मणिपुर के लोगों की गंभीर परिस्थिति

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/02/2017 - 21:21

1 नवंबर, 2016 से, यानी पिछले लगभग ढाई महीनों से, मणिपुर के लोगों को उन पर थोपी गई आर्थिक घेराबंदी के दुष्परिणामों का सामना करना पड़ रहा है।

स्वाभाविक जीवन पूरी तरह अस्त-व्यस्त हो गया है। मणिपुर और उसकी राजधानी इंफाल को बाकी हिन्दोस्तान के साथ जोड़ने वाले दोनों राष्ट्रीय महामार्गों को बंद कर दिया गया है। म्यानमार के ज़रिये अंतरराष्ट्रीय व्यापार लगभग बंद हो गया है। आवश्यक सामान से लदे हुये हजारों ट्रक महामार्गों में अलग-अलग जगहों पर फंसे हुये हैं।

पेट्रोल की कीमत 250 रुपये प्रति लिटर हो गई है। आवश्यक दवाइयों तथा लोगों की दूसरी मूल ज़रूरतों की सप्लाई बहुत ही कम है। इंफाल घाटी के निवासियों पर इस घेराबंदी का सबसे बुरा प्रभाव पड़ा है।

यूनाइटेड नगा काउंसिल (यू.एन.सी.) ने घेराबंदी का बुलावा दिया है। यू.एन.सी. को नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालिम-आइजै़क मुइवा (एन.एस.सी.एन.-आई.एम.) का समर्थन प्राप्त है।

एन.एस.सी.एन.-आई.एम. नगा लोगों के आत्म-निर्धारण के लिये लंबे अरसे से संघर्ष करता आ रहा है। इस संघर्ष के तहत, वह अपना लक्ष्य हासिल करने के लिये, एक के बाद दूसरी केन्द्र सरकारों के साथ समझौता वार्ता करता रहा है। पिछले वर्ष ही, प्रधानमंत्री मोदी ने घोषित किया था कि इन वार्ताओं के फलस्वरूप, उस झगड़े का ‘ऐतिहासिक’ समाधान हो गया है। परन्तु अब तक यह स्पष्ट नहीं बताया गया है कि उस समझौते की असली विषय वस्तु क्या थी।

इस माहौल में, यू.एन.सी. द्वारा इस समय इंफाल घाटी पर घेराबंदी करने का तात्कालिक कारण यह बताया जा रहा है कि मणिपुर की सरकार ने राज्य के पर्वतीय जिलों की वर्तमान सीमाओं को बदलकर, सात नये जिले बना दिये हैं, जिनमें एक कुकी बहुत जिला भी है। यू.एन.सी. ने मणिपुर राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि पर्वतीय परिषदों से सलाह किये बिना ही, एक-तरफा ढंग से यह किया गया है।

पर्वतीय परिषदों को पर्वतीय इलाकों में निवासी लोगों के अधिकारों की रक्षा करने के तथाकथित इरादे से बनाया गया था। संविधान की धारा 371(सी) के अनुसार, पर्वतीय इलाकों में निवासी लोगों से संबंधित सभी मामलों पर पर्वतीय परिषदों के साथ सलाह करना ज़रूरी है। यू.एन.सी. ने यह कहकर राज्य सरकार की निन्दा की है कि वह मौजूदे जिलों को बांटकर, मणिपुर के नगा बहुल पर्वतीय इलाकों में रहने वाले नगा लोगों के अधिकारों पर हमला करने की कोशिश कर रही है। उसने मणिपुर सरकार पर यह इल्ज़ाम लगाया है कि नगा बहुल इलाकों को प्रभावित करने वाले फैसलों को लेने में, राज्य सरकार उन अनेक समझौतों का हनन कर रही है जो एक तरफ केन्द्र व राज्य सरकारें तथा दूसरी तरफ नगा लोगों के बीच किये गये हैं।

मणिपुर के मुख्यमंत्री ने खुलेआम यह आरोप लगाया है कि केन्द्र सरकार वर्तमान घेराबंदी को समर्थन दे रही है और उसे खत्म करने के लिये कोई कदम नहीं ले रही है। इंफाल घाटी में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने इस घेराबंदी की प्रतिक्रिया में, पर्वतीय जिलों पर घेराबंदी डाल रखी है, जिसके लिये उन्हें राज्य सरकार का समर्थन मिल रहा है। इंफाल से पर्वतीय जिलों की ओर जाने वाली अनेक गाड़ियों को आग लगा दी गई है।

“कानून और व्यवस्था” बनाये रखने के नाम पर, केन्द्र सरकार ने पूरे मणिपुर राज्य में अर्ध-सैनिक बालों की 150 टुकड़ियों को तैनात कर रखा है। इंफाल पर करफ्यू लगा दिया गया है। पूरे मणिपुर राज्य में पहले से ही “बगावत विरोधी कार्यवाहियों” की आड़ में, सेना और अर्ध-सैनिक बलों को भारी संख्या में तैनात रखा गया है।

इन हालतों में, निर्वाचन आयोग ने घोषणा की है कि 4 फरवरी और 8 फरवरी को, दो सत्रों में मणिपुर विधानसभा के चुनाव होंगे।

इस घोषणा की प्रतिक्रिया बतौर, यू.एन.सी. ने ऐलान किया है कि इंफाल घाटी पर घेराबंदी जारी रहेगी। उसने ऐलान किया है कि जब तक वर्तमान समस्याओं को हल नहीं किया जायेगा, तब तक मणिपुर के नगावासी इलाकों में शांतिपूर्ण चुनाव नहीं हो सकेगा।

इस समय मणिपुर ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ है।

मणिपुर में समस्या क्या है और कौन समस्या खड़ी कर रहा है?

केन्द्र सरकार की प्रचार मशीनरी बार-बार दोहराती रहती है कि मणिपुर की समस्या विभिन्न नस्लवादी दलों के साथ जुड़े हुये विभिन्न बागी और अलगाववादी गिरोहों द्वारा पैदा की गई है। केन्द्र सरकार यह कहना चाहती है कि मणिपुर के लोग मेइतेई, नगा, कुकी, आदि नस्लवादी समुदायों में बंटे हुये हैं और राज्य में तैनात सेना व अर्ध-सैनिक बलों की वजह से ही यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि ये सभी नस्लवादी समुदाय एक दूसरे का कत्ल न कर डालें।

यह एक बहुत बड़ा झूठ है।

सच तो यह है कि मणिपुर के लोग, जिनमें विविध नस्लवादी व आदिवासी समुदाय शामिल हैं, कई सदियों से आपस में शांतिपूर्वक जीते आ रहे हैं। उन सभी के मेलजोल के साथ मणिपुर राष्ट्र का गठन हुआ है और बीती सदियों के दौरान उसका अपना इतिहास, संस्कृति और भाषा विकसित हुई है।

मणिपुर के लोगों ने देश के बाकी लोगों के साथ-साथ, आज़ादी के लिये बर्तानवी उपनिवेशवादियों के खिलाफ़ लगातार संघर्ष किये थे। परन्तु 1947 में हिन्दोस्तान की आज़ादी की घोषणा के बाद, हिन्दोस्तान के नये शासकों ने मणिपुर के लोगों पर विश्वासघातक हमला किया। मणिपुर के महाराजा को गिरफ्तार करके, केन्द्र सरकार ने उन्हें मणिपुर को हिन्दोस्तानी संघ के अंदर जोड़ने के ऐलाननामे पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया। इस तरह मणिपुर को अक्तूबर 1949 को, हिन्दोस्तानी गणतंत्र की घोषणा के ठीक पहले, बलपूर्वक हिन्दोस्तानी संघ के साथ जोड़ दिया गया। मणिपुर के लोग उस इतिहास को आज तक नहीं भूले हैं। उन्होंने अपनी संप्रभुता के लिये संघर्ष को जारी रखा है।

नगा लोगों को भी हिन्दोस्तानी राज्य का भाग होना कभी मंजूर न था। उनका आत्म निर्धारण का संघर्ष भी 1947 से आज तक जारी है।

मणिपुरी, नगा और अन्य पूर्वोत्तर राज्यों के लोगों के प्रति हिन्दोस्तानी राज्य ने उपनिवेशवादी और साम्राज्यवादी नीति अपनाई है। एक तरफ, हिन्दोस्तानी राज्य बार-बार यह दावा करता है कि ये लोग हिन्दोस्तानी संघ का हिस्सा हैं। दूसरी तरफ, हिन्दोस्तानी राज्य ने अपनी सेना और अर्ध-सैनिक बलों के ज़रिये, इन लोगों के खिलाफ़ अनवरत जंग चलाई है। वहां फासीवादी सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (1958) लागू है, जिसके चलते सेना को लोगों का कत्लेआम व बलात्कार करने की निरंकुश ताक़त दी गई है और सेना की हरकतों पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता है। बीते वर्षों में दसों-हजारों बेकसूर लोग सेना के हाथों मारे गये हैं। वहां के लोगों के नरकीय जीवन की यही हकीक़त है।

मणिपुरी, नगा तथा पूर्वोत्तर इलाके के अन्य लोगों ने मानवीय, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों के लिये अपने संघर्ष को त्यागने से इंकार किया है। उन्होंने फासीवादी सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द करने के लिये जोरदार संघर्ष किया है, जिसे हिन्दोस्तानी संघ के अन्य भागों के लोगों का बढ़ता समर्थन प्राप्त है। इन हालतों में, हिन्दोस्तानी राज्य ने राजकीय आतंक के साथ-साथ दूसरे पैशाचिक हथकंडों का भी इस्तेमाल किया है।

हिन्दोस्तानी राज्य के खिलाफ़ व अपने अधिकारों की हिफाज़त में किये जा रहे सांझे संघर्ष में मणिपुरी और नगा लोगों की जो एकता बन रही है, उसे तोड़ने के लिये राज्य की खुफिया एजेंसियों ने उस इलाके में अनगिनत हथियारबंद गिरोहों को गठित किया है, उन्हें धन और हथियार दिये हैं। इस प्रकार के हथियारबंद गिरोह लोगों के अपने अधिकारों के लिये किये जा रहे जायज़ संघर्ष को बदनाम करने के इरादे से, अंधाधुंध हिंसक हरकतें करते हैं। इससे राज्य को वहां सैनिक शासन तथा सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को लागू रखने का बहाना मिल जाता है।

सैनिक शासन और राज्य की खुफिया एजेंसियों की कार्यवाहियों के साथ-साथ, केन्द्र सरकार समय-समय पर वहां चुनाव करवाने का नाटक भी करती रहती है। इसके ज़रिये कुछ ऐसे तबकों को, जो वर्तमान हालतों से फायदा उठाने की उम्मीद करते हैं, राजनीतिक प्रक्रिया में शामिल कर लिया गया है। उन्हें विधायक और मंत्री बनने का मौका भी मिल जाता है। वे लोगों के बीच में सामुदायिक भावनाओं को भड़काते हैं और सुनियोजित तरीके से लोगों की एकता को तोड़ने का काम करते हैं।

केन्द्र सरकार इस या उस गिरोह के साथ अलग-अलग समझौता वार्ता करके भी पूर्वोत्तर राज्यों के विभिन्न राष्ट्रीय आंदोलनों में फूट डालने की कोशिश करती है। इन समझौता वार्ताओं के ज़रिये वह अपनी बांटो और राज करो की नीति को लागू करती है।

एन.एस.सी.एन.-आई.एम. के साथ केन्द्र सरकार की समझौता वार्ताओं का यही इरादा है। मौजूदा पर्वतीय जिलों को बदलकर नये जिले बनाने की मणिपुर की राज्य सरकार की घोषणा का यही इरादा है। मणिपुर के लोगों में यह डर है कि केन्द्र सरकार मणिपुर राज्य को बांटने की योजना बनाने के लिये, एन.एस.सी.एन.-आई.एम. के साथ समझौता कर लेगी। इस डर का फायदा उठाकर, शासक और विपक्षी संसदीय पार्टियां तथा मणिपुर में विभिन्न राजनीतिक दल लोगों के बीच में उन्माद भड़काते हैं। इस तरह, मेइतेई-नगा विभाजन को बड़े सुनियोजित तरीके से और तीखा बना दिया गया है।

मणिपुर तथा सभी पूर्वोत्तर राज्यों की समस्या यही है कि हिन्दोस्तानी राज्य वहां के लोगों को उनके मानवीय, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों से बलपूर्वक वंचित करता है।

घेराबंदी और उसकी प्रतिक्रिया में दूसरी घेराबंदी, इससे समस्या हल नहीं होगी। मणिपुर के लोगों, घाटी और पर्वतीय इलाकों के लोगों, दोनों को इसकी वजह से भारी कठिनाइयां झेलनी पड़ रही हैं। केन्द्र सरकार इस अराजकता और झगड़ों की स्थिति का मजा ले रही है।

मणिपुर की कम्युनिस्ट और प्रगतिशील ताक़तों के सामने एक बड़ी चुनौती है। उन्हें लोगों को यह समझाना होगा कि हिन्दोस्तानी राज्य पर भरोसा रखकर उनकी कोई समस्या हल नहीं होने वाली है। वर्तमान हिन्दोस्तानी संघ के अंदर, राजकीय आतंकवाद तथा मणिपुर के लोगों के राष्ट्रीय अधिकारों की समस्या का कोई हल नहीं हो सकता है। यह इस बात से साफ जाहिर हो जाता है कि सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम का इतना अधिक विरोध होने के बावजूद, आज तक उस फासीवादी कानून को वापस नहीं लिया गया है। अब केन्द्र सरकार मणिपुर में सैनिक शासन को जायज़ ठहराने के लिये बागी आंदोलनों के खिलाफ़ लड़ने का बहाना ही नहीं बल्कि एक नया बहाना भी दे रही है, कि वहां नस्लवादी झगड़ों को रोकने के लिये सेना और सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम की ज़रूरत है।

मणिपुर की परिस्थिति से हिन्दोस्तानी संघ के पुनर्गठन का सवाल फिर से उठता है। हिन्दोस्तानी संघ को रज़ामंद राष्ट्रों और लोगों के स्वेच्छापूर्ण संघ बतौर पुनर्गठित करना होगा। मणिपुरी और नगा लोगों, मेइतेई व अन्य समुदायों के लोगों पर अत्याचार करने वाला एक ही राज्य है। बाकी हिन्दोस्तान के मजदूर वर्ग और सभी शोषित लोगों के साथ एकता बनाकर, उत्पीड़ित राष्ट्रों के लोगों को वर्तमान हिन्दोस्तानी संघ की जगह पर एक नये राज्य की स्थापना करने के लिये संघर्ष करना होगा, जो सभी के मानवीय, लोकतांत्रिक और राष्ट्रीय अधिकारों को सुनिश्चित करेगा।

Tag:    Jan 16-31 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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