नारोडा पाटिया पर फैसला:

इंसाफ के संघर्ष को जारी रखना होगा, चाहे कितनी ही मुश्किलें हों

31 अगस्त को अहमदाबाद के एक विशेष अदालत ने नरोडा पाटिया के भयानक हत्याकांड में उनकी भूमिका के लिये भाजपा विधायक और भूतपूर्व मंत्री माया कोडनानी, बजरंग दल के नेता बाबू बजरंगी तथा 30 अन्य लोगों को दोषी ठहराया। नरोडा पाटिया का हत्याकांड उन अनेक भीभत्स घटनाओं में से एक था, जो 2002 में गुजरात में राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक कत्लेआम के दौरान सुर्खियों में थीं। दोषियों को अलग-अलग समय के लिये कारावास की सज़ा दी गई है। खास तौर पर, गुजरात के भूतपूर्व मंत्री और भाजपा विधायक मायाबेन कोडनानी को 28वर्ष जेल की सज़ा दी गई है।

अहमदाबाद के नरोडा पाटिया इलाके में, शासक भाजपा के प्रतिनिधियों की अगुवाई में, गुंडों द्वारा 90 से अधिक मुसलमानों की हत्या की गई थी, जिनमें बहुत सी महिलायें व बच्चे थे। अनगिनत चश्मदीद गवाहों ने यह बताया था कि दोषी विधायक उस इलाके में कातिलाना गुंडों को सक्रियता से अगुवाई दे रही थी और साम्प्रदायिक नफ़रत भड़का रही थी। परन्तु बीते दस वर्षों में पुलिस और अदालतों ने बार-बार उनकी गवाही के बयानों को नकार दिया था।

दस लंबे वर्षों तक गुजरात के 2002 के हत्याकांड के पीडि़त, कम्युनिस्टों, वकीलों, राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं, मानव अधिकार कार्यकर्ताओं और अनेक इंसाफ पसंद लोगों के साथ, गुनहगारों को सज़ा दिलाने तथा पीडि़तों को इंसाफ़, राहत और पुनर्वास दिलाने के लिये, तरह-तरह से संघर्ष करते आ रहे हैं। इन सभी लोगों की दिलेर और अनवरत कोशिशों की वजह से संघर्ष जारी रखा गया है, हालांकि उनके रास्ते में भारी कठिनाइयां रही हैं और रास्ते में कई कठिन मोड़ आये हैं। अदालतों, मामले से संबंधित पुलिस अफसरों व अन्य अफसरों पर, वकीलों, अभियोग पक्ष के गवाहों, पीडि़तों व उनके परिवारों पर खुलेआम राजनीतिक दबाव डाला गया कि हिंसा को आयोजित करने व अंजाम देने में शासक पार्टी और राज्य की भूमिका पर पर्दा डाला जा सके। इस लंबे अनवरत संघर्ष का परिणाम अदालत का यह फैसला है।

इस फैसले से उस बात की पुष्टि होती है जो लोग पहले से ही कहते आ रहे हैं, कि 2002 में गुजरात में साम्प्रदायिक हिंसा और कत्लेआम राज्य तंत्र की पूरी मदद के साथ किया गया था और शासक पार्टी के ऊंचे प्रतिनिधि भी कई बार हिंसा को अंजाम देने में अगुवाई दे रहे थे। यह नरेन्द्र मोदी सरकार के मुंह पर एक तमाचा है, क्योंकि मोदी ने न सिर्फ 2002 के कत्लेआम को आयोजित करने में अपनी भूमिका को नकारा है, बल्कि 2007 में कोडनानी को महिला व बाल विकास मंत्री नियुक्त करके लोगों के प्रति अपनी नफरत को भी दर्शाया है। इससे फिर यह साबित होता है कि इन अपराधों के गुनहगार चाहे कितने ही ऊंचे सरकारी पद पर हों या किसी भी राजनीतिक दल से संबंधित हों, उन्हें दोषी ठहराने व सज़ा दिलाने के संघर्ष को जारी रखने तथा और तेज़ करने की जरूरत है।

गुनहगारों को सज़ा दिलाने के संघर्ष में यह फैसला एक महत्वपूर्ण मीलपत्थर है। यह पहली बार है जब मंत्री पद के किसी महत्वपूर्ण अधिकारी को साम्प्रदायिक हिंसा के संबंध में दोषी ठहराया गया है व सज़ा दी गई है। इससे नवंबर 1984 में सिखों के जनसंहार के लिये इंसाफ के और भी लंबे समय से चल रहे संघर्ष को नयी उम्मीद व गतिशीलता मिलती है।

अगर नवंबर 1984 में दिल्ली और दूसरी जगहों में सिखों के कत्लेआम को आयोजित करने तथा अगुवाई देने वाले कांग्रेस पार्टी के कुछ नेताओं को उनके अपराधों के लिये सज़ा दी गई होती, तो शायद गुजरात के हत्याकांड को आयोजित करने वालों के लिये यह प्रतिरोधक होता। परन्तु 1984 के हत्याकांड के आयोजकों को सज़ा देना तो दूर, उन्हें मंत्री पद समेत, सत्ता के उच्च पदों पर रखा गया है। उनमें से कुछ तो आज भी कांग्रेस पार्टी की ओर से अपनी अपराधी हरकतें करते जा रहे हैं, जैसा कि हाल ही में ओडीशा में कांग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा फैलाई गई अराजकता व हिंसा से देखा जा सकता है।

राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक और गुटवादी हिंसा शासक वर्ग के हाथों में एक पसंदीदा हथियार हमेशा ही रहा है व आज भी है। इसका उद्देश्य है लोगों के संयुक्त प्रतिरोध को कुचलना, ताकि शासक वर्ग पूरे समाज पर अपना अजेंडा थोप सके। हमारे देश की वर्तमान न्याय व्यवस्था में साम्प्रदायिक हत्याकांडों को व्यक्तिगत हत्याओं के रूप से माना जाता है, न कि किसी एक या अनेक पार्टियों या सत्तासीन सरकार द्वारा आयोजित राजनीतिक अपराध के रूप में। इन मामलों में किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार को गुनहगार ठहराने का कोई प्रावधान नहीं है। सिर्फ इस या उस व्यक्ति को ही दोषी ठहराया जा सकता है और राजनीतिक पार्टियों के बडे़-बड़े नेता या ऊंचे सरकारी अफसर हमेशा ही बच जाते हैं क्योंकि उनका बल और प्रभाव बहुत ज्यादा होता है।

राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक और समुदायिक हिंसा को खत्म करने के लिये संघर्ष में लगे हुये जन संगठनों ने बार-बार कमान की जिम्मेदारी को स्थापित करने की जरूरत पर ज़ोर दिया है। अगर ऐसा किया जाये तो सरकार के ऊंचे अधिकारियों को अपने नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के अपने कर्तव्य और जिम्मेदारी का उल्लंघन करने के लिये दोषी ठहराया जा सकता है।

राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक और समुदायिक हिंसा के खिलाफ़ तथा गुनहगारों को सज़ा दिलाने के लिये लोगों के एकजुट संघर्ष को जारी रखना तथा आगे ले जाना होगा, इस उद्देश्य के साथ कि राजनीतिक सत्ता लोगों के हाथ में हो। अपने हाथ में राजनीतिक सत्ता लेकर इस देश के लोग अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों को उनके अपराधों के लिये दोषी ठहरा सकेंगे और उन्हें सज़ा दिलाने के लिये जरूरी कानून और तंत्र स्थापित कर सकेंगे, ताकि राज्य द्वारा आयोजित साम्प्रदायिक और समुदायिक हिंसा को हमेशा के लिये समाप्त किया जा सके।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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