नोटबंदी पर प्रतिक्रियायें

Submitted by sampu on शुक्र, 16/12/2016 - 17:50

नोटबंदी से लोगों पर क्या असर हो रहा है इसे जानने के लिये मजदूर एकता लहर ने मजदूर वर्ग के अनेक नेताओं के साथ साक्षात्कार किये, जिनके कुछ अंश यहां प्रकाशित कर रहे हैं।

हनुमान प्रसाद शर्मा, राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) के सलाहकार

मजदूर एकता लहर (म.ए.ल.) : नोटबंदी के असर से देश का कोई कोना अछूता नहीं है। आपके यहां किसानों और मजदूरों पर क्या असर पड़ा है?

हनुमान प्रसाद शर्मा : देश के बहुसंख्यक मजदूर और किसान आबादी नोटबंदी से पीड़ित है। मजदूर रोज़ काम करता है, उसी से खाता है। वेतन पर ज़िन्दा रहने वाले मजदूर कैश न होने के कारण मुश्किलों में हैं। ये मजदूर रात भर बैंकों के ए.टी.एम. के सामने लाइन में खड़े होते हैं, लेकिन ज़रूरी नहीं कि सुबह तक उनका नम्बर आये।

नोटबंदी ने किसानों की रबी की फसल को उजाड़कर रख दिया है। इस इलाके में, चना, सरसों और गेहूं रबी की मुख्य फसलें हैं। रबी की फसल की 10-15 प्रतिशत ही बुआई हुई है। किसानों को न तो खाद और न ही बीज मिल रहे हैं। नोटबंदी के चलते, किसान बैंक और खेत के बीच उलझा हुआ है।

म.ए.ल. : क्या नोटबंदी से भ्रष्टाचार और कालाधन समाप्त हो सकता है, जैसा कि सरकार दावा कर रही है?

हनुमान प्रसाद शर्मा : सरकार का यह दावा बिल्कुल झूठा है। यह जनता के साथ धोखा है। सरकार जैसे-जैसे दवा दे रही है, मर्ज़ कम होने की जगह बढ़ रहा है। आये दिन अखबारों में भ्रष्टाचार के मामले उजागर हो रहे हैं। हर सड़क पर और हर ऑफिस में भ्रष्टाचार है। आज किसी किसान को अगर किसान क्रेडिट कार्ड लेना हो या पिता की मृत्यु के बाद किसी किसान को ज़मीन का अंतकाल करवाना हो तो इसके लिए उसे निश्चित धनराशि देनी ही पड़ती है। ज़मीन की खरीद-फरोख्त में कुछ करना है तो उसका निश्चित प्रतिशत पंजीकरण विभाग में देना ही पड़ेगा। यह निरंतर चल रहा है। नोटबंदी का ड्रामा मजदूर, किसान और आम जनता का ध्यान उनकी मुख्य समस्याओं से हटाने के लिए है।

म.ए.ल. : सरकार दावा कर रही है कि नोटबंदी से आतंकवाद का सफाया होगा। प्रधानमंत्री के इस दावे में कितनी सच्चाई है?

हनुमान प्रसाद शर्मा : रोज-ब-रोज हम देखते हैं कि सीमा पर तनाव बना रहता है। कोई न कोई आतंकवादी घटना होती रहती है। घटना की सच्चाई कभी सामने नहीं आ पाती है। कोई आतंकवादी है या नहीं, सच में पता नहीं चलता है। सरकार मनमर्जी से किसी को भी आतंकवादी घोषित कर देती है।

दुनिया के अंदर असली आतंकवादी अमरीका है। यह जानते हुए कि अमरीकी साम्राज्यवाद दुनिया को उजाड़ रहा है और बर्बाद कर रहा है, उसके साथ देश का हुक्मरान वर्ग रणनैतिक व खुफिया समझौते करके गठबंधन बना रहा है। यह कोई छुपी बात नहीं है कि एशिया में अमरीका ने सबसे पहले अफगानिस्तान में, रूसी सेना के खिलाफ़ आतंकवादी संगठनों को खड़ा किया था। युगोस्लाविया के टुकड़े-टुकड़े किये थे। सीरिया, अफगानिस्तान, लिबिया, इराक को बर्बाद कर दिया है। जो देश अमरीका की बात नहीं मानता है, वहां अमरीकी साम्राज्यवाद और इसकी खुफिया एजेंसियां आतंकवादी गिरोह खड़ा करके, उन्हें धन देकर, गृहयुद्ध और तख्तापलट आयोजित करती हैं।

हमारे हुक्मरानों का अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ संबंध बनाना खतरे से खाली नहीं है।

अगर सचमुच इस इलाके से व दुनिया से आतंकवाद को खत्म करना है तो हमारे देश की सरकार को अमरीकी साम्राज्यवाद के साथ सभी संबंधों को रद्द करना होगा। अमरीकी साम्राज्यवादियों की काली करतूतों को दुनिया के सामने लाना होगा। देश और दुनिया के लोगों की चेतना विकसित करनी होगी। प्रत्येक देश और राष्ट्र की संप्रभुता की हिफाज़त में देश और दुनिया के लोगों को लामबंध करना होगा। चाहे कोई देश कितना ही छोटा या बड़ा हो - सभी बराबर हैं। हरेक देश के लोग खुद की चाहत के मुताबिक, राजनीतिक व आर्थिक व्यवस्था बनाने के लिए आज़ाद हैं।

प्रधानमंत्री जी, देश के मुखिया होने के नाते आप अमरीका के साथ बढ़ते संबंध को रोक सकते हैं, ताकि देश ही नहीं दुनिया को आतंकवाद के खतरे से बचाया जा सके।

म.ए.ल. : सरकार का दावा है कि नोटबंदी से अमीरी और गरीबी के बीच की बढ़ती खाई कम होगी। आपका क्या विचार है?

हनुमान प्रसाद शर्मा : अमीरी-गरीबी के बीच की खाई को बंद करना इस पूंजीवादी व्यवस्था में असंभव है। पूंजीवादी व्यवस्था लूट और मुनाफे़ पर आधारित है। जब तक राज्य लूट और मुनाफ़े की खुली छूट देगा, तब तक अमीरी-गरीबी की खाई को कम या खत्म नहीं किया जा सकता है।

उदाहरण के लिए, आज देश के सबसे अधिक अमीर 1 प्रतिशत लोगों के पास, देश की कुल दौलत का 58.4 प्रतिशत है। जबकि देश की आधी आबादी (गरीबों) के पास देश की कुल दौलत का सिर्फ 2.1 प्रतिशत है। यह मैं नहीं, बल्कि क्रेडिट सूइस की रिपोर्ट कहती है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश के सबसे अमीर 10 प्रतिशत आबादी के पास, देश की कुल दौलत का 80.7 प्रतिशत है। हमारे देश में अमीरों की अमीरी में यानी उनकी दौलत में तेज़ी से तरक्की हो रही है। 2014 में एक प्रतिशत सबसे अमीरों के पास देश की कुल दौलत का 49 प्रतिशत था। 2015 में वह बढ़कर 53 प्रतिशत हो गया। अब यानी 2016 में यह बढ़कर 58.4 प्रतिशत हो गया है।

ऐसे में, अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती दूरी नोटबंदी से कम होगी, यह प्रधानमंत्री की कोरी कल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अमीरी और गरीबी के बीच के अंतर को खत्म करना है तो उत्पादन के साधनों पर समाज का कब्ज़ा होना चाहिए। निजी लाभ पर आधारित आर्थिक व्यवस्था को खत्म करना होगा।

मेरा प्रधानमंत्री से निवेदन है कि आप, भ्रष्टाचार, कालाधन और आतंकवाद को रोक नहीं सकते हैं। लेकिन कुछ काम आप अवश्य कर सकते हैं, पहला कि मजदूरों के श्रम अधिकारों पर जो हमले हो रहे हैं, उनको बंद कर सकते हैं। दूसरा, संसद में आपकी सरकार ने स्वीकार किया कि देश के 2071 उद्योगपतियों पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का 3 लाख 89 हजार करोड़ रुपये का बकाया है, इसे वसूल सकते हैं। इस वसूले गये धन को जनता के हित में खर्च कर सकते हैं।

म.ए.ल. : सरकार जनहित के विज्ञापनों के ज़रिये दावा कर रही है कि आपका फोन ही, आपका बटुआ और बैंक है। फोन, बटुआ और बैंक दोनों है, इसमें कितनी सच्चाई है?

हनुमान प्रसाद शर्मा : देश को मोबाइल, कार्ड, डिजीटल मनी से इनकार नहीं है, लेकिन देशवासियों के बैंक खातों में बचत तो होनी चाहिए। जब देश की अधिकतम आबादी को दिन में दो-जून का भोजन भी मुश्किल से मयस्सर होता है।

बड़े शहर, देश की पूरी तस्वीर नहीं हैं। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में, एक गांव में 10-15 परिवार ही ऐसे होते हैं, जो तहसील, पंचायत समिति या जिला मुख्यालय तक पहुंच पाते हैं। इन्हीं की ही टीवी, रेडियो और अखबार तक पहुंच होती है। बाकी लोगों को सुबह से शाम तक, पेट-भरने के काम से वक्त ही नहीं मिलता। इनके लिए, मोबाइल, कार्ड, डिजीटल मनी और कैशलेस एक कल्पना है।

उदाहरण के लिए, हमारे हनुमानगढ़ में बिहार से आये एक प्रवासी परिवार की जिंदगी चाय की दुकान से चलती थी। उसने अब दुकान बंद कर दी है। क्योंकि ग्राहक नहीं आ रहे हैं। जो आ रहे हैं वे दो हजार का नोट लेकर। उसके पास सामान खरीदने के लिए कैश नहीं है। उसके पास कुछ नहीं है, जिसे वो बैंक जाकर बदलकर लाये। सिर्फ उसके पास शरीर है, जिसके बल पर श्रम बेचकर अपने परिवार को चलाता था। ऐसे में, आज गांव के लोग मिलकर उसके परिवार के भोजन का इंतजाम कर रहे हैं।

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का. विश्वास उतगी, ल इंडिया बैंक ईम्पलॉइज़ एसोसिएशन के उपाध्यक्ष

म.ए.ल. : देश में कालेधन की मात्रा के बारे में आपका क्या अनुमान है? उसमें कितना नकदी पैसा होगा?

का. उतगी : काला पैसा या काला धन, इनका मतलब है वह धन जिसका हिसाब नहीं जाहिर किया गया है, यानी कि जिसके ऊपर टैक्स नहीं भरा गया है। पैसे का तो अपना कोई भी रंग नहीं होता है। इसलिए जब हम सफ़ेद पैसा कहते हैं, तो उसका मतलब है वह पैसा जिसका हिसाब-किताब दिखाया गया है, जबकि काले पैसे का हिसाब-किताब दिखाया नहीं जाता है और इसलिए उस पर टैक्स लगाना मुमकिन नहीं होता है। लेकिन दोनों का चलन होता है।

हिन्दोस्तान में काले धन का अनुमान लगाया जाता है कि चलन में जितना नकदी पैसा है, वह उसके तिगुना या चैगुना होगा। करीबन 70 लाख करोड़ रुपया काला धन है, ऐसा अनुमान है। भारत सरकार के खुद के अपने अनुमान के अनुसार उसका सिर्फ़ 6 प्रतिषत हिस्सा नकदी पैसे में है और बाकी का सोना, ज़मीन या विदेषी बैंकों में है। यानी कि अनुमान है कि तकरीबन 3.5 लाख करोड़ रुपये काला धन नकदी के रूप में है।

काला धन तो दुनिया भर में होता है, क्योंकि कर से बचना आम बात है। दुनिया भर में तकरीबन 80 ऐसी जगहें हैं जहां काले पैसे को सफ़ेद में बदलने के लिए सुविधाएं दी जाती हैं। उदाहरण के तौर पर, हाल ही में पनामा पेपर्स घोटाले ने स्पष्ट दिखाया कि कैसे हिन्दोस्तान सहित दुनिया भर के राजनेताओं तथा पूंजीपतियों की उसमें भागीदारी है। जहां तक हिन्दोस्तान का सवाल है, यहां के राजनेता तथा पूंजीपति काले पैसे को सफ़ेद में बदलने के लिए आम तौर पर मॉरीशस का इस्तेमाल करते हैं। वे मॉरीशस तथा हिन्दोस्तान के बीच डबल टैक्सेसन अवाइडेंस समझौते का इस्तेमाल करते हैं। इस समझौते के अंतर्गत जो कंपनी इन दोनों देशों के बीच व्यापार करती है उसे किसी एक देश में ही टैक्स देना होगा। अगर मॉरीशस में पंजीकृत एक कम्पनी हिन्दोस्तान में मिले हुए मुनाफ़े को मॉरीशस भेजती है, तो इस करार के तहत उससे एक ही देष कर वसूल सकता है। उस पर सिर्फ़ मॉरीशस में कर लगाया जाता है। लेकिन वहां के कर की दर तो शून्य प्रतिषत है। इसका मतलब यही होता है कि मॉरीशस में पंजीकृत कम्पनियों को न मॉरीशस में कर भरना पड़ता है और न ही हिन्दोस्तान में! इसलिए अगर किसी भी हिन्दोस्तानी पूंजीपति के पास काला पैसा हो, तो वह हवाला के द्वारा उसे मॉरीशस भेज सकता है और वहां वह एक कम्पनी पंजीकृत कर सकता है। इस तरह से उसका पैसा सफ़ेद बन जाएगा और वह उसे पुनर्निवेश के लिए हिन्दोस्तान भेज सकता है। इस पर जो मुनाफ़ा मिलता है, उसे वह फिर से मॉरीशस भेज सकता है। उस पर वह कर नहीं देगा। इतना ही नहीं, इसके द्वारा उसका काला पैसा रंग बदल कर मुनाफ़ा कमाने वाला सफ़ेद बन जाता है!

म.ए.ल. : काला पैसा बाहर निकालने में नोटबंदी कितनी असरदार है?

का. उतगी : मैं सीधा-सीधा बोलता हूं कि नोटबंदी से न तो काला पैसा बाहर आएगा, और न ही यह उसका उद्देश्य था! जिन्होंने कालाधन जुटाया है, उनके ख़िलाफ़ कार्यवाही करने का सरकार का कोई इरादा है ही नहीं। बल्कि उन्हीं के हित की रक्षा के लिये वह सक्रिय है। आप देखेंगे कि कम से कम सज़ा देकर अपना धन घोषित करने के लिए सरकार ज्यादा से ज्यादा योजनाएं घोषित करती रहेगी।

तथाकथित सर्जिकल स्ट्राइक का बुरा असर तो सिर्फ़ हिन्दोस्तान की गरीब जनता पर ही हुआ है। उन्हें खुद के कठोर परिश्रम से कमाये हुए पैसे को निकालने के लिए लम्बी-लम्बी लाइनों में खड़ा रहना पड़ रहा है। यह सरकार की एक क्रूर तथा तर्क शून्य चाल है।

अर्थव्यवस्था पर बुरा परिणाम होगा। बाज़ारों में से दो लाख करोड़ से ज्यादा संपत्ति का नाष हो चुका है। सकल घरेलू उत्पादन की वृद्धि 2 या 3 प्रतिशत कम होने की अपेक्षा है। किसान पीड़ित हैं वे अपने उत्पादन को सड़कों पर फेंक रहे हैं। नकदी पैसों पर आधारित अर्थव्यवस्था तो गतिहीन बन गयी है। यह स्थिति कम से कम 6 महीनों तक ऐसी ही रहेगी, ऐसी अपेक्षा है। इस चाल ने अपने करोड़ों लोगों के जीवन को बहुत भारी नुकसान पहूंचाया है और अर्थव्यवस्था को संचयी हानि पहुंचायी है। श्रमिक इसकी कीमत चुका रहे हैं और सरकार को उनके बारे में कोई चिंता नहीं है।

म.ए.ल. : सरकार का दावा है कि नोटबंदी को बहुत अच्छे तरीके से लागू किया गया है। सरकार लोगों को अपने पैसे उन्हें नहीं देने का इल्ज़ाम बैंक मज़दूरों पर लगाकर वह लोगों का गुस्सा बैंकों के ख़िलाफ़ मोड़ने की कोशिश कर रही है। क्या आप हमारे पाठकों को बता सकते हैं कि बैंकों में नये नोटों की क्यों कमी है?

का. उतगी : रिज़र्व बैंक की तरफ़ से यह गैर व्यवस्थापन हो गया। इस परिस्थिति का सामना वे कैसे करेंगे, इसके बारे में निश्चित ही अनुमान गलत थे। उदाहरण के तौर पर, उनका अनुमान था कि देशभर के तकरीबन 2 लाख एटीएम तथा एक लाख बैंक शाखाओं के द्वारा वे प्रतिदिन एक लाख करोड़ रुपये दे पाएंगे। वास्तव में तो वे सिर्फ़ दस हज़ार करोड़ रुपये दे पाये, जो अनुमानित मात्रा से दस गुना कम है! नोटबंदी के द्वारा बाज़ार से 15 लाख करोड़ रुपये निकाल दिये गये हैं। इतना सारा पैसा फिर से बाज़ार में डालने के लिए, आज की छपाई की गति के अनुसार 5 से 6 महीने लगेंगे। नये नोटों की बहुत कमी है और ज्यादातर एटीएम तो नये नोट वितरित करने के काबिल ही नहीं बनाये जा सके हैं।

म.ए.ल. : नोटबंदी के बाद बैंकों को 500 तथा 1000 रुपयों के पुराने नोटों के द्वारा तकरीबन दस लाख करोड़ रुपयों के डिपाज़िट मिले हैं। कई लोगों का कहना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के जो न चुकाये गये कर्ज़े (एन.पी.ए.-नॉन परफार्मिंग एसेट्स) हैं, उनका समायोजन करने के लिए इस पैसे का इस्तेमाल किया जा सकता है। आपका क्या कहना है?

का. उतगी : यह तो पूरा गलत है। बैंकों में जो पैसा आया है, वह नकदी धन है, जिसका न चुकाये गये कर्ज़ों (एन.पी.ए.-नॉन परफार्मिंग एसेट्स) के समायोजन के लिए इस्तेमाल नहीं हो सकता। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बहुत भारी डुबाये हुए तथा संकटग्रस्त कर्ज़ों की मात्रा करीबन 16 लाख करोड़ रुपये है। उनके बारे में सरकार के इरादे अगर नेक होते, तो इन बड़ी कम्पनियों के ख़िलाफ़, जानबूझकर जो कर्ज़े डुबाते हैं, उनके ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक करना ज़रूरी था। सरकार को डुबाये हुए कर्ज़ों को माफ़ नहीं करना चाहिए था, बल्कि इन पूंजीपतियों की संपत्ति पर कब्ज़ा कर लेना चाहिये था। भारी मात्रा में जिनके कर्ज़े डुबाये गये हैं, ऐसे बैंकों को पुनः पूंजीकृत करने के लिए यह उपाय है कि जानबूझकर कर्ज़ें न चुकाने वालों की संपत्ति को छीनना। इन लुटेरों के ख़िलाफ़ सर्जिकल स्ट्राइक करने के बजाय सरकार ने श्रमिक जनता की बचत पर ही सर्जिकल स्ट्राइक की है!

म.ए.ल. : कालेधन पर रोक लगाने के लिए क्या करना चाहिए?

का. उतगी : सरकार को देष के सभी प्राकृतिक संसाधनों का राष्ट्रीकरण करना चाहिए। उसे शहरों की पूरी ज़मीन का राष्ट्रीयकरण करना चाहिए और नागरिकों के पास जो बड़ी मात्रा में ज़मीन है, उसका भी राष्ट्रीयकरण करना चाहिए। जो किसान खुद ज़मीन जोतते हैं, उन्हीं को ज़मीन रखने की इज़ाज़त होनी चाहिए। उन्होंने बेनामी संपत्ति कानून को पूरी तरह से लागू करना चाहिए। कर्ज़ा न चुकाने वालों को कठोर सज़ा देनी चाहिए। यहां तक कि उनकी संपत्ति को ज़ब्त करना चाहिए। यह सरकार जैसा कर रही है तथा इसके पूर्व कांग्रेस की सरकार ने जिस तरह किया था, उस तरह उनका संरक्षण नहीं करना चाहिए।

म.ए.ल. : नगद रहित अर्थव्यवस्था के बारे में आपके क्या विचार हैं? क्या यह आम आदमी के लिए फ़ायदेमंद है?

का. उतगी : आज सिर्फ़ 5 प्रतिशत लेन-देन मुद्रा-रहित होते हैं। उसको रातों-रात 100 प्रतिशत मुद्रा-रहित बनाना सम्भव नहीं है। मुद्रा-रहित बनने के लिए लाजमी है कि सब लोगों के अपने बैंक खाते हों। आज सिर्फ़ 40 प्रतिशत हिन्दोस्तानी लोगों के पास बैंक खाते हैं। शेष 60 प्रतिषत लोगों के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक व्यवस्था में भारी विस्तार होने की ज़रूरत है। टेलिकॉम तकनीकी तथा बैंक तकनीकी को साथ-साथ विकसित होने की ज़रूरत है। लेकिन जो मूलभूत समस्या है वह सुलझानी होगी, वह है गरीबी, बेरोज़गारी, निरक्षरता तथा कुपोषण की समस्या। जब इतने सारे लोग इतनी गरीबी से पीड़ित हैं, तब मुद्रा-रहित अर्थव्यवस्था के बारे में बोलना क्या ख़िलवाड़ नहीं है?

म.ए.ल. : आपके साक्षात्कार के लिए हम धन्यवाद प्रकट करते हैं।

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का. डी.डी. रस्तोगी, ल इंडिया बैंक इंप्लाइज़ एसोसियेशन के सह-सचिव

म.ए.ल. : नोटबंदी से बैंक-कर्मियों को किस प्रकार की मुसीबतों को झेलना पड़ रहा है?

का. डी.डी. रस्तोगी : 8 नवंबर की रात प्रधानमंत्री के ऐलान के बाद से ही नोटबंदी का फैसला लागू हो गया। 9-10 नवम्बर को बैंक बंद रहे। सरकार ने कहा कि पूरी तैयारी है। हालांकि रात 10-12 बजे तक कोई दिशा-निर्देश नहीं थे कि इसे कैसे लागू किया जायेगा। बैंक खुले तो कैश नहीं था और नोट बदलने वाले एक-दूसरे के ऊपर चढ़ रहे थे। जनता में मारा-मारी चल पड़ी। बैंक की प्रतिदिन की गतिविधियां बंद पड़ गईं। लोगों की समस्याओं के चलते बैंकिंग की समय-अवधि बढ़ गयी। क्योंकि जो लोग बैंक के अंदर थे, उसे आप बाहर नहीं निकाल सकते। पुलिस का कोई इंतजाम न था। बैंक के अंदर से ज्यादा लोग बाहर खड़े थे। रात 7-8 बजे तक पुराने नोट बदले गये। पुराने नोटों को कम्प्यूटर में दर्ज करना पड़ता है। ऐसे में, बैंककर्मियों ने रात को 11-12 बजे तक काम किया। बैंकों में नगदी न होने की वजह से बैंककर्मियों को मां-बहनों की गालियां सुननी पड़ीं। बैंककर्मी सोच रहे थे कि एक-दो दिन में हालात सुधर जायेंगी। लेकिन हालात सुधरने की बजाय और बदतर होते चले गये।

सरकार आनन-फानन में रोज़ दिशा-निर्देश बदलती रही। नगद देने के लिये आज 4000 रुपये तो फिर कल 4500 रुपये कर दिया, फिर 2000 रुपये कर दिया। लोगों की सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया 2000 रुपये के नोट को लेकर थी। लोगों ने हमें इसलिए भी गालियां दी कि जब वे बाज़ार में 2000 रुपये का नोट लेकर गये तो उन्हें खुल्ला नहीं मिल रहा था। बाज़ार में 500 रुपये के नये नोट नहीं थे।

म.ए.ल. : क्या कालाधन खत्म करने का मकसद सरकार की नोटबंदी से पूरा होगा?

का. डी.डी. रस्तोगी : इस पर देश की जनता और नेताओं की मिली-जुली प्रतिक्रिया है।

सरकार का अनुमान था कि नोटबंदी से 3 या 4 लाख करोड़ रुपये का कालाधन आयेगा। अब तक आंकड़े बता रहे हैं कि 8 दिसंबर तक करीब 13 लाख 27 या 37 हजार करोड़ रुपये जमा हुए हैं। जबकि अधिकतम 500 और 1000 के नोटों में 86 प्रतिशत करेंसी का कुल मूल्य 14 लाख 86 हजार करोड़ रुपये बताया गया था। अब सवाल उठ रहा है कि काला धन कहां है?

यह भी पता चल चुका है कि एक भी पैसा नई मुद्रा में जमा नहीं हुआ है। रेल, बस और हवाई जहाज की टिकट खरीदी और उससे पहले पेट्रोल पंप पर खूब धांधलेबाजी हुई है। अब सवाल है कि क्या कोई स्कूटी या स्कूटर में 500 या 1000 रुपये का पेट्रोल भर सकेगा। मदर डेयरी और सफल के अंदर 500 का नोट देने पर, बैलंस के रूप में अगले दिन सामान खरीदने के लिए पर्ची दी जाती थी।

इसके अलावा, मेरी जानकारी के अनुसार, कुछ प्राइवेट बैकों ने नये नोटों को पुराने नोटों में दिखाकर जमा किया। ऐसे में, कालाधन खत्म करने का मकसद, इस प्रकार की नोटबंदी से पूरा होगा, मेरी समझ से बाहर है।

म.ए.ल. : नोटबंदी से लोगों को होने वाली परेशानियों के लिए सरकार बैंककर्मियों को दोषी ठहरा रही है! क्या यह उचित है?

का. डी.डी. रस्तोगी : बैंककर्मियों की दिन-रात की मेहनत को प्रधानमंत्री ने माना और कहा कि बैंककर्मियों ने इन 7 दिनों में एक वर्ष का काम किया है। लेकिन दूसरी तरफ, सरकार और रिर्ज़व बैंक यह भी बयान दे रहे हैं कि ‘हमारे पास हालत से निपटने के लिए पूरी तैयारियां हैं और भरपूर कैश है’। इसका यह मतलब है कि लोगों में यह संदेश दिया जा रहा है कि रिज़र्व बैंक, बैंकों को भरपूर नगदी भेज रहा है, लेकिन बैंककर्मी कुछ गड़बड़ कर रहे हैं।

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि कुछ प्राइवेट बैंक कोटक महिन्द्रा, एक्सिस बैंक आदि ने खुलकर धांधलेबाजी की है। बाहर ‘कैश नहीं है’ का बोर्ड लगाकर, अंदर-ही-अंदर पूरे व्यवस्थित तरीके से काम किया है। लेकिन रिर्ज़व बैंक और सरकार के बयानों का जवाब कौन देगा? जवाबदेही सिर्फ सरकारी बैंककर्मियों को देनी पड़ती थी। प्राइवेट बैंक की जवाबदेही नहीं थी, बल्कि सिर्फ वे कैश की मांग करते थे।

मैंने 37 वर्ष बैंकिंग क्षेत्र में काम किया है। स्थिति यह है कि 2 लाख एटीएम तीन महीने निकल जायेंगे तो भी ठीक नहीं होंगे। अगर ऐसा हो जाये तो इसमें डालने के लिए नगदी नहीं है। 500 और 2000 के नये नोट के साईज में बदलाव मेरी समझ से बाहर है। 100 का नोट भी दूसरा आ रहा है। उसके लिए एटीएम को ठीक नहीं करेंगे तो ऐसे ही चलेगा।

शुरू में, सरकार ने 24 हजार रुपये नगदी निकालने की सीमा तय कर दी। पहले कहा गया कि सप्ताह में दो दिन पैसा निकाल सकते हैं, फिर एक दिन कर दिया गया। अब नगदी है नहीं तो 24,000 रुपये बैंककर्मी देंगे कैसे? उदाहरण के लिए एक बैंक के पास अगर 100 उपभोक्ता हैं, तो बैंक के पास 24 लाख रुपये होने चाहिये। लेकिन नगदी भेजी जाती है 10 लाख रुपये। आज हालत यह है कि बड़ी-बड़ी शाखाओं में सिर्फ 5 लाख रुपये भेजे जा रहे हैं। नगदी के संकट के चलते, बैंककर्मी लोगों का निशाना बने हुए हैं। तनावपूर्ण हालत में काम करने के चलते कई बैंककर्मियों की मौत हो गई है। कहीं-कहीं बैंककर्मियों की पिटाई भी हुई है। बैंकों पर पत्थर बरसाये गये हैं।

मैं जिस शाखा में काम करता हूं वहां 100-100 बोरों में एक-एक रुपये के सिक्के भेज दिये गये। हमने ऐलान किया कि जो 10 हजार से ऊपर नगदी लेगा, उसे एक बोरा लेना पड़ेगा। ग्राहक बोरा देखकर भड़क गये। वे बैंकों को तुरंत वापस लौटाने लगे। उन एक रुपये वाले सिक्कों वाले बोरों को जमा करने से हम इनकार नहीं कर सकते थे, आखिर जमा भी किया गया।

म.ए.ल. : नोटबंदी का बैंक कर्मियों की रोज़ी-रोटी पर क्या असर होगा?

का. डी.डी. रस्तोगी : आने वाले दिनों में सरकार बैंककर्मियों पर हमला कर सकती है। नोटबंदी के दौरान, बैंकों में जमा होने वाली पाई-पाई के लिए बैंककर्मी जिम्मेदार है। यहां मैं आपको बताना चाहता हूं कि यह एक विशाल देश है। देश के अंदर तीस करोड़ परिवार हैं। बच्चों ने कुछ नोट फाड़ दिये होंगे, कुछ नोट बर्बाद और बेकार हुये होंगे, कुछ अंत तक जमा नहीं करवाये जा सकेंगे। ऐसे में, पूरा का पूरा धन रिज़र्व बैंक में वापस आना, इस शक को जन्म देता है कि क्या जाली नोट भी बदला जा चुका है।

जाली नोटों की जांच के लिए बैंकों के पास कोई आधारभूत संरचना नहीं है। जांच का काम बैंक कर्मी खुद करते हैं। जहां करोड़ों-करोड़ों रुपये रोज-रोज जमा हो रहे हों, हाथ से एक-एक नकली नोट को लेकर पहचानना बैंक कर्मियों के लिए बड़ा मुश्किल काम है। नोट की गिनती करने वाली मशीन, सडे़-गले और नकली नोट नहीं देख सकती है। इस पर एक्शन होगा, इसको सरकार ने इंगित कर दिया है। सरकार विवरण मांग रही है कि किसने कितना जमा कराया है।

म.ए.ल. : नोटबंदी में आपकी क्या मांगें हैं?

का. डी.डी. रस्तोगी : फौरी तौर पर, बैंक कर्मी औद्योगिक विवाद अधिनियम के तहत एक कर्मचारी की श्रेणी में आता है। बैंक में काम-काज सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक होता है। सेवा-शर्तों के मुताबिक, नोटबंदी के दौरान किये गए ओवरटाईम का मुआवज़ा मिलना चाहिए। साथ ही हमें सुरक्षा प्रदान किये जाने की मांग सरकार से है।

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का. श्रीवास्तव, ल इंडिया गार्ड्स काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी

म.ए.ल. : शहर तथा गांव में रहने वाले आम लोगों पर नोटबंदी का क्या परिणाम हुआ है?

का. श्रीवास्तव : एक बहुत ही गंभीर परिस्थिति पैदा हुई है, जहां कामकाज़ी लोग अपने खुद के पैसे बैंकों से नहीं निकाल पा रहे हैं। छोटे किसानों तथा छोटे व्यापारियों के उत्पादों के लिए कोई ग्राहक ही नहीं हैं। रिक्शावालों, टैक्सीवालों, सब्जी बेचने वालों, जैसे लोगों पर बहुत बुरा असर हुआ है। प्रति हफ़्ते बैंकों से केवल 24000 रुपये निकालने की सरकार ने सीमा लगायी है, लेकिन वाकई में तो नोटों की कमी से लोगों को उतना भी नहीं मिल रहा है। लोगों की तमाम तरीके की आवश्कताएं होती हैं, वे क्या कर सकते हैं? लोगों को कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है!

पहली बात तो यह है कि उन्होंने इसके लिए गलत तारीख चुनी। हर महीने, 1 से 10 तारीख तक ज्यादातर मज़दूरों को वेतन दिया जाता है। और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले मज़दूरों को तो अधिकतर 500 रु. या 1000 रु. के नोटों में ही वेतन मिलता था। 8 नवम्बर के ऐलान के बाद रातों-रात यह पैसा निकम्मा बन गया है। अब यह हालत है कि काम करने के बजाय लोगों को बैंकों या एटीएम के सामने कतार लगाकर खड़ा होना पड़ता है। बुजुर्गों को अपनी पेंशनों के लिए लाइन में खड़ा रहना पड़ता है और इसकी वजह से अनेक लोगों की मौत भी हो गई है। यह हिटलरवादी परिस्थिति है। मीडिया में तो बताया जाता है कि सब कुछ ठीक-ठाक है और लोग सरकार की कार्यवाही बर्दाश्त कर रहे हैं। वस्तुस्थिति में तो लोग सरकार को गाली दे रहे हैं, बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं।

म.ए.ल. : मोदी कहते हैं कि नोटबंदी के द्वारा काला पैसा निकाला जाएगा। क्या आप को लगता है कि ऐसा होगा?

का. श्रीवास्तव : सरकार कहती है कि भ्रष्टाचार बंद होगा। लेकिन हर रोज़ ख़बरें आती हैं कि कई लोग नये नोटों में लाखों-करोड़ों रुपयों के साथ पकड़े जा रहे हैं। उनको ये कहां से मिले? प्रणाली के अंदर ही भ्रष्टाचार है। राजनेताओं को तथा पूंजीपतियों को असीमित मात्रा में नये नोट मिल रहे हैं, लेकिन आम लोगों को लाइनों में खड़ा रहना पड़ता है। श्रमिक जनता की बचत ही बाहर निकल रही है, न कि काला पैसा। काले पैसे वाले उस धन को अपने बिस्तरों में या फ़र्ष के नीचे नहीं रखते हैं। गरीबों को लगता है कि अमीर ऐसा करते हैं, और इस गलतफ़हमी की वजह से वे सरकार का समर्थन कर भी सकते हैं। लेकिन जिन अमीरों के पास काला पैसा है, वे तो उसे सोना या ज़मीन खरीदने में इस्तेमाल करेंगे या उदाहरण की तौर पर मारीशस के रास्ते उसे सफ़ेद पैसे में परिवर्तित करेंगे।

म.ए.ल. : सरकार की इस कृति से किस का फ़ायदा होगा?

का. श्रीवास्तव : श्रमिक जनता की बचत अब बैंकों में इकट्ठा हो रही है। वे अभी तक 12 लाख करोड़ रुपये इकट्ठा कर भी चुके हैं। बैकों में इतना सारा पैसा इकट्ठा होने की वजह से ब्याज दर कम हो जाएगी, जिससे बड़े पूंजीपतियों को फ़ायदा होगा। लेकिन श्रमिक जनता की बचत पर जो ब्याज़ मिलता है, वह भी कम हो जाएगा, जिसका बुरा असर उनकी सुरक्षितता तथा सुखचैन पर होगा। इसलिए यह लोगों के हित में नहीं है।

म.ए.ल. : मोदी कहते हैं कि इससे गरीबी तथा बेरोज़गारी कम होगी। आपको क्या लगता है?

का. श्रीवास्तव : पिछले 30 सालों में नाईजीरिया, घाना, ज़िम्बाब्वे, बर्मा तथा और कुछ देशों में नोटबंदी की गयी, लेकिन कहीं भी भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं हुआ है। बल्कि इससे उत्पादन बहुत गिर गया, जिसकी वजह से दंगे हुए। अपने पड़ोस के बर्मा में ऐसा ही हुआ।

म.ए.ल. : सत्ताधारी कहते हैं कि नोटबंदी का विरोध करने वाले देषद्रोही हैं। आपके क्या विचार हैं?

का. श्रीवास्तव : उत्तर प्रदेश के आने वाले चुनाव सीधा स्पष्ट करेंगे कि लोग क्या सोचते हैं। सरकार के ख़िलाफ़ बहुत नाराज़गी है और यह 31 दिसम्बर, 2016 के बाद तो और भी बढ़ेगी।

म.ए.ल. : आपके साक्षात्कार के लिए हम आपका धन्यवाद करते हैं।

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एम.पी. देव, ल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसासियेशन के उपाध्यक्ष

म.ए.ल. : नोटबंदी का रेलवे कर्मचारियों पर क्या असर पड़ रहा है?

एम.पी. देव : नोटबंदी से रेलवे मजदूरों की तकलीफ, देश के आम मजदूरों और किसानों की तकलीफ से अलग नहीं है। खासकर रेल चालकों के लिए यह बहुत मुश्किल भरा समय है। सवारियों की सुरक्षा के नज़रिये से रेल चालकों को आराम की ज़रूरत होती है। अगर आराम का वक्त सिर्फ एटीएम और बैंक की लाइन में जाये, तो हमारी मुश्किलों को आप समझ सकते हैं।

म.ए.ल. : सरकार काले धन पर नोटबंदी को एक हमला बता रही है। आपका अनुभव क्या है?

एम.पी. देव : सरकार के पास नोटबंदी, यही एक रास्ता है, इससे मैं पूरी तरह असहमत हूं। 8 नवम्बर से पहले, कालाधन का खुलासा करने की योजना सरकार लेकर आयी थी। अगर सरकार, काला धन निकालने के प्रति ईमानदार होती तो अंतिम तारीख के बाद, काला धन पाये जाने पर उक्त व्यक्ति को आजीवन जेल में डालकर उसकी संपत्ति जब्त करने जैसे कठोर कदम उठाने की घोषणा करती। इससे लोगों की समझ में बात आती कि काले धन और भ्रष्टाचार को खत्म करने के प्रति सरकार ईमानदार है। नोटबंदी के बीच, सरकार ने एक और योजना की घोषणा की कि कालाधन जमा करो और 50 प्रतिशत की छूट पाओ और व्यक्ति का नाम गुप्त रखा जायेगा। इससे साफ है कि काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर सरकार ईमानदार बिल्कुल नहीं है।

कालाधन, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के लिए व्यवस्था जिम्मेदार है। इस व्यवस्था में मौजूद तंत्र - इनकम टैक्स डिपार्टमेंट, आई.बी., सी.बी.आई. के अलावा, भर-भर के संस्थान और तंत्र मौजूद हैं। लेन-देन की हरेक गतिविधि इन तंत्रों की जानकारी में होती है। इनकी जानकारी में ही पैसा देश के अंदर और बाहर आता-जाता है। बावजूद इसके, भ्रष्टाचार, कालाधन और आतंकवाद रुक नहीं पाया है। मेरी नज़र में नोटबंदी इस व्यवस्था की खामियों को छुपाने के लिए है।

म.ए.ल. : क्या, नोटबंदी से आतंकवाद खत्म हो जायेगा?

एम.पी. देव : आंतकवादी लेन-देन सिर्फ करेंसी में नहीं करते हैं। लेन-देन में इलेक्ट्रानिक-ट्रांसफर, गोल्ड, डायमंड और सिल्वर का इस्तेमाल भी होता है।

म.ए.ल. : अमीरी-गरीबी के बीच बढ़ती दूरी को नोटबंदी के ज़रिये सरकार खत्म करने का दावा कर रही है। इस पर आपका विचार क्या है?

एम.पी. देव : नोटबंदी से अमीरी-गरीबी के बीच दूरी कम होगी, यह सबसे बड़ा झूठ है। इंदिरा गांधी का नारा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा आज बुलंद है। अगर सरकार चाहती कि सचमुच अमीरी-गरीबी के बीच की दूरी कम हो, तो वह फौरन देश के लोगों को मूलभूत सुविधायें - शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, पानी, साफ-सुथरा आवास उपलब्ध कराती। दूसरा कि सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य का राष्ट्रीयकरण करे। सभी मजदूरों को जीवन-जीने लायक वेतन मिले, जिससे वे अपना जीवनस्तर ऊपर उठा सकें।

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बाबू लाल जैन, राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) के पूर्व अध्यक्ष

म.ए.ल. : आपके यहां नोटबंदी का क्या असर देखने में आ रहा है?

बाबू लाल जैन : यहां जिन्दगी ठहर गयी है। मजदूर-किसान काम से वंचित हो गये हैं। मजदूरों के श्रम के औने-पौने दाम मिल रहे हैं। किसानों को अपनी फसल के दाम नहीं मिल रहे हैं। देश का ताना-बाना छिन्न-भिन्न हो गया है। छोटे व्यापारियों का धंधा 20 प्रतिशत पर आकर रुक गया है।

म.ए.ल. : क्या, नोटबंदी से आतंकवाद खत्म हो जायेगा?

बाबू लाल जैन : सरकार ने कैसे अंदाजा लगाया कि आतंकवाद का खात्मा नोटबंदी से होगा - यह समझ से बाहर है। आज भी आतंकवादी हमलों में नये नोटों का इस्तेमाल हो रहा है।

अमरीका खुद के व्यापारिक हितों के अनुसार विदेश नीति तय करता है। हथियारों को बनाता है और दुनिया में बेचता है। अपने साम्राज्य को विकसित करता है। अमरीका के साथ, रणनीतिक गठबंधन पर सरकार को नये सिरे से विचार करने की ज़रूरत है।

म.ए.ल. : क्या, नोटबंदी से भ्रष्टाचार समाप्त होगा?

बाबू लाल जैन : नोटबंदी से भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा तो हम इसका स्वागत करेंगे। लेकिन सरकार के दावे में सच्चाई नज़र नहीं आती है। नोटबंदी के फैसले ने नये प्रकार के भ्रष्टाचार को जन्म दिया है। भ्रष्टाचार के समाचार रोज़-ब-रोज़ आ रहे हैं और नये नोट बड़ी मात्रा में पकड़े जा रहे हैं। दूसरी तरफ लोगों को नये नोट मिल नहीं रहे हैं।

म.ए.ल. : सरकार कैश लैस व्यवस्था का प्रचार कर रही है, कि आपका फोन ही आपका बटुआ और बैंक है। इसमें कितनी सच्चाई है?

बाबू लाल जैन : डिजिटल इंडिया देश का प्रतिनिधित्व नहीं करता है। सवाल उठता है कि कितने प्रतिशत लोगों के लिये यह सुविधा है? कितने प्रतिशत लोग इस प्रक्रिया में शिक्षित हैं? हम जानते हैं कि ग्रामीण इलाकों के लोगों को डिजिटल शिक्षा नहीं दी गई है और न ही कैश लैस की सुविधा। अतः कैश लैस सिर्फ हवाई बातें हैं।

मेरे अनुभव के मुताबिक, देश आर्थिक मंदी से इसलिए बच पाया क्योंकि यहां के लोगों को घर में बचत करने की आदत है। सरकार लोगों की इस आदत को खत्म करना चाहती है।

म.ए.ल. : नोटबंदी से फायदा किसको है?

बाबू लाल जैन : लोगों को इससे फायदा तो नहीं होने वाला है। देश की जनता इस वक्त तकलीफ और दर्द से गुजर रही है। सरकार के इस दावे में कोई सच्चाई नहीं है कि जनता इसका समर्थन कर रही है। झूठे सर्वे से जनता को भ्रमित किया जा रहा है। जैसे कि सरकार ने एक एप के ज़रिये 5 लाख लोगों से सर्वे किया है। सर्वे में कहा गया कि 92 प्रतिशत लोगों ने नोटबंदी का समर्थन किया है। तथ्य यह है कि 25 करोड़ जनता के पास स्मार्ट फोन है। उसमें से भी सिर्फ 5 लाख जनता ने ही समर्थन किया है। फिर कैसे कहा जा सकता है कि देश की आम जनता खुलेदिल से नोटबंदी का समर्थन कर रही है?

बात ज़रूर है कि देश के पूंजीपति नोटबंदी का समर्थन कर रहे हैं। इससे यह समझा जा सकता है कि नोटबंदी किसके फायदे के लिए है?

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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