्शन के, मज़दूर एकता कमेटी का यह सारा काम असंभव होता। फिर उन्होंने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रवक्ता कॉमरेड प्रकाश राव को सभा को संबोधित करने का आमंत्रण दिया।

अपने भाषण में कॉमरेड प्रकाश राव ने ध्यान दिलाया कि दो दशकों के उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम के लागू करने से इसके असली मकसद और इसके तत्व का पर्दाफाश हुआ है। पिछले 20 वर्षों के संवर्धन के दौरान मुट्ठीभर इजारेदार पूंजीपतियों की दौलत बहुत तेजी से बढ़ी है और साथ ही मज़दूर वर्ग का शोषण तथा किसानों व आदिवासी लोगों की लूट तथा बर्बादी और तेजी से बढ़ी है। प्रधान मंत्री व शासक पूंजीपतियों के दूसरे प्रवक्ताओं के “पूंजी के पलायन”  के तर्क, जिसके आधार पर वे हाल के नीतिगत कदमों की सफाई देते हैं, इसका पर्दाफाश करते हुये उन्होंने ध्यान दिलाया कि इसका मकसद लोगों की जमीन और श्रम के शोषण और लूट को तीव्र करके, बेशुमार मुनाफे कमाकर विदेश में हिन्दोस्तानी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना है। बड़े पूंजीपति विदेशी इजारेदारों से हाथ मिला कर, देश के अंदर अपने काम के पैमाने को तेजी से बढ़ाना चाहते हैं। हमारे देश के शासक पूंजीपति साम्राज्यवादी पूंजीपति हैं, जिन्हें अधिकतम मुनाफा बनाने और अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर बड़ी शक्ति बतौर मान्यता पाने के अपने “अधिकार”  के सिवाय, राष्ट्रीय अधिकारों या दूसरे किसी अधिकार के बारे में कोई चिंता नहीं है।

देश का नौजवान मज़दूर वर्ग विकास के इस दृष्टिकोण को क्यों माने, जिसमें उनकी भूमिका एक सस्ती श्रमशक्ति का स्रोत मात्र है? सिर्फ पूंजीपतियों के जीवनस्तर का वैश्वीकरण और अधिकांश लोगों के लिये निरंतर पिछड़ापन - हम इसे क्यों स्वीकार करें, उन्होंने पूछा। इसके साथ समझौता करने की प्रवृत्ति के खतरे की ओर इशारा करते हुये, उन्होंने लोगों के वैकल्पिक अजेंडे के इर्द-गिर्द एकता बनाने का आह्वान दिया।

उन्होंने लोगों के वैकल्पिक अजेंडे के कुछ अहम पहलुओं पर प्रकाश डाला। इनमें शामिल हैं व्यापार को लोगों के नियंत्रण में लाना, मज़दूरों की बचत व पेंशन सुविधाओं की पूंजीवादी सट्टेबाजी लूट से बचाव की राज्य द्वारा गारंटी, बिना किसी अपवाद के सभी मज़दूरों के दैनिक कार्यकाल की सीमा का कानूनन पालन, महिलाओं के लिये बराबर काम के लिये बराबर वेतन, पर्याप्त मातृत्व अवकाश, काम के स्थानों पर बच्चों की देखभाल की सुविधा व देर तक काम करने वाली महिलाओं को सुरक्षा, शामिल हैं। इनमें यूनियन बनाने के अधिकार और सामूहिक समझौता, मालिक द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करवाने के लिये हड़ताल का अधिकार तथा सभी मज़दूरों के अलंघनीय अधिकारों की संवैधानिक गारंटी, जिनमें इन अधिकारों का उल्लंघन करने वालों को कड़ी सजा के तंत्र शामिल हैं।

कृषि में लोगों का अजेंडा लागू हो सकता है जब किसानों के छोटे-छोटे खेतों को मिला कर सहकारी फार्म बनाने के लिये राज्य सहायता व मुफ्त तकनीकी सेवा प्रदान करे और लाभकारी स्थायी दामों पर राज्य द्वारा फसलों की खरीद की गारंटी हो। उपनिवेशवादी भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द करने की मांग करते हुये उन्होंने कहा कि भूमि को एक विक्रय वस्तु नहीं माना जा सकता है जिसे निजी तौर पर बेचा और खरीदा जा सकता हो। भूमि इस्तेमाल का विनियमन, खेती, उद्योग, आवास तथा दूसरी सामाजिक जरूरतों के आधार पर, एक सामाजिक योजना के अनुसार होना चाहिये। उन्होंने एक सर्वव्यापक सार्वजनिक वितरण प्रणाली की मांग रखी जिसमें अच्छी गुणवत्ता की, पर्याप्त मात्रा में, उचित दाम पर, उपभोग की सभी जरूरी वस्तुयें उपलब्ध हों। लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिये पर्याप्त संसाधन सुनिश्चिति के लिये, उन्होंने ऋण चुकाने पर रोक, सैन्यीकरण पर रोक तथा शोषकों से “काला“ धन छीनने के कुछ कदमों पर जोर दिया।

वर्तमान संसदीय लोकतांत्रिक व्यवस्था कैसे सत्ता पूंजीपतियों के हाथ में रखती है और लोगों को सत्ता से बाहर रखती है, इसकी सजीवतापूर्वक कलई खोलते हुये, कॉमरेड प्रकाश राव ने लोगों के अजेंडे को आगे रखा, जिसके लिये पूंजीवादी लोकतंत्र का पर्याय बतौर एक ऐसी राजनीतिक प्रक्रिया होगी, जिसमें फैसले लेने में लोगों की भूमिका सर्वोच्च होगी। अन्य चीजों के साथ, इसमें सभी नागरिकों के उम्मीदवारों का चयन करने, चुनने और चुने जाने के अधिकार, निर्वाचित लोगों को वापस बुलाने के अधिकार तथा कानून बनाने में पहलकदमी करने के अधिकारों की संवैधानिक गारंटी होगी। अपने राजनीतिक अधिकारों को अमल में लाने तथा निर्वाचित प्रतिनिधियों को जवाबदेह ठहराने के लिये, उन्होंने निर्वाचन-क्षेत्र समितियों की भूमिका पर जोर दिया। इसमें मज़दूर एकता कमेटी जैसे जन संगठनों की अहम भूमिका पर उन्होंने जोर दिया।

मज़दूर एकता कमेटी के जुझारू इतिहास को याद करते हुये, उन्होंने आज नज़र आ रहे विभिन्न उद्योगों व सेवा क्षेत्रों में मज़दूरों के बहादुरी के संघर्षों पर ध्यान दिलाया, जिसके फलस्वरूप राजनीतिक पार्टियों से जुड़ी सभी केन्द्रीय ट्रेड यूनियन व फेडरेशनों के नेता एक मंच पर साथ आने के लिये बाध्य हो रहे हैं। इस परिस्थिति में, पार्टियों के विभाजनों से परे होकर, मज़दूरों, मज़दूर नेताओं तथा कार्यकर्ताओं के बीच, पूंजीपतियों और लोगों के अजेंडे पर नियमित राजनीतिक चर्चा चलाना बेहद जरूरी है। ऐसी चर्चायें चलाने के लिये मज़दूर एकता कमेटी अच्छी स्थिति में है। जिन मज़दूरों पर हमला हो रहा है उनके समर्थन में, ‘एक पर हमला, सब पर हमला’ के नारे से मार्गदर्शित होकर, सहानुभूति की कार्यवाइयों के आयोजन के तंत्र विकसित करने में भी मज़दूर एकता कमेटी की महत्वपूर्ण भूमिका है।

अपने भाषण को समाप्त करते हुये, कॉमरेड प्रकाश राव ने लोगों के अजेंडे को विकसित करने के काम के बारे में पूरे आशावाद के साथ कहा: “सभागृह में उपस्थित अनुभवी साथियों और नौजवानों के जोशभरे चेहरों से मुझे पूरा विश्वास है कि भविष्य हमारा है, न कि हमारे दुश्मनों का, हालांकि आज वे शक्तिशाली लगते हैं। भविष्य हम सबका है जो समाज की समस्याओं को समाधान के लिये उठाने की हिम्मत कर रहे हैं। इस घिनौनी व्यवस्था को जीवित रखने के अजेंडे को हराना होगा। लोगों के अजेंडे को केन्द्र में लाना होगा।“

श्री हनुमान प्रसाद शर्मा ने अत्यंत कटू ढ़ंग से संसदीय पार्टियों से जुड़े केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा पूंजीपतियों के अजेंडे से सहयोग करने की राजनीति के अभ्यास का पर्दाफाश किया। मज़दूरों, खास तौर पर नौजवानों, के मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ गुस्से और निराशा की मनोदशा पर ध्यान दिलाते हुये उन्होंने राजस्थान के मज़दूरों के विभिन्न तबकों को संगठित करने के काम का वर्णन किया। ग़ाजियाबाद के वरिष्ठ ट्रेड यूनियन नेता बी. एस. सिरोही ने लोगों की जीविका पर हो रहे सबसे नये हमलों के साथ उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के कार्यक्रम के असली मकसद व सार का पर्दाफाश किया। उन्होंने बुलावा दिया कि लोगों के पर्यायी अजेंडा को व्यापक तौर पर मज़दूरों के बीच ले जाया जाये। मज़दूरों के पेंशन निधि के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सरकार ने सिर्फ दो वर्ष पहले माना था कि इनमें दसियों करोड़ रुपयों की अतिरिक्त राशि है। अब सुधारों के नाम पर वे इसे पूंजीपतियों के सुपुर्द कर देना चाहते हैं। इस राशि का इस्तेमाल मज़दूरों के लिये आवास तथा अस्पताल उपलब्ध कराने के लिये क्यों नहीं होना चाहिये? पूंजीपतियों द्वारा किसानों की भूमि के अधिग्रहण का विरोध करने की आवश्यकता का उल्लेख करते हुये उन्होंने कहा कि बहुत सी बंजर जमीनें उपलब्ध हैं जहां उद्योग चालू किये जा सकते हैं।

मुंबई के कामगार एकता चलवल के वरिष्ठ नेता, कॉमरेड मैथ्यू ने लोगों के अजेंडा के लिये अपना पूरा समर्थन जताया ताकि मेहनतकश लोगों का बढ़ता शोषण और दयनीयता खत्म की जा सके। उन्होंने जनता के बीच रेलवे मज़दूरों के अपने अधिकारों के संघर्ष और उनके लक्ष्य को लोकप्रिय बनाने और रेलवे मज़दूरों के संघर्ष को नेतृत्व देने में कामगार एकता चलवल के काम पर ध्यान दिलाया।

सम्मेलन को संबोधित करने वालों में गुडगांव के वकील और ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता राजेन्द्र पाठक, जो मारुति सुज़ुकी के मज़दूरों के हित में लड़ रहे हैं, मज़दूर एकता कमेटी के एक पुराने कार्यकर्ता, कॉमरेड मोहन नायर, मानेसर में स्थित मारुति सुज़ुकी वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष इमरान खान, एन.टी.पी.सी, के यूनियन के नेता ओ.पी. गुप्ता, वसंत विहार क्लब एम्प्लोईज यूनियन के अध्यक्ष सुखबीर, मज़दूर एकता कमेटी के कार्यकर्ता उमेश मिश्रा और ए.आई.एल.आर.एस.ए. के प्रतिनिधि गौरव मित्तल शामिल थे।

दोपहर का सत्र “महिला मज़दूरों के संगठन”  के विषय पर समर्पित था। इस सत्र की शुरुआत करते हुये, मज़दूर एकता कमेटी की कार्यकर्ता संजीवनी, जो मुंबई में मेहनतकश महिलाओं के संघर्षों को करीब 30 साल से अगुवाई देती आयी हैं, उन्होंने कहा कि इस सत्र का आयोजन करना इस बात का सबूत है कि मज़दूर एकता कमेटी ने हमेशा महिलाओं को अपने अधिकारों की रक्षा के लिये संगठित करने के काम को अहम माना है। अपने समाज में महिलाओं के सामने बहुत सी चुनौतियों पर प्रकाश डालते हुये उन्होंने ध्यान दिलाया कि पूंजीपति महिलाओं को सस्ते श्रम के स्रोत मात्र समझते हैं और शौच सुविधाओं जैसी उनकी मूलभूत जरूरतों के बारे में बिल्कुल भी चिंतित नहीं हैं। मेहनतकश महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिये मज़दूर एकता कमेटी द्वारा उठाये गये अनेक कार्यों का उन्होंने वर्णन किया, जिसमें हमेशा इस सिद्धांत की पुष्टि होती है कि संपूर्ण मज़दूर वर्ग की मुक्ति और लोगों के अजेंडे को प्रस्थापित करने के लिये महिलाओं की मुक्ति एक जरूरी शर्त है।

मज़दूर एकता कमेटी की संस्थापक सदस्या, सुचरिता, जो दिल्ली में मेहनतकश महिलाओं को संगठित करने में सक्रियता से जुड़ी हैं, उन्होंने मज़दूर एकता कमेटी की, मौजूदा पूंजीपतियों के अजेंडे बनाम लोगों के पर्यायी अजेंडे को पेश करने की, बहादुर पहलकदमी की सराहना की। उन्होंने मज़दूर एकता कमेटी द्वारा मज़दूर बतौर और महिला बतौर, महिलाओं को संगठित करने पर जोर देने की ओर ध्यान दिलाया। महिलाओं को पुरुषों की बराबरी का वेतन न देकर, न केवल उन्हें मज़दूरों के अधिकारों से वंचित रखा जाता है, बल्कि समाज में उनकी कमजोर परिस्थिति के आधार पर, उन्हें मालिकों की धमकियों और डरावने दबावों से पीडि़त किया जाता है, ताकि उनका शोषण बढ़ाया जा सके। महिलाओं को शौचालय व काम के दौरान और रात में यात्रा के समय सुरक्षा की मूलभूत सेवायें उपलब्ध नहीं हैं। वे मातृत्व सुविधा, बच्चों की देखभाल सेवा, स्वास्थ्य सेवा, आदि से वंचित हैं। कश्मीर और पूर्वोत्तर में महिलायें सुरक्षा बलों के हाथों राज्य के आतंक की शिकार बनती हैं। उन्होंने जोर दिया कि मज़दूर एकता कमेटी लोगों के अजेंडे को स्थापित करने और उन्हें समाज में फैसले लेने वाला बनाने के नजरिये से महिलाओं को संगठित करती आयी है। इसके लिये, महिलाओं को अपने काम के स्थानों और आवासीय स्थानों पर संगठित होना होगा, और चुनावों में उम्मीदवारों के चयन, निर्वाचित उम्मीदवारों की जवाबदेही, किसी भी समय उनको वापस बुलाने तथा कानून बनाने में पहलकदमी करने के तंत्र बनाने होंगे, अपने भाषण को समाप्त करते हुये उन्होंने कहा।

नौजवान मज़दूर एकता कमेटी कार्यकर्ता, रेनू नायक ने मज़दूर एकता कमेटी द्वारा महिलाओं की एकता बनाने की कोशिशों पर बात की। उन्होंने कहा कि मौजूदा राजनीतिक प्रक्रिया को स्वीकार करने के लिये, और वैधानिक निकायों में 33 प्रतिशत आरक्षण को समाधान मानने के लिये बहुत दबाव आता है। परन्तु महिलाओं पर सबसे भयंकर तरह के अपराध दिल्ली में होते आ रहे हैं, जहां की मुख्यमंत्री एक महिला है! हमारी राष्ट्रपति एक महिला रह चुकी है, हमारी प्रधान मंत्री एक महिला रह चुकी है और कई राज्यों में महिला मुख्यमंत्री हैं, परन्तु क्या महिलायें सुरक्षित हुयी हैं, उन्होंने पूछा। उन्होंने महिलाओं को समितियों में संगठित करने की जरूरत पर बात की, जिन समितियों का काम महिलाओं को सत्ता में लाने की दिशा में होना चाहिये। एक और मज़दूर एकता कमेटी की नौजवान कार्यकर्ता, छाया ने महिलाओं को संगठित करने में अनेक चुनौतियों की बात रखी। समाज में महिलायें दोहरी तरह शोषित हैं - काम के स्थान पर और घरों में भी। उन्होंने जोर दिया कि नौजवान महिलाओं के बहुत से सपने होते हैं पर गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण ये अधूरे ही रह जाते हैं। परन्तु एक बार जब वे संगठित हो जाती हैं, तब समाज में बदलाव के लिये वे एक बहुत बड़ी शक्ति बन जाती हैं, ऐसा उनका कहना था। कार्यकर्ताओं पूनम शर्मा और बॉबी नायक ने भी महिलाओं को संगठित करने के अपने अनुभवों के बारे में बातें रखी।

सम्मेलन की कार्यवाई समाप्त करते हुये संजीवनी ने सभी सहभागियों को, सक्रियता और सजीवता से भाग लेने के लिये धन्यवाद दिया। उन्होंने मज़दूर एकता कमेटी की, पूंजीपतियों के अजेंडे को हराने के लिये, लोगों के अजेंडे के महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा आयोजित करने की पहलकदमी करने पर आभार प्रकट किया। चलो, हम इस अजेंडा को लोगों के बीच ले जायें, ऐसी उन्होंने घोषणा की। पूंजीपतियों के चंद ही दिन रह गये हैं। भविष्य हमारा है, लोगों का!

एक ऐसे समय जब पूंजीपति हर दिन मेहनतकश लोगों पर हमले कर रहे हैं, मज़दूर एकता कमेटी का यह सम्मेलन बहुत ही महत्व रखता है। इसने पूंजीपतियों द्वारा अपने हमलों की सफाई में दिये झूठों का पर्दाफाश किया और इन हमलों के असली कारणों को उजागर किया - अपने लोगों के श्रम और संसाधनों के शोषण के बल पर, बड़े इजारेदार पूंजीपति घरानों को और भी अधिक बड़ा वैश्विक खिलाड़ी बनाना। सम्मलेन ने अर्थव्यवस्था के सभी क्षेत्रों के मेहनतकशों की एकता बनाने का आधार डाला, ताकि लोग खुद फैसले ले सकें और समाज के असली मालिक बन सकें।

पूंजीपतियों के खिलाफ़ मज़दूर वर्ग के संघर्ष को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बतौर मज़दूर एकता कमेटी के इस सम्मेलन को मज़दूर एकता लहर सलाम करती है।    द

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

 

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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