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  • अमरीकी दखलंदाज़ी का डटकर विरोध करें!

    27 मई को अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने खुलेआम ऐलान किया कि "हमने दोनों हिन्दोस्तान और चीन को बता दिया है कि उनके बीच में इस समय चल रहे सीमा विवाद को लेकर, अमरीका मध्यस्तता करने को तैयार, राज़ी और सक्षम है"।  

    अमरीकी राष्ट्रपति की इन बातों से यह साफ़ पता चलता है कि हिन्दोस्तान और चीन के बीच में चल रहे सीमा विवाद का इस्तेमाल करके अमरीका इस इलाके में अपने हितों को बढ़ावा देना चाहता है। यह दोनों, हिन्दोस्तान और चीन के लिए तथा एशिया में शांति के लिए बहुत ख़तरनाक है। हिन्दोस्तान, चीन और इस इलाके के सभी देशों के लोगों को इसका डटकर विरोध करना चाहिए।

  • लाखों लोग सड़कों पर उतर पड़े थे, पैसों और काम के अभाव ने उन्हें पैदल चलने के लिए विवश कर दिया था। महाराष्ट्र-मध्य प्रदेश की सीमाओं पर पचासों किलोमीटर लम्बा ट्रकों का जाम लगा जिसमे सिर्फ मज़दूर और उनके परिवार भरे थे। मज़दूर परिवारों की बड़ी तादाद अभी भी बाकी थी जिन्होंने सब्र का लिबास ओढ़ रखा था, उनकी आशाएं भारतीय रेल की ओर टिकी थीं। आखिरकार भारतीय रेल का मौन टूटा परन्तु मज़दूर परिवारों को सिर्फ निराशा ही हाथ लगी।
  • KEM-hospital_nurses_protest

    के.ई.एम. अस्पताल के मज़दूरों ने 26 मई को सुबह 7 बजे से दोपहर 12:30 बजे तक अस्पताल में धरना प्रदर्शन किया। इन मज़दूरों ने अस्पताल के अधिकारियों की लापरवाही की वजह से अपने एक साथी की मौत हो जाने खि़लाफ़ धरना प्रदर्शन आयोजित किया।

  • Mughal Sarai

    26 मई को भारतीय रेल के पंडित दीन दयाल उपाध्याय रेलवे स्टेशन (मुगल सराय) पर टिकट चेकिंग कर्मचारियों को रेल प्रशासन के खि़लाफ़ धरना देना पड़ा।

  • Belgian_nurses_turn_their_backs_on_PM

    17 मई को बेल्जियम के डॉक्टरों और नर्सों ने, स्वास्थ्य-सेवाओं में अप्रशिक्षित नर्सिंग स्टाफ को काम में लगाये जाने के, बेल्जियम सरकार के फरमान के खि़लाफ़ एक मूक लेकिन शक्तिशाली विरोध प्रदर्शन किया।

    बेल्जियम की प्रधानमंत्री सुश्री सोफी विल्मेस की ब्रसेल्स में सेंट पीटर अस्पताल की यात्रा के दौरान, डॉक्टरों और नर्सों ने अस्पताल के प्रवेश द्वार के दोनों ओर दो पंक्तियों में खड़े होकर अपना विरोध प्रदर्शन किया। और जैसे ही प्रधानमंत्री की कार अस्पताल के प्रवेश द्वार के पास पहुंची, उनमें से प्रत्येक ने अपने स्थान में खड़े रहकर, उलट कर अपनी पीठ दिखाकर अपना विरोध प्रकट किया। इस मूक लेकिन बहुत ही जबरदस्त विरोध को व्यापक रूप से मीडिया में भी प्रसारित किया गया।

  • Defence Employees Against Corporatisation

    इस समय सरकार कोविड-19 की महामारी और लॉकडाउन के बहाने देश के श्रम कानूनों में पूंजीवादी संशोधन करके और मज़दूर वर्ग के अधिकारों को कुचलकर एक जबरदस्त बदलाव लागू करने की कोशिश कर रही है। इन हमलों के खि़लाफ़ अपना कड़ा विरोध व्यक्त करने के लिए देशभर के विभिन्न क्षेत्रों के मज़दूरों ने धरना प्रदर्शन और अन्य विरोध प्रदर्शन आयोजित किये हैं।

  • 22 मई को देशभर में कोविड-19 के रोगियों का उपचार करने वाले डॉक्टर और स्वास्थ्य मज़दूरों ने केंद्र और कुछ राज्यों के स्वास्थ्य विभागों द्वारा जारी परिवर्तित क्वारंटाइन दिशा-निर्देशों के खि़लाफ़ विरोध प्रदर्शन किया। हमें याद होगा की स्वस्थ्य मंत्रालय ने 15 मई को कोविड-19 के रोगियों का उपचार करने वाले स्वास्थ्य मज़दूरों के लिए क्वारंटाइन नियमों में बदलाव घोषित किये थे। बदले हुए नियमों के अनुसार कर्मचारियों को केवल तब क्वारंटाइन किया जाएगा जब वे किसी ”अति ख़तरे वाले रोगी के संपर्क“ में आएंगे या अगर उन कर्मचारियों में कोविड-19 के लक्षण पाए जाएंगे।  जबकि पहले के नियमों के अनुसार, सभी कर्मचारियों को 14 दिनों की कोविड ड्यूटी के बाद 14 दिन के लिए क्वारंटाइन करने की सलाह थी।
  • Sanitation workers in Amaravati

    22 मई को आंध्र प्रदेश राजधानी राजधानी क्षेत्र अमरावती में ए.पी.सी.आर.डी.ए. (एपी कैपिटल रीजन डेवलपमेंट अथॉरिटी) द्वारा अनुबंध पर रखे गए 550 स्वास्थ्य एवं सफाई मज़दूरों ने विरोध प्रदर्शन किए। उन्होंने अपने पिछले 4 के महीने के बकाया वेतन की मांग उठाई।

  • 15 मई को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कृषि को बढ़ावा देने के लिए सहायता के नाम पर “एक लाख पचास हजार करोड़ रुपये” के पैकेज के साथ तमाम कई नीतियों में बदलाव का ऐलान किया। प्रधानमंत्री ने दावा किया कि इससे किसानों की आय में बढ़ोतरी होगी। लेकिन इन घोषणाओं का नजदीकी से मूल्यांकन करने से यह नज़र आता है कि इससे किसानों को तुरंत राहत देने की ज़रूरत बिलकुल भी पूरी नहीं होती है। इसके ठीक विपरीत, वित्तीय पैकेज और नीतिगत बदलाव पूंजीवादी कंपनियों द्वारा किसानों की लूट के दायरे को और अधिक विस्तृत करने के मक़सद से किये जा रहे है।
  • मजदूर एकता कमेटी का आह्वान, 18 मई, 2020

    मज़दूर साथियों,

    कोरोना वैश्विक महामारी के नाम पर केंद्र सरकार द्वारा घोषित आपातकालीन स्थिति का फायदा उठाकर, पूंजीपति वर्ग हमारे अधिकारों पर अप्रत्याशित हमले कर रहा है।

    आज देश में विशाल पैमाने का संकट है। देश व्यापी लॉक डाउन, जिसके दो महीने पूरे होने जा रहे हैं, की वजह से करोड़ों-करोड़ों मज़दूरों ने अपनी नौकरियां और रोजी-रोटी के स्रोत खो बैठे हैं। करोड़ों भूखे और बेरोज़गार मज़दूर, जिनके सर के ऊपर छत भी नहीं है, अब हज़ारों मीलों दूर अपने गाँवों को पहुँचने के लिए, खेतों, जंगलों, रेल की पटरियों और महामार्गों पर चल पड़े हैं। सैकड़ों पुरुष, स्त्री और बच्चे चलते-चलते, भूख, थकान या दुर्घटनाओं के कारण दम तोड़ चुके हैं।

  • 22 मई, 2020 को देशव्यापी विरोध

    केंद्रीय ट्रेड यूनियनों का संयुक्त बयान, 15 मई 2020 

    केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के संयुक्त मंच ने 14 मई, 2020 को अपनी मीटिंग में देशभर में लॉक डाउन के चलते मेहनतकशों के लिए पैदा हुई विकट स्थिति का जायज़ा लिया और यह फ़ैसला किया कि इन चुनौतियों का सामना करने के लिए एकजुट कार्यवाहियों को मजबूत किया जायेगा।

  • देशभर के मज़दूर अपनी रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर हमलों का विरोध कर रहे हैं

    12 मई को उत्तर प्रदेश राज्य सरकार ने, कोरोना महामारी के दौरान “खर्चे कम करने के उपायों” के तहत कर्मचारियों के सभी भत्तों को ख़त्म करने के अपने फै़सले का ऐलान किया। इस सरकारी आदेश से लगभग 16 लाख कर्मचारी प्रभावित होंगे और कम से कम छः भत्तों, जिसमें शहर मुआवज़ा भत्ता, सचिवालय कर्मचारियों और पुलिस कर्मियों को दिए जाने वाले विशेष भत्ते, सिंचाई विभाग के कर्मचारियों और जूनियर इंजिनीयर के लिए भत्ते और सार्वजनिक कार्यों के कर्मचारियों के लिए भत्ते शामिल हैं, ये सभी अगले महीने से नहीं दिए जायेंगे। खर्चे कम करने के अभियान के तहत, उप्र सरकार ने पिछले महीने ही कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में बढ़ोत्तरी को अगले डेढ़ साल तक निलंबित करने का फ़ैसला किया था।

  • लगभग 75 साल बीत चुके हैं देश को आज़ाद हुए। जमींदारी, साहूकारी का दौर ख़0त्म हुआ और बैंकों की संख्या और धंधे में बहुत इजाफा हुआ, परन्तु उनका एकमात्र मकसद ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़ा बनाना था। आज़ादी के बाद भी ग़रीब मजलूमों का शोषण करने की सोच वैसी ही रही बल्कि और तेज़ हुईं; हाँ तौर तरीके ज़रूर बदल गए।
  • US_Uber_drivers_protest

    दुनियाभर में फैली महामारी ने मेहनतकश लोगों के लिए और मुश्किल हालात पैदा कर दिए हैं। पूंजीपति यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं कि स्वास्थ्य संकट का बोझ मज़दूरों द्वारा झेला जाये और इस तरह  उनका अपना मुनाफ़ा बरकरार रह सकता है। मज़दूर अपने अधिकारों के लिए लड़ रहे हैं, एक सम्मानजनक जीवन जीने के अपने अधिकार के लिए, अपनी आजीविका के अधिकार के लिए, वर्तमान स्वास्थ्य आपातकाल की हालतों के दौरान अपने काम के स्थानों पर सुरक्षित काम करने के हालातों को सुनिश्चित करने अपने अधिकार के लिए। हम आपके लिए हाल ही के सप्ताहों में मज़दूरों के कुछ बहादुर संघर्षों की रिपोर्ट पेश कर रहे है।

  • असम, कर्नाटक, केरल, ओडिशा और पंजाब सहित देश के कई राज्यों में किसानों ने हजारों लीटर दूध और हजारों किलो की तादाद में सड़ती हुई सब्जियां और फल सड़क पर फेंक दिए। यह किसानों की सदियों पुरानी मान्यता के खि़लाफ़ है जहां ऐसा माना जाता है कि “किसान अपने लिए पैदा नहीं करता और अपना पैदा किया कभी नाश नहीं करता”। लेकिन उनकी यह कार्यवाही यह दिखाती है कि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा कोविड-19 के चलते लागू लॉक डाउन के दौरान समय पर इन चीजों की खरीद आयोजित न किये जाने से किसानों का आक्रोश किस कदर बढ़ गया है।
  • अमानवीय प्रणाली और असंवेदनशील राज्य

    16 मई की सुबह, लखनऊ से 200 किलोमीटर की दूरी पर उत्तर प्रदेश के औरैया जिले में ट्रकों के टकरा जाने की वजह से उनमें यात्रा कर रहे 24 मज़दूरों की मौत हो गई तथा कई गंभीर रूप से जख़्मी हो गये। यह इन दिनों में होनेवाली दुर्घटनाओं का सबसे हाल का मामला है जिनमें घर पहुंचने की कड़ी कोशिश करने वाले मज़दूरों की जाने गयी हैं।

पार्टी के दस्तावेज

8 जनवरी, 2020 की सर्व हिन्द आम हड़ताल को सफल करें!

मज़दूर एकता कमेटी का आह्वान

देश की दिशा पूंजीपतियों की अमीरी को बढ़ा रही है और मज़दूर, किसान व सभी मेहनतकशों को ग़रीबी में धकेल रही है। इस रास्ते का विरोध करने के लिए और देश की दौलत पर अपने अधिकार का दावा करने के लिए यह हड़ताल आयोजित की जा रही है।

मेहनतकशों का है यह नारा, हम हैं इसके मालिक! हिन्दोस्तान हमारा!

thumbपूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां यह दावा करती हैं कि उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण के कार्यक्रम का कोई विकल्प नहीं है। परंतु सच तो यह है कि इसका विकल्प है। इसका विकल्प है अर्थव्यवस्था को एक नयी दिशा दिलाना, ताकि लोगों की जरूरतों को पूरा करने को प्राथमिकता दी जाए, न कि पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने को। यह हिन्दोस्तान के नवनिर्माण का कार्यक्रम है।

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5th Congress Documentहिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव कामरेड लाल सिंह द्वारा, पार्टी की केन्द्रीय समिति की ओर से, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के पांचवें महाअधिवेशन को यह रिपोर्ट पेश की गई। महाअधिवेशन में इस पर चर्चा की गयी और इसे अपनाया गया। पांचवें महाअधिवेशन के फैसले के अनुसार, इस रिपोर्ट को सम्पादकीय शोधन के साथ, प्रकाशित किया जा रहा है।

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Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब, मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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