हिन्दोस्तान और रूस ने मुख्य सैनिक, परमाणु और ऊर्जा के सौदों पर हस्ताक्षर किये

Submitted by sampu on मंगल, 01/11/2016 - 05:30

हिन्दोस्तानी सरमायदारों के साम्राज्यवादी मंसूबों की सेवा में

प्रधानमंत्री मोदी और रूस के राष्ट्रपति पुतिन के बीच शिखर सम्मेलन, जो 15 अक्तूबर को गोवा में बी.आर.आई.सी.एस. शिखर सम्मेलन से पहले हुआ था, उसमें दोनों पक्षों ने 16 सौदों पर हस्ताक्षर किये, जिनमें 3 मुख्य सैनिक सौदे शामिल थे।

सैनिक समझौतों के अनुसार, हिन्दोस्तान रूस से बहुत ही ऊंचे दर्जे के सैनिक यंत्र खरीदेगा। ये हैं (1) 5 एस-400 ट्रायंफ वायु रक्षक व्यवस्थाएं, जिनकी कीमत होगी 39,000 करोड़ रुपये; (2) नौसेना के लिये 4 स्टेल्थ फ्रिगेट पोत जिनकी कीमत 3 अरब डॉलर से अधिक होगी; और (3) कामोव-226 टी यूटीलिटी हेलिकॉप्टर जो रूस और हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.) द्वारा संयुक्त रूप से बनाये जायेंगे। हिन्दोस्तान के लिये इन तीनों सौदों की कुल कीमत लगभग 8 अरब डॉलर होगी, जो कि दोनों देशों के कुल पारस्परिक दोतरफा व्यापार के बराबर है।

इसके अलावा, मोदी और पुतिन ने वीडियो लिंक के ज़रिये, रूसी मदद के साथ निर्मित कुडनकुलम परमाणु सयंत्र की यूनिट 3 और 4 की नींव डालने के समारोह का उद्घाटन किया।

एक और प्रमुख सौदे के ज़रिये, रूसी राज्य की विशाल तेल कंपनी रोज़नेफ्ट ने एस्सार तेल कंपनी के 49 प्रतिशत नियंत्रक शेयर को, वादिनार के तेल शोधक केन्द्र और बंदरगाह के समेत, 12.9 अरब डॉलर की कीमत पर खरीदा। इसे हिन्दोस्तान में किसी विदेशी कंपनी द्वारा सबसे बड़ी खरीदी तथा रूस के इस तरह के विदेशी सौंदों में सबसे बड़ा माना जा रहा है।

रूसी कंपनी गैज़प्रोम और इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड ने दोनों देशों के बीच गैस पाइप लाइन की संभावना की तलाश करने के लिये मिलकर काम करने का समझौता किया है। शिखर सम्मेलन में गठित किये गये एक संयुक्त निवेश कोष में हर एक देश ने 50 करोड़ डॉलर डाले हैं।

हिन्दोस्तान और रूस ने निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र की भागीदारी के साथ, सैनिक प्रौद्योगिकी पर एक संयुक्त गोष्ठी करने और रक्षा प्रौद्योगिकी में संयुक्त शोध के लिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी वार्ता करने का फैसला किया।

इन सबको मिलाकर देखा जाये तो इन सौंदों से यह स्पष्ट होता है कि रूसी राज्य और हिन्दोस्तानी राज्य के बीच संबंध आज भी बहुत मजबूत हैं, हालांकि हिन्दोस्तान हाल के वर्षों में अमरीका और जापान के साथ निकट संबंध बनाता रहा है। मीडिया में इस प्रकार की अटकलें लगायी जा रही थीं, कि हिन्दोस्तान-रूस संबंध “कुछ ठंडे” पड़ रहे हैं क्योंकि अब हिन्दोस्तान का हथियारों का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता रूस नहीं बल्कि अमरीका हो गया है। 2014 में रूस ने पाकिस्तान को सैनिक यंत्र न बेचने की नीति को त्याग दिया और हाल ही में, इसी वर्ष सितम्बर में सर्वप्रथम पाकिस्तान-रूस सैनिक अभ्यास पाकिस्तान में संपन्न हुए। परन्तु रूस के साथ किये गये इन सौदों ने इन अटकलों को झूठा साबित कर दिया। रूस के साथ किये गये इन अरबों रुपयों के बड़े-बड़े सौंदों से यह स्पष्ट होता है कि खास तौर पर परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में और संयुक्त उत्पादन के ज़रिये ऊंचे दर्ज़े की सैनिक प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के लिये, रूस हिन्दोस्तानी सरमायदारों का एक अहम सहकारी आज भी है। इन घोषित सौदों के अलावा, दो और मुख्य सौदों को अंतिम रूप दिया जा रहा है - पहला, रूस से पांचवी पीढ़ी के लड़ाकू विमान खरीदने का सौदा और दूसरा, रूस से दूसरी परमाणु पनडुब्बी खरीदने का सौदा।

रूस भी इस समय हिन्दोस्तानी बाज़ार में पहले से ज्यादा रुचि दर्षा रहा है और इन रणनैतिक व सैनिक सौदों से लाभ हासिल करने की उम्मीद कर रहा है, क्योंकि यूक्रेन पर झगड़े के बाद पष्चिमी साम्राज्यवादी ताक़तों द्वारा लगाये गये प्रतिबंधों का रूस पर भारी असर पड़ा है। रूस तेल का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता है, अतः वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतों की गिरावट से भी रूस बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

परन्तु, हिन्दोस्तान और रूस के बीच सैनिक, परमाणु और ऊर्जा सहकार्य पर आधारित मजबूत संबंधों के बावजूद, दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक संबंध अभी भी बहुत कम हैं। इस समय हिन्दोस्तान और रूस के पारस्परिक व्यापार की कुल मात्रा सिर्फ 12 अरब डॉलर है, जबकि चीन के साथ हिन्दोस्तान का व्यापार 70 अरब डॉलर से अधिक है और अमरीका के साथ 100 अरब डॉलर से अधिक है। समाचार रिपोर्टों के अनुसार, हाल में हुये हिन्दोस्तान-रूस शिखर सम्मेलन में दोनों देशों के बीच व्यापार और व्यवसाय में उन्नति लाने के कदम लिये गये।

रूस के साथ किये गये ये विशाल सैनिक और रणनैतिक सौदे हिन्दोस्तानी सरमायदारों के तेज़ गति से सैन्यीकरण करने के प्रयासों के हिस्से हैं। हिन्दोस्तान के सरमायदार एक वैश्विक ताक़त बनने की आकांक्षा रखते हैं। हाल में किये गये इन सौदों में, “मेक इन इंडिया” अभियान के तहत, हिन्दोस्तानी सार्वजनिक क्षेत्र और निजी क्षेत्र की कंपनियों के साथ रूसी कंपनियों की रणनैतिक सांझेदारी करके, हिन्दोस्तान में संयुक्त रूप से निर्माण करने का कार्यक्रम भी शामिल है। दूसरी प्रमुख साम्राज्यवादी ताक़तों की तरह एक सैनिक-औद्योगिक परिसर की स्थापना करना इस कार्यक्रम का एक अहम भाग है। हिन्दोस्तान की सभी प्रमुख इजारेदार पूंजीवादी कंपनियां बहुत ही प्रदर्शनात्मक तरीके से हथियारों के उत्पादन के क्षेत्र में प्रवेश कर रही हैं। जबकि हथियारों के इन सौदों से इन बड़ी-बड़ी इजारेदार पूंजीवादी कंपनियों को बेशुमार मुनाफे़ मिलेंगे, सैकड़ों हजारों करोड़ों रुपयों के इन रक्षा सौदों का बोझ हिन्दोस्तानी मजदूर वर्ग और लोगों पर लाद दिया जायेगा।

इस समय तथा समय-समय पर पाकिस्तान के खिलाफ़ हिन्दोस्तानी राज्य जो चीख-चीख कर जंग फरोशी करता है और चीन के साथ संबंधों में बढ़ते तनाव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो, हाल में किये गये ये रक्षा सौदे हिन्दोस्तान के सरमायदारों की ओर से पड़ोसी देशों को फिर यह संदेश है कि हिन्दोस्तान इस इलाके में अपने वर्चस्व वाले रुतबे को सिद्ध करने की पूरी तैयारी, और ज़रूरत होने पर सैनिक तैयारी भी, कर रहा है। ट्रायंफ वायु रक्षक व्यवस्था दुनिया में सबसे उन्नत किस्म की रक्षा व्यवस्थाओं में से एक मानी जाती है, जो 400 किलोमीटर की दूरी पर, यानी हिन्दोस्तानी वायु क्षेत्र से काफी दूर बाहर तक, विमानों पर निशाना साधने में सक्षम है। कामोव हेलिकॉप्टर समुद्र से 20,000 फुट की ऊंचाई पर उड़ान भर सकते हैं और उन्हें सियाचीन में तैनात किया जायेगा, जिसका यह मतलब है कि “दुनिया की इस सबसे ऊंची युद्ध भूमि” पर देश के कीमती संसाधनों का बहुत बड़ा हिस्सा अभी भी खर्च किया जायेगा।

हिन्दोस्तानी राज्य बहुत बड़े और खतरनाक सौदों का खिलाड़ी है और हमारी जनता के संसाधनों को बढ़ते सैन्यीकरण के बवंडर में फंसाता जा रहा है। सैन्यीकरण की तेज़ गति तथा हिन्दोस्तानी सरमायदारों की साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की वजह से हमारे लोगों और इस पूरे इलाके की शांति और सुरक्षा को घोर खतरे में डाला जा रहा है। जबकि हमारी सरकार रूस के साथ इन सौंदों पर हस्ताक्षर करके खुद अपनी पीठ थपथपा रही है, हमारे देश के लोगों के लिये इन पर खुश होने की कोई वजह नहीं है, बल्कि हमारी शांति और सुरक्षा के बढ़ते खतरों पर चिंता करने की ज़रूरत है।

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पार्टी के दस्तावेज

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पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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