रेलवे के निजीकरण के खिलाफ़ संयुक्त बयान

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 27/01/2017 - 22:41

भारतीय रेल के निजीकरण का विरोध करो!

इस बयान को जारी करने वाले संगठनों के नाम हैं: कामगार एकता कमेटी, एअरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ इंडिया इम्प्लॉइज यूनियन, एयर इंडिया सर्विस इंजीनियर्स एसोसिएशन, ऑल इंडिया बैंक इम्प्लॉइज एसोसिएशन, आल इंडिया लोको रनिंग स्टाफ एसोसिएशन, आल इंडिया गार्ड्स कौंसिल, आल इंडिया स्टेशन मास्टर्स असोसिएशन, लड़ाकू गारमेंट मजदूर संघ, मुंबई म्युनिसिपल मजदूर यूनियन, वेस्टर्न रेलवे मोटरमेन्स एसोसिएशन तथा लोक राज संगठन और पुरोगामी महिला संगठन।

भाइयों और बहनों,

केंद्र सरकार, भारतीय रेल का निजीकरण करेगी इस तरह की बातें गत कुछ वर्षों से चल रही हैं। सत्ताग्रहण के तुरंत बाद मोदी सरकार ने सितंबर 2014 में बिबेक देबराय समिति का गठन किया। “भारतीय रेल की वित्तीय हालत एवं कामकाज को सुधारने” के लिए सुझाव देने का काम समिति को सौंपा गया। जून, 2015 में समिति ने रिपोर्ट को पेश किया। भारतीय रेल का कॉर्पोरेटाइजेशन यानी कि कंपनीकरण किया जाए एवं रेल मंत्रालय को केवल नीति बनाने तक सीमित रखा जाए, जबकि यात्री तथा माल के यातायात का कारोबार निजी कंपनियों के हाथों में सौंपना चाहिए, ये सुझाव समिति ने दिए। मगर सभी रेल कर्मचारियों एवं उनकी सभी यूनियनों ने तीखा विरोध किया और हड़ताल करने की धमकी दी। जिसके फलस्वरूप रेल मंत्री ने तुरंत घोषित किया कि “हिन्दोस्तानी सरकार ही भारतीय रेल की मालिक बनी रहेगी एवं वही व्यवस्थापन भी करती रहेगी। हम स्वामित्व नहीं बदलना चाहते ... हम तो केवल रेलवे का कामकाज सुधारने के लिए आधुनिक तकनीकी ज्ञान तथा निजी पूंजी निवेश लाना चाहते हैं, जिससे रेलवे ज्यादा मूल्यवान बन जाए।”

इससे पहले 28 दिसंबर, 2014 को वाराणसी के डीज़ल लोको वक्र्स के मज़दूरों को संबोधित करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि वे रेलवे मज़दूरों व देश की जनता को आश्वासन देना चाहते हैं कि भारतीय रेल का निजीकरण कभी नहीं होगा और उन्हें अफ़वाहों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मगर दो-मुंही बात करने वाले ये राजनीतिज्ञ यह असलियत छुपा रहे हैं कि भारतीय रेल को टुकड़ों-टुकड़ों में निजी पूंजीपतियों को बेचा जा रहा है।

निम्नलिखित सच्चाई पर गौर कीजिये :

1) 2015 एवं 2016 के रेल बजट में रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने घोषित किया कि अगले 5 वर्षों में 8.5 लाख करोड़ रुपयों की राशि इकट्ठी की जाएगी, जिसका उद्देश्य होगा भारतीय रेल की क्षमता को बढ़ाना एवं बुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण करना। यह पूंजी एल.आई.सी., विश्व बैंक और 400 रेलवे स्टेशनों को निजी कंपनियों को

आधुनिकीकरण के लिए सौपकर तथा रेलवे की दूसरी संपत्ति को बेचकर संग्रहित की जाएगी। अतः यह पूंजी निजी क्षेत्र की भागीदार से तथा प्रत्यक्ष विदेशी पूंजी निवेश के द्वारा संचित की जाएगी। वर्तमान भाजपा सरकार की यह योजना कांग्रेस की पिछली सरकारों की नीतियों के जैसी ही है, जिनके अंतर्गत सड़कों, बिजली, दूरसंचार तथा अब रेलवे में इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए निजी पूंजी पर ही ज्यादा से ज्यादा मात्रा में निर्भरता बढ़ाई जा रही है।

2) सिंगापुर में 24 अक्तूबर, 2015 को सिंगापुर सरकार तथा विश्व बैंक द्वारा आयोजित एक सभा को संबोधित करते हुए रेल मंत्री ने कहा कि “मॉल बनाने सहित रेलवे स्टेशनों के सुधार तथा विस्तार, नई रेल पटरियां बिछाने, भीड़ कम करने के लिए माल तथा यात्री यातायात के लिए अलग-अलग ट्रैक तैयार करने, आदि योजनाओं में विदेशी निजी कंपनियां या तो खुद शेयर पूँजी लगा सकती हैं अथवा किसी सुनिश्चित वित्तीय मुनाफ़े के बदले में किसी हिन्दोस्तानी कंपनी के साथ मिलकर काम कर सकती हैं”। इसका मतलब उन्होंने हिन्दोस्तानी तथा विदेशी पूंजीपतियों को यह गारंटी दे दी कि बिना कोई जोखि़म उठाए उन्हें सुनिश्चित मुनाफ़ा मिलेगा। इससे देशी और विदेशी पूंजीपति तो बहुत खुश होंगे!

3) भारतीय रेल ने मार्च 2015 में एल.आई.सी. के साथ एक समझौते के तहत 1.5 लाख करोड़ रुपयों का कर्ज़ा लिया है जिससे आनेवाले 5 वर्षों में रेल की क्षमता बढ़ाई जाएगी। मगर शर्त यह है कि केवल उन्हीं परियोजनाओं के लिए यह पैसा इस्तेमाल होगा जिनसे सालाना कम से कम 14 प्रतिशत मुनाफ़ा सुनिश्चित होगा!

जिन इलाकों में आज रेलवे नहीं है, वहाँ पर नई रेल पटरी बिछाकर क्षमता बढ़ा सकते हैं, मगर उसमें मुनाफ़े की दर कम ही होगी। मगर जिन पटरियों पर आज ज्यादा भीड़ है, उन्हीं पटरियों के साथ-साथ नई पटरियां बिछाने से क्षमता बढ़ेगी और मुनाफ़े की दर भी कहीं ज्यादा होगी। जाहिर है कि रेलमंत्री एवं कर्ज़ देनेवाली एजेंसियां ज्यादा मुनाफ़े का विकल्प चुनेंगी। मगर यह नज़रिया तो पूंजीपतियों का नज़रिया है, जो अपने देश के नागरिकों के हित के बिल्कुल विपरीत है।

रेलवे ने 24 ऐसे मार्ग निर्धारित किये हैं, जहां “भीड़ कम करने के लिए” मौजूदा पटरियों के साथ-साथ और पटरियां बिछाई जाएंगी। इनमें तथाकथित स्वर्णिम चतुर्भुज योजना, यानी कि हावड़ा-चेन्नई, दिल्ली-हावड़ा, हावड़ा-मुम्बई, दिल्ली-चेन्नई, चेन्नई-मुम्बई तथा मुम्बई-दिल्ली का समावेश है। इसका मतलब है कि एल.आई.सी. से लिया हुआ पूरा कर्ज़ा मौजूदा पटरियों के साथ-साथ ही नयी पटरियां बिछाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, न कि नये रेल मार्ग बनाने के लिए।

दिसंबर 2015 में जापान के प्रधानमंत्री सिंजो आबे जब हिन्दोस्तान आये थे तब मुंबई से अहमदाबाद के बीच “बुलेट ट्रेन” की भारतीय रेल की योजना घोषित की गई जिसके लिए करीब 1 लाख करोड़ रुपये खर्च होंगे। इस महंगी परियोजना के अंतर्गत ठाणे और विरार के बीच 21 किलोमीटर का रेल मार्ग समुद्र के नीचे से होगा! 80 प्रतिशत पूंजी जापान की सरकार 50 साल की अवधि के लिये एवं केवल 0.1 प्रतिशत ब्याज़ दर से देगी और पहले 15 वर्षों के लिए कर्ज़ का चुकाना स्थगित किया जायेगा। यदि वे इतनी पूंजी देंगे, तो ज़्यादातर इंजन, रेल के डिब्बे, सिग्नल तंत्र, इत्यादि जापान से ही आएंगे। इससे सरकार के “मेक इन इंडिया” का क्या होगा? और क्योंकि केवल जापान ही इसके लिये बोली लगा सकता है, इसलिये उनसे खरीदी गई सामग्री की सही कीमत क्या होनी चाहिए इस पर भारत सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होगा। ज़ाहिर है कि कम ब्याज़ दर से कर्ज़ा देने के बदले में जापानी कंपनियां बेशुमार मुनाफ़ा कमायेंगी।

रेलवे का अनुमान है कि बुलेट ट्रेन परियोजना 7 सालों में कार्यरत होगी। यह सच्चाई छुपाई जा रही है कि केवल अधिक पैसे वाले लोग ही बुलेट ट्रेन सेवा का उपयोग कर पाएंगे क्योंकि मुंबई अहमदाबाद का एक तरफ़ा टिकट 3000 रुपये यानी कि हवाई सफ़र के बराबर होगा। 50 हज़ार लोग हर रोज इस सेवा का उपयोग करेंगे ऐसा अनुमान है। भारतीय रेल सेवा का उपयोग हर रोज 2.5 करोड़ यात्री करते हैं। इसका मतलब केवल 0.2 प्रतिशत यात्री ही बुलेट ट्रेन का उपयोग करेंगे। इतने कम यात्रियों की सुविधा के लिए इतना बेशुमार पैसा क्यों खर्च हो रहा है, इस सवाल का जवाब रेल मंत्री नहीं दे रहे हैं। सर्वसाधारण ट्रेनों के लिए नये रेल मार्ग की 1 हज़ार किलोमीटर पटरियां बिछाने के लिए 10 करोड़ रुपये लगते हैं। इसी 1 लाख करोड़ रुपये की लागत से 10 हज़ार किलोमीटर नई रेल पटरियां बिछाई जा सकती हैं जिनसे कई आंतरिक इलाके जोड़े जा सकते हैं और भीड़ भी कम कर सकते हैं!

करोड़ों यात्रियों को बेहतर सेवाएं, बढ़ाई गयी क्षमता, बेहतर सुरक्षा तथा मानव लायक यात्राओं की चाहत है। रेल मंत्री को यह सब प्रदान करने के लिए अपनी ताक़त लगानी चाहिए।

इसके विपरीत रेल मंत्री सोचते हैं कि कैसे भारतीय रेल की सेवाएं कम करके निजी ट्रेनों को बढ़ावा दिया जाये।

रेल मंत्री ने कहा है कि, “अंततः रेलवे संचालन के लिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा देना चाहिये। आज हम निजी क्षेत्र को आकर्षित नहीं कर सकते हैं क्योंकि रेल मार्ग पर बहुत ज्यादा भीड़ है। अगर हम क्षमता बढ़ायेंगे तो निजी क्षेत्र की कंपनियां आएंगी और काफ़ी पूंजी निवेश भी करेंगी और कोई निवेष किए बग़ैर ही हम रेल नेटवर्क के मालिक बने रहेंगे और वे ट्रेन सेवा का संचालन करेंगे।” मगर हमारे लिए यह समझना मुश्किल नहीं है कि पूंजीपतियों की रुचि मालगाड़ी एवं अमीरों के लिए बुलेट ट्रेन जैसी मुनाफ़ेदार सेवाएं चलाने में ही होगी, जबकि लाखों श्रमिकों के यातायात के लिए घाटेवाली राहत प्राप्त तथा अमानवीय सेवाएं देने के काम भारतीय रेल करेगी। रेल मंत्री तथा सरकार इसी दिषा में रेलवे को ले जाना चाहते हैं।

भाइयों और बहनों,

भारतीय रेल के निजीकरण का हमें दृढ़़ता से विरोध करना चाहिये क्योंकि

1) सरकार बहुत सस्ते दाम पर पूंजीपतियों को भारतीय रेल का बुनियादी ढांचा सौंपना चाहती है। निजीकरण का असली मक़सद यही है, जबकि हमें बताया जाता है कि रेल सेवा की कार्यक्षमता बढ़ाना इसका मक़सद है। सत्ता में बैठी सभी राजनीतिक पार्टियों ने कई दशकों से निजीकरण की यही प्रक्रिया जारी रखी है। भारतीय रेल हम हिन्दोस्तान के लोगों की बचत के धन से बनी है। हम उसके मालिक हैं और हम उसे पूंजीपतियों के हाथों में बिकने नहीं देंगे।

2) भारतीय रेल सेवा का संचालन मुनाफ़े के दृष्टिकोण से चलाना हमें मंज़ूर नहीं है। अंग्रेज़ जब हिन्दोस्तान छोड़कर गए थे तब 54 हज़ार किलोमीटर रेल मार्ग बना था। अब आज़ादी के 69 साल बाद भी केवल 11 हज़ार किलोमीटर नया रेलमार्ग बनाया गया है। पटरियों में 1 लाख 15 हज़ार किलोमीटर की जो बढ़ोतरी हुई है, वह ज्यादातर मौजूदा मार्गों की पटरियां दुगुनी या तिगुनी करने से ही हुई है। इसलिए अपने देश के कई इलाके आज भी रेलवे से नहीं जुड़े हैं। किसी भी प्रदेश की उन्नति के लिए रेलवे एक उत्प्रेरक है, यह सभी जानते हैं। इसका मतलब स्पष्ट है कि एक के बाद एक केंद्र सरकारों ने रेल मार्गों की वृद्धि नहीं की है और इस तरह अपने देश के सभी राज्य एवं इलाकों की समान उन्नति के लिए काम नहीं किया है। इससे देश में असंतुलन बढ़ गया है। कई राज्य एवं इलाके बेहद पिछड़े रह गये हैं, जिससे उन इलाकों के लोगों को रोज़ी-रोटी के लिए घर-बार छोड़कर दूर-दूर जाना पड़ता है। निजी पूंजीपतियों को भारतीय रेल को सौंपने से यह असंतुलन और बढ़ेगा क्योंकि उन्हें नये रेल मार्ग बनाने में कोई रुचि नहीं होगी, जिसमें मुनाफ़े नहीं हैं जबकि पूंजी निवेश भारी मात्रा में करना पड़ेगा। पूंजीपतियों को मौजूदा रेल मार्ग बहुत कम कीमत में मिलेंगे। उनसे ही वे ज्यादा से ज्यादा मुनाफ़े बनाने की कोशिश करेंगे। 

3) सरकार निजी पूंजीपतियों को सार्वजनिक निजी भागीदारी (पी.पी.पी.) मॉडल के तहत निजीकरण उपक्रम संचालित करने का न्यौता दे रही है। पी.पी.पी. मॉडल यानी उनके पूंजीनिवेश पर सुनिश्चित भारी मुनाफ़े की गारंटी। यह पूंजीपतियों के लिये बहुत ही फ़ायदेमंद है, क्योंकि दूसरे किसी उपक्रम में पूंजीपतियों को बाज़ार में उतार-चढ़ाव एवं बाज़ार की अनिश्चितता की वजह से मुनाफ़े की कोई गारंटी नहीं होती है। इस “मुनाफ़े की गारंटी” की आपूर्ति किराया बढ़ाकर, मतलब यात्रियों की जेब काटकर होगी या फिर सरकार की तिज़ोरी से यानी कि श्रमिकों पर टैक्स बढ़ाकर की जायेगी।

4) निजीकरण के सुझाव के समर्थन में देबराय समिति ने ब्रिटिश, जर्मन एवं जापानी रेलवे के निजीकरण के उदाहरण पेश किए हैं। इसमें कोई संदेह नहीं है कि निजीकरण से उन देशों के पूंजीपतियों को बेहद मुनाफ़ा हुआ है। मगर उन देशों के रेल कर्मचारी तथा आम लोगों को उससे बेहद हानि हुई और इसलिये उन्होंने निजीकरण का विरोध किया था, इस तथ्य को समिति छुपा रही है। ब्रिटेन में मासिक सीज़न टिकट फ्रांस के मुकाबले 10 गुना महंगा है। फ्रांस में रेल सेवा सरकार द्वारा संचालित है। हाल ही में ब्रिटेन के 75 प्रतिशत लोगों ने सर्व सहमति से ब्रिटिश रेलवे का पुनः राष्ट्रीयकरण करने की मांग की है!

5) हिन्दोस्तान के रेल नेटवर्क का ऐसे दूर-दराज के क्षेत्रों में विस्तार करने की ज़रूरत है, जो शायद फ़ायदेमंद नहीं होंगे। यह नया नेटवर्क बिछाने के लिए बहुत बड़ी मात्रा में पूंजी की आवश्यकता है। लेकिन पूंजीपतियों को लोगों की फ़िक्र ही कहां है?

भाइयों और बहनों,

जिन हालतों में अपने देश के लोगों को यात्रा करनी पड़ती है और जिन हालतों में भारतीय रेल के कर्मचारियों को काम करना पड़ता है, वे सुरक्षा एवं आराम के मामले में दुनिया में सबसे बदतर में से हैं। यह कोई नकार नहीं सकता कि भारतीय रेल की उन्नति आवश्यक है। मगर उस उन्नति का मक़सद दूर-दूर के इलाकों में रहनेवाले लोगों का और शहरों में रहने वाले यात्रियों का हितरक्षण तथा रेल कर्मचारियों के हितों का रक्षण होना चाहिये। मगर एक के बाद एक सरकारें भारतीय रेल को इसकी बिल्कुल उल्टी दिशा में ले जाना चाहती हैं।

भारतीय रेल के निजीकरण को तेज़ी से आगे बढ़ाने के साथ-साथ मोदी सरकार हिन्दोस्तान के लोगों पर हमले कर रही है। श्रम कानूनों में इस तरह से तब्दीली कर रही है जिससे मज़दूरों को नौकरी से निकाल फेंकना आसान होगा। वह बैंक, बीमा तथा पेंशन फंड का निजीकरण कर रही है, मतलब हिन्दोस्तानी लोगों की बचत पूंजीपतियों के लिये उपलब्ध करवा रही है। वह भूमि अधिग्रहण कानून में तब्दीली कर रही है जिससे किसानों की ज़मीनों एवं शहरी ज़मीनों को हड़पना आसान होगा। “मेक इन इंडिया” तथा “व्यापार के लिए आसान माहौल” के नारे की आड़ में ये हमले हो रहे हैं। पहले की सरकारों की तरह यह सरकार भी हिन्दोस्तानी एवं विदेशी बड़े पूंजीपतियों की सेवा में तत्पर है।

इन समाज-विरोधी तथा जन-विरोधी परियोजनाओं का विरोध करना मज़दूर वर्ग का फर्ज़ है। इसके साथ-साथ, सभी मेहनतकशों तथा दबे-कुचले लोगों के सामने अपने देश के विकास का एक विकल्प पेश करना भी अपनी ज़िम्मेदारी है। मुट्ठीभर शोषकों की ज़रूरतें नहीं बल्कि हिन्दोस्तान के मेहनतकशों की ज़रूरतों की पूर्ति, यही उस विकल्प का उद्देश्य होगा!

Tag:    Jan 1-15 2017    Struggle for Rights    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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