हिन्दोस्तानी राज्य ही सांप्रदायिक है, न कि सिर्फ़ कुछ राजनेता

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/02/2017 - 21:23

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, 8 जनवरी, 2017

2 जनवरी को हिन्दोस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने एक फैसला सुनाया कि, कोई भी राजनेता जाति, संप्रदाय या धर्म के नाम पर वोट नहीं मांग सकता है” तथा ऐसी कार्यवाहियां संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वभाव के ख़िलाफ़ होंगी तथा भ्रष्ट चुनावी अभ्यास माने जायेंगे।”

जन प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123(3) के आधार पर खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। इस धारा के मुताबिक, उम्मीदवार द्वारा धर्म, जाति, संप्रदाय के आधार पर हिन्दोस्तान के नागरिकों के विभिन्न वर्गों के बीच, घृणा की भावना को बढ़ावा देने की कोषिष करने पर कानूनी पाबंदी है।

ऐतिहासिक अनुभव यही साबित करता है कि सांप्रदायिक या जातिवादी घृणा फै़लाने के लिए सिर्फ कुछ राजनेता और चुनावी उम्मीदवार ही ज़िम्मेदार नहीं हैं। इसके लिये संसद की प्रमुख राजनीतिक पार्टियां तथा संपूर्ण राज्य ज़िम्मेदार हैं।

जो-जो राजनीतिक पार्टी कार्यकारिणी को संभालने के लिये सत्ता में आती रही है, उन सभी ने इस या उस खास धर्म या जाति के लोगों के ख़िलाफ़ घृणा फ़ैलाने और हिंसा छेड़ने के लिये बार-बार राज्य तंत्र का इस्तेमाल किया है। उन्होंने अपनी पार्टी के तंग हितों तथा सत्ताधारी बड़े पूंजीपति वर्ग के हित में ऐसा किया है। जो उपनिवेषवादी समय से विरासत में मिली बांटो और राज करो की रणनीति का यह एक हिस्सा है।

नवंबर 1984 में सिखों के जनसंहार की बात करें, 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के साथ हिंदुओं और मुसलमानों के बीच भड़काई गई हिंसा की बात करें, या फिर गुजरात में 2002 के कत्लेआम की, अभी तक सब जान चुके हैं कि कुछ गिने-चुने व्यक्ति ही अपराधी नहीं थे। हर कांड में सत्ताधारी पार्टियों ने सांप्रदायिक हिंसा को आयोजित किया था। राज्य के सषस्त्र सुरक्षा बलों ने पीड़ितों की जानें नहीं बचायीं। उन्होंने हिंसा को अनुमति दी और उसमें हिस्सा भी लिया। अनेक बार तो कातिलाना गिरोहों के आने के पहले ही सुरक्षा बलों ने पीड़ितों को निशस्त्र भी किया।

ऐसा नहीं कि पूंजीपति वर्ग की राजनीतिक पार्टियां सिर्फ़ चुनावों की मुहिमों में ही लोगों के बीच धर्म और जाति के आधार पर फूट डालती हैं। वे हमेशा ऐसा करती रहती हैं। इसलिए, यह अपेक्षा करना निरर्थक है कि उम्मीदवार किस तरह से मत मांग सकता है, इस पर पाबंदियां डालकर पूंजीपति वर्ग की प्रतिस्पर्धी राजनीतिक पार्टियों की बंटवारे की राजनीति पर कोई असर होगा।

विभिन्न धार्मिक संप्रदायों के बीच घृणा तथा तनाव फ़ैलाने पर प्रतिबंध लगाने के बारे में सर्वोच्च न्यायालय अगर चिंतित है, तो सबसे भयानक सांप्रदायिक अपराधों को आयोजित करने वाली पार्टियों को सज़ा देने के बारे में वह क्यों कुछ नहीं करता है? राज्य के जो अधिकारी कमान में थे और जिनकी जिम्मेदारी थी सबके जीवन तथा संपत्ति की रक्षा करना, उन्हें दोषी सिद्ध करके उन्हें सज़ा देने के बारे में न्यायालय क्यों कुछ भी नहीं करता?

सांप्रदायिक तथा जातिवादी घृणा भड़काने वाली प्रमुख पार्टियों के ख़िलाफ़ या लोगों की जानें बचाने में असफल होने वाले राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ सर्वोच्च न्यायालय कुछ भी नहीं करता है, इसका कारण यह है कि वह भी वर्तमान राज्य का एक हिस्सा है। और वर्तमान राज्य तो पूंजीपति वर्ग की हुक्मषाही का एक साधन है।

इज़ारेदार घरानों की आगुवाई में बड़े पूंजीपति ही हिन्दोस्तानी राज्य का और न्यायपालिका सहित उसके सभी अंगों का नियंत्रण करते हैं। इसी वजह से सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करने वालों को कभी भी सज़ा नहीं मिलती है। और यही वजह है कि सर्वोच्च न्यायालय तथाकथित धर्मनिरपेक्ष” निर्णय देता रहता है, जिनका सांप्रदायिक राजनीति के अनवरत फ़ैलाव पर कोई भी असर नहीं होता है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का विचार यह है कि दमन, शोषण, पक्षपात या किसी भी प्रकार के अन्याय के ख़िलाफ़ लड़ रहे लोगों को इस झूठ पर विष्वास नहीं करना चाहिए कि वर्तमान राज्य तथा उसका संविधान किसी धर्मनिरपेक्ष स्वभाव” का समर्थन करते हैं।

देष का संविधान उसका मूल कानून होता है। वह या तो प्रचलित सामाजिक-आर्थिक प्रणाली को मज़बूती देने के लिए होता है या फिर नयी प्रणाली के निर्माण की मूलभूत लाइन निर्धारित करने का साधन होता है। 1950 में जिस संविधान को अपनाया गया था, वह प्रचलित प्रणाली को जारी रखने तथा मज़बूत करने के लिए था। संविधान के विषेषज्ञ श्री सुभाष कष्यप के अनुसार, संविधान ने बर्तानवी हुकूमत को तो ख़ारिज़ किया, लेकिन उन संस्थानों को नहीं, जिन्हें बर्तानवी शासनकाल के दौरान विकसित किया गया था। अतः संविधान ने बीते उपनिवेशवादी शासनकाल से पूरी तरह नाता नहीं तोड़ा था।”

1950 के संविधान ने उस सांप्रदायिक दृष्टिकोण को भंग नहीं किया, जिसके अनुसार यह माना जाता है कि हिन्दोस्तानी समाज एक हिंदू बहुसंख्या”, एक मुस्लिम अल्पसंख्या” तथा अन्य अल्पसंख्यकों से गठित है।

धार्मिक बहुसंख्या की अवधारणा को अपनाकर, संविधान ने बर्तानवियों से विरासत में मिले सांप्रदायिक राज्य को बरकरार रखने का आधार बनाया।

पंजाबी, गुजराती, राजस्थानी, मराठी, कश्मीरी, तामिल, तेलुगू, कन्नड, मलयाली, बंगाली, बिहारी, ओड़िया, असमी, नागा, मैतेयी, मिज़ो, अवधी, बुदेलखंडी तथा असंख्य अन्य लोग इस हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप में सदियों से रहते आये हैं। ऐसी किसी भी राष्ट्रीय पहचान का हिन्दोस्तान के संविधान में उल्लेख मात्र भी नहीं है। हिन्दोस्तान को सिर्फ़ सांप्रदायिक चश्मे से देखा गया है, कि वह विभिन्न धार्मिक तथा जातिवादी संप्रदायों से गठित है।

धर्मनिरपेक्षता का फ़लसफ़ा, जो इस संविधान का आधारभूत मार्गदर्शक विचार है, वह तो बर्तानवी उपनिवेषवाद की प्रतिक्रियावादी विरासत के सिवाय कुछ और नहीं है। यह विरासत सहनशीलता” तथा न्यायपूर्ण व्यवहार” की अवधारणाओं पर आधारित है। लोगों के रीति-रिवाज़ों के प्रति सहनशील होने के नाम पर, जाति, लिंग और धार्मिक पहचान पर आधारित पक्षपात को संविधान बरकरार रखता है। संविधान राज्य को विषेषाधिकार बांटने के लिए, धार्मिक विवाद भड़काने के लिए तथा बाद में निष्पक्ष मध्यस्थता का नाटक करने की अनुमति देता है। अति सांप्रदायिक तथा सामुदायिक राजनीतिक पार्टी प्रणाली और चुनावी प्रक्रिया को वह वैधता प्रदान करता है।

जब तक राज्य समाज के सभी सदस्यों के जीवन तथा मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं करता है, तब तक यह मांग उठाना जायज़ नहीं है कि लोगों को धर्म या जाति के आधार पर संगठित नहीं होना चाहिए। जिन लोगों को अपनी धार्मिक या जातिवादी पहचान के आधार पर शिकार बनाया जाता है, उनका अपनी रक्षा के लिए संगठित होना स्वाभाविक है। जो सांप्रदायिक या जातिवादी उत्पीड़न के षिकार बनते हैं, उन्हें धार्मिक या जातिवादी पहचान के आधार पर राजनीतिक पार्टी या संगठन बनाने के लिए अपराधी नहीं माना जा सकता।

बंटवारे की राजनीति के ख़िलाफ़ संघर्ष के लिए सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला किसी काम का नहीं है। यह उस खतरनाक भ्रम को बरकरार रखता है कि वर्तमान राज्य तथा संविधान एक “धर्मनिरपेक्ष स्वभाव” की रक्षा करते हैं, जबकि सिर्फ़ कुछ भ्रष्ट राजनेता ही सांप्रदायिकता के दोषी हैं। यह हिन्दोस्तानी राज्य की सांप्रदायिक नींव को छुपाने का काम करता है।

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Jan 16-31 2017    Statements    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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