नोटबंदी से नेपाल और भूटान के लोगों की समस्यायें

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/02/2017 - 21:14

नेपाल और भूटान दो ऐसे देश हैं जिनमें हिन्दोस्तानी मुद्रा का इस्तेमाल करना वैध है। 8 नवबंर, 2016 को हिन्दोस्तान की सरकार द्वारा घोषित नोटबंदी की वजह से उन दोनों देशों के लोगों को बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। उन दोनों देशों की अर्थव्यवस्थायें हिन्दोस्तानी मुद्रा पर भारी तौर पर निर्भर हैं।

हिन्दोस्तान और भूटान के बीच समझौतों के अनुसार, भूटान में 500 और 1000 रुपये के हिन्दोस्तानी नोट वैध नहीं माने जाते हैं। नेपाल में भी जनवरी 2015 से पहले ऐसा ही था। परन्तु नवंबर 2014 में प्रधानमंत्री मोदी की नेपाल यात्रा के बाद, हिन्दोस्तानी सरकार ने नेपाल की सरकार के साथ एक समझौता किया, जिसके अनुसार नेपाल में 500 और 1000 रुपये के हिन्दोस्तानी नोटों का इस्तेमाल वैध माना जाने लगा। नेपाल की सरकार ने उम्मीद की थी कि हिन्दोस्तानी सरकार उस समझौते को मानेगी। इसलिये नेपाल की सरकार ने अपने देश में जनवरी 2015 से 500 और 1000 रुपये के हिन्दोस्तानी नोटों के संचालन की इजाज़त दे दी।

नोटबंदी के बाद, अब नेपाल के लोग अपने पुराने नोटों को न तो अपने बैंक खातों में जमा कर सकते हैं और न ही उन्हें बदलकर नये नोट ले सकते हैं। और नेपाली मुद्रा के बदले में उन्हें हिन्दोस्तानी मुद्रा भी नहीं मिल रही है क्योंकि नेपाल के केन्द्रीय बैंक के पास, अपने नागरिकों को देने के लिये, कोई हिन्दोस्तानी मुद्रा है ही नहीं।

नेपाल के राजदूत श्री दीप कुमार उपाध्याय के अनुसार, नेपाल के केन्द्रीय बैंक, नेपाल राष्ट्र बैंक में हिन्दोस्तानी रुपयों की सप्लाई जल्दी ही खत्म होने वाली है क्योंकि 8 नवबंर की नोटबंदी के बाद, भारतीय रिज़र्व बैंक ने काठमांडु को बीती तिमाही की सप्लाई अभी तक नहीं भेजी है।

नेपाल राष्ट्र बैंक और भारतीय रिज़र्व बैंक के बीच समझौते के अनुसार, भारतीय रिज़र्व बैंक को हर तिमाही में नेपाल राष्ट्र बैंक को 600 करोड़ रुपये भेजना होता है, जिसके बदले में उसे समान मूल्य के अमरीकी डॉलर मिलते हैं। परन्तु 8 नवंबर की नोटबंदी की घोषणा के बाद, भारतीय रिज़र्व बैंक के पास नये नोटों की भारी कमी रही है, इसलिये उसने नेपाल को पिछली तिमाही के पैसे नहीं भेजे हैं, हालांकि उसे दो महीने पहले ही ऐसा करना चाहिये था।

नेपाल राष्ट्र बैंक के गवर्नर ने कहा है कि नेपाल में लगभग 3,500 करोड़ रुपये के पुराने 500 और 1000 रुपये के नोट संचालन में थे। परन्तु हिन्दोस्तान की सरकार ने नेपाल की सरकार को आदेश दिया है कि नेपाली लोगों को अपने बैंक खातों में अपने पुराने नोटों को जमा न करने दिया जाये। हिन्दोस्तान की सरकार ने ऐलान किया है कि अगर हिन्दोस्तान और नेपाल, दोनों देशों में एक ही समय पर लोगों को अपने बैंक खातों में अपने पुराने नोटों को जमा करने की इजाज़त दी जायेगी, तो हिन्दोस्तानी लोग किन्हीं दलालों के ज़रिये नेपाली बैंक खातों में अपने अवैध नोटों को जमा कर सकते हैं। ऐसा किया जा सकता है क्योंकि नेपाल और हिन्दोस्तान के बीच की सीमा पर ज्यादा पाबंदियां नहीं हैं, अतः नोटों की तस्करी आसानी से की जा सकती है। फिर यह बेहिसाब धन के रूप में हिन्दोस्तानी वित्त व्यवस्था में वापस आ सकता है। यही कारण बताकर, हिन्दोस्तानी सरकार ने अब तक यह भी नहीं स्पष्ट किया है कि वह अवैध घोषित नोटों को नेपाल से कब और कैसे वापस लेगी।

वर्तमान विनिमय दरों के अनुसार, हिन्दोस्तानी 500 रुपये नेपाली 800 रुपये के बराबर हैं। परन्तु अगर हिन्दोस्तान की सरकार जल्दी से यह फैसला नहीं करती कि नेपाली नागरिकों को कब अपने पुराने नोटों को अपने बैंक खातों में जमा करने की इजाज़त दी जायेगी, हिन्दोस्तान उन नोटों को कब वापस लेगा तथा नेपाल को समान मूल्य के नये नोट कब देगा, तो तब तक नेपाल के नागरिकों को यह डर रहेगा कि वे अवैध घोषित नोटों का पूरा पैसा खो देंगे। नेपाली लोग गैर कानूनी तरीके से, कम मूल्य पर अपने पुराने नोटों को बदलने के दबाव में रहेंगे, ऐसा नेपाल के राजदूत ने कहा है।

नेपाल की अर्थव्यवस्था पर इस संकट का भारी प्रभाव पड़ा है। हिन्दोस्तान-नेपाल सीमा पर व्यापार ज्यादातर नगदी में होता है। नेपाल में पर्यटन भी हिन्दोस्तानी मुद्रा पर भारी तौर से निर्भर है।

भूटान के केन्द्रीय बैंक, रॉयल मोनिटेरी ऑथारिटी (आर.एम.ए.) को भी 8 नवंबर, 2016 के बाद, भारतीय रिज़र्व बैंक से हिन्दोस्तानी मुद्रा की नियुक्त सप्लाई नहीं मिली है। जबकि भूटान के नागरिकों के पास (आर.एम.ए. के अनुमानों के अनुसार) लगभग 100 करोड़ रुपये के अवैध नोट हैं, तो उस देश की ओर भी हिन्दोस्तान की सरकार का वैसा ही रवैया रहा है। इसकी वजह से उस देश की आर्थिक गतिविधियां, जो हिन्दोस्तानी मुद्रा पर भारी तौर से निर्भर हैं, बुरी तरह प्रभावित हैं।

इसके फलस्वरूप दोनों देशों के आम नागरिक बहुत परेशान हैं। नेपाल और भूटान की सरकारों ने इस बात पर भी नाराज़गी प्रकट की है कि नोटबंदी के फैसले को लेने से पहले उनके साथ सलाह नहीं की गई और न ही उन्हें इसकी पूर्व सूचना दी गई, जब इतने मुख्य फैसले से उनकी अर्थव्यवस्थाओं पर भारी असर पड़ने वाला है।

हिन्दोस्तानी राज्य ने हमेशा ही अपने प्रधान रुतबे का फायदा उठाकर, नेपाल व भूटान जैसे छोटे पड़ोसी देशों के मामलों में, तरह-तरह के आर्थिक दबाव व ब्लेकमेल के ज़रिये, अपना वर्चस्व जमाया है तथा बेरहमी से दखलंदाजी की है। हाल में, लगभग एक वर्ष पहले, उसने दो महीने से ऊपर तक, हिन्दोस्तान-नेपाल सीमा पर घेराबंदी आयोजित की थी, जिससे नेपाली लोगों को बड़ी कठिनाई हुई। हिन्दोस्तानी राज्य का इरादा था कि ऐसा करके नेपाल के राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप किया जाये। बीते दिनों में हिन्दोस्तानी राज्य ने भूटान के राजनीतिक मामलों को प्रभावित करने की कोशिश करते हुये, उस देश को आवश्यक चीजों की सप्लाई तक रोक दी है। अब फिर से नोटबंदी के फैसले के ज़रिये, हिन्दोस्तानी राज्य उन देशों को शिकंजे में कस रहा है और उनके लोगों को बहुत दुख-दर्द पहुंचा रहा है।

Tag:    Jan 16-31 2017    World/Geopolitics    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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