हिन्द-ईरान संबंधों में साम्राज्यवादी दखलंदाजी का विरोध करें!

ईरान से हिन्दोस्तान के संबंध, जो प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक बहुत गहरे रहे हैं, अब अमरीकी साम्राज्यवाद के नेतृत्व में ईरान पर हमलावर कार्यवाइयों से दबाव में आ रहे हैं। यह तब देखा गया जब हिन्दोस्तान ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के विचार-विमर्श में, अमरीका तथा दूसरे साम्राज्यवादियों के समर्थन में और ईरान के खिलाफ़ मत दिया। ईरान से हिन्दोस्तान द्वारा कच्चे तेल के आयात में 2010-11 के 185 लाख टन के मुकाबले इस वित्त वर्ष के अपेक्षित 155 लाख टन की गिरावट से भी यही देखा जा सकता है।

जुलाई के महीने में अमरीका के नेतृत्व में ईरान पर लगाये गये प्रतिबंधों से हिन्द-ईरानी आर्थिक संबंधों को और भी नुकसान हुआ। इरानो हिन्द शिपिंग कंपनी, जो शिपिंग कार्पोरेशन ऑफ इंडिया (एस.सी.आई.) और इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान शिपिंग लाईंस की संयुक्त कंपनी थी, इसको बंद होना पड़ा। यह कंपनी 1974 में बनायी गयी थी और तब से लगातार कारोबार करती आयी है, परन्तु 2010 में इसको संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिबंधों के घेरे में लाया गया था। अमरीकी प्रशासन निशाना बना कर ईरानी कंपनियों के पीछे पड़ा है, क्योंकि उसके कहने के अनुसार ईरानी जहाजरानी कंपनियां प्रतिबंधों के घेरे से बचने के लिये ''भ्रामक व्यवहार'' का इस्तेमाल कर रही हैं, जैसे कि अपने जहाजों का पंजीकरण बदलना। एस.सी.आई. के अध्यक्ष और प्रंबंध निर्देशक एस. हाजरा के अनुसार, ''चार्टर कंपनियां प्रतिबंधित जहाजों को किराये पर उठाने को तैयार नहीं हैं। संयुक्त कंपनी अपने जहाजों को इस्तेमाल नहीं कर पा रही है अत: उसे बंद करना पड़ा है।''

इरानो हिन्द शिपिंग कंपनी के बंद होने के कुछ ही वक्त बाद, यह भी उजागर हुआ है कि संप्रग सरकार ने अब ईरानी जहाजों को हिन्दोस्तानी समुद्री क्षेत्र में आने से रोक लगा दी है। ऐसा तब किया गया जब अमरीका ने नेशनल इरानियन टेंकर कंपनी के सभी 58 जहाजों को प्रतिबंध के घेरे में लिया। हिन्दोस्तानी समुद्री क्षेत्र से ईरानी जहाजों पर रोक से मेंगलोर रिफाइनरीज एण्ड पेट्रोकेमिकल्स लिमिटेड (एम.आर.पी.एल.) के कच्चे तेल की आपूर्ति में जबरदस्त चोट पंहुची है। एम.आर.पी.एल. के प्रंबंध निर्देशक पी. पी. उपाध्याय ने बताया कि ''हम जुलाई से 90,000 टन वाले चार टेंकर कच्चा तेल आयात करने वाले थे, परन्तु हमें सिर्फ एक ही मिला क्योंकि सरकार ने सी.आई.एफ. की अनुमति नहीं दी।'' ईरानी कच्चे तेल में कमी की भरपाई के लिये उन्हें ऊंचे दामों पर हाजिर बाजार से दुगुनी कीमत पर कच्चा तेल खरीदना पड़ा है।

मई में अमरीकी राज्य सचिव हिलरी क्लिंटन के दौरे के बाद बड़ा मुद्दा बनाया गया था कि हिन्दोस्तान पर, ईरान के साथ व्यापार करने के बावजूद, प्रतिबंध नहीं लगये गये थे क्योंकि वह खुद ही इस देश से आयात में कटौती करने के लिये राजी था। ताजा घटनायें दिखाती हैं कि हिन्दोस्तान और ईरान के बीच के संबंधों को तोड़ने के लिये, अमरीका कठोरता से लगातार दबाव डालता आया है। इससे हिन्दोस्तान और ईरान के बीच के संबंधों के सभी पहलुओं पर प्रभाव पड़ रहा है। चूंकि हिन्दोस्तान ईरान के पड़ौस में एक विशाल देश है, जिसके घनिष्ट ऐतिहासिक संबंध रहे हैं, ईरान को घेरने और कमजोर करने की कोशिशों में अमरीकी साम्राज्यवादी हिन्दोस्तान को एक महत्वपूर्ण कारक मानते हैं। अपने आदेशपालन के लिये वे ब्लैकमेल और ''इनाम'' दोनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उनकी कोशिश है कि हिन्दोस्तान अपनी तेल की जरूरत साऊदी अरब, कतर और इराक जैसे अमरीका के सहयोगी देशों से पूरी करे। अभी से ही हिन्दोस्तान, ईरान के मुकाबले इराक से ज्यादा कच्चा तेल खरीद रहा है। इस मुद्दे पर हिन्दोस्तानी सरकार की नीति सिध्दांतहीन है, और प्रतिबंधों के सामने मजबूरी बताकर, सरकार लगातार ईरान से संबंध तोड़ती जा रही है। यह सिध्दांतहीन नीति हिन्दोस्तानी लोगों के हित के खिलाफ़ है, और ऊर्जा व देश की दूसरी जरूरतों की पूर्ती से मेल नहीं खाती है। 2010-11 और 2011-12 के बीच, हिन्दोस्तान का कच्चा तेल आयात की कीमत औसतन प्रति बैरल 27 अमरीकी डॉलर बढ़ गयी है। इसकी वजह से हिन्दोस्तान का कच्चे तेल का खर्चा सालाना 100अरब अमरीकी डॉलर से बढ़कर 140अरब अमरीकी डॉलर तक पहुंच गया है। यह बहुत जबरदस्त 40  प्रतिशत अधिक खर्चा है जिसका भुगतान हिन्दोस्तानी लोगों को करना पड़ रहा है।

हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग और लोगों को, ईरान के प्रश्न पर हिन्दोस्तानी सरकार की सिद्धांतहीन और मौकापरस्त नीति और उसके अमरीकी साम्राज्यवाद के दबाव के सामने घुटने टेकने का विरोध करना चाहिये। साम्राज्यवादी आधिपत्य का लगातार विरोध करने के लिये, ईरानी लोगों पर अमरीकी साम्राज्यवाद का निर्दयी हमला हो रहा है। हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग व लोग भी हर तरह के साम्राज्यवादी आधिपत्य व आक्रमण का विरोध करते हैं। ईरान व हिन्दोस्तान के बीच के रिश्ते हमेशा से घनिष्ट रहे हैं। अपने रिश्तों पर अमरीकी व दूसरे साम्राज्यवादी दबाव और आपसी मामलों में बाहर की दखलंदाजी का हमें कड़ा विरोध करना चाहिये, और हिन्दोस्तानी सरकार से मांग करना चाहिये कि वह भी इसका दृढ़ता से विरोध करे।

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पार्टी के दस्तावेज

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पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि
उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई
विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है।
इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि
लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि
पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को।
यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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इस दस्तावेज़ “किस प्रकार की पार्टी” को, कामरेड लाल सिंह
ने हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय कमेटी की
ओर से 29-30 दिसम्बर, 1993 में हुई दूसरी राष्ट्रीय सलाहकार
गोष्ठी में पेश किया था।


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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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