सिंडिकेट वाईपर के मज़दूरों और उनकी यूनियन के नेताओं पर हो रहे हमलों की कड़ी निंदा करो!

नयी मुंबई में स्थित एक कारखाने के मज़दूरों और उनकी यूनियन के नेताओं पर मालिक के भाड़े के गुंडों द्वारा हमले किये गये।

सिंडिकेट वाईपर सिस्टम्स लिमिटेड गाड़ियों के वाईपर बनाने वाली कंपनी है तथा हिन्दोस्तान की अनेक ऑटो कंपनियों का प्रमुख सप्लायर है। इसके 11 कारखाने हैं जो चेन्नई और उत्तरांचल के साथ-साथ महाराष्ट्र के विभिन्न स्थानों में स्थित हैं। बड़ी संख्या में छोटे-छोटे कारखाने खोलने की चाल बहुत से पूंजीपति चलाते हैं ताकि वे विभिन्न सरकारों द्वारा दी जाने वाली रियायतों का फायदा उठा सकें और उन श्रम कानूनों तथा विनियमों से बच सकें जो बड़े कारखानों पर लागू होते हैं पर छोटे कारखानों पर लागू नहीं होते हैं। जैसा कि बहुत सी दूसरी कंपनियों में भी किया जाता है, सिंडिकेट वाईपर में भी स्थायी मज़दूरों के मुकाबले बहुत बड़ी संख्या में ठेका मज़दूरों से काम कराया जाता है। नयी मुंबई के कारखाने में करीब 120 मज़दूर स्थायी नौकरी पर हैं, जबकि 300 से भी अधिक बदली मज़दूर हैं। बदली मज़दूर का मतलब है कि जरूरत के मुताबिक मालिक किसी एक दिन ज्यादा या कम मज़दूरों को काम पर लगा सकता है और अलग-अलग दिन अलग-अलग मज़दूर काम पर हो सकते हैं!

जब पिछला समझौता समाप्त हुआ तब स्थायी मज़दूर चाहते थे कि उनकी पुरानी यूनियन नये समझौते की बातचीत करे। जब इस यूनियन ने समझौते पर पैर घसीटने शुरू किये तब मज़दूरों ने इस साल की अप्रैल में निर्णय लिया कि वे अपने एक नये आंतरिक यूनियन का गठन करेंगे। पहले स्थायी मज़दूर 12 घंटे दैनिक काम करते थे और ओवरटाईम को मिलाकर उन्हें 8,000 रु. से कम वेतन मिलता था। अप्रैल से उन्होंने मालिक को चुनौती देने के लिये सिर्फ 8 घंटे काम करना शुरू कर दिया हालांकि उनकी मासिक आमदनी में कटौती हुयी। अप्रैल में उन्होंने अपना मांगपत्र भी पेश किया। परन्तु मालिकों ने उनके साथ चर्चा करने से इनकार कर दिया। इसकी जगह उन्होंने कारखाने में गुंडों को लाना शुरू कर दिया। मज़दूरों की यूनियन ने 22 जुलाई से हड़ताल करने का कानूनी सूचनापत्र मालिकों को दिया। यूनियन ने न्यायालय से मालिक के लिये एक आदेश ले लिया जिसके अनुसार मालिक कारखाने से कोई भी माल या मशीनें बाहर नहीं ले जा सकते थे। न्यायालय के आदेश के अनुसार सिर्फ उन्हीं बदली मज़दूरों को नौकरी की अनुमति दी जा सकती है जिनके पास भविष्य निधी (प्राविडेंट फंड) और ई.एस.आई.सी. कार्ड हो। यूनियन हड़ताल की तैयारी कर रही थी परन्तु पूंजीपति मालिक ने कुछ और ही योजना तैयार की।

शनिवार 21 जुलाई के दिन पहली पारी में जाने वाले स्थायी मज़दूरों ने देखा कि बड़ी संख्या में एकदम अनजाने ठेका मज़दूर अंदर आ रहे थे। मालिकों के पास सिर्फ 50 तक ठेका मज़दूरों को लगाने की अनुमति है। यूनियन के सदस्यों ने ठेके पर लिये जा रहे मज़दूरों के प्रोविडेंट फंड और ई.एस.आई.सी. कार्ड देखने की मांग की। कुछ मज़दूरों ने तुरंत पुलिस स्टेशन में संपर्क किया कि न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुये, मालिक गुंडों को ला रहा है। स्थानीय पुलिस स्टेशन के प्रभारी ने घमंड से कहा कि ''वह सोमवार के दिन आयेगा!''। चार मज़दूर खुद पुलिस स्टेशन गये परन्तु पुलिस को कारखाने में भेजने की जगह इन मज़दूरों को हिरासत में ले लिया गया। इस बीच कारखाने में मौजूद गुंडों ने मज़दूरों पर शारीरिक तौर पर हमला शुरू कर दिया और कारखाने में तोड़-फोड़ शुरू कर दी। पांच से भी ज्यादा मज़दूर गंभीर तरीके से जख्मी हुये। एक घंटे के बाद पुलिस कारखाने पहुंची और, जैसे कि उन्हें इशारा किया गया हो, गुंडे वहां से भाग गये। गुंडों को पकड़ने की जगह, पुलिस ने मज़दूरों पर ही हमला शुरू कर दिया और यूनियन के अध्यक्ष के साथ मज़दूरों को हिरासत में लेना शुरू कर दिया। कुल मिला कर 25 मज़दूरों और उनके यूनियन के नेताओं को हिरासत में लिया गया और उन पर ''आग लगाने'', ''कातिलाना हमला करने की कोशिश'', ''दंगा फसाद करना'', आदि आरोप लगाये गये। ऐसा करने का मकसद था कि उन्हें जमानत न मिले और पूरे संघर्ष को कुचला जा सके। परन्तु अगले दिन जब हिरासत में लिये गये मज़दूरों को न्यायालय में लाया गया तब वहां अलग-अलग कारखानों के 300 से भी अधिक मज़दूर तथा अलग-अलग संगठनों के कार्यकर्ता मौजूद थे। यूनियन के नेता जो हिरासत में नहीं लिये गये थे उन्होंने फुर्ती से यह सुनिश्चित किया कि हर एक हिरासत में लिये गये मज़दूर के लिये ''जमानत की सुनिश्चिति'' के लिये एक व्यक्ति तैयार था। इस कोशिश की वजह से और 21 जुलाई के दिन गुंडों को कारखाने में न घुसने देने के लिये मज़दूरों द्वारा पुलिस को बार-बार बुलाने के प्रयासों के सबूतों की वजह से न्यायाधीश को सभी हिरासत में लिये गये मज़दूरों को जमानत पर रिहा करना पड़ा।

21 जुलाई की इस घटना के बाद कारखाने के समीप रहने वाले मज़दूरों को गुंडे घमकियां दे रहे हैं। सभी को पता है कि ये गुंडे एक शक्तिशाली स्थानीय राजनेता के वेतन भोगी हैं जो सरकार का एक राज्य मंत्री है और खुद एक बहुत बड़ा श्रम ठेकेदार है। परन्तु इस हमले से डरने की बजाय, मज़दूर अपने अधिकारों के लिये लड़ने के लिये और भी दृढ़ हो गये हैं। इस इलाके के बहुत से दूसरे मज़दूरों और अन्य दूसरे संगठनों ने संघर्षबध्द मज़दूरों को समर्थन दिया है।

जैसा कि ऐसी घटनाओं में होता है, स्थानीय समाचार मीडिया ने सिंडिकेट वाईपर के मज़दूरों के खिलाफ पूरी तरह का झूठे प्रचार का अभियान शुरू किया है कि मज़दूरों ने कारखाने में तोड़-फोड़ की और यहां तक कि आग लगाने की कोशिश की। स्थानीय मीडिया ने यह भी मांग रखना शुरू किया कि ''मज़दूरों के खिलाफ़ कड़ी कार्यवाई होनी चाहिये'' और ''विभिन्न कानूनों पर पुनर्विचार होना चाहिये जिनके तहत मज़दूरों को आंदोलन करने की छूट मिलती है'' ताकि मज़दूरों की बहादुर कार्यवाइयों पर रोक लगायी जा सके। विभिन्न पूंजीपतियों और उनके प्रवक्ताओं ने यह कहना शुरू कर दिया है कि ''मज़दूरों की ऐसी कार्यवाइयों से कारोबार के लिये असुरक्षित वातावरण पैदा होता है'', आदि। उनका मकसद है कि लोगों की नजरों में मज़दूरों को बदनाम किया जाये ताकि ''श्रम सुधार'' किये जा सकें जो हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के मुनाफे अधिकतम करने के लिये सहायक हों। सिंडिकेट वाईपर के मज़दूरों पर हो रहे हमलों की मज़दूर एकता लहर कड़ी निंदा करती है और राजनेताओं व सरकारी तंत्रों की भर्त्सना करती है जो खुल्लम-खुल्ला सिंडिकेट वाईपर के पूंजीपति मालिकों की तरफदारी कर रहे हैं। 

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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