1984 के जनसंहार की 28वीं बरसी पर इंसाफ के लिए अभियान

‘1984 के इंसाफ के लिए अभियान’ ने सिख नरसंहार के आयोजकों को सज़ा दिलाने के लिए चलाये जा रहे अभियान के बारे में प्रेस को अवगत कराने के लिए 19 अक्तूबर, 2012 को प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में प्रेस वार्ता रखी।

लोक राज संगठन के एस. राघवन ने प्रेस वार्ता की शुरुआत करते हुए, कहा कि यह अभियान विभिन्न संगठन मिलकर संयुक्त रूप से आयोजित कर रहे हैं। सिख नरसंहार के बाद, 28 वर्ष बीत चुके हैं। अभी तक कोई इंसाफ नहीं मिला है। इस नरसंहार और उसके बाद, 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस तथा सांप्रदायिक हत्याकांड और 2002 में गुजरात नरसंहार से कई सवाल पैदा होते हैं कि क्या हम आम लोगों का, हमारे चुने हुए प्रतिनिधियों पर कोई नियंत्रण है, जब वे लोगों की रक्षा करने के उनके राज धर्म का खुलेआम उल्लंघन करते हैं? क्या सरकारी कर्मचारियों पर हमारा कोई नियंत्रण है, जब जिस पुलिस पर हमारी सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही मुँह मोड़ ले और उल्टा खूनियों तथा बलात्कारियों की रखवाली करे? क्या अपने देश की कानून व न्यायव्यवस्था पर हमारा कोई नियंत्रण है, जिसने लगातार हमें न्याय देने से इन्कार किया है और सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के राजनीतिक हित के मुताबिक अपने आप को ढाला है?

उन्होंने इस अवसर पर, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से इंसाफ की मांग को लेकर सेवानिवृत जस्टिस वी.आर. कृष्ण अय्यर द्वारा हस्ताक्षरित एक याचिका जारी की। याचिका पर हस्ताक्षर अभियान को दिल्ली, पंजाब सहित मुंबई, चेन्नई, पुणे और विभिन्न शहरों में चलाया जायेगा।

उन्होंने कहा कि इस अभियान के तहत, सुसज्जित चलित फोटो प्रदर्शनी की शुरुआत जलियांवाला बाग से 21 अक्तूबर से होकर पंजाब के विभिन्न शहरों से गुजरती हुई, दिल्ली में 26 अक्तूबर को पहुंचने की योजना है।

3 नवम्बर को संसद मार्ग पर केंडल लाइट विजिल होगी।

उन्होंने कहा कि 4 नवम्बर को ‘कमान की जिम्मेदारी’ को केन्द्र बिन्दू बनाकर, सांप्रदायिक कत्लेआम आयोजित करने वालों को सज़ा देने के लिए कानून पर एक सेमीनार, इंडियन लॉ इंस्ट्यिूट में की जायेगी। इस सेमीनार की अध्यक्षता पूर्व न्यायाधीश श्री होसबेट सुरेश करेंगे।

 

वरिष्ठ अधिवक्ता श्री एच.एस. फुल्का ने प्रेस वार्ता में बताया कि सरकारी आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली की सड़कों पर 3000 सिखों का कत्लेआम किया गया था। 28 वर्ष बीत जाने के बाद, हत्याकांड के मुख्य आयोजकों पर मुकद्दमा चलाकर उन्हें सजा देना तो दूर, बल्कि उन्हें आरोपियों के रूप में पहचाना भी नहीं गया है।

अभियान के सदस्य, पत्रकार जरनैल सिंह ने कहा कि सिखों की हत्या करने वाले गुनहगारों को सजा दिलाना तो दूर, वास्तव में 1984 के हत्याकांड के प्रमुख आयोजकों को मंत्री बनाया गया, एवं उस हत्याकांड में सक्रिय योगदान देने वाले और बाद के गत 28 वर्षों में न्याय के रास्ते में बाधा खड़ा करने वाले पुलिस तथा प्रशासन के उच्चाधिकारियों को सम्मान तथा पदोन्नति से पुरस्कृत किया गया।

बचपन बचाओ आंदोलन और सोशलिस्ट युवजन सभा के प्रतिनिधियों ने भी प्रेस वार्ता को संबोधित किया।

‘1984 के इंसाफ के लिए अभियान’ इस हकीकत का प्रतीक है कि 1984 के जनसंहार के आयोजकों को सज़ा दिलाने का संघर्ष आज भी जारी है और तब तक जारी रहेगा जब तक गुनहगारों को सज़ा नहीं मिलती है।  

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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