20 दिसम्बर की मजदूर वर्ग रैली में साक्षात्कार

20 दिसम्बर, 2012 के दिन आये दसियों हजारों मजदूरों के कुछ नेताओं से मज़दूर एकता लहर के संवाददाताओं ने बातचीत की। उनकी मांगों और संघर्षों के बारे में बातचीत करने के साथ-साथ हमने उनसे हाल में संसद में व्यापक विरोध के बावजूद खुदरा कारोबार में एफ.डी.आई. की अनुमति के बारे में प्रश्न उठाया और पूछा कि मेहनतकश लोगों को, जो समाज के 90 प्रतिशत लोग हैं, उनको सत्ता में लाने के लिये क्या करना होगा। साक्षात्कार के कुछ अंश हम नीचे प्रकाशित कर रहे हैं।

20 Dec Workers Rally, Delhi, Santosh Kumar, Mazdoor Ekta Committeeमज़दूर एकता कमेटी, दिल्ली, कॉमरेड संतोष कुमार

"पिछले कुछ एक सालों से सभी ट्रेड यूनियनें अपने झंडे को भुलाकर एक साथ, पूंजीवाद के खिलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद कर रही हैं। यह एक सकारात्मक पहल है। पूंजीवाद का मुकाबला सभी मजदूरों को, मजदूर वर्ग बतौर, मिलकर करना होगा, तभी हम इस व्यवस्था को हरा सकते हैं, अन्यथा कोई और ताकत नहीं है इसको हराने के लिये। इसीलिये हम भी इस रैली में आये हैं, और इस रैली से सभी मजदूरों को बहुत बल मिलता है।

"जब भी अवाम पर हमला करना होता है तब सभी संसदीय पार्टियां एक हो जाती हैं। जैसा कि एफ.डी.आई. पास करने के लिये इस बार हुआ है, यह पहली बार नहीं है। अगर मजदूर वर्ग के अजेंडे को केन्द्र बिन्दू बनाना है तो मजदूर वर्ग का प्रतिनिधित्व करने वालों को मजदूरों की मांगें संसद में उठानी होंगी। सभी मजदूरों को मजदूर परिषदों, ट्रेड यूनियनों व जनसंगठनों के ज़रिये अपने उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा करना होगा, जो मजदूरों की मांगों को उठायेंगे। हर प्रकार के मजदूरों को, चाहे वे शारीरिक श्रम करने वाले हों या मानसिक, आई.टी. क्षेत्र, रेलवे, एयर लाईंस, पोर्ट, सेवा क्षेत्र, डाक्टर, अध्यापक, प्रोफेसर, आदि सभी श्रमजीवियों को एक होकर मजदूरों और मेहनतकशों के अजेंडे को लेकर संघर्ष करना होगा। तब जाकर यह केन्द्र बिन्दू बनेगा, और सभी तबकों में इस पर चर्चा होगी।

“मजदूर राज्य सत्ता में जरूर आ सकता है। इतिहास में देखेंगे तो रूस में मजदूरों ने लगभग 30-32 साल राज्य सत्ता चलाई थी। देश को चलाने वाले सही मायने में उस देश के मजदूर ही होते हैं। मिसाल के तौर पर, अगर संसद, विधानसभा, न्यायपालिका, नौकरशाह, पूंजीपति, देश से निकाल दिये जायें, तब भी यह देश चलेगा। लेकिन जब मजदूर एक दिन की हड़ताल करते हैं तो पूरा देश बंद हो जाता है। यह हमने कई बार प्रत्यक्ष रूप से देखा है। सत्ता में आने के लिये सभी मजदूरों को मजदूर वर्ग का राजनीतिज्ञ बनना पड़ेगा और मजदूर वर्ग की राजनीति करनी पड़ेगी। राज्य सत्ता में हमें आने के लिये तंत्र बनाने होंगे। जैसे कि काम करने की जगहों पर मजदूरों की परिषदें, रहने की जगहों पर लोक राज समितियां, अन्य जगहों पर मजदूरों के एसोसियशनें, नौजवानों के संगठन, महिलाओं के संगठन और अन्य सभी संगठन अपने उम्मीदवारों को चुनाव में खड़ा करें। उनको जितायें परन्तु उनको वापस बुलाने का अधिकार उन संगठनों और समितियों के हाथों में हो। अगर लोग अपनी समितियां बनायें और ये संगठन तय करें तो मजदूर वर्ग राज्य सत्ता में आ सकता है।"

ऑल बंगाल टीचर्स एसोसियेशन, कॉ. रामप्रसाद हल्दार

"शिक्षा पर अपनी सरकार की नीति जनहित विरोधी है। सरकार सबको शिक्षा देने का दावा करती है परन्तु शिक्षकों के अधिकारों का हनन करती है। ये हालात तभी बदल सकते हैं जब सब मेहनतकश लोग एक साथ आकर संघर्ष बढ़ायें। पूंजीपतियों के अलग-अलग राजनीतिक दल पूंजीपतियों के अजेंडे के लिये एक साथ काम करते हैं। उनकी योजना यही रहती है कि मेहनतकश लोग हर हालत में एक साथ न आयें। अगर हमें मज़दूरों का अजेंडा स्थापित करना है तो मज़दूरों के अपने नुमाइंदे संसद में होने चाहिये। इसके बिना पूंजीवाद को उखाड़ना नामुमकिन है।"

राजस्थान रोडवेज के प्रतिनिधि

"आज मज़दूरों का दमन हो रहा है। हम मज़दूरों के न्यूनतम वेतन सुनिश्चित करने व अन्य अधिकारों के लिये संघर्ष कर रहे हैं। ठेके पर काम करवा कर बहुत से मज़दूरों के अधिकार छीने जाते हैं। हम बहुत खुश हैं कि मज़दूरों के संगठन अपनी-अपनी पार्टियों के भिन्न होने के बावजूद एक साथ यहां आये हैं। आज जरूरत है कि अलग-अलग स्थानों व कारखानों के मज़दूर, पूंजीपतियों के हमले को परास्त करने के लिये एकजुटता से संघर्ष करें। हमें सिर्फ जंतर-मंतर में आना काफी नहीं है, हमें मज़दूरों के प्रतिनिधियों को संसद तक भेजना चाहिये।"

पंजाब पावर कोर्पोरेशन के टेक्नीकल यूनियन, प्रतिनिधि कॉ. देव राज

हमारी वही मांगें हैं जो मोर्चे की मांगें हैं, अलग से कोई मांगें नहीं हैं। यह पहली बार हो रहा है कि सभी पार्टियों की यूनियनें यहां एक साथ आयी हैं। हालांकि यह व्यवस्था पूंजीपतियों के हित में चलती है परन्तु अभी तो इस व्यवस्था को बदला नहीं जा सकता है। अभी तो इसे दुरुस्त करके चलाना पड़ेगा। सच्चे आदमियों को आगे आना चाहिये।

एम.टी.एन.एल. मज़दूर संघ, कॉ. कपिल देव

"टेलीफोन विभाग के मज़दूरों की बड़ी समस्यायें हैं। हम अपनी सामूहिक समस्याओं के समाधान के लिये यहां एकजुट हुये हैं। मज़दूरों को शोषण से छुटकारा पाने के लिये बहादुरी से सामने आना चाहिये। सरकार के यहां हमारी कोई सुनवाई नहीं है। इसीलिये जितना संघर्ष हम कर सकते हैं, हमें जरूर करना चाहिये। मज़दूरों को बड़ी कुर्बानी देनी होगी, तभी मज़दूरों की सरकार बन सकती है।"

पंजाब के कॉ. राघविंदर सिंह

"हम इन मांगों को लेकर यहां आये हैं कि सभी को पेंशन व ग्रेच्युटी की सुविधा मिलनी चाहिये। निजी ठेकेदार और पूंजीपति मज़दूरों को लूट रहे हैं। इसके खिलाफ़ हमें संघर्ष करते रहना पड़ेगा। जब उत्पादन ज्यादा हो जाता है तब मज़दूरों को नौकरी से निकाल दिया जाता है, हमें इस व्यवस्था का जमकर विरोध करना चाहिये। हमें चाहिये एक मज़दूरों की सरकार जो उत्पादन की ठीक से योजना बनायेगी ताकि बार-बार संकट न हो। इसीलिये हम इस प्रदर्शन में भाग ले रहे हैं। माक्र्सवाद-लेनिनवाद का रास्ता ही मज़दूरों की भलाई में है। इसी तरह के लोगों को संसद में आना चाहिये। इससे ही देश की तरक्की होगी और लोगों का भला होगा।"

ईंट भट्ठा यूनियन, शामली, कॉ. मोहम्मद इकबाल

"हम भट्टा मज़दूरों के अधिकारों के संघर्ष को नेतृत्व देते हैं। मालिक भट्ठा नहीं चला रहे हैं। जब मज़दूर काम नहीं करता तो उसे वेतन भी नहीं मिलता है। भट्ठा न चलाने की वजह से मज़दूरों की हालत बहुत खराब है। उनकी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं हो रही हैं। वैसे भी उन्हें 6 फुट बाई 6 फुट के टीन के शेड में रहना पड़ता है और उचित पीने का पानी व शौच की व्यवस्था भी उपलब्ध नहीं होती है।"

टी.बी.आर.एल., चण्डीगढ़, कॉ. एस.के. जुनेजा

"हमारे यहां आने का सबसे पहला कारण है कि केंद्र सरकार की नीति पूरी तरह से मज़दूर विरोधी है। हम चाहते हैं कि सातवां वेतन आयोग गठित हो, 50 प्रतिशत महंगाई भत्ते को मूल वेतन में जोड़ना चाहिये, नयी पेंशन योजना को वापस लेना चाहिये तथा वेतन आयोग के लागू करने में असंगतियों को दूर करना चाहिये। हम 14 सूत्रीय मांगों को लेकर चण्डीगढ़ से आये हैं। हमारा दृढ़ निश्चय है कि फरवरी की दो दिवसीय आम हड़ताल को हम चण्डीगढ़ में सफल बनायेंगे। हाल की संसदीय कार्यवाई से साफ है कि सरकार मज़दूर विरोधी रास्ते पर ही चल रही है। वहां टाटा, बिड़ला व अंबानी के सांसद बैठे हैं जो उनका ही काम करते हैं। हमें संसद में अपने प्रतिनिधियों को भेजना पड़ेगा। 2014 के चुनावों में हमें एक निर्णायक भूमिका अपनानी पड़ेगी और मज़दूरों के उम्मीदवारों को जिताने के लिये एकता और दृढ़ता से काम करना पड़ेगा।"

ऑल इंडिया इंश्योरेंस

एम्प्लाईज ऐसोसियेशन, मेरठ, कॉ. पंकज मणी बंसल “हम एफ.डी.आई. का विरोध कर रहे हैं, और इंश्योरेंस बिल का भी विरोध कर रहे हैं जो सरकार लाना चाहती है। दोनों कांग्रेस पार्टी और भाजपा नंगे हो गये हैं; लोग साफ तरीके से देख सकते हैं कि वे कैसे देश को लूट रहे हैं। इनके विरोध में मज़दूरों को एकजुट होना होगा। मज़दूर वर्ग को सीधे तौर पर चुनावों में उतरना पड़ेगा। अपने उम्मीदवार खड़े करने पड़ेंगे। इसके सिवाय कोई और चारा ही नहीं है।“

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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