राजन राजे महाराष्ट्र के ठाणे जिले के ट्रेड यूनियन नेता से साक्षात्कार

म.ए.ल.: पहले आप अपनी यूनियन के बारे में हमें बतायें।

श्री राजन राजे: हमारी यूनियनें ठाणे जिला, रोहा, पुणे, तलोजा, कल्याण, बदलापुर, अंबरनाथ आदि जगहों पर 70 से 80 कंपनियों में सक्रिय हैं। कुछ कंपनियों में 10 से कम कर्मचारी हैं तो कुछ कंपनियों में 400 से 450 कर्मचारी हैं।

म.ए.ल.: आपकी यूनियनें उन दूसरे यूनियनों से, जिनके नेता कई बड़ी हस्तियाँ हैं, किस तरह अलग हैं?

श्री राजन राजे: पहली बात तो यह है कि वे “मेरी” यूनियनें नहीं हैं। इन सभी जगहों पर यूनियनें, एक चुनी हुई कमेटी के अंतर्गत हैं। स्वयं मैं और मेरे साथी श्री विक्रांत कर्णिकजी, सभी यूनियनों के अध्यक्ष तथा कार्याध्यक्ष हैं। मगर हर कमेटी का काम जनतांत्रिक तरीके से चलता है। उन्हीं में से नेतृत्व तैयार करना यही हमारा मकसद है। यूनियन का काम हम इस तरह संगठित करते हैं ताकि इस तरह का नेतृत्व तैयार हो सके। यूनियन कमेटी के कुछ सदस्य हमेशा हमारे साथ रहते हैं जब हम मालिक, पुलिस या किसी सरकारी अफसर से मिलते हैं। इसका अच्छा नतीजा हुआ है। हमें बड़ी खुशी है कि अब हमारे कई कमेटी सदस्य निडरता से मालिक, पुलिस तथा सरकारी अफसरों के साथ पेश आते हैं। कई गेट मीटिंग भी करते हैं।

म.ए.ल.: आपकी राय में निजीकरण, उदारीकरण की नीतियों का श्रमजीवियों पर क्या असर हुआ है?

श्री राजन राजे: मैं बेझिझक कहूँगा कि इन नीतियों का श्रमजीवियों पर बहुत ही बुरा असर हुआ है। पूँजीपतियों को हर तरह की रियायतें दी गईं मगर श्रमजीवियों की जीविका की रक्षा के लिए कोई कदम नहीं उठाये गए। ठेका मजदूरी प्रथा तथा आउटसोर्सिंग से काम कराना अब और आसान हो गया है। ठेका मजदूरों की संख्या बहुत बढ़ गई है। फैक्टरियों में या कार्यालयों में हजारों या सैकड़ों स्थायी श्रमजीवियों की जगह पर अब कुछ सैकड़ों या बहुत ही कम स्थायी श्रमजीवी बचे हैं। 100से कम की संख्या जिधर है उन्हें बंद करना अब कानूनन बहुत आसान हो गया है। “बड़े छत की जगह पर अब बस छोटा सा छाता बच गया है। रोजगार नहीं बल्कि रोजमर बच गया है।” इन नीतियों के चलते विशेषकर ठेका मजदूरों की हालत और भी बिगड़ गयी है। ठेका मजदूरी यानि एक बहुत बड़ी अस्पृश्यता है। स्थाई कर्मचारियों को जो सुविधायें मिलती हैं वे उन्हें नहीं दी जाती। ज्यादातर कंपनियों में कंपनी की बस या वाहन में ठेका मजदूरों को बैठने की इजाज़त नहीं दी जाती। उनके लिये पीने का पानी, शौचालय और कपड़े बदलने की जगह भी अलग ही होती है। यह छुआछूत नहीं तो और क्या है?

म.ए.ल.: इन नीतियों के चलते मजदूरों के शोषण के स्तर में क्या फर्क हुआ है?

श्री राजन राजे: कई दूसरे देशों में जहाँ पर काम का स्वरूप अस्थायी होने के कारण ठेका मजदूर रखने की इजाज़त अगर दी गई तो ठेका मजदूरों को स्थाई मजदूरों की तुलना में कई गुना ज्यादा वेतन दिया जाता है। मगर अपने देश में पूरे साल चलने वाले काम को करने के लिये भी ठेका मजदूर रखे जाते हैं और उन्हें बहुत कम वेतन दिया जाता है। गत 20साल में स्थाई मजदूरों को बड़ी संख्या में स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति देकर उनकी जगह पर बहुत कम वेतन पर ठेका मजदूरों को रखा गया है। आधुनिक तकनीकी ज्ञान की वजह से मानवीय श्रम से पैदा होने वाला अतिरिक्त मूल्य बहुत ज्यादा बढ़ गया है। इसका मतलब काम करने के घंटे कम और वेतन ज्यादा बढ़ना चाहिये था। मगर हुआ इसके उलट है। छोटे उद्योगों के सरमायदार मालिकों के मुनाफे भी बहुत बढ़ गये हैं। इसका मतलब स्पष्ट है कि गत 20साल में शोषण का स्तर बहुत ज्यादा बढ़ गया है। निजीकरण-उदारीकरण के समर्थक कहते हैं कि “पहले संपत्ति की गंगा पैदा होने दीजिये, फिर वह गंगा सबके घरों तक पहुंचेगी।” असल में हुआ यह कि वह संपत्ति पैदा हो गई बहुत बड़े पैमाने पर मगर वह गंगा श्रमजीवियों के घर को नजरअंदाज करके आगे निकल गई!

म.ए.ल.: न्याय व्यवस्था तथा सरकारी अफसर यानि कि नौकरशाही के बारे में गत 20 साल में क्या अनुभव हैं?

श्री राजन राजे: श्रमजीवियों के हितों के खिलाफ़ यह परिवर्तन हम स्पष्ट रूप से अनुभव करते हैं। ठेका मजदूरी प्रथा को न्यायोचित बताने के लिये बहुत मोटी घूस दी गई है। मीडिया में यह अक्सर कहा जाता है कि हाई कोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की संपत्ति में बहुत ज्यादा वृद्धि हुई है। श्रम कानूनों का विविध न्यायालयों में इस तरह से मतलब निकाला जाता है जिससे कि मलिकों का हितरक्षण हो। कानूनी संघर्ष अब और मुश्किल हो गया है। ठेका मजदूर नियमन तथा बंदी कानून को ठेका मजदूरी को न्यायोचित बताने के लिये इस्तेमाल किया गया है। हम बहुत लंबे समय से किसी मालिक के यहाँ नौकरी कर रहे हैं, यह साबित करना अब करीब-करीब नामुमकिन हो गया है। महाराष्ट्र में तो बड़े राजनीतिक नेताओं के और मंत्रियों के रिश्तेदार या चमचे खुद ठेका मजदूरों के बड़े ठेकेदार हैं। सरकारी अफसर तो हमेशा ही श्रमजीवियों के खिलाफ़ ही थे। उन्होंने कभी भी मजदूरों की मदद नहीं की। मगर अब तो वे पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक हुए हैं। कई बड़े अफसर अब बहुत ही ज्यादा दौलतमंद हैं। उनके पास इतनी दौलत कहाँ से आई? प्रशासन के श्रम विभाग को कोई अधिकार नहीं जिससे वे सरमायदार की मनमानी पर अंकुश रख सके। मगर श्रमिकों को संघर्ष से रोकने के अधिकार उनके पास हैं। वे तो सिर्फ श्रमिकों को थकाने वाली उनके पैर में जंजीर बतौर पेश आते हैं। “श्रम मंत्री” अपनी करतूतों से यह साबित करते हैं कि असल में वे “मालिक मंत्री” हैं!

म.ए.ल.: क्या पुलिस के साथ भी यही अनुभव है?

श्री राजन राजे: सभी दमनकारी राज्य, फिर वह रशिया के ज़ार का हो या फ्रांस की राजशाही हो, बगावत को कुचलने के लिये दमन तंत्र का इस्तेमाल करते हैं। अपने देश में भी पुलिस ही नहीं बल्कि फौज को भी श्रमिकों पर हमला करने की पूरी आज़ादी है। अब हम यह देखते हैं कि दफा 144जैसा कानून महाराष्ट्र में कई जगहों पर पूरे सालभर लगातार जारी किया जाता है! पहले तो मजदूरों के संघर्ष तोड़ने के लिये गुंडों का इस्तेमाल किया जाता था। मगर अब हमारा यह अनुभव है कि पुलिस खुलेआम यह काम करती है!

म.ए.ल.: अब जब आर्थिक सुधारों की अगली लहर के बारे में बातें हो रही हैं, तब आपके विचार से श्रमजीवी वर्ग को क्या करना चाहिये?

श्री राजन राजे: पहले तो हमें उदारीकरण तथा निजीकरण के दुष्परिणामों की सच्चाई आम लोगों को बताना चाहिये। बिना किसी समझौते के हमें उन नीतियों का विरोध करना चाहिये। मजदूर सिर्फ अपनी खुद की एकता पर ही निर्भर रह सकते हैं, न कि किसी बड़ी राजनीतिक पार्टी के बड़े नेता पर। हमें बड़ी सावधानी से उन सभी कानूनी हकों का इस्तेमाल संघर्ष के लिये करना चाहिये जो अब भी बरकरार है जैसे कि आर.टी.आई. कानून। स्थाई मजदूर को मासिक 15000 रुपये वेतन तथा अस्थाई एवं ठेका मजदूरों को रोजाना 1000 रुपया यानि कि स्थाई मजदूरों के दुगुना वेतन के लिये हमें संघर्ष करना चाहिये। छोटे से लेकर बड़े फैक्टरियों तथा कंपनियों में सभी जगह पर हर कर्मचारी का रोज का रिकार्ड रखने के कड़े कानून के लिये हमें संघर्ष करना चाहिये। हमें ऐसे कानून की माँग करनी चाहिये ताकि इस तरह के रिकार्ड न रखने या उन्हें छिपाने के लिए गैर-जमानती वारंट तथा कम से कम 6महीने सश्रम कारावास की सजा हो। सभी वेतन चेक द्वारा दिया जाये और वह भी उपस्थिति रिकार्ड के साथ यह माँग भी हमें रखनी चाहिये।

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पार्टी के दस्तावेज

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


पी.डी.एफ. डाउनलोड करनें के लिये चित्र पर क्लिक करें

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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