वैश्विक कुपोषण सूचकांक में हिन्दोस्तान की जगह

Submitted by sampu on मंगल, 01/11/2016 - 05:30

सरमायदारों और उनके समाज-विरोधी कार्यक्रम की नाकामी का सबूत!

अन्तर्राष्ट्रीय खाद्य नीति संशोधन संस्थान (आई.एफ.पी.आर.आई.-इफ्प्री) द्वारा हाल ही में जारी वैश्विक भूख सूचकांक (ग्लोबल हंगर इंडेक्स-जी.एच.आई.) ने एक बार फिर हिन्दोस्तान के लोगों की दयनीय स्थिति की पोल खोल दी है। 2016 के वैश्विक भूख सूचकांक में 118 देशों में हिन्दोस्तान 97वें स्थान पर है।

जी.एच.आई. की गणना चार अलग-अलग संकेतक मापदंडों को मिलाकर की जाती है। ये संकेतक हैं - 1) कुपोषित आबादी (जिन्हें ज़रूरत से कम कैलोरी मिलती है); 2) बाल अपक्षय (ऊंचाई के हिसाब से कम वजन, जो कि तीव्र कुपोषण की निशानी है); 3) बच्चे का बौना होना (उम्र के हिसाब से कम ऊंचाई, जो कि दीर्घकालीन कुपोषण की निशानी है); और 4) बाल मृत्यु दर (पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों में मृत्यु दर)। किसी भी देश के लिए सूचकांक तय करने के लिए, पहले और अंतिम संकेतक को एक-तिहाई (1/3) भार दिया जाता है, और दूसरे और तीसरे संकेतक को 1/6 भार दिया जाता है। इस तरह से अधिक अंक का मतलब होता है, अधिक ऊँचा भुखमरी का स्तर।

इस गणना के अनुसार, 0-100 की पैमाने पर हिन्दोस्तान को 28.5 अंक हासिल हुये हैं। यह वाकई में बेहद दयनीय परिस्थिति है। दीर्घकालीन कुपोषण की परिस्थिति देहातों और शहरों दोनों में साफ तौर से नज़र आती है। देहातों और शहरों, दोनों में बसने वाली अधिकतम मेहनतकश आबादी में कुपोषण, कम वजन और बौनापन साफ नज़र आता है।

हर एक नयी सरकार जो सत्ता में आती है नए-नए नारे लगाती है कि किस तरह से वह लोगों को गरीबी से बाहर निकालने के लिए, उनकी भूख मिटाने और कुपोषण को खत्म करने के लिए काम करेगी और इसके लिए तमाम तरह की योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा करती है। लेकिन हकीक़त यह है कि हमारे देश में करोड़ों लोग हर रोज भूखे रहने को मजबूर हैं। यह स्थिति हमारे सरमायदार हुक्मरानों द्वारा अपनाये गए रास्ते की असलियत साफ दिखाती है। सरमायदार हुक्मरानों का यह राज लोगों की बुनियादी ज़रूरतों को पूरा करने में न तो कोई दिलचस्पी रखता है और न ही वह इसके काबिल है। सरमायदार हुक्मरानों को इस बात की पूरी जिम्मेदारी लेनी होगी कि 70 वर्षों के बाद भी लोग गरीबी में जी रहे हैं, उनके पास रोज़गार नहीं हैं, वे अपने बच्चों को सही खाना तक नहीं खिला सकते और उन्हें अपनी आंखों के सामने भूख और बीमारी से अपने बच्चों को मरता हुआ देखना पड़ता है।

अर्थव्यवस्था की दिशा इस तरह से बनायी गयी है कि बहुसंख्य लोगों की गरीबी के चलते, अल्पसंख्य सरमायदार के लिए अधिकतम मुनाफ़े सुनिश्चित किये जा सकें। अर्थव्यवस्था की मौजूदा दिशा कभी भी लोगों की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकती। अमीरी और गरीबी के बीच बढ़ती खाई के लिए पूरी तरह से पूंजीवाद जिम्मेदार है। एक तरफ बड़े पूंजीपति खुद को दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में गिने जाने पर गर्व कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ बहुसंख्य मेहनतकश परिवारों के लिए पोषक खाद्य पदार्थ भी उपलब्ध नहीं हैं। बहुसंख्य लोगों के लिए रोज़गार की कोई गारंटी नहीं है - देहातों में लाखों-करोड़ों छोटे और भूमिहीन किसान और शहरों में मेहनतकश लोग किसी तरह से झुग्गी-झोपड़ियों में गुजर-बसर कर रहे हैं। उपभोग की अत्यधिक ज़रूरी वस्तुओं की बढ़ती कीमतों की वजह से अधिकतर परिवारों के पास पोषक खाद्य पदार्थ खरीदने तक का पैसा नहीं है।

पिछले 25 वर्षों में हुक्मरान वर्ग ने निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण का रास्ता अपनाया है और साथ ही साथ जो कुछ संस्थान और व्यवस्थायें इससे पहले के दौर में तथाकथित रूप से गरीबी, भुखमरी और कुपोषण को खत्म करने के लिए बनायी गयी थीं, उन्हें भी एक के बाद एक खत्म करना शुरू कर दिया है। इसी तरह से उन्होंने सार्वजनिक वितरण व्यवस्था को खत्म कर दिया है। यह उनका समाज-विरोधी रास्ता है।

भुखमरी और कुपोषण से लड़ने के नाम पर सरमायदार हुक्मरानों ने एक के बाद एक सरकारी योजनायें शुरू कीं और ऐसा जताने की कोशिश की कि गरीबी, भुखमरी और बेरोज़गारी का यही समाधान है। इन सारी योजनाओं का लोगों की समस्याओं पर कोई असर नहीं हुआ, क्योंकि इन योजनाओं ने समस्या की असली जड़ को छुआ तक नहीं - वह जड़ है पूंजीवादी व्यवस्था!

समेकित बाल विकास सेवा योजना (आई.सी.डी.एस.) जो कि तथाकथित तौर से 40 वर्ष पहले भूख और गरीबी को हटाने के लिए बनायी गयी थी, यह सरमायदारी धोखेबाजी का सबसे बड़ा नमूना है। इस योजना के तहत जिस तरह से आंगनवाड़ी कर्मचारी के साथ भेदभाव का बर्ताव किया जाता है, वह साफ तरीके से इसके ढोंग का पर्दाफाश करता है। आंगनवाड़ी कर्मचारी आई.सी.डी.एस. योजना के तहत मुख्य पात्र है, जिसका काम है आंगनवाड़ी केंद्र चलाना, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और माताओं की देखभाल करना। लेकिन सरकार उसको मजदूर नहीं मानती है और केवल 3000 रुपये प्रतिमाह मानदेय देती है। आंगनवाड़ी कर्मचारियों ने कई बार संघर्ष चलाया और यह मांग की कि उन्हें मजदूर माना जाये और मजदूरों को दिया जाने वाला वेतन और सुविधायें मिलनी चाहिए। लेकिन किसी भी सरकार ने उनकी इस मांग पर गौर नहीं किया। वे किस तरह से इतने कम रुपयों में अपने बच्चों के लिए पोषण सुनिश्चित कर सकती हैं? 

संप्रग सरकार द्वारा ग्रामीण लोगों के लिए शुरू की गई नरेगा योजना, जिसके तहत वर्ष में 100 दिन के रोज़गार का प्रावधान है, दरअसल मौजूदा व्यवस्था की पोल खोलती है। पिछले कुछ वर्षों में देश के कई इलाके सूखे की मार झेल रहे हैं, लाखों किसान बर्बाद हो गए हैं और बढ़ती तादाद में लोग नरेगा के तहत रोज़गार की मांग कर रहे हैं। अब राजग सरकार ने राज्यों को निर्देश दिये हैं कि नरेगा के तहत खर्चों पर सीमा लगायी जायेगी। इसका मतलब है कि राज्य सरकारों से कहा गया है कि अब वे यह 100 दिन का रोज़गार भी नहीं दे सकतीं, जो कि ग्रामीण इलाकों में न्यूनतम वेतन पर दिया जाता था। लेकिन यही सरमायदार हुक्मरान जंग की मशीन और अत्याधुनिक हथियारों पर लोगों का हजारों करोड़ों रुपये खर्च कर सकते हैं। सबसे बड़ी इजारेदार कंपनियों को बड़े-बड़े सरकारी बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज़ को माफ कर सकते हैं और इसका बोझ लोगों पर लाद सकते हैं। 

बड़े सरमायदार जो रास्ता अपना रहे हैं वह मजदूरों का शोषण बढ़ाने और किसानों की लूट को बढ़ाने का रास्ता है, ताकि हिन्दोस्तान को देशी और विदेशी पूंजीपतियों द्वारा निवेश करने के लिए आकर्षक बनाया जा सके। श्रमजीवी वर्ग और किसानों की परिस्थिति दिन-ब-दिन खराब होती जा रही है।

इस बीच हिन्दोस्तानी राज्य ने संयुक्त राष्ट्र संघ के कई समझौतों पर हस्ताक्षर किये हैं - जैसे मिलेनियम डेवलपमेंट गोल (एम.डी.जी.) और अब सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एस.डी.जी.)। हिन्दोस्तानी सरमायदारों की यह धोखेबाजी है - पहले एक लक्ष्य तय करना, जिसे पूरा करने का कोई इरादा नहीं है और फिर उस लक्ष्य को आगे धकेल देना। अब नया एस.डी.जी. है - भुखमरी को वर्ष 2030 तक खत्म करना। 

असलियत यह है कि मौजूदा व्यवस्था में पर्याप्त भोजन, बुनियादी स्वास्थ्य सेवा, पानी, शौच व्यवस्था और शिक्षा ये सभी अधिकार बतौर नहीं हैं। इनको हासिल करने के लिए पूरी अर्थव्यवस्था को पूंजी-केंद्रित दिशा से मानव-केंद्रित दिशा की ओर बदलना होगा। मौजूदा सरमायदारी राज्य को बदलकर मजदूरों और किसानों का राज बसना होगा जो कि अर्थव्यवस्था की दिशा को सभी के लिए सुख और सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा की ओर मोड़ देगा। तब हम हिन्दोस्तान को भुखमरी और कुपोषण से मुक्त कर पायेंगे।

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पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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