राजस्थान सरकार द्वारा शिक्षा के निजीकरण को लेकर राजस्थान शिक्षक संघ (प्रगतिशील) के पदाधिकारियों के साथ साक्षात्कार

Submitted by sampu on मंगल, 01/11/2016 - 17:30

बाबूलाल जैन सभा अध्यक्ष

मजदूर एकता लहर : वर्तमान शिक्षा नीति पर आपके संगठन की क्या राय है?

बाबूलाल जैन : वर्तमान में जो शिक्षा नीति चल रही है उसमें आमूलचूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा के परिणाम बहुत भयावह हैं। अफसर सरकार, और प्रशासन के दमन से तंग आकर आत्महत्या कर रहे हैं। पढ़ने वाले छात्र पढ़ाई के दबाव में आकर आत्महत्यायें कर रहे हैं। शिक्षा में समता का समावेश किया जाना चाहिये। समाज की आवश्यकता के आधार पर शिक्षा नीति का निर्माण हो। जैसे कि आप गरीब और पिछड़े बच्चों को तथा अभिजात्यों को एक जैसी शिक्षा नीति के आधार पर आंकोगे तो पिछड़ा वर्ग आगे नहीं आ पायेगा। सभी के लिये समान शिक्षा प्रणाली हो, समतामूलक शिक्षा व्यवस्था हो, समानता पर आधारित हो, ऐसी बातें सब करते हैं, लेकिन इस दिशा में आज तक कुछ नहीं हुआ है। उल्टे राजस्थान में तो पाठ्यक्रम का ही राजनीतिकरण किया जा रहा है।

म.ए.ल. : शिक्षा के निजीकरण को आप कैसे देखते हैं?

बाबू लाल जैन : हमारा संगठन निजीकरण के खिलाफ़ लड़ रहा है। हम पी.पी.पी. मॉडल के खिलाफ़ लड़ रहे हैं। सरकार पी.पी.पी. मॉडल के तहत सभी अच्छे स्कूलों का निजीकरण कर रही है। अगर सरकार को निजीकरण करना ही है तो सुदूर, दुर्गम इलाकों में जाकर करे जहां शिक्षा की बहुत आवश्यकता है। जो भी निजी कंपनी आ रही हैं वे मुनाफ़ा कमाने आ रही हैं। उन कंपनियों को तो शहर के अंदर प्राइम लोकेशन की ज़मीनें दिख रही हैं। पी.पी.पी. में सब कुछ सरकार देगी - स्कूल के भवन और स्टाफ का वेतन। प्राईवेट स्कूलों में अध्यापकों का तो पहले ही शोषण किया जा रहा है, इससे वहां शोषण और बढ़ जायेगा।

निजीकरण की वजह से फीस इतनी बढ़ा दी जायेगी कि शिक्षा गरीब लोगों की पहुंच से बाहर हो जायेगी। ज्यादा से ज्यादा बच्चे, जो ऊंची फीस नहीं दे पायेंगे वे शिक्षा से वंचित रह जायेंगे।

म.ए.ल. : स्टाफीकरण और एकीकरण में क्या अनिमिततायें हैं? पढ़ाई का समय बढ़ाने पर क्या विरोध है?

बाबू लाल जैन : शिक्षक एक मननशील प्राणी है। सरकार कहती है कि अध्यापक को आठ घंटे काम करना होगा। अध्यापक अगर आठ घंटे केवल पढ़ायेगा तो फिर वह सोचेगा कब, स्वाध्याय कब करेगा, अपनी पाठ योजना कब बनायेगा, अध्यापक का काम केवल पढ़ा देना ही नहीं होता है। उसे शिक्षण सामग्री तैयार करनी होती है, जिसके लिये उसे मनन करना होता है, तैयारी करनी होती है। सरकार समय बढ़ाकर शिक्षा की गुणवत्ता में बाधक बन रही है। राजस्थान की सरकार ने हजारों स्कूलों को एकीकृत करके बंद कर दिया है।

राजस्थान सरकार ने केरिकूलम बदल दिया, किताबें बदल दीं। सरकार आपातकाल को तो पढ़ाना चाहती है, लेकिन बाबरी मस्जिद के विध्वंश को नहीं पढ़ाना चाहती। इसे भी पढ़ाया जाना चाहिये क्योंकि इससे देश की सामाजिक समरसता नष्ट हुई थी, कितने ही लोग मारे गये थे, इसको अगुवाई देने वाले बड़े-बड़े नेताओं को कोई सज़ा नहीं हुई। यह भी पढ़ाना होगा कि इसमें कौन लोग आगे थे, आज वे सब बड़े-बड़े पदों पर सुशोभित हो रहे हैं कोई राज्यपाल है तो कोई मंत्री बन रहा है। इतिहास तो इतिहास होता है, इसके साथ भेदभाव कैसे किया जा सकता है।

म.ए.ल. : जो शिक्षक संविदा के आधार पर हैं, परियोजनाओं में काम करते हैं, उनकी क्या स्थिति है?

बाबू लाल जैन : हम हमेशा समान काम के लिये समान वेतन के हामी हैं। कोई भी काम संविदा के आधार पर नहीं होना चाहिये। शिक्षकों की नियुक्ति स्थाई रूप से होनी चाहिये। जो भी परियोजनायें होती हैं वे सामयिक काल के लिये होती हैं और कुछ समय चल के बंद हो जाती हैं। बच्चे कुछ समय पढ़ाकर छोड़ दिये जाते हैं। उनकी आगे की पढ़ाई की कोई व्यवस्था नहीं होती। सरकार स्कूलों को खोलने की बजाय बंद कर रही है।

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राम लुभाया तिन्ना,

जिला अध्यक्ष (हनुमानगढ़)

मजदूर एकता लहर : स्टाफिंग पैटर्न क्या है और यह किस प्रकार खराब है?

राम लुभाया : हम इसका विरोध करते हैं, क्योंकि इसमें पद तो सृजित किये गये, विषय अध्यापक भी बनाये गये, लेकिन अध्यापकों के पदों में कटौती कर दी गई। इससे भविष्य में युवकों के लिये रोज़गार के साधनों में कमी होगी। इसकी वजह से जो ग्रेड 3 में विषय अध्यापक हैं वे अधिशेष हो गये हैं, जो कि एक बड़ा नुकसान है।

म.ए.ल. : सरकार द्वारा जिन विद्यालयों का एकीकरण किया जा रहा है और जो शिक्षा नीति चलाई जा रही है उस पर आपकी क्या राय है?

राम लुभाया : एकीकरण के बाद दूरस्त इलाकों, ढांणियों और गांवों में जो विद्यालय थे, उनको सरकार ने बंद कर दिया है। जिसकी वजह से उनके भवन भी बेकार हो गये हैं। उन ढांणियों और गांवों में रहने वाले बच्चे शिक्षा से वंचित हो गये हैं और एकीकृत स्कूलों में ड्रापआउट (स्कूल छोड़ने वाले) बच्चे बढ़ गये हैं। दूर-दराज के इलाकों की लड़कियों ने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी है, क्योंकि इनके लिये जो नये स्कूल तय किये गये हैं वे सभी उनकी पहंुच से दूर हो गये हैं।

सरकार जो नई शिक्षा नीति चला रही है वह ठीक नहीं है। साथ-साथ जो पाठ्यक्रम बनाया जा रहा है उसमें विषयों के विशेषज्ञों की जगह पर नेताओं, विधायकों को लिया जा रहा है जिनका शिक्षा से कोई वास्ता ही नहीं है। विषय विशेषज्ञों से जो पाठ्य सामग्री हमें मिलनी चाहिये थी वह नहीं मिल पा रही है। नेताओं और विधायकों की वजह से पाठ्यक्रम में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ गया है। इससे पाठ्यक्रम की सार्थकता कम हो गई है।

अब तो स्थानांतरण राजनेताओं की सिफारिश पर किये जाते हैं। जबकि हमारी मांग है कि पारदर्शितापूर्ण नीति बनाकर स्थानांतरण किये जाने चाहिये और राजनीतिक हस्तक्षेप बंद किया जाना चाहिये।

म.ए.ल. : शिक्षा के निजीकरण की नीति के विरोध में आपकी आगे की क्या रणनीति है?

राम लुभाया : हमारा संगठन शिक्षा के किसी भी प्रकार से निजीकरण का विरोध करता है। शिक्षा के निजीकरण से रोज़गार के अवसर कम हो जायेंगे, राजकीय विद्यालयों की कमी हो जायेगी। निम्न आय वर्ग के बच्चे, गरीबों के बच्चे और मजदूर वर्ग के बच्चे ऊंची फीस न दे पाने के कारण शिक्षा से वंचित रह जायेंगे। हमारे संगठन ने संघर्ष की रणनीति तय कर ली है, हमने जिला स्तर, तहसील स्तर और राज्य स्तर पर संघर्ष का बिगुल बजा दिया है। सबसे पहले हमने ज्ञापन देने से शुरू किया है और बाद में इसे हम बड़े स्तर पर ले जायेंगे।

हमारा संगठन पूंजीवादी व्यवस्था को पूर्ण रूप से समाप्त करने के लिये संघर्षरत है। साथ ही साथ, हम सरकार के सामने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करवाने के लिये भी संघर्ष कर रहे हैं।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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