सार्वजनिक शिक्षा के निजीकरण के खिलाफ़ राजस्थान के शिक्षकों का संघर्ष

Submitted by sampu on मंगल, 01/11/2016 - 05:30

राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) का दो दिवसीय प्रांतीय शैक्षिक सम्मेलन 20-21 अक्तूबर, 2016 को जोधपुर के कुड़ी भगतासनी हाउसिंग बोर्ड के सामुदायिक भवन में संपन्न हुआ। इस सम्मेलन में राजस्थान के विभिन्न जिलों के गांवों और ढांणियों से 900 से ज्यादा प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस सम्मेलन में राजस्थान सरकार के तहत विद्यालयी शिक्षा में कार्यरत विभिन्न विभागों और परियोजनाओं से शिक्षकों, शिक्षाधिकारी प्राध्यापकों, प्रबोधकों, विद्यार्थी मित्रों, शिक्षार्थियों, प्रेरकों, संविदा कर्मियों और शिक्षाप्रेमियों ने हिस्सा लिया।

यह सम्मेलन, सार्वजनिक शिक्षा और शिक्षण को कमजोर करने के खिलाफ़ संघर्ष को आगे बढ़ाने, अपने संगठन के पिछले वर्ष के किये गये कार्यों पर चिंतन-मनन करने, शिक्षक समाज की व्यापक एकजुटता बनाने और ज्वलंत मुद्दों के समाधान, जैसे अनेक विषयों पर विचार-विमर्श करने तथा नई कार्यकारिणी के चुनाव के लिये बुलाया गया था।

सम्मेलन का संचालन बाबूलाल मांजू ने किया। सम्मेलन की अध्यक्षता, बाबूलाल जैन, हनुमान प्रसाद शर्मा (संरक्षक व पूर्व अध्यक्ष), महकराम बिश्नोई, शैतान सिंह गुर्जर, लक्ष्मण यादव, गिरीशकुमार शर्मा, बेगराज खोथ, अभिमन्यु सिंह भदौरिया, परसराम तिवाड़ी, भंवर सिंह राठौर, दुर्गाराम गौड़ और राणाराम जाणी ने की।

सम्मेलन को संबोधित करते हुए, वक्ताओं ने बताया कि सरकार शिक्षा का निजीकरण करने पर तुली हुई है। सभी को गुणवत्तापूर्व और सुलभ शिक्षा देने में सरकार नाकाम रही है। सरकार आवश्यकता के अनुसार भर्तियां नहीं कर रही है, जबकि इस समय प्रदेश में लगभग 1 लाख 35 हजार शिक्षकों के पद खाली हैं। सरकार ने लगभग 5000 अंग्रेजी, विज्ञान और गणित जैसे विषयों को पढ़ाने वाले अध्यापकों को शिक्षा निदेशालयों में गैर-शिक्षण कार्यों के लिये नियुक्त किया हुआ है। अनेक स्कूलों में इन्हीं विषयों के अध्यापकों को शिक्षा विभाग के आई.टी. विभाग का काम दे दिया गया है, जिन्हें शिक्षा विभाग के पोर्टल (ऑन-लाईन) पर रोज-रोज आंकड़े देने पड़ते हैं। जिनका काम पढ़ाना है, उन्हें क्लर्क का काम करना पड़ रहा है। जिसकी वजह से शिक्षा और शिक्षण के स्तर पर बहुत बुरा असर पड़ रहा है।

वक्ताओं ने बताया कि स्कूली अध्यापकों को गैर-शिक्षण कार्यों में लगा दिया जाता है। सरकार की विभिन्न योजनाओं का प्रचार करने के लिये गांव-गांव घूमकर पर्चे बांटने का काम दिया जाता है। उन पर विभिन्न दिवसों और जन-संपर्क कार्यक्रमों के फोटोग्राफ भेजने का काम भी जबरन लादा गया है। उपरोक्त कार्यों के साथ-साथ शैक्षणिक कार्यों को भी गुणवत्तापूर्ण करने का दबाव डाला जा रहा है। यह कैसे हो सकता है कि शिक्षक अपने शिक्षण कार्यों के साथ-साथ उपरोक्त कामों को भी करे, जहां शिक्षकों की कमी से सभी स्कूल जूझ रहे हैं।

एक वक्ता जो खुद ही प्रधानाचार्य हैं, उन्होंने बताया कि उन्हें बिना किसी स्थायी चपरासी और बिना क्लर्क के स्कूल को चलाना पड़ता है। ये सभी जिम्मेदारियां स्कूल के अध्यापकों या प्रधानाध्यापक को पूरी करनी पड़ती हैं। कहीं-कहीं तो सिर्फ 1 या 2 अध्यापक से माध्यमिक और सीनियर स्कूल चल रहे हैं। सरकार का दबाव होता है कि विद्यालय में कम से कम 400 से लेकर 450 बच्चे होने चाहिए। ऐसे में प्रधानाध्यापक या अध्यापकों को शिक्षा की खराब गुणवत्ता के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। जबकि इसके लिए सरकार जिम्मेदार है। प्रदेश में लाखों-लाखों प्रशिक्षित अध्यापक बेरोज़गार हैं।

उन्होंने कहा कि स्कूलों में पोषाहार के लिए नियुक्त कर्मचारी को महीने में मात्र 1000 रुपये दिये जाते हैं। क्या, महीने में 1000 रुपये से उसके परिवार का जीवन-यापन संभव है?

सरकार ने सेटअप परिवर्तन के ज़रिये, प्राथमिक विद्यालयों का उच्चतर विद्यालयों के साथ एकीकरण कर दिया है। प्राथमिक अध्यापकों को माध्यमिक स्तर पर पदोन्नति दी गई है। दूर-दराज के इलाकों में, गांव और ढांणी के स्कूलों को बंद कर दिया गया है, जिससे प्राथमिक शिक्षा से स्थानीय बच्चे वंचित हो गये हैं। सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिक शिक्षा चैपट हो रही है। इससे आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि सरकार की दिशा शिक्षा में निजीकरण को बढ़ावा देने की है। सरकार द्वारा प्राथमिक शिक्षा को नज़रंदाज करने का मतलब है कि प्राथमिक स्तर से ही बच्चों को निजी विद्यालयों की ओर भेजना। जो आगे चलकर, निजी विद्यालय में ही पढ़ने को मजबूर हों।

इस दो दिवसीय सम्मेलन को आमंत्रित अतिथियों के अलावा, राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) के विभिन्न पदाधिकारियों - बाबूलाल जैन, महकराम बिश्नोई, अभिमन्यु सिंह भदौरिया, शैतान सिंह गुर्जर, हनुमान प्रसाद शर्मा, सुभाष आचार्य, यशवंत भारद्वाज, परसराम तिवाड़ी, भंवर सिंह राठौर, शौकत अली, भामाराम बिश्नोई, हीरालाल बिश्नोई, दुर्गाराम सौलंकी, नरपति हंचारण, भागाराम, देवराम भादू, देवराम पंवार, हीरालाल मेगवाल, जुगल काबरा, सुनील परिहार, रामाराम जांगू, करनाराम, महेन्द्र बिश्नोई, शोभाराम सरपंच, आदि ने सभा को संबोधित किया।

सम्मेलन में सर्वसम्मति से केसरा राम को संगठन का अध्यक्ष और अभिमन्युसिंह भदौरिया को मुख्यमहामंत्री चुना गया।

इस सम्मेलन में, जसवंत सिंह बिश्नोई (अध्यक्ष, ऊन विकास बोर्ड), चंद्रप्रकाश चैहान (राज्यमंत्री), बिरजू नायक (लोक राज संगठन), कैलाश भंसाली (विधायक-शहर जोधपुर), बाबू सिंह राठौर (विधायक-शेरगढ़), श्री सुखराम बिश्नोई (विधायक-संचोर), कर्मचारी नेता राजेन्द्र बोहरा, जुगल काबरा (पूर्व विधायक-शहर जोधपुर) के अलावा, विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के स्थानीय पदाधिकारी और शहर के गणमान्य व्यक्ति आमंत्रित अतिथि के रूप में मौजूद थे।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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