प्रधानमंत्री का “एहसान” नहीं चाहिए!

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/02/2017 - 21:19

हम अपने अधिकारों की मांग करते हैं!

नवम्बर में 500 और 1000 रुपये के नोटों के बंद होने के बाद शहरों और गांवों के लाखों-करोड़ों मेहनतकश लोगों पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा है। लाखों मज़दूर अपनी नौकरियां खो चुके हैं और किसानों के रोज़गार पर खतरा मंडरा रहा है। नए वर्ष की पूर्वबेला पर प्रधानमंत्री ने बड़े गाजे-बाजे के साथ लोगों के गुस्से को ठंडा करने के लिए कुछ कदमों का ऐलान किया, जिसमें यह दिखाने की कोशिश की गई कि 8 नवम्बर को लिए गए नोटबंदी के फैसले से जो धन बैंकों में जमा हुआ है उसे लोगों के कल्याण के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस घोषणा में प्रधानमंत्री ने बताया कि शहरी इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत लिए गए छोटे कर्ज़ पर ब्याज दर में कुछ कटौती की जायेगी। इसके अनुसार 9 लाख से कम के कर्ज़ पर 4 प्रतिशत की रियायत और 12 लाख से कम के कर्ज़ पर 3 प्रतिशत की रियायत लागू होगी। इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में नए घरों के निर्माण या फिर पुराने घरों के विस्तार के लिए 2 लाख तक के कर्ज़ पर ब्याज की दर में 3 प्रतिशत की रियायत दी जायेगी।

2011 की जनगणना की आंकड़ों के अनुसार शहरी इलाकों में आधे से अधिक आबादी के पास घर नहीं हैं, जबकि यह समस्या और विकट होती जा रही है। इसकी मुख्य वजह है कि बढ़ती तादाद में ग्रामीण इलाकों से लोग मजबूरन शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं, और शहरों में घरों की कीमत उनकी पहुंच से बाहर है। जिन लोगों के पास सुरक्षित रोज़गार नहीं हैं, वे तो कर्ज़ भी नहीं ले सकते। ब्याज दर में कटौती का फायदा घर निर्माण के लिए कर्ज़ देने वाली वित्तीय कंपनियों को होगा, जो कि अभी से व्यापार बढ़ने की उम्मीद लगाये बैठी हैं। घर निर्माण के लिए कर्ज़ देने वाली एक कंपनी के मुखिया ने बताया कि “आने वाले समय में इस क्षेत्र में तेज़ी आयेगी”। इसका मतलब है कि मुनाफे़ बनाने के लिये और अधिक मौके खुले हैं।

दूसरा ऐलान था ग्रामीण इलाकों में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बनाए जाने वाले घरों की संख्या में 33 प्रतिशत की बढ़ोतरी।

प्रधानमंत्री आवास योजना का ऐलान 25 जून, 2015 को किया गया था। जैसा कि तमाम प्रधानमंत्री योजनाओं के साथ हुआ है, प्रधानमंत्री आवास योजना का भी पिछले एक वर्ष के रिकॉर्ड में कुछ भी देखने लायक नहीं है। आवास और शहरी गरीबी उन्मूलन के राज्यमंत्री को यह मानना पड़ा है कि अनुमति प्राप्त परियोजनाओं में से 15 प्रतिशत से भी कम परियोजनाएं अभी तक शुरू हो पाई हैं। इसके मद्देनज़र प्रधानमंत्री का यह दावा कि आने वाले वर्षों में ग्रामीण क्षेत्र में 33 प्रतिशत घरों की बढ़ोतरी होगी, इस बात पर कैसे विश्वास किया जा सकता।

इस सिलसिले में तीसरा ऐलान यह है कि तीन करोड़ किसान क्रेडिट कार्ड की जगह रुपे डेबिट कार्ड दिए जायेंगे।

रुपे डेबिट कार्ड एक भुगतान (पेमेंट) कार्ड है जिसके द्वारा सभी हिन्दोस्तानी बैंक और वित्तीय संस्थान इलेक्ट्रॉनिक भुगतान कर पायेंगे। रुपे डेबिट कार्ड के रूप में सरकार किसानों को “स्मार्ट कार्ड” दे रही है जिससे कि वे कर्ज़ ले पायेंगे। लेकिन इससे न तो किसानों की आमदनी में बढ़ोतरी होगी और न ही उनको दिवालिया होने से बचाया जा सकेगा। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरों के अनुसार 2015 में जिन किसानों ने आत्महत्यायें कीं उनमें से 80 प्रतिशत के कारण थे बैंकों या अन्य लघु ऋण कंपनियों (माइक्रो फाइनेंस कंपनी) से लिया गये कर्ज़ों को न चुका पाना है।

आगे प्रधानमंत्री ने ऐलान किया है कि केंद्र सरकार द्वारा छोटे कारोबारों को दी जा रही कर्ज़माफी को 1 करोड़ से बढ़ाकर 2 करोड़ किया जायेगा। इसके अलावा छोटे उद्योगों को दिए जाने वाले कर्ज़ की राशि को कुल टर्न-ओवर के 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 25 प्रतिशत कर दिया गया है।

इसका नतीजा यह होगा कि और अधिक छोटे कारोबार कर्ज़ में डूब जायेंगे। हर रोज़ हजारों छोटे कारोबार बर्बाद हो रहे हैं, क्योंकि वे महाकाय इज़ारेदार कारोबारों से स्पर्धा नहीं कर पा रहे हैं। नोटबंदी के चलते बाज़ार में पैसों की किल्लत की वजह से वैसे ही कई हजारों-लाखों कारोबार बर्बाद हो गए हैं। वे पहले से ही कर्ज़ में डूबे हुये हैं, और उनको और अधिक कर्ज़ देने का ऐलान करना, उनके जले पर नमक छिड़कने जैसा है।

प्रधानमंत्री की अगली घोषणा थी कि गर्भवती महिलाओं को वित्तीय सहायता दी जायेगी। जो गर्भवती महिला सरकारी स्वास्थ्य केन्द्रों में प्रसव कराती है और अपने बच्चे का टीकाकरण कराती है, उसके बैंक खाते में 6000 रुपये जमा किये जायेंगे।

गर्भवती महिलाओं के खाते में 6000 रुपये जमा करने के वादे की असलियत यह है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम 2013 में पहले से ही इंदिरा गांधी मातृत्व सहयोग योजना 2010 के तहत सभी गर्भवती महिलाओं को 4000 रुपये देने का प्रावधान है। इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट ने महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से सवाल भी किया था। उस वक्त मंत्रालय ने 30 अक्तूबर, 2015 को सुप्रीम कोर्ट में एक झूठा हलफनामा दायर करते हुए बताया था कि सरकार इस योजना को 53 जिलों से बढ़ाकर 2015-16 में 200 जिलों तक ले जाएगी और 2016-17 में देश के सभी जिलों में लागू करेगी। लेकिन 2016-17 में इस योजना को लागू करने के लिए केवल 400 करोड़ रुपये का ही प्रावधान किया गया है (जो कि पिछले वर्ष जितना ही है), और ऐसा करने से 53 से अधिक जिलों में इसे लागू करना असंभव है।

ये सभी ऐलान मजदूरों, किसानों और मेहनतकश लोगों की समस्याओं को हल करने के इरादे से नहीं किये गए हैं। बल्कि पूंजीपतियों का यह राज्य मजदूरों, किसानों और मेहनतकश लोगों पर लगातार हमले करता है और, फिर उनके गुस्से को ठंडा करने के लिए इस तरह की गुमराहकारी “सहूलियतों” का ऐलान करता है।

रोज़गार, स्वास्थ्य सेवा, आवास और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सेवा सुविधाएं, ये सब मेहनतकश लोगों के अधिकार हैं, और यह पूंजीवादी व्यवस्था इन अधिकारों की गारंटी देने में नाकाबिल है। प्रधानमंत्री जी, हमें आपका एहसान नहीं चाहिए, हमें हमारा अधिकार चाहिए!

Tag:    Jan 16-31 2017    Voice of the Party    2017   

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