छत्तीसगढ़ में भयानक राजकीय आतंक!

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/02/2017 - 21:15

बस्तर पुलिस ने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं पर हमला किया

छत्तीसगढ़ में जो लोग वहां के आदिवासियों के मानव अधिकारों के हनन की जांच कर रहे हैं, बहादुरी से सच्चाई को सामने ला रहे हैं तथा उन अपराधों को आयोजित करने व अंजाम देने के दोषी अधिकारियों को सज़ा दिलाने के लिये लड़ रहे हैं, उन्हें उत्पीड़ित व बदनाम करने, धमकाने व गिरफ्तार करने के लिये पुलिस और सुरक्षा बलों ने एक जलील अभियान चला रखा है।

हाल में यह रिपोर्ट मिली है कि डब्ल्यू.एस.एस. (यौन हिंसा व राजकीय दमन के खिलाफ़ महिलायें) की कार्यकर्ता, एडवोकेट शालिनी गेरा और जगलैग नामक संगठन के उनके सहकर्मी वकीलों, जो एक जवान आदिवासी लड़के की फर्ज़ी मुठभेड़ में मौत के मामले की जांच करने जगदलपुर गये थे, को बस्तर पुलिस और अधिकारियों

द्वारा घोर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने लाश को बाहर निकालने और दुबारा पोस्टमार्टम करने का आदेश दिया था, जिसे करवाने के लिये वे वहां गये थे। 27 दिसंबर की रात को एक पुलिस दल उनके निवास स्थान में घुस गया और उन पर माओवादियों के लिये, बंद किये गये नोटों को बदलने की कोशिश करने का आरोप लगाया। उन्हें पूछताछ के लिये पुलिस स्टेशन जाने का आदेश दिया गया। उनके कमरों और सामान की बलपूर्वक तलाशी लेने की कोशिश की गई। जब उन्होंने पुलिस कर्मियों से तलाशी के लिये वारंट दिखाने की मांग की, तो दल के प्रमुख सब-इंस्पेक्टर ने उनके साथ बहुत ही हमलावर और बुरा व्यवहार किया।

उसके एक दिन बाद, बस्तर के एस.पी. ने एडवोकेट गेरा को फोन पर धमकाया। फोन कॉल बस्तर पुलिस द्वारा गठित और समर्थित तथाकथित ‘शांति रक्षक’ गिरोह अग्नि के किसी सदस्य के निजी मोबाइल फोन से किया गया था। एस.पी. ने दावा किया कि उसे शिकायत मिली है कि एडवोकेट गेरा मोआवादियों की दलाल है, कि वह गांववासियों को आधारकार्ड लेने के खिलाफ़ भड़का रही है, माओवादियों के लिये पुराने नोटों को बदल रही है, पुलिस अत्याचार की कहानियां फैला रही है, इत्यादि। उन्हें और “पूछताछ” के लिये बस्तर जाने का आदेश दिया गया परन्तु उन्होंने तथा उनके सहकर्मियों ने पुलिस की धमकियों से न दबकर, पुलिस के आदेश का पालन करने से इंकार किया। अग्नि गिरोह के सदस्यों ने वकीलों और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को बदनाम करने के प्रयास में, पुलिस के दावों की प्रतियां भी बांटीं।

याद किया जाये कि 2016 में बस्तर की पुलिस ने स्थानीय कार्यकर्ताओं, मीडिया कर्मियों, मानव अधिकार वकीलों, आदि जो पुलिस व अर्ध-सैनिक बलों द्वारा नियमित तौर पर किये जा रहे मानव अधिकारों के हनन और आदिवासी महिलाओं पर यौन हिंसा की जांच और पर्दाफाश कर रहे थे, उन्हें डराने-धमकाने के लिये एक अभियान चलाया था। उस समय डब्ल्यू.एस.एस. के कार्यकर्ताओं ने उन धमकियों का बहादुरी से सामना करते हुये, सच्चाई को पेश किया था, जिसकी वजह से राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग को मार्च 2016 में एक जांच दल को बस्तर भेजना पड़ा था। छत्तीसगढ़ सरकार ने उस जांच की रिपोर्ट का अब तक कोई जवाब नहीं दिया है।

बहरहाल, इंस्पेक्टर जनरल एस.आर.पी. कल्लूरी की कमान में बस्तर पुलिस मानव आधिकार कार्यकर्ताओं व मीडिया कर्मियों पर लगातार हमले करती जा रही है। कल्लूरी ने सलवा जुडुम के खिलाफ़ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का बड़े घमंडी तरीके से विरोध किया है। वह अग्नि जैसे तथाकथित “शांति रक्षक” गिरोहों को संगठित करने में आगे रहा है, जिन गिरोहों के माध्यम से सलवा जुडुम के भूतपूर्व नेता आदिवासियों तथा उन्हें अपने अधिकारों के लिये लड़ने में संगठित करने वालों पर हमले करते रहते हैं। सी.बी.आई. ने कल्लूरी को ताडमेत्ला जनसंहार के लिये दोषी ठहराया था, जिस कांड में पुलिस ने निहत्थे आदिवासियों पर गोली चलाई थी और पूरे गांव को आग लगा दी थी। कल्लूरी ने उसकी प्रतिक्रिया में मानव आधिकार कार्यकर्ता प्रोफेसर नन्दिनी सुन्दर, जिसने सलवा जुडुम के मामले में याचिका पेश की थी, पर हमला किया और उन्हें हत्या के मामले में दोषी ठहराने का प्रयास किया।

एडवोकेट गेरा और उनके सहकर्मियों पर इस हाल के हमले के ठीक कुछ ही दिन पहले तेलंगाना डेमोक्रेटिक फोरम के बस्तर जाने वाले जांच दल के 7 सदस्यों को गिरफ्तार किया गया था। उस दल में वरिष्ठ मानव

अधिकार वकील, मानव अधिकार कार्यकर्ता तथा छात्र नेता शामिल थे। उन पर माओवादियों के लिये, बंद नोटों को बदलने का आरोप लगाया गया और छत्तीसगढ़ जनसुरक्षा अधिनियम के फासीवादी प्रावधानों के तहत उनके खिलाफ़ मामला दर्ज़ किया गया।

छत्तीसगढ़ राज्य और खासतौर पर बस्तर इलाके को बीते 10 से अधिक वर्षों से एक जंग का मैदान जैसा बना दिया गया है। हिन्दोस्तानी राज्य और उसकी पुलिस व अर्ध-सैनिक दलों ने आदिवासियों के खिलाफ़ आतंक की मुहिम चला रखी है। बेकसूर आदिवासियों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, अपहरण किया जाता है, हिरासत में मार डाला जाता है, फर्ज़ी मुठभेड़ में मार दिया जाता है, महिलाओं का बलात्कार किया जाता है, खेतों की पूरी-पूरी फसलें जला दी जाती हैं, स्कूलों, अस्पतालों व पूरे गांवों को जला दिया जाता है। सलवा जुडुम (जिसे 2011 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बैन किया गया था) और हाल में अग्नि जैसे आतंकवादी गिरोहों को राज्य ने संगठित प्रशिक्षित और हथियारबंद किया है। उन गिरोहों के सहारे, ‘माओवाद विरोधी’ तथा ‘बगावत विरोधी’ कार्यवाहियों के नाम से, राज्य आदिवासियों को आतंकित करता है। हाल की रिपोर्टों से जाना जाता है कि इन कार्यवाहियों को बहुत बढ़ा दिया गया है, कि राज्य वहां पूरे-पूरे गांवों और वनों पर हेलिकॉप्टरों के सहारे ऊपर से बम बरसा रहा है। बीते वर्ष के दौरान पूरे देश में ‘माओवाद विरोधी’ कार्यवाहियों में पुलिस की गोली से 185 लोगों की मौत की रिपोर्ट आई है, जिनमें 134 मौतें बस्तर इलाके में ही हुई हैं। जांच रिपोर्टों से साबित हुआ है कि इन सभी कांडों में निहत्थे लोगों को गोली मारकर उड़ा दिया गया था। पुलिस के दावे, कि उन्हें आत्म रक्षा में गोली चलानी पड़ी थी या कि पुलिस और बागियों के बीच चल रही लड़ाई में गांववासी फंस गये थे, बिल्कुल झूठे साबित हुये हैं।

छत्तीसगढ़ के लोगों पर हिन्दोस्तानी राज्य ने यह जंग इसलिये छेड़ी है ताकि वहां के आदिवासियों को आतंकित करके या भारी संख्या में उनका कत्ल करके, उन्हें वहां से बाहर निकाल दिया जाये तथा हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़ी इज़ारेदार पूंजीवादी कंपनियों के लिये वहां प्रवेश करना और वहां के अनमोल खनिज संसाधनों को लूटकर बेशुमार मुनाफे़ कमाना और आसान बना दिया जाये। इस इरादे को छुपाने के लिये, वहां के ‘माओवादी खतरे’ का मुकाबला करने का बहाना देकर, राजकीय आतंक तथा मानव अधिकारों के हनन को जायज़ ठहराया जा रहा है। जो लोग इस सच्चाई का पर्दाफाश करने तथा आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश कर रहे हैं, उन पर हमले किये जा रहे हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी छत्तीसगढ़ में खूंखार राजकीय आतंक को फौरन बंद करने की मांग करती है। छत्तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम जैसे फासीवादी कानूनों को फौरन रद्द करना होगा। लोगों के अधिकारों की हिफ़ाज़त करने वालों का उत्पीड़न रोकना होगा। जनता के खिलाफ़ इन भयानक अपराधों के दोषी अधिकारियों, चाहे किसी भी पद पर हों, को कड़ी से कड़ी सज़ा देनी होगी।

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Jan 16-31 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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