नव वर्ष के लिए संदेश

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 27/01/2017 - 22:44

प्यारे साथियों

नव वर्ष 2017 की अगवानी करते हुए, हम मज़दूरों, किसानों, छोटे व्यापारियों, आदि को नगदी पैसे की कमी के कारण बहुत सी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यह आशंका है कि नए साल में भी यह नगदी की कमी रहेगी। अपनी मेहनत से कमाई हुयी आमदनी में से अपनी बचत के पैसे को किस रूप में आप रखना चाहते हैं, यह फैसला करने का अधिकार सरकार ने आपसे छीन लिया है।

अर्थव्यवस्था के कई क्षेत्रों में तबाही फैल गयी है। कई लोगों की जानें गयी हैं। करोड़ों मेहनतकश अपनी रोज़ी-रोटी के साधन खो बैठे हैं। दूसरी ओर, इज़ारेदार पूंजीवादी घराने खुशियां मना रहे हैं, कि नोटबंदी की वजह से, 2017 में डिजिटल पेमेंट के ज़रिये वे बेशुमार मुनाफे़ कमा सकेंगे।

नोटबंदी का मकसद भ्रष्टाचार या आतंकवाद के खिलाफ़ लड़ना नहीं है। न ही उसका मकसद देश की दौलत को गरीबों के हित में इस्तेमाल करना है। नोटबंदी के ज़रिये अधिकतम संचालित मुद्रा पर हमला करने का असली मकसद है लोगों को अपनी बचत के सारे धन को बैंकों में जमा करने और नगदी से हटकर डिजिटल पेमेंट करने को मजबूर करना। इसका अंतिम उद्देश्य है व्यवसायिक बैंकों और नए पेमेंट बैंकों के ज़रिये, सम्पूर्ण जनता की बचत के धन को इज़ारेदार पूंजीपतियों के नियंत्रण में लाना।

नगदी से हटकर डिजिटल पेमेंट की ओर जाना - यह बर्तानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों और विश्व बैंक, गेट्स फाउंडेशन व अन्य दान संस्थानों द्वारा बढ़ावा दिए जा रहे तथाकथित शासन सुधार एजेंडा का हिस्सा है। कई कारणों से दुनिया के इज़ारेदार पूंजीपतियों को इस एजेंडा में रुचि है। इससे न सिर्फ जनता से कर वसूली करने का आधार और विस्तृत होगा, बल्कि बैंक और पेमेंट सर्विस कम्पनियां हर लेन-देन पर शुल्क लगाकर, अधिक से अधिक मुनाफे़ कमा सकेंगे। इसके अलावा, हर व्यक्ति के बारे में विस्तृत सूचना समेत बहुत सारे डाटा बेस उन कंपनियों को उपलब्ध हो जायेंगे, जिनका इस्तेमाल खास तबकों को निशाना बनाकर विज्ञापन, राजनीतिक प्रचार, इत्यादि के लिए किया जा सकेगा, और इस तरह जन-विरोध तथा क्रांति को रोका जा सकेगा।

जनता की बचत के अधिकतम धन को बैंकिंग व्यवस्था के नियंत्रण में लाकर, पूंजीवादी राज्य और कुशल व व्यापक तौर पर लोगों की बचत के धन को लूट सकेगा, और इस तरह इज़ारेदार पूंजीपतियों द्वारा पैदा किये गए संकट के लिए जनता से वसूली कर सकेगा। हमारे देश में कर्ज़ न चुकाने वाले बड़े पूंजीपतियों ने बैंकों के लिए वित्त संकट पैदा किया, और अब बैंकों के मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए, मेहनतकशों को लूटा जा रहा है।

2017 में प्रवेश करते हुए, आगे होने वाली घटनाएं और साफ-साफ दिखलाएंगी कि देश की बहुसंख्यक जनता पर वित्तीय कमखर्ची का कार्यक्रम थोपा गया है, ताकि मुट्ठीभर अरबपतियों की तिजोरियां और भर सकें।

इज़ारेदार पूंजीपतियों द्वारा नियंत्रित मीडिया के ज़रिये, हर रोज लोगों को झूठ बोला जा रहा है। यह बताया जा रहा है कि नोटबंदी आतंकवाद, भ्रष्टाचार और काला धन के खिलाफ़ एक ज़िहाद है। लोगों को बताया जा रहा है कि नगदी पैसे की कमी इसलिए जारी है क्योंकि योजना बनाने और उसे लागू करने में थोड़ी गलती हो गयी है और यह समस्या जल्दी ही दूर हो जाएगी। इस सारे प्रचार के पीछे यह छिपाया जा रहा है कि नोटबंदी सबसे बड़े पूंजीपतियों के हित के लिए, मेहनतकशों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर एक सोचा-समझा, सुनियोजित हमला है। नगदी पैसे की जारी कमी इस योजना का एक हिस्सा है।

साथियों,

दिन-ब-दिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि संसदीय लोकतंत्र और उसकी राजनीतिक प्रक्रिया की वर्तमान व्यवस्था इज़ारेदार घरानों की अगुवाई में बड़े पूंजीपतियों का शासन है। राजनीतिक प्रक्रिया में यह गलतफहमी पैदा की जाती है कि शासक पार्टी सभी सार्वजनिक फैसलों को लेती है और संसद उस पर निगरानी करती है। परन्तु वास्तविकता तो यह है कि बड़े पूंजीपति ही देश का पूरा एजेंडा तय करते हैं।

नोटबंदी का फैसला, बिना कोई अध्यादेश जारी किये ही, लिया गया और लागू किया गया। अगर अध्यादेश जारी किया जाता तो उसके लिए संसद की सहमति की ज़रूरत होती। परन्तु नोटबंदी की योजना एक छोटे विशिष्ठ गिरोह द्वारा गुप्तता में बनाई गयी, फिर रिज़र्व बैंक के बोर्ड ने उस पर ठप्पा लगाया और एक अधिसूचना जारी करके उसे लागू किया गया।

जब लोगों का गुस्सा और असंतोष बहुत बढ़ जाता है, तब बड़े पूंजीपति सत्ताधारी पार्टी को दोषी ठहराते हैं और चुनाव करवाकर, उसकी जगह पर किसी और पार्टी को बैठा देते हैं। उसके बाद, वे मेहनतकश बहुसंख्या को चूसकर खुद की अमीरी बढ़ाने के उसी पुराने रास्ते पर फिर से चलने लग जाते हैं। 

वर्ष 2016 में उदारीकरण और निजीकरण के कार्यक्रम के खिलाफ़ और अपने मौलिक अधिकारों की हिफ़ाज़त में, मज़दूरों के एकजुट संघर्षों में बहुत वृद्धि देखने में आयी। सितम्बर की आम हड़ताल में 17 करोड़ मज़दूरों ने भाग लिया। मज़दूर वर्ग के बढ़ते प्रतिरोध का सामना करते हुए, शासक वर्ग अपने शासन को बनाए रखने के लिए तरह-तरह के पैशाचिक तौर-तरीकों का सहारा ले रहा है। वह लोगों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर व्यापक हमले कर रहा है और इन हमलों को राष्ट्रवाद का जामा पहनाकर जायज़ ठहरा रहा है। जो भी लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त करता है और राज्य के हमलों का विरोध करता है, उसे “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जाता है। शासक वर्ग सांप्रदायिक तनाव और जातिवादी दुश्मनियों को भड़का रहा है, अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत लोगों के खि़लाफ़ राजकीय आतंकवाद को बढ़ा रहा है, पाकिस्तान के खि़लाफ़ सुनियोजित तरीके से नफ़रत फैला रहा है और जंग की तैयारी कर रहा है।

हमारे देश के बड़े सरमायदार दुनिया के सबसे हमलावर, जंग-फरोश और आतंकवादी राज्य, अमरीका के साथ एक खतरनाक रणनैतिक गठबंधन बना रहे हैं। इससे हमारे समाज को खतरा बढ़ रहा है।

संसद में विपक्षी पार्टियां सिर्फ शासक पार्टी की ही आलोचना करती हैं, परन्तु सत्ताधारी वर्ग की नहीं। वे यह भ्रम फैलाती हैं कि अगर उनकी सरकार चुनी जाती है तो सभी समस्याएं हल हो जायेंगी। इस भ्रम को चकनाचूर करना और मज़दूर वर्ग के सामने सच्चाई को स्पष्ट करना कम्युनिस्टों का फर्ज़ बनता है।

सच तो यह है कि हिन्दोस्तानी समाज को सभी प्रकार के शोषण, दमन, परजीविता, भ्रष्टाचार, सम्मान व मानव अधिकारों के हनन से मुक्त कराने के लिए, एक सम्पूर्ण क्रांति की ज़रूरत है। हमारे समाज की तमाम बीमारियों को दूर करने और सभी की सुख और सुरक्षा का रास्ता खोलने वाला न तो कोई व्यक्तिगत हीरो होगा, न ही पूंजीपति वर्ग की कोई पार्टी होगी। सिर्फ हिन्दोस्तानी मज़दूर वर्ग में ही यह परिवर्तन लाने की रुचि और क्षमता है, जिसके लिए उसे किसानों और सभी दबे-कुचले लोगों के साथ गठबंधन बनाना होगा। कम्युनिस्ट होने के नाते, हमारा काम है मज़दूर वर्ग को, अपना ऐतिहासिक कर्तव्य पूरा करने के लिए, संगठित करना और अगुवाई देना। 

आज यह वक्त की मांग है कि एक ऐसी क्रांति लाई जाए, जो पूंजीवाद, सभी सामंती अवशेषों, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद को खत्म करेगी। सिर्फ ऐसी क्रांति ही हमारे देश को उस खतरनाक रास्ते से बचा सकती है जिस पर हमारे शासक हमें ले जाने पर तुले हुए हैं।

हम कम्युनिस्टों के लिए यह ज़रूरी है कि हम लोगों के बीच अनवरत प्रचार करते हुए, यह समझाएं कि आज पूंजीपति वर्ग की अगुवाई करने वाली सबसे बड़ी इजारेदार कम्पनियां ही शासन कर रही हैं। उन्हीं के शासन का तख्तापलट करना होगा। मेहनतकश किसानों और सभी दबे-कुचले लोगों के साथ गठबंधन बनाकर, मज़दूर वर्ग को क्रांति लानी होगी। सरमायदारों के शासन की जगह पर, श्रमजीवी वर्ग के अधिनायकत्व, यानी राष्ट्र की दौलत पैदा करने वालों के शासन को स्थापित करना होगा।

हमारे देश और दुनिया में हालतें यही दिखा रही हैं कि आने वाले भविष्य में क्रांतिकारी तूफान कभी भी आ सकते हैं। एक सौ वर्ष पहले, रूस में महान अक्तूबर क्रांति की जीत हुयी थी और दुनिया के सर्वप्रथम समाजवादी राज्य की स्थापना का रास्ता खुला था। दुनिया को हिला देने वाली उस घटना की शताब्दी के अवसर पर, हम कम्युनिस्टों को विजयी क्रांतियों के एक और दौर की तैयारियां करनी होंगी।

मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनसमुदाय की मुक्ति के लक्ष्य, समाजवाद और कम्युनिज़्म के लक्ष्य के लिए खुद को समर्पित कर देने से ज्यादा उच्च कोई लक्ष्य नहीं हो सकता है। नव वर्ष के लिए आप सभी को शुभ कामनाएं!

क्रांतिकारी अभिवादन के साथ,

लाल सिंह

महासचिव

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी 

Tag:    Jan 1-15 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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