यह राजकीय आतंक के अलावा कुछ और नहीं!

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 27/01/2017 - 22:29

देश के अनेक भागों में बहुत से लोग आतंकवाद के विभिन्न आरोपों में जेलों में बंद रखे जाते हैं। कई सालों बाद अदालत उन्हें बेगुनाह पाकर रिहा कर देती है। इन रिहा हुए लोगों की दुर्दशा की सुनवाई करने के लिए ‘पहली जन अदालत’ का गठन 2 अक्तूबर, 2016 को किया गया था। पीड़ितों की गवाही सुनकर जूरी ने जो रिपोर्ट पेश की वह 10 दिसम्बर, 2016 को नई दिल्ली में जारी की गई। ‘द इनोसेंस नेटवर्क इंडिया’ ने उस रिपोर्ट को प्रकाशित किया है।

जन अदालत के अध्यक्ष थे - दिल्ली उच्च न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश ए.पी. शाह। इसके अन्य सदस्यों में देश के जाने-माने नाम थे - सईद अख्तर मिर्जा (फिल्म डायरेक्टर), डा. जी.एस. वाजपेयी (प्राध्यापक, अपराधशास्त्र और अपराध-न्यायशास्त्र और रजिस्ट्रार, राष्ट्रीय कानून विश्वविद्यालय), नीना व्यास (वरिष्ठ पत्रकार), डा. नंदिनी सुंदर (प्राध्यापक समाजशास्त्र), अब्दुल शाबान (उप-निदेशक टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान), विनोद शर्मा (पत्रकार) और मोनिका सखरानी (स्वतंत्र वकील और शिक्षाविद)।

बरी हुए कुछ बेगुनाह लोग

निसार अहमद और जहीर अहमदगुलबर्गाकर्नाटक

निसार अहमद, जो कालेज के 20 वर्षीय छात्र थे। इनको जनवरी 1994 में गिरफ्तार किया गया और उन्होंने जेल में 23 साल गुजारे। साथ ही, उनके भाई जहीर अहमद, जो मुंबई में सिविल इंजीनियर थे उन्होंने भी 14 साल जेल में गुजारे। उन दोनों को 1993 में हुए रेलवे विस्फोट मामले में दोषी ठहराया गया था। उन पर टाडा के तहत विभिन्न धाराओं सहित पांच ट्रेनों के अंदर बम रखने का आरोप लगाया गया था। पुलिस और जांच-एजेंसियों के पास सबूत के रूप में मात्र आरोपियों का कबूलनामा था, जो उन्हें यातना देकर लिया गया था। जेल में किडनी केंसर से पीड़ित होने के कारण जहीर अहमद को 9 मई, 2008 को सुप्रीम कोर्ट ने जमानत दी। 11 मई, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने निसार अहमद को बेकसूर पाकर रिहा कर दिया।

शोएब जागीरदारजालनामहाराष्ट्र

ये हैदराबाद की मक्का मस्जिद विस्फोट (18 मई, 2007) के पहले आरोपी थे। इनकी गिरफ्तारी 26 जून, 2007 को हुई थी। मक्का मस्जिद मामले में जमानत मिलने के तुरंत बाद, उन्हें गोकुल चाट विस्फोट मामले का आरोपी बना दिया गया। मक्का मस्जिद विस्फोट मामले में उनके खिलाफ़, आर.डी.एक्स. की तस्करी और फर्ज़ी पासपोर्ट के आरोप लगाये गये थे। गोकुल चाट विस्फोट मामले में उन पर भारतीय दंड संहिता की धारा 107 के तहत आरोप लगाया गया। एक विचाराधीन कैदी के रूप में 7 साल जेल में बिताने के बाद, सत्र न्यायालय ने 17 जुलाई, 2014 को उन्हें बेकसूर बताकर रिहा कर दिया।

मोहम्मद आमिर खानदिल्ली

1996-97 के दौरान हुए बम-विस्फोटों के लिए उन्हें आरोपी बनाया गया। दिल्ली पुलिस ने 20 फरवरी, 1998 को उन्हें गिरफ्तार किया। वे उस समय 18 साल के थे। उनके खिलाफ़ 19 केस दर्ज किये गये। उन्होंने 14 साल जेल में गुजारे। 9 जनवरी, 2012 को उन्हें बेगुनाह बताकर रिहा किया गया। इस बीच, उनके पिता की मौत हो गयी और माता लकवा की शिकार हो गईं।

अब्दुल अजीमबीडमहाराष्ट्र

2006 के औरंगाबाद हथियार बरामदगी मामले में आतंकियों की गाड़ी का चालक होने का आरोप उन पर लगाया गया था। उन्हें मकोका (महाराष्ट्र संगठित अपराध निरोधक अधिनियम) और यू.ए.पी.ए. (गैर-कानूनी गतिविधि-रोकथाम) अधिनियम के तहत गिरफ्तार किया गया था। वे 10 साल और 3 महीने जेल में बिताने के बाद, 28 जुलाई, 2016 को मकोका अदालत से बेगुनाह बरी हुए।

मौलाना सालिज

50 की उम्र में उन्हें सिमी का सदस्य होने का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया गया। उसके बाद, उन पर चार और आरोप लगा दिए गए। उन्होंने सिमी मामले में लगभग 2.5 साल जेल में बिताए और अब भी कुछ आरोप उन पर चल रहे हैं। अन्य आरोपों के अलावा, उन्हें कानपुर विस्फोट मामले के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। अभी वे सभी आरोपों में बेगुनाह पाये गये हैं।

वासिफ हैदर

उन पर राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम के तहत, राष्ट्र के खिलाफ़ युद्ध छेड़ने (राजद्रोह), दंगा करने, हत्या करने, आदि के आरोप लगाये गये थे। उन पर हिज़बुल मुजाहिदीन का सदस्य होने का आरोप लगाया गया था। बाद में आरोप साबित नहीं हो सके और उन्हें रिहा कर दिया गया।

वाहिद शेख

वे सरकारी स्कूल के शिक्षक थे। 11 जुलाई, 2006 को मुंबई में 7 अलग-अलग ट्रेनों में हुए धमाकों के सिलसिले में, उन्हें मकोका और यू.ए.पी.ए. की अनेक धाराओं के तहत, 29 सितम्बर, 2006 को गिरफ्तार किया गया। वे 10 साल से अधिक जेल में रहने के बाद सभी आरोपों से बेगुनाह बरी हुए। बरी होने के बाद अपनी नौकरी और बकाया वेतन पाने के लिए उन्हें एड़ी-चोटी तक का जोर लगाना पड़ा।

इफ्तिखार गिलानी

इफ्तिखार गिलानी कश्मीर टाइम्स के दिल्ली ब्यूरो चीफ थे। उन पर आधिकारिक गोपनीयता अधिनियम का उल्लंघन करने और गुप्त दस्तावेज़ों को रखने का आरोप लगाया गया था। उन दस्तावेज़ों में हिन्दोस्तानी फौज़ द्वारा कश्मीर में कथित मानवाधिकार हनन की जानकारी थी। पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने 1995 में इसे एक सार्वजनिक दस्तावेज़ के रूप में जारी किया था। 9 जून, 2002 से लेकर 13 जनवरी, 2003 तक वे जेल में रहे। बाद में यह आरोप और सबूत दोनों झूठे निकले।

जन अदालत ने पाया (देखिए बॉक्स-बरी हुए कुछ बेगुनाह लोग) कि आतंकवाद की विभिन्न घटनाओं में मुसलमान समुदाय के नौजवानों को निशाना बनाया गया है। उन पर टाडा, यू.ए.पी.ए., मकोका, आदि जैसे काले कानूनों के तहत फर्ज़ी आरोप लगाये गये और सालों-साल के लिए जेल में बंद कर दिया गया। उन्हें भयानक यातनाएं देकर, जुर्म कबूल करने के लिए मजबूर किया गया। मीडिया ने उन पर आतंकवादी होने का ठप्पा लगाकर उनके खिलाफ़ खूब प्रचार किया।

‘पहली जन अदालत’ ने सुनवाई के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण सिफारिशें पेश कीं:

  • राज्य बरी किये गये बेगुनाह लोगों की गरिमा को वापस लाये, जिन पर आंतकवादी होने का कलंक लगा है। कैदी के रूप में गुजारे दिनों, उससे हुई आय की हानि, शिक्षा और रोज़ी-रोटी की संभावनाओं के अवसरों की हानि, कानूनी फीस, परिवार के सदस्यों के जीवन की हानि, आरोपी और उसके परिवार की भावना और मानसिक क्षति के लिए राज्य मुआवज़ा दे।
  • पुलिस, जांच एजेंसियों और अभियोजन पक्ष की जवाबदेही ठहराकर उन पर आपराधिक मुकदमा चलाकर उन्हें कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाये।
  • सभी मीडिया घराने-चैनल और प्रकाशन, आरोपी के खिलाफ़ कलंकित और अपमानजनक सूचनाएं दिखाने और छापने के लिए, बिना शर्त माफीनामा दिखायें और प्रकाशित करें।
  • जिन व्यक्तियों को फर्ज़ी तरीके से फंसाया गया और जेल में बंद किया गया, फिर बाद में बेकसूर घोषित करके रिहा कर दिया गया, उनके लिए मुआवज़े का कानून बनाया जाए।
  • कबूलनामें को सबूत मानने की मकोका की धारा 18 को खत्म करने के साथ-साथ यू.ए.पी.ए. और मकोका के तहत जमानत न देने और हिरासत में रखने की विशेष धारा को खत्म किया जाए। टाडा और पोटा के तहत चल रहे मामलों को निरस्त करके आम कानून के तहत मुकदमा चलाया जाए।
  • यातना-रोकथाम (संशोधन) विधेयक पास किया जाए।

खासतौर पर, बीते कुछ 20-25 वर्षों से हमारे देश में मुसलमान समुदाय को ‘आतंकवादी’ बताकर भयानक राजकीय आतंकवाद का शिकार बनाया जाता रहा है। ‘आतंकवाद पर जंग’ के नाम पर हरेक आतंकवादी घटना के लिए बड़ी तादात में मुसलमान नौजवानों को बिना किसी आधार के गिरफ्तार करना, यातना देकर जबरदस्ती जुर्म कबूल करवाना, जमानत न देना, फर्ज़ी सबूत तैयार करना, मीडिया के ज़रिये उन पर आतंकी का ठप्पा लगाना, हिरासत या जेल या एनकाउंटर में उन्हें मार डालना, आदि बदस्तूर जारी है। जबकि अनगिनत मुसलमान नौजवानों और उनके परिवारों के जीवन, गरिमा और रोज़ी-रोटी नष्ट हो गये हैं, आज तक किसी भी आतंकवादी घटना के असली गुनहगार नहीं पकड़े गये हैं।

यह वही दौर है जब दुनियाभर में अमरीकी साम्राज्यवाद की अगुवाई में साम्राज्यवादियों ने ‘इस्लामी आतंकवाद’ का हव्वा खड़ा करके, अपने-अपने देशों में इस्लाम धर्म को मानने वालों पर क्रूर भेदभाव और वहशी हमले छेड़ दिये। साम्राज्यवादियों ने ‘आतंकवाद पर जंग’ के झंडे तले, मध्य एशिया और अफ्रीका के अनेक देशों में अपनी फौजें भेजकर हमलावर जंगें छेड़ीं और उन पर कब्ज़ा किया तथा उन देशों को बर्बाद कर दिया। हिन्दोस्तानी राज्य साम्राज्यवादियों की इस ‘आतंकवाद पर जंग’ की मुहिम में उनके साथ कदम मिलाकर चलता रहा है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी जन अदालत की सिफारिशों का पूरा समर्थन करती है और बेगुनाह लोगों को राजकीय आतंक का निशाना बनाये जाने की निंदा करती है।  

Tag:    Jan 1-15 2017    Struggle for Rights    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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