“व्यापार को सुगम बनाने” के नाम पर पर्यावरण संबंधी मसले नज़र अंदाज

Submitted by sampu on मंगल, 01/11/2016 - 05:30

अखबार में छपी खबरों के मुताबिक केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की वन सलाहकार समिति (फारेस्ट एडवाइज़री कमेटी-एफ.ए.सी.) ने हाल ही में तीन ऐसी खदानों और जल ऊर्जा की परियोजनाओं को मंजूरी दी है, जो कि वन्य जीवन क्षेत्रों के बहुत करीब हैं। इनमें शेरों और हाथियों के प्राकृतिक आवास भी शामिल हैं। सरकार के इस कदम से वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता और इन इलाकों में रहने वाले लोग बेहद आक्रोशित हैं।

अभी तक चली आ रही कार्य प्रणाली के मुताबिक, आमतौर से वन्य जीवों के आवास वाले इलाकों में किसी भी परियोजना को पर्यावरण मंत्री की अध्यक्षता में वन्य जीवों के लिए गठित राष्ट्रीय बोर्ड ही इस तरह की मंजूरी दे सकता था। लेकिन पहली बार एफ.ए.सी. ने इस मामले को बोर्ड की मंजूरी के लिए नहीं भेजा। पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी के मुताबिक, “पिछले वर्ष बदले गए नियम के अनुसार वन्य जीवों के आवास के बाहर के इलाकों में परियोजना को मंजूरी देने का अधिकार अब एफ.ए.सी. को है” और इसके लिए वह कंपनी से वन्य प्राणी प्रबंधन शुल्क वसूल कर सकता है।

इन बदले हुए नियमों के मुताबिक, एफ.ए.सी. किसी भी कंपनी को वन्य प्राणियों के प्रबंधन के लिए निर्धारित ज़मीन की खरीदी की मंजूरी दे सकता है और इसके लिए उसे वन्य प्राणियों के मसलों के विशेषज्ञों की मंजूरी लेना ज़रूरी नहीं है। जब तक कंपनी 43,000 रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से वन्य प्राणी प्रबंधन शुल्क अदा करती है। यह शुल्क पेड़ कटाई शुल्क के अतिरिक्त है, जो कि पेड़ के मूल्य और वन के घनत्व पर निर्भर होती है।

नियम में यह बदलाव भूतपूर्व पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडे़कर द्वारा “ग्रीन अप्रूवल” (हरित मंजूरी) को त्वरित बनाने के लिए लागू किये जा रहे “ग्रीन रिफार्म” (हरित सुधार) के तहत किया गया था, जो कि हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीपतियों के लिए “व्यापार को सुगम बनाने” में अपनी योग्यता को और बेहतर बनाने के मौजूदा राजग सरकार के प्रयासों का हिस्सा है।

अगस्त 2016 में एफ.ए.सी. ने टाटा स्टील और अन्य कंपनियों को ओडिशा के सुकिंदा खनिज क्षेत्र में खदान परियोजना शुरू करने की मंजूरी दी। इस क्षेत्र में कई विलुप्त होने वाली प्रजातियां पाई जाती हैं - जैसे कि हाथी, पंैगोलिन छिपकली और आलसी भालू।

इसी तरह से मार्च 2016 में टाटा स्टील को ओडिशा के क्योंझार जिले में खदान परियोजना शुरू करने की मंजूरी दी गयी। इस इलाके के आस-पास हाथियों का प्राकृतिक आवास है। स्थानीय वन्य प्राणी कार्यकर्ताओं के विरोध के बावजूद इस परियोजना को मंजूरी दी गयी।

तीसरी परियोजना है जय प्रकाश पॉवर वेंचर्स लिमिटेड (जे.पी.वी.एल.) की उत्तराखंड के चमोली जिले के बेहद नाजुक पर्यावरण वाले इलाके में 252 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना। इसे फरवरी 2016 में मंजूरी दी गयी थी। पर्यावरण मंत्रालय के लखनऊ क्षेत्रीय कार्यालय ने बताया कि इस इलाके में कई दुर्लभ वन्य प्राणियों का आवास है जैसे कि हिमालयी तहर, काला भालू, हिमालयी चीता और कस्तूरी मृग। परन्तु एफ.ए.सी. ने अतिरिक्त शुल्क लगाकर इस परियोजना को मंजूरी दे दी है।

जबकि तमाम वैज्ञानिक और वन्य प्राणियों की सुरक्षा के लिए काम कर रहे कार्यकर्ता कई बार यह बता चुके हैं कि खदान और जल-विद्युत जैसी बड़ी क्षमता वाली परियोजना से वन्य प्राणियों के जीवन को खतरा है, उनकी चिंताओं को नज़र अंदाज किया गया है। इसके विपरीत, सरकार के प्रवक्ता पूंजीपतियों के हित में लाये जा रहे इन बदलावों को यह कहकर जायज़ ठहरा रहे हैं कि इससे परियोजनाओं की मंजूरी में “तेज़ी आएगी”, और लगाये जा रहे अतिरिक्त्त शुल्क से वन विभाग के पास वन्य प्राणियों की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए अधिक धन आएगा, क्योंकि सरकार उन्हें पर्याप्त संसाधन नहीं देती है।

सच तो यह है कि हिन्दोस्तानी राज्य देश की प्राकृतिक सम्पदा सहित वन्य प्राणियों की रक्षा करने और उनकी परवरिश करने की अपनी जिम्मेदारी से न केवल इंकार कर रहा है, बल्कि साफ तौर से वह हमारे लोगों के इन बहुमूल्य संसाधनों का इस्तेमाल हिन्दोस्तानी और विदेशी इजारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़ों को सुनिश्चित करने के लिए कर रहा है।  

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

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