काले कानूनों के विरोध में मुंबई में जनसभा

Submitted by sampu on रवि, 16/10/2016 - 04:30

प्रस्तावित महाराष्ट्र प्रोटेक्शन ऑफ इंटर्नल सिक्योरिटी एक्ट (एम.पी.आई.एस.ए.) सहित तमाम काले कानूनों तथा महाराष्ट्र सरकार के अन्य दमनकारी कदमों का विरोध करने के लिये 22 सितंबर, 2016 को कामगार एकता कमेटी, लोक राज संगठन, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी, सी.पी.आई. (एम.-एल.) लिबरेशन, और एस.यू.सी.आई. (कम्युनिस्ट) ने मुंबई में एक जनसभा का आयोजन किया। सभा की अध्यक्षता जस्टिस सुरेश ने की जो लोक राज संगठन के माननीय अध्यक्ष हैं। सभा में अनेक मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधियों व कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया।

हालांकि एम.पी.आई.एस.ए. के मसौदे की विभिन्न काली उप-धाराओं के खिलाफ़ लोगों व राजनीतिक, सामाजिक व मानव अधिकार कार्यकर्ताओं के भारी विरोध के चलते इसे वापस ले लिया गया है, लेकिन भाजपा नीत महाराष्ट्र सरकार ने इस जन-विरोधी कानून को लादने की कोशिशें अभी तक बंद नहीं की हैं। सरकार की कोशिश यह भी है कि सोशल मीडिया में सरकार-विरोधी विचारों पर रोक लगाई जाये। अतः सभा के आयोजकों ने न केवल प्रस्तावित कानून की तमाम काली उप-धाराओं सहित सरकार के अन्य दमनकारी कदमों के बारे में सूचना प्रसारित करने की ज़रूरत महसूस की, बल्कि मज़दूर वर्ग की आवाज़ को दबाने के सरकार के हर कदम का एकजुटता से विरोध करने की ज़रूरत पर भी जोर दिया।

लोक राज संगठन के प्रतिनिधि ने ध्यान दिलाया कि मीडिया ने सिर्फ कुछ ही उप-धाराओं पर विरोध को प्रकाशित किया है और इसीलिये सरकार उन कुछेक उप-धाराओं को कमजोर करके बाकी सभी उप-धाराओं को बरकरार रखना चाहेगी, जिससे महाराष्ट्र लगभग एक ”पुलिस राज्य“ बन जायेगा।

उन्होंने बाकि सभी आपत्तिजनक उप-धाराओं पर ध्यान आकर्षित करते हुए, मौजूद लोगों को समझाया कि मौजूदा रूप में या किसी भी दूसरे परिवर्तित रूप में इस विधेयक का विरोध करना चाहिये। उन्होंने याद दिलाया कि 1999 से मौजूद एम.सी.ओ.सी.ए. (मकोका) कानून, जिसे संगठित अपराधी गुटों को दबाने के लिये लाया गया था, बार-बार उसका इस्तेमाल न्याय और अधिकारों के लिये लड़ने वाले लोगों पर किया गया है।

एस.यू.सी.आई. (कम्युनिस्ट) के प्रतिनिधि ने सवाल उठाया कि सुरक्षा पर ख़तरे का सामना करने के इतने सारे कानून मौजूद होने के बावजूद, सरकार क्यों एक और ऐसा कानून लाना चाहती है। इस कानून का मसौदा पिछली कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व की सरकार ने पहले से तैयार किया हुआ था। इस विधेयक का लक्ष्य उन सभी लोकतांत्रिक शक्तियों को दबाना है जो साम्राज्यवाद और इज़ारेदारी व वित्त पूंजी के आधिपत्य का विरोध करते हैं। भाजपा और कांग्रेस पार्टी जैसी सरमायदारी पार्टियां सिर्फ पूंजीपति वर्ग के हित में काम करती हैं। हमें मिलकर इस जन-विरोधी विधेयक का विरोध करना होगा और साथ-साथ एक वैकल्पिक व्यवस्था के निर्माण के लिये काम करना होगा।

जस्टिस सुरेश ने कहा कि न केवल हमें इस प्रस्तावित कानून का विरोध करना होगा बल्कि सभी मौजूदा सुरक्षा कानूनों का भी विरोध करना होगा क्योंकि इन सभी को लोगों के खिलाफ़ इस्तेमाल किया गया है। ये सभी सुरक्षा कानून बेकसूर लोगों को कैद करने के लिये इस्तेमाल किये गये हैं। उन्होंने ध्यान दिलाया कि 1985 में तथाकथित खालिस्तानियों का सामना करने के लिये टी.ए.डी.ए. (टाडा) कानून बनाया गया था। इस कानून के तहत कुल मिलाकर 77,000 कैद किये लोगों में से सिर्फ 1.8 प्रतिशत को ही सज़ा दी गयी थी। उन्होंने कहा कि हमें पूरे देश में आंदोलन करना होगा और आवाज़ उठानी होगी कि हमें कोई सुरक्षा कानून नहीं चाहिये।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के प्रतिनिधि ने जस्टिस सुरेश के सुझाव का हार्दिक समर्थन किया। उन्होंने ध्यान दिलाया कि भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों ही काले कानून बनाते आये हैं। पहला और सबसे खराब काला कानून, ए.एफ.एस.पी.ए. 1958 से लागू है जबकि इसको हटाने की मांग लगातार आती रही है। इन काले कानूनों का एक ही मकसद होता है - अपने देश में 150 इज़ारेदार घरानों के नेतृत्व में मात्र दो लाख पूंजीपतियों के राज का विरोध करने वालों को दबाना। सभी काले कानूनों का विरोध करने के साथ-साथ, हमें मज़दूरों और किसानों की एकता बनानी होगी ताकि एक नये समाज की स्थापना की जा सके जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के दमन से मुक्त होगा। अपनी एकता को तोड़ने और हमें बहकाने की शासक वर्ग की सभी कोशिशों के प्रति सतर्क रहना होगा। हुक्मरान वर्ग को संकट से निकालने के लिये देश को जंग में फंसाने की इजाजत हम नहीं दे सकते हैं।

सी.पी.आई. (एम.-एल.) लिबरेशन के प्रतिनिधि ने समाज के विभिन्न तबकों के संघर्षों की तरफ ध्यान आकर्षित किया, खास तौर पर न्याय व बराबरी के लिये, जातीय दमन के विरोध में और हर प्रकार के दमन के खिलाफ़ एकजुट विरोध की ज़रूरत पर जोर दिया।

कामगार एकता कमेटी के प्रतिनिधि ने कहा कि सरकार मज़दूरों द्वारा विरोध प्रदर्शनों के सभी रास्तों को एक के बाद एक बंद करती जा रही है। पहले उसने “शांत इलाकों” का ऐलान करके मैदानों में मज़दूरों की जनसभाओं पर रोक लगाई। अब वह इस नये कानून के ज़रिये सभागृहों में विडियो रिकॉर्डिंग की मांग करके हॉल के अंदर होने वाली सभाओं पर भी रोक लगाना चाहती है। वे वाट्सएप के ज़रिये संगठित करने और विचार व्यक्त करने पर भी प्रतिबंध लगाने की योजना बना रहे हैं। पश्चिम रेलवे के अधिकारियों ने मज़दूरों को चेतावनी दी है कि जन सेवक होने के नाते वे वाट्सएप पर सरकार के खिलाफ़ नहीं बोल सकते हैं। राज्य की कोशिश है कि किसी भी मीडिया या दूसरे तरीकों के ज़रिये लोग अपनी असहमति न प्रकट कर सकें। इन हमलों का सामना सिर्फ अपनी एकजुट कार्यवाइयों से किया जा सकता है।

कम्युनिस्ट गद़र पार्टी, भाकपा, एस.यू.सी.आई.(सी), लोक राज संगठन, कामगार एकता कमेटी, जागृत कामगार मंच, भारतीय लोक क्रांति आंदोलन, बिगुल मज़दूर दस्ता, इत्यादि के विभिन्न कार्यकर्ताओं, यूनियन के नेताओं और सदस्यों ने, जन-विरोधी एम.पी.आई.एस.ए. के बारे में चेतना बढ़ाने और लोकतंत्र और मानव अधिकारों के समर्थन करने वाले सभी लोगों का एकजुट विरोध संगठित करने की मांग का समर्थन किया।

भाकपा के एक सदस्य ने कहा कि गुजरात में इस तरह का कानून पहले से लागू है और अगर आप यह लिखित में नहीं देते कि आप सरकार के खिलाफ़ नहीं बोलेंगे तो पुलिस आपको सभा आयोजित करने की अनुमति नहीं देगी! उन्होंने कहा कि हमें लोगों के असली दुश्मनों को, बड़े पूंजीपतियों को पहचानना होगा और लोगों को उनके खिलाफ़ एकजुट करना होगा।

जागृत कामगार मंच के प्रतिनिधि ने इस सभा का आयोजन करने की पहलकदमी की सराहना की और कहा कि आम लोगों के बीच सरकार की दमनकारी कोशिशों के बारे में चेतना बढ़ाने के लिये अभियान शुरू करना बहुत ज़रूरी है। उन्होंने कहा कि एक संयुक्त पर्चा लिखा जा सकता है और उसे संयुक्त रूप से और अलग-अलग संगठनों द्वारा बांटा जा सकता है।

ऑल इंडिया गार्ड्स कौंसिल के नेता ने ध्यान दिलाया कि ब्रिटिश सरकार उनके खिलाफ़ लड़ने वालों को देशद्रोही कहती थी। इसी तरह आज जो सरकार का विरोध करते हैं, उन्हें सरकार देशद्रोही बता रही है। हम सबको पता है कि ब्रिटिश हुकूमत का क्या हुआ। इसी तरह वर्तमान सरकार की जन-विरोधी नीतियों के खिलाफ़ हमें एकजुट होना होगा। राज करने वाली राजनीतिक पार्टियां टाटा और बिरला जैसे बड़े पूंजीपतियों के हाथों में कठपुतलियां होती हैं। हमें मज़दूर वर्ग के संगठनों के प्रतिनिधियों को एक मंच में लाकर एक देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की ज़रूरत है।

सर्वसम्मति से पारित एक दृढ़ संकल्प के साथ सभा का समापन हुआ: “सेवानिवृत्त जस्टिस हॉस्बेट सुरेश की अध्यक्षता में 22 सितम्बर, 2016 को संगठनों के प्रतिनिधियों, यूनियनों के नेताओं, मज़दूरों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की यह सभा वर्तमान महाराष्ट्र सरकार द्वारा एम.पी.आई.एस.ए. नामक एक और काले कानून को लाने की कोशिश की कड़ी निंदा करती है। सर्वसम्मति से यह सभा एम.पी.आई.एस.ए. का, मौजूदा रूप में या किसी भी परिवर्तित रूप में, विरोध करने का फैसला लेती है और सभी लोकतांत्रिक शक्तियों को बुलावा देती है कि लोगों के अधिकारों पर सभी हमलों को पराजित करने के लिये एक साथ आयें।”

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पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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