जी.एन. साईबाबा के जारी दमन की निंदा करें

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 27/01/2017 - 22:28

प्रोफेसर जी.एन. साईबाबा, जो एक प्रख्यात राजनीतिक कार्यकर्ता हैं, उनको दिल्ली विश्वविद्यालय का राम लाल आनंद महाविद्यालय फिर से नियुक्त करने से इनकार कर रहा है। 207 शिक्षाविदों के एक ज्ञापन, जो हिन्दोस्तान के उप-राष्ट्रपति को भेजा गया था, के बावजूद महाविद्यालय ने फैसला किया कि प्रो. साईबाबा को निलंबित रखा जायेगा। उनकी नौकरी का एक “मानित निलंबन” आदेश 2014 में जारी किया गया था, जब उन्हें हिरासत में लिया गया था।

9 मई, 2014 को हिन्दोस्तानी राज्य ने साईबाबा का अपहरण करके उन्हें “राज्य के खिलाफ़ जंग करने” के आरोप तथा यू.ए.पी.ए. की विभिन्न धाराओं के तहत गिरफ्तार किया था। अप्रैल 2016 को सर्वोच्च न्यायालय ने उन्हें जमानत दी। प्रो. साईबाबा के खिलाफ़ कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है; उन्हें 1965 के केन्द्रीय लोक सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियमों के तहत फिर से नियुक्ति पाने का अधिकार है।

जी.एन. साईबाबा बचपन से पोलियो की वजह से लगभग पूरी तरह से लकवाग्रस्त हैं। उनके पैरों में बिल्कुल भी हिलने-डुलने की क्षमता नहीं है। दो साल तक नागपुर जेल में अधिकारियों ने उन्हें पाश्विक यातनायें दीं। न्यायालय में बिना हथकड़ी के पेश होने के उनके अधिकार को नकारा गया और उन्हें दवाओं से वंचित रखा गया, जिसकी वजह से उनका स्वास्थ्य और बिगड़ गया। उनके जारी निलंबन का मतलब है कि उन्हें अपने वेतन का सिर्फ 50 प्रतिशत ही मिल रहा है। इसकी वजह से उनकी आर्थिक परिस्थिति पर और इसके फलस्वरूप उनके उपचार पर बुरा असर पड़ा है।

18 नवम्बर, 2016 के जारी एक आदेश में महाविद्यालय के प्रधानाचार्य ने कहा है कि “... इस मामले के तथ्यों में कोई बदलाव नहीं आया है, ... मामला अभी भी विचाराधीन है ... ”, निलंबन जारी रहेगा। हां, मामला विचाराधीन है, और संभव है कि कई वर्षों तक विचाराधीन ही रहेगा। यह सभी को मालूम है कि हिन्दोस्तान में अपराधिक मामले बहुत सालों तक चलते रहते हैं और कोई अपराध साबित नहीं होता है। महत्वपूर्ण बात है कि अभी तक उनके खिलाफ़ अदालत द्वारा कोई फैसला नहीं दिया गया है और कोई अपराध साबित नहीं हुआ है।

राज्य से असहमति को फासीवादी आतंक से कुचलने का हिन्दोस्तानी राज्य का कुख्यात इतिहास रहा है। पिछले तीस वर्षों में, जबसे सरमायदारों ने विश्वस्तर की एक साम्राज्यवादी ताक़त बनने के लिये उदारीकरण व निजीकरण के ज़रिये वैश्वीकरण का रास्ता अपनाया है, तबसे राज्य को मज़दूरों, किसानों, महिलाओं, नौजवानों, आदिवासियों और क्रांतिकारी बुद्धिजीवियों के बढ़ते विरोध का सामना करना पड़ा है। इस विरोध को कुचलने के लिये राज्य ने यू.ए.पी.ए. जैसे अनेक काले कानूनों का सहारा लिया है। इन काले कानूनों का यही इतिहास रहा है कि इनके तहत राजनीतिक लोगों - न्यायाधीशों व वकीलों, शिक्षकों व पत्रकारों, छात्रों, मज़दूरों, किसानों और आदिवासी लोगों - को सालों-साल बंदी बनाकर रखा गया है। इन कानूनों के तहत बहुत ही कम लोगों के अपराध सिद्ध हुए हैं - परन्तु उनका जीवन बर्बाद हो गया है, उनकी रोज़ी-रोटी खो गयी है, उन्हें और उनके परिजनों को सामाजिक बहिष्कार सहना पड़ा है और सभी को यह संदेश दिया गया है कि ‘लोगों के अधिकारों की रक्षा में अपनी आवाज़ उठाने की जुर्रत मत करना, वरना ...’।

हिन्दोस्तानी राज्य द्वारा प्रो. साईबाबा के जारी दमन का हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी कड़ा विरोध करती है और उनकी पुनः नियुक्ति के अधिकार का समर्थन करती है।

Tag:    Jan 1-15 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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