महिलाओं के प्रति हिंसा से मुक्त समाज के संघर्ष से सीख

महिलाओं के हकों की सुरक्षा और न्याय के लिए जारी संघर्ष, दिल्ली में चलती हुयी बस में एक 23 वर्षीय पैरा मेडिकल छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और उसकी दुखद मृत्यु से, और तीव्र हो गया है। इससे अनेक महत्वपूर्ण सीखें सामने आयी हैं।

सबसे पहली सीख यह है कि हमारे देश की सुरक्षा एवं कानून व्यवस्था आम जनता के लिए नहीं है बल्कि सिर्फ कुछ विशेषाधिकार प्राप्त लोगों के लिए ही है। कानून हर किसी के लिए समान रूप से लागू नहीं किया जाता है। इसलिए पुलिस से हर कामकाजी महिला को सुरक्षा देने की उम्मीद रखना बेकार है।

दिल्ली पुलिस ने जानबूझकर इस घटना से जुड़े सारे तथ्यों पर पर्दा डालकर रखा था जबकि उनको इस घटना के बारे में पूरा आँखों देखा हाल, उस घायल युवक से मिल चुका था, जो पीड़ित छात्रा के साथ उस बस में था। घटना के बाद किस तेज़ी से पुलिस ने कार्रवाई की सिर्फ उसी कहानी को बार-बार पुलिस लोगों को सुनाती रही। बाद में, जब चश्मदीद गवाह ने अपनी कहानी एक टीवी चैनल को बतायी तो यह साफ़ हो गया कि पुलिस कितना झूठ बोल रही है। पीड़ित छात्रा के साथ-साथ जिस युवक पर हमला हुआ था उसने बताया कि जब वे दोनों बुरी तरह जख्मी हालत में नग्न अवस्था में सड़क पर पड़े हुए थे, घटनास्थल पर पहुंची पुलिस आधे घंटे तक यह बहस करती रही कि किस पुलिस स्टेशन को इस केस की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस का यह रवैया कोई नया नहीं है बल्कि यह साफ़ दिखाता है कि किस तरह पुलिस को सिर्फ कुछ गिने-चुने लोगों के हित में काम करने का प्रशिक्षण दिया जाता है और आमतौर पर कामकाजी पुरुष और महिलाओं पर होने वाले शारीरिक हमलों पर उनकी प्रतिक्रिया कैसी होती है। तथ्यों को दबाकर लोगों को झूठी कहानियाँ सुनाई जाती हैं। इससे पुलिस को यह पता करने का समय मिलता है कि अपराधी कोई ऊंची पहुंचवाला व्यक्ति या फिर कोई वी.आई.पी. तो नहीं है जिसे बचाने की ज़रुरत हो।

सत्ता में बैठे राजनेताओं की प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि अधिकांश मेहनत करने वाले लोगों के प्रति असंवेदनशीलता और निर्दयता सिर्फ पुलिस का स्वभाव नहीं बल्कि ऊपर से नीचे तक इस पूरे राज्यतंत्र का स्वभाव है।

दिल्ली की मुख्यमंत्री श्रीमती शीला दीक्षित ने आरोपों का रुख बहुत जल्द यह कहते हुए मोड़ दिया कि दिल्ली पुलिस केंद्र सरकार के गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है न कि राज्य सरकार को। गृह मंत्री शिंदे जी ने तो राजधानी में विरोध करने वाले प्रदर्शनकारियों से मिलने से भी इन्कार कर दिया। उन्होंने प्रदर्शनकारियों पर आरोप लगाया कि वे पुलिस को कमज़ोर करने के लिए माओवादियों का सहयोग ले रहे हैं। उन्होंने लाठी चार्ज, आंसू गैस और पानी की तेज़ बौछार का आदेश देकर न्याय मांगने के लिए जमा हुए महिलाओं, मजदूरों, नौजवानों और छात्रों की भीड़ को दबाने की कोशिश की।

यह बात भी सामने आयी है कि जिस बस में जुर्म हुआ था उसके पास शहर में यात्रियों को ले जाने का परमिट नहीं था। दिल्ली में बढ़ते हुए निजीकरण और यातायात सेवाओं में गलत नीतियों की वजह से हालात ऐसे हो गए हैं कि यहाँ हर तरह की गाड़ियां पुलिस और ताकतवर राजनेताओं की सांठ-गांठ से गैर-कानूनी ढंग से चलती हैं। ऐसी बसों के ड्राइवर व कंडक्टर आमतौर पर अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट पर होते हैं जिसका मतलब है समाज के प्रति ज़िम्मेदारी और उत्तरदायित्व के स्तर को और भी गिराना। डी.टी.सी. बसों के स्थाई कर्मचारी अपनी नौकरी को जोखिम में नहीं डालेंगे जबकि एक अस्थायी कॉन्ट्रैक्ट पर नियुक्त व्यक्ति को कुछ खोने का डर नहीं है। महिलाओं की सुरक्षा के इस संघर्ष से यह साफ़ हो गया कि निजीकरण और यातायात सेवाओं में गलत नीतियाँ कितनी समाज-विरोधी हैं।

सारे तथ्यों की जांच पड़ताल करके पुलिस और अन्य सार्वजनिक संस्थाओं की भूल-चूक पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए मनमोहन सिंह की सरकार ने अब ‘मेहरा कमिशन’ नाम के एक विशेष कमिशन की नियुक्ति की है।  इस बीच दिल्ली पुलिस ने चश्मदीद गवाह के इंटरव्यू के ज़रिये केस की सारी सच्चाइयों को उजागर करने वाले टी.वी. चैनल पर यह कह कर केस कर दिया है कि चैनल ने ऐसा करने से पहले पुलिस की इजाज़त नहीं ली!

दूसरा महत्वपूर्ण खुलासा यह है कि शासक वर्ग की प्रबल विचारधारा जिसके मुताबिक इस तरह के हमलों की ज़िम्मेदार खुद महिलायें हैं। इससे साफ़ जाहिर होता है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था सिद्धांत और अभ्यास दोनों में ही महिला विरोधी है। अनेक हस्तियों ने मीडिया में महिलाओं के विरोध में अत्यधिक पिछड़े और रूढ़ीवादी विचार व्यक्त किये। एक आर.एस.एस. नेता का बयान कि महिलाओं पर ऐसे हमले सिर्फ शहरी इंडिया में होते हैं, ग्रामीण भारत में नहीं - जैसी एकदम झूठी बातों का काफी प्रचार किया गया।

अनेक ‘जन प्रतिनिधियों’ का महिलाओं पर होने वाले हमलों के औचित्य पर तरह-तरह के बयान, जिस राजनीतिक दल व वैधानिक संस्था के ये सदस्य हैं, उनके द्वारा इन लोगों पर कोई कार्रवाई नहीं किया जाना भी गौरतलब है। पश्चिम बंगाल के एक संसद सदस्य जो कांग्रेस पार्टी से हैं और हिन्दोस्तान के राष्ट्रपति के बेटे हैं उन्होंने दिल्ली में प्रदर्शन करने वाली महिलाओं को ‘लिपी-पुती महिलायें’ कहा जिसका तात्पर्य है कि इन महिलाओं और वेश्याओं में कोई फर्क नहीं है। आन्ध्र प्रदेश के एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने यह कहा कि महिलाओं का रात को घर से बाहर निकलना खतरे को निमंत्रण देने जैसा है। मध्य प्रदेश से  भाजपा के एक मंत्री ने कहा कि महिलायें अगर ‘लक्ष्मण रेखा’ पार करेंगी तो उन पर हमला होना निश्चित है।

इन सबसे यह सीख बिलकुल स्पष्ट है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए संसद की इन पार्टियों पर भरोसा नहीं करना चाहिये।

कॉर्पोरेट मीडिया में बलात्कार सम्बन्धी कानूनों को मज़बूत करने के अनेक विकल्पों की जोर-शोर से चर्चा हो रही है। मनमोहन सिंह सरकार ने बलात्कार और महिलाओं पर होने वाली अन्य तरह की हिंसाओं से सम्बन्धी कानूनों को मज़बूत करने के उपाय सुझाने के लिए ‘वर्मा कमिशन’ की नियुक्ति की है।

दिल्ली सामूहिक बलात्कार मामले से यह साफ़ ज़ाहिर हो गया है कि कैसे आम लोग पुलिस से बिल्कुल जुड़ना नहीं चाहते और यही वजह है कि सड़क पर मरते हुए किसी व्यक्ति को बचाने के लिए भी वो पुलिस को नहीं रिपोर्ट करते हैं। सामूहिक बलात्कार की पीड़िता के साथ जिस युवक पर हमला हुआ था उसने इस बात को बड़े स्पष्ट रूप से जाहिर किया था। उस युवक द्वारा निकाला गया निष्कर्ष काफी समझदारीपूर्ण था कि कानूनों को मज़बूत करने से कोई फायदा नहीं है जब तक आम लोग पुलिस के पास जाने से डरते रहें।

शासक वर्ग यही चाहता है कि सारे लोग कानूनों को मज़बूत करने के वाद-विवाद में उलझे रहें। यह जानबूझकर लोगों को गुमराह करने का एक तरीका है। कानूनों को मजबूत करना तब तक बेकार है जब तक उनको लागू करने वाले तंत्र सिर्फ गिने-चुने विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को संरक्षण देने के लिए हों।

इन सारी सीखों से यही निष्कर्ष निकलता है कि हमें फौरी तौर पर संगठित होकर आत्मरक्षा करनी होगी। हमें सामूहिक शक्ति के बल पर संगठित होकर अपनी रक्षा करनी होगी क्योंकि हम इन राजनेताओं या तथाकथित सुरक्षा बलों पर बिल्कुल निर्भर नहीं रह सकते।

मजदूर, महिलायें और नौजवान - हम सब को संगठित होकर अपनी रक्षा करनी होगी। हमें - अपनी बहनों, दोस्तों, माँ-बेटियों, साथ पढ़ने व काम करने वालों, पत्नी, महिला मित्र - इन सबकी रक्षा करनी होगी। हर इलाका जन समितियों को वहां के सारे निवासियों की सुरक्षा और खासकर महिलाओं की सुरक्षा के अनुकूल सामाजिक वातावरण सुनिश्चित करने का जिम्मा लेना होगा।

सामूहिक आत्मरक्षा के लिए तुरंत कदम उठाने के साथ-साथ हमें मौजूदा व्यवस्था एवं कानून में बुनियादी बदलाव की मांग करनी होगी और निरंतर उसके लिए लड़ना होगा। मजदूर, किसान, औरत और नौजवानों को मालिक बनाने के लिए राजनीतिक सत्ता का पुनर्गठन अनिवार्य है, जिसमें राजनीतिक पार्टियां लोगों को सशक्त करने की भूमिका निभाएं। यह जरूरी है कि कानून, सिद्धांत और अभ्यास दोनों में महिलाओं के अधिकारों पर अमल करे, वह अधिकार जो उन्हें एक महिला बतौर और एक मानव होने के नाते मिलने चाहिए। हमें एक ऐसे आधुनिक लोकतान्त्रिक राज्य के लिए संघर्ष करना होगा जिसमें किसी भी बहाने से कोई भी महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन न कर सके।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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