बारामूला में घर-घर तलाशी और गिरफ्तारी

Submitted by sampu on मंगल, 01/11/2016 - 05:30

कश्मीरी लोगों पर बर्बर हमलों की निन्दा करें!

केंद्र सरकार ने कश्मीर के लोगों द्वारा चलाये जा रहे राजकीय आतंकवाद के खिलाफ़ संघर्ष और उनके राष्ट्रीय अधिकारों के संघर्ष को वहशी हिंसा से कुचलने का काम निरंतर जारी रखा हुआ है। हिन्दोस्तानी राज्य के सशस्त्र बालों ने कश्मीरी लोगों पर आतंक का राज और तेज़ कर दिया है। “आतंकवादियों” को पकड़ने के नाम पर पूरे शहर को निशाना बनाया जा रहा है। बारामूला शहर के लोगों के अनुभव से यह साफ नज़र आता है।

बारामूला के पुराने शहर में मंगलवार 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह से ही घर-घर तलाशियां और गिरफ्तारियां की जा रही हैं। सेना सहित, केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (सी.आर.पी.एफ.), सीमा सुरक्षा बल (बी.एस.एफ.), स्थानीय पुलिस और तमाम सशस्त्र बलों ने बुलेट-प्रूफ वाहनों से पुराने शहर को सुबह 5 बजे घेर लिया। सशस्त्र बलों ने इस इलाके में रहने वाले लोगों को घर से बाहर जाने से रोक दिया और अलग-अलग टुकड़ियों में बंटकर पूरे इलाके में घर-घर जाकर तलाशी ली। यह पूरी कार्यवाही करीब 12 घंटे चली और 40 से अधिक लोगों को “आतंकवादी” करार देते हुए गिरफ्तार किया गया।

इस पूरे दौर में बारामूला शहर में लगातार प्रदर्शन होते आये हैं। हर शुक्रवार को लोग बड़े-बड़े प्रदर्शन करते हैं, जिसे पुलिस आंसू गैस, पैलेटगन और अन्य हथियारों से तोड़ने की कोशिश करती है। बारामूला इलाके में कम से कम 100 लोग पैलेटगन से गंभीर रूप से जख्मी हुए हैं और कई लोगों को अपनी आँखें गंवानी पड़ी हैं।

हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा कश्मीर की घेराबंदी में तेज़ी का यह सबसे ताजा वाकया है। पिछले करीब पांच महीनों से कश्मीर के लोग हिन्दोस्तानी राज्य के दमन और शोषण के खिलाफ़ तथा अपने अधिकारों की मांग करते हुए लगातार सड़कों पर उतर रहे हैं। कश्मीर के लोगों की आवाज़ और जन आन्दोलन को कुचलने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य ने बेहद बर्बर तरीकों का इस्तेमाल किया है, जिसमें कई बच्चों और नौजवानों को पैलेटगन से अंधा कर दिया गया है।

पिछले दो महीनों में कश्मीर में लगभग 9000 से अधिक लोगों को गिरफ्तार किया गया है या नज़रबंद किया गया है। कई लोगों को फासीवादी जन सुरक्षा कानून (पब्लिक सेफ्टी एक्ट) के तहत गिरफ्तार किया गया है, जिसके अनुसार किसी भी व्यक्ति को 6-24 महीनों तक अदालत में किसी भी तरह की सुनवाई के बिना ही जेल में रखा जा सकता है।

इसके साथ ही केंद्र सरकार ने हिन्दोस्तान के अन्य लोगों के बीच कश्मीर के लोगों को बदनाम करने के लिए जोरदार दुष्प्रचार और झूठ का अभियान चलाया है। कश्मीर के जुझारू लोगों को आतंकवादी और अलगाववादी करार देते हुए उनके संघर्ष को बदनाम करने के लिए यह झूठा प्रचार किया जा रहा है कि उनका संघर्ष “पाकिस्तान द्वारा उकसाया” गया है।

लेकिन इन सब बर्बर हमलों, दुष्प्रचार और बदनाम करने की कोशिश के बावजूद कश्मीर के लोग झुके नहीं हैं और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का उनका फैसला और अधिक मजबूत हो गया है। खबर है कि अब अनेक महिलायें और लड़कियां भी बड़ी तादाद में विरोध प्रदर्शनों के हिस्सा ले रही हैं।

अपने दुष्प्रचार अभियान के तहत केंद्र सरकार अपनी वही घिसी-पिटी लाइन दोहरा रही है कि कश्मीरी नौजवानों को “रोज़गार के अवसर प्रदान” करके वह उन्हें संघर्ष के रास्ते से दूर ले जा पायेगी। ऐसी खबरें आ रही हैं कि सरकार कश्मीरी नौजवानों को पुलिस में भर्ती करने जा रही है। दरअसल पिछले कुछ महीनों में कश्मीरियों ने बड़े पैमाने पर पुलिस की नौकरी छोड़ दी है, सरकार के इस कदम को उस संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

कश्मीरी नौजवानों का गुस्सा और आक्रोश किस हद तक बढ़ गया है इसका एक उदाहरण दिल्ली में केंद्र सरकार द्वारा आयोजित कार्यक्रम में देखा गया, जहां सरकार कश्मीर घाटी से 580 नौजवानों को कार्यक्रम के लिए लाई थी। सरकार द्वारा यह कार्यक्रम कश्मीर में नयी संचार सेवा के उद्घाटन का प्रचार करने के लिए आयोजित किया गया था। जब मीडिया ने कश्मीरी नौजवानों से उनकी आकांक्षाओं के बारे में पूछा तो उन्होंने सरकार के इस कदम को एक धोखा करार देते हुए कहा कि इसी सरकार ने पिछले तीन महीनों से कश्मीर में इन्टरनेट सेवायें बंद कर रखी हैं। नौजवानों ने आत्म-निर्धारण का नारा लगाते हुए राजकीय आतंकवाद की निंदा की। हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा कश्मीरी लोगों पर की जा रही नाइंसाफी के खिलाफ़ वहां के लोगों में बेहद आक्रोश भरा हुआ है।

राजकीय हिंसा के खिलाफ़ और अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिए कश्मीरी लोगों का संघर्ष पूरी तरह से जायज़ है। हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा कश्मीरी लोगों पर चलाये जा रहे आतंक के राज का हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी निन्दा करती है। राजकीय आतंकवाद को तुरंत बंद किया जाना चाहिए। सशस्त्र बलों को हटाकर वापस बैरक में भेजा जाना चाहिए और सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को तुरंत रद्द किया जाना चाहिए।

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पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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