बैंक कर्मियों की हिफ़ाज़त में

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 27/01/2017 - 22:30

हाल के हफ्तों में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार यह आरोप लगा रहे हैं कि बैंक कर्मचारी अपने कुछ खास ग्राहकों को करोड़ों-करोड़ों रुपये दे रहे हैं और उसमें से खुद भी कुछ पैसे बना रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि मोदी सरकार बैंक व्यवस्था को पर्याप्त मात्रा में नये नोट दिलाने में नाकामयाब रही है। सरकार इस बात के लिये जिम्मेदार है कि लोगों को अनेक घंटों तक लम्बी-लम्बी लाइनों में खड़े रहना पड़ा है और उसके बाद भी, बैंक में पैसे न होने के कारण, वे अपने ही पैसे नहीं निकाल पाये हैं। अब प्रधानमंत्री बैंक कर्मचारियों के खिलाफ़ इस प्रकार के नाजायज़ आरोप लगा रहे हैं, ताकि उनकी सरकार के खिलाफ़ जनता के गुस्से को मोड़कर बैंक कर्मचारियों के खिलाफ़ कर दिया जाये।

आजकल हर रोज़ मीडिया में रिपोर्टें छप रही हैं कि इस या उस व्यक्ति के घर में या बेसमेंट या गोदाम में छिपे हुये करोड़ों-करोड़ों रुपये के नये और पुराने नोट मिल रहे हैं। देशभर में छापे मारे जा रहे हैं और चंडीगढ़ से हैदराबाद तक व ठाणे से बैंगलूरू तक, लाखों-करोड़ों रुपये “पाये” जा रहे हैं। इस दौरान प्रधानमंत्री ने बार-बार बैंक कर्मचारियों पर उंगली उठाई है। 2000 रुपये के नये नोटों की बड़ी-बड़ी गड्डियों के करोड़ों रुपयों की “पायी गई” धनराशि के लिये बैंक कर्मचारियों को अपराधी ठहराया जा रहा है। यह आरोप लगाया जा रहा है कि भारतीय रिज़र्व बैंक, बैंकों को पैसे भेज रहा है परन्तु बैंक कह रहे हैं कि उनके पास पर्याप्त पैसे नहीं हैं और ग्राहकों को अपने ही खातों में से पैसे देने से इंकार कर रहे हैं।

10 दिसंबर को जब प्रधानमंत्री गुजरात में अमूल के एक बिक्री केन्द्र का उद्घाटन कर रहे थे, तब उन्होंने वहां इकट्ठी हुई मुख्यतः किसानों की भीड़ को संबोधित करते हुये यह दावा किया कि “नोटबंदी देश में भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिये एक निर्णायक कदम है। आजकल सरकार वास्तव में ही भ्रष्टाचार के पीछे पड़ी हुई है। बैंकरों को जेल भेजा जा रहा है। जो नोटों की बड़ी-बड़ी गड्डियां लेकर भाग रहे हैं उन्हें जेल भेजा जा रहा है। उन्होंने सोचा था, ‘ठीक है, मोदी ने 1000 और 500 रुपये के नोटों पर बैन लगा दिया है तो हम पीछे के दरवाजे़ से कुछ करेंगे’, परन्तु उन्हें यह नहीं पता था कि मोदी ने पीछे के दरवाजे़ पर भी कैमरा लगा रखा है। अब ये सारे लोग पकड़े जायेंगे; कोई नहीं बच पायेगा...”

बैंकों में आ रहे पैसे की समीक्षा साफ-साफ दिखाती है कि बैंक कर्मचारियों पर लगाये जा रहे आरोप तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। 8 नवंबर के बाद, एच.डी.एफ.सी. जैसे निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंक को भी, दिल्ली जैसे शहर में प्रतिदिन सिर्फ 20-24 करोड़ रुपये प्राप्त हुये हैं, जबकि सामान्य दिनों में प्रतिदिन 150 करोड़ रुपये तक की मांग होती है। कई दिनों पर कोई पैसा नहीं मिला है। एच.डी.एफ.सी. की देशभर में अनेक शाखायें और ए.टी.एम. हैं, परन्तु किसी भी एक शाखा को किसी भी दिन पर 25-30 लाख रुपये से ज्यादा नहीं मिला है, जबकि किसी भी शाखा में इससे दस गुना से ज्यादा की मांग है। तो बैंकों के पास इतना सारा धन कैसे आया होगा जिससे उनके कर्मचारी करोड़ों-करोड़ों रुपये अपने खास ग्राहकों को दिलाने में सहयोग कर रहे होंगे?

दूसरी बात यह है कि भारतीय रिज़र्व बैंक अलग-अलग शहरों के विभिन्न बैंकों के मुद्राकोषों को थोक में पैसा भेजते हैं। मुद्राकोष के बारे में भारतीय रिज़र्व बैंक को पूरी जानकारी होती है तथा उस पर रिज़र्व बैंक का पूरा अधिकार होता है। बैंक उस मुद्राकोष से अपनी विभिन्न शाखाओं और ए.टी.एम. मशीनों को पैसा बांटते हैं तथा उन दूसरे बैंकों की शाखाओं को भी जिन्हें उसी मुद्राकोष से धन मिलता है। हर एक शाखा को हिसाब रखना पड़ता है कि उसे मुख्यालय से कितना पैसा मिला है और कितना पैसा ग्राहकों द्वारा निकाला गया है। अगर हिसाब में कोई गड़बड़ी हुई तो बैंक कैशियर या मैनेजर को उसकी भरपाई करनी पड़ती है।

अंत में बैंक ही रिज़र्व बैंक की फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट (वित्त जासूसी इकाई) को किसी भी खाते में संदिग्ध रूप से धन के आने या जाने के बारे में सूचना देता है। 10 लाख रुपये से अधिक लेन-देन होते ही बैंक फाइनेंशियल इंटेलिजेंस यूनिट को सूचना देता है। इसी तरह जनधन खातों में, जहां के.वाई.सी. की ज़रूरत नहीं होती है, वहां भी 50,000 रुपये से अधिक की लेन-देन की सूचना दी जाती है।

प्रधानमंत्री बार-बार दोहरा रहे हैं कि वे तथा उनकी सरकार ईमानदार सरकार चाहते हैं और वे अवश्य ही “उन सभी मालदार भ्रष्ट लोगों को, जो जनता की मेहनत से कमाये गये धन को लूट रहे हैं, रंगे हाथ पकड़ेंगे”। उनके ये दावे खोखले हैं और असली तथ्य कुछ और ही बताते हैं।

बैंकों में जमा किये गये धन को वास्तव में लूटा जा रहा है, जिसे बैंक कर्मचारियों के यूनियन लगातार सबके सामने रखते आये हैं परन्तु जिस पर सरकार हमेशा पर्दा डालने की कोशिश करती रही है। राज्य पर नियंत्रण करने वाले सबसे बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों का बैंकों पर भी बहुत भारी प्रभाव है। वही पूंजीपति सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बोर्ड के सदस्य होते हैं और उनमें से अनेकों ने इन बैंकों से बहुत बड़ी मात्रा में धन उधार पर ले रखा है, जिसे वे चुकाने से इंकार कर रहे हैं। अनुमान लगाया जाता है कि आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक न चुकाये गये उधार हैं। बैंक कर्मचारी यह मांग करते आये हैं कि कर्ज़ न चुकाने वालों के नाम सार्वजनिक किये जायें तथा उस धन को वापस लेने के कदम लिये जायें। परन्तु सरकार ने ऐसा करने से बार-बार इंकार किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि सबसे बड़ी इज़ारेदार कंपनियों द्वारा देश की दौलत की लूट को रोकने का सरकार का कोई इरादा नहीं है।

मोदी जी सरकार पर लोगों के गुस्से को मोड़कर, उसे बैंक कर्मचारियों के खिलाफ़ करने की कोशिश कर रहे हैं। परन्तु जनता की भारी कठिनाइयों के लिये बैंक कर्मचारियों पर आरोप लगाना बेहद नाजायज़ है। 8 नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा होने के बाद से बैंक कर्मचारी प्रतिदिन 14-16 घंटों तक अनथक काम करते आ रहे हैं और सामान्य समय की तुलना में दस गुना ग्राहकों की सेवा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे जनता के दुख-दर्द को कम करने के लिये बहुत ही कठिन हालतों में काम करते आ रहे हैं। कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी हमारे देश के बैंक कर्मियों की डटकर हिफ़ाज़त करती है।

Tag:    Jan 1-15 2017    Political-Economy    2017   

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