नोटबंदी के असली इरादे और झूठे दावे

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/02/2017 - 21:27

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का प्रकाशन, जनवरी 2017

http://www.cgpi.org/hi/system/files/private/demonetisation_hindi.pdf2016 का वर्ष सरकार के सोचे-समझे कदम की वजह से पैदा किये गये नगदी पैसे के घोर संकट के साथ समाप्त हुआ। 8 नवम्बर को नोटबंदी के नाम से प्रचलित जो मुहिम शुरू की गई थी, उसकी वजह से चारों तरफ तबाही फैल गयी है और समाज में उत्पादन के अनेक क्षेत्रों में काफी विनाश हुआ है।

8 नवम्बर, 2016 को संचालन में रुपये के नोटों के 86 प्रतिशत को एक झटके में ही अवैध करार कर दिया गया। लोगों को अपने पुराने नोटों को बैंकों में जमा करने के लिये 50 दिन का समय दिया गया। ऐसे समाज में जहां अधिकतम लोग अपनी आजीविका के लिये नकदी रुपयों की लेन-देन पर भारी रूप से निर्भर होते हैं, यहां नोटबंदी का फौरी आर्थिक असर वास्तव में बहुत ही विनाशकारी रहा है।

वेतन देने के लिये नकदी की कमी के कारण लाखों-लाखों दिहाड़ी के म़जदूरों और ठेके के मज़दूरों को काम से निकाल दिया गया है। देश के कई इलाकों में किसान रबी फसल की बुआई के लिये ज़रूरी चीजें खरीदने में असमर्थ रहे हैं। थोक और खुदरा व्यापार काफी घट गया है। निर्माण का काम, पर्यटन, परिवहन, छोटे और मंझोले उद्योग और सेवाएं, जो नगदी पर निर्भर हैं, सब काफी घट गये हैं। एमरजंसी दवाइयां खरीदने के लिये पैसे न होने के कारण कई लोगों की जानें भी गई हैं।

दूसरी ओर, नोटबंदी की वजह से अनेक हिन्दोस्तानी इज़ारेदार घरानों और विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को बेशुमार मुनाफ़े कमाने के बहुत से मौके मिल गये हैं। इनमें टेलीकॉम की इज़ारेदार कंपनियां तथा हाल में शुरू किये गये पेमेंट बैंक शामिल हैं। इंडिया इनकारपोरेटेड के नाम से जाने जाने वाले इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों के मुखियों ने नोटबंदी के इस कदम का गरमजोशी से स्वागत और सराहना की है। बिज़नेस स्टेंडर्ड अखबार ने 2 जनवरी, 2017 को रिपोर्ट किया था कि हिन्दोस्तान की बड़ी-बड़ी कंपनियों के 25 प्रमुखों (सी.ई.ओ.) में से 21 ने सरकार के काम-काज से अपना संतोष प्रकट किया था और उनमें से अधिकतम 2017 में अपने पूंजीनिवेशों को बढ़ाने की उम्मीद कर रहे थे।

कई लोगों की मौत, करोड़ों नागरिकों की रोज़ी-रोटी का छिन जाना, दिनभर लम्बी-लम्बी लाइनों में खड़े लोगों का घंटों-घंटों का समय बर्बाद होना, नगदी पैसा निकालने पर पाबंदियां - इन सबको जायज़ ठहराने के लिये कहा जा रहा है कि लम्बे समय के फायदे” के लिये थोड़े समय के लिये कष्ट” झेलना पड़ेगा। नव वर्ष से एक दिन पहले की शाम को प्रधानमंत्री ने बैंकों द्वारा दिये गये कर्ज़ों में तरह-तरह की तथाकथित छूटों की घोषणा की और इन्हें देश के गरीब और मेहनतकश लोगों को नोटबंदी से मिलने वाले लाभों की प्रथम सूची बतौर पेश किया।

लम्बे तौर पर इस कदम से क्या लाभ होने वाला है और किसे? किस वर्ग को इससे असली लाभ होगा और किस वर्ग को इससे नुकसान होगा? अचानक हमारे ऊपर थोपे गये इस वित्तीय कमखर्ची के कार्यक्रम का असली मकसद क्या है?

इस पर्चे में तीन भाग हैं। प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

असली मकसद

जबकि लगभग 15 खरब (लाख करोड़) रुपयों के पुराने नोटों पर रोक लगाई गयी, तो प्रथम 50 दिनों में इसके आधे से कम मूल्य के नये नोट संचालित किये गये। भारतीय रिज़र्व बैंक और केन्द्रीय वित्त मंत्रालय, दोनों ने कहा कि यह सोच-समझकर बनायी गई योजना के अनुसार किया गया है। इससे क्या दिखता है? यह दिखता है कि भूतपूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने जब नोटबंदी को एक बहुत बड़ी भूल” बताया था तो वे गलत थे। जब भूतपूर्व वित्त मंत्री चिदंबरम ने नोटबंदी को भारी कुप्रबंधन” बताया था तो वे भी गलत थे। सच तो यह है कि लम्बे समय के लिये नगदी की भारी कमी बहुत सोच समझकर पैदा की गई है ताकि लोगों को नगदी से हटकर डिजिटल लेन-देन करने को मजबूर किया जा सके।

नोटबंदी का मुख्य मकसद है हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीवादी अरबपतियों के हितों के अनुसार, “वित्त क्षेत्र में सुधारों” को तेज़ी से लागू करना। इसका मकसद है लोगों को अपनी बचत के पूरे धन को बैंकों में डालने तथा नगदी से हटकर डिजिटल भुगतान के तंत्रों पर निर्भर होने को मजबूर करना, ताकि इज़ारेदार वित्त पूंजीपति ज्यादा शक्तिशाली हो सकें और ज्यादा कुशलता से व विस्तृत तौर पर लोगों की बचत के धन को लूट सकें।

86 प्रतिशत पुराने नोटों पर रोक लगाने का ठोस परिणाम यह हुआ है कि 13 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोट जनता के हाथों से निकलकर बैंकों में जमा हो गये हैं। बैंकों में अचानक जनता द्वारा जमा किया गया बहुत सारा धन आ गया है जिस पर बहुत कम ब्याजदर है, जबकि नगदी पैसा निकालने पर कठोर पाबंदियां अभी भी लागू हैं। बैंक प्राप्त धन के कुछ हिस्से को अपने भंडार में रखकर, अब बाकी धन को कर्जे़ के रूप में दे सकते हैं और अपने मुनाफ़ों में खूब वृद्धि कर सकते हैं।

जाना जाता है कि हिन्दोस्तान के एक सबसे बड़े इज़ारेदार घराने के प्रमुख, मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री द्वारा घोषित नोटबंदी की सराहना करते हुये कहा है कि, “उन्होंने एक कदम से संपूर्ण अनुत्पादक धन को उत्पादक प्रयोग में ला दिया है। इससे अर्थव्यवस्था में कर्ज़ का प्रवाह और तेज़ हो जायेगा...” जब मुकेश अंबानी “उत्पादक प्रयोग” की बात करते हैं तो उनका मतलब है अपने जैसे इज़ारेदार पूंजीपतियों के अधिकतम मुनाफ़ों के लिये उत्पादन करना।

जनता को डिजिटल भुगतान प्रणाली का हिस्सा बनने को मजबूर करके, हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपति अपने लिये बेशुमार मुनाफ़ों का एक नया स्रोत खोलने की उम्मीद कर रहे हैं, जिसका उन्होंने अब तक पूरा फायदा नहीं उठाया था। ठीक 9 नवम्बर से ही, तमाम डिजिटल भुगतान कंपनियां अपनी सेवाओं के विज्ञापन देने लगीं। भुगतान सेवा दिलाने वाले बैंक और कंपनियां प्रत्येक डिजिटल लेन-देन पर 2 प्रतिशत कमीशन या शुल्क वसूलने की उम्मीद कर रहे हैं। ये शुल्क इस समय जनता को सामान बेचने वाले विक्रेताओं से वसूले जा रहे हैं। जब डिजिटल भुगतान प्रचलित हो जायेगा तो यह शुल्क लोगों द्वारा वस्तुओं के लिये दी जा रही कीमतों के साथ जुड़ जायेगा।

मुकेश अंबानी की रिलायंस जीओ कंपनी को 10 नवम्बर को एक भुगतान बैंक चलाने का लाइसेंस मिला और वह डिजिटल भुगतान सेवाओं के बाज़ार के सबसे बड़े हिस्से को हथियाने की उम्मीद कर रहा है। रिलायंस जीओ उस भुगतान बैंक को भारतीय स्टेट बैंक के साथ मिलकर, एक संयुक्त कारोबार बतौर खोलना चाहता है। भुगतान बैंक चलाने के लिये लाइसेंस कुछ और कंपनियों को भी मिले हैं, जिनमें शामिल हैं बिरला समूह की आइडिया मोबाइल, मित्तल समूह की एयरटेल और टाटा व चीनी समूह आलीबाबा की पेटीएम।

दुनिया की एक सबसे बड़ी कनसलटेंसी (परामर्श) कंपनी, बोस्टन कनसलटिंग ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, हिन्दोस्तान के डिजिटल भुगतान उद्योग में, अगले 5 वर्षों में 500 अरब डॉलर (सकल घरेलू उत्पाद का एक-चैथाई हिस्सा) के वार्षिक करोबार की उम्मीद की जा रही है। इसका मतलब है प्रतिवर्ष 10 अरब डॉलर, यानी 65,000 करोड़ रुपये के संभावित मुनाफ़े।

अगर इज़ारेदार पूंजीपतियों को डिजिटल भुगतान से संभावित मुनाफ़ों को हासिल करना है, तो कम से कम 50 करोड़ हिन्दोस्तानी लोगों को दैनिक लेन-देन में नगदी से हटकर इस या उस प्रकार के गैर-नगदी भुगतान का माध्यम अपनाना होगा। अधिकतम हिन्दोस्तानी लोगों की आदत बदलने में बहुत ज्यादा समय लग जाता है। अतः इज़ारेदार घरानों ने यह फैसला किया कि लोगों के हाथों से नगदी को हटा लेना ही इस प्रक्रिया को तेज़ गति से आगे बढ़ाने का सबसे अच्छा तरीका होगा।

नगदी लेन-देन से हटकर डिजिटल लेन-देन की ओर आगे बढ़ना - यह बर्तानवी-अमरीकी साम्राज्यवादियों और विश्व बैंक, बिल एण्ड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन व अन्य दानकर्ता संस्थानों द्वारा बढ़ावा दिये गये तथाकथित शासन सुधार अजेंडा का हिस्सा है। देखने में ऐसा लगता है कि यह सभी के हित के लिये एक प्रगतिशील अजेंडा है, परन्तु वास्तविकता में इसके सबसे बड़े लाभार्थी पूंजीवादी अरबपति ही हैं।

अगर सभी या अधिकतम आर्थिक लेन-देनों का रिकार्ड रखा जाता है और यह सूचना राज्य के लिये उपलब्ध होती है, तो जनता से टैक्स वसूलने तथा तरह-तरह के सेवा शुल्क वसूलने का संभावित आधार बहुत विस्तृत हो जाता है। इसके अलावा, हर एक व्यक्ति के बारे में विस्तृत सूचना के बड़े-बड़े डाटा बेस तैयार हो जायेंगे, जिनका इस्तेमाल लक्षित विज्ञापन, लक्षित राजनीतिक प्रचार और क्रांति के खतरे को दूर करने के लिये किया जा सकता है।

विक्रय वस्तुओं के उत्पादन और लेन-देन के लम्बे इतिहास में पैसे के तरह-तरह के रूप रहे हैं - कभी अनाज तो कभी मवेशी, कभी सोना तो कभी सिक्के या कागज़ के नोट। कागज़ी पैसे की जगह पर डिजिटल पैसे का लेन-देन इसी दिशा में एक और विकास है, जिसके प्रति मजदूर वर्ग और मेहनतकशों को कोई आपत्ति नहीं है। आपत्ति इस बात पर है कि बैंकिंग व्यवस्था और राज्य पर लालची इज़ारेदार पूंजीपतियों का वर्चस्व बना हुआ है, जिसकी वजह से इस प्रौद्योगिक विकास का इस्तेमाल करके अल्पसंख्यक इज़ारेदार पूंजीपति मेहनतकश बहुसंख्या के शोषण और विस्तृत लूट को खूब बढ़ा सकेंगे।

2008 के वैश्विक वित्त संकट के बाद, जब अमरीका तथा कई यूरोपीय देशों में सरकारी बजट में से धन निकालकर बड़े-बड़े बैंकों को डूबने से बचाया गया था, तब लोगों ने बड़े पैमाने पर उसका विरोध किया था। लोगों ने यह सवाल उठाया था कि जनता द्वारा जमा किये गये धन के साथ सट्टेबाजी करके बार-बार नुकसान में फंसने और डूबने वाले पूंजीवादी बैंकों को बचाने के लिये जनता के धन का इस्तेमाल क्यों किया जाना चाहिये। अमरीका और अन्य पूंजीवादी देशों के मजदूर वर्ग और लोगों ने यह जायज़ सवाल उठाया था।

2009 में दुनिया की अगुवा साम्राज्यवादी ताक़तों ने बड़े-बड़े बैंकों को दिवालियापन से बचाने के तौर-तरीके निकालने के लिये, एक फाइनेंशियल स्टेबिलिटी बोर्ड (वित्त स्थिरता बोर्ड-एफ.एस.बी.) की स्थापना की थी। एफ.एस.बी. ने वित्त व्यवस्था की स्थिरता को सुनिश्चित करने के लिये एक धन जुटाने” की रणनीति का प्रस्ताव किया। बैंकों को डूबने से बचाने के लिये सरकारी बजट से धन निकालने के बजाय, धन जुटाने की रणनीति के अनुसार यह प्रस्तावित किया जा रहा है कि बैंकों में लोगों द्वारा जमा किये गये पैसे के एक हिस्से को लूट लिया जाये और उसे बैंकों को डूबने से बचाने के लिये इस्तेमाल किया जाये। इस लूट को वैधानिक जामा पहनाने के लिये नये कानून बनाने की सिफारिश की जा रही है।

इस रणनीति का सबसे पहला ठोस उदाहरण 2013 में साइप्रस में देखने में आया। जनता द्वारा बैंकों में जमा किये गये पैसे को निकालने पर पाबंदी लगाने वाले कानून पास किये गये और इस तरह, बैंकिंग संकट के लिये दोषी लालची पूंजीपतियों के अपराधों के लिये जनता से वसूली की गई। यूनान में बड़े-बड़े बैंकों ने पूरी जनता पर वित्त कमखर्ची थोप दी, और काफी लम्बे समय तक लोगों को बैंकों में जमा अपने ही पैसे को निकालने से रोका गया।

हिन्दोस्तानी राज्य समेत जी-20 समूह ने 2014 में इस रणनीति का अनुमोदन किया। वित्त मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने 21 सितम्बर, 2016 को, नोटबंदी के ठीक दो हफ्ते पहले, फाइनेंशियल रेज़ोल्यूशन एण्ड डिपोज़िट इंश्योरेंस बिल का मसौदा प्रस्तुत किया। प्रस्तावित बिल में एक फाइनेंशियल रेज़ोल्यूशन एण्ड डिपोज़िट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन गठित करने की योजना पेश की गई है, जिसे जनता द्वारा बैंक में जमा किये गये धन की सुरक्षा पर यथोचित सीमा” थोपने की ताक़त दी गयी है।

इन सारे तथ्यों से स्पष्ट हो जाता है कि कर्ज़ न चुकाने वाले बड़े-बड़े पूंजीपतियों ने बैंकिंग क्षेत्र में जो संकट पैदा किया है, उस संकट को हल करने के लिए, नोटबंदी लोगों से अदायगी करने की रणनीति का एक हिस्सा है। पूंजीपतियों द्वारा भारी मात्रा में कर्ज़ न चुकाने तथा जमा किये गए धन और कर्ज़ों के घट जाने से हिन्दोस्तान के बैंकों में जो गहरा संकट छाया हुआ है, उसे जनता को लूटकर हल किया जा रहा है। नोटबंदी की वजह से बैंकों में जमा किया गया पैसा बहुत बढ़ गया है और पैसे निकालने पर कठोर पाबंदियां लगाई गयी हैं, ताकि आने वाले दिनों में बैंकों के लिए कर्ज़ा देना और ज्यादा मुनाफे़दार हो सके।

वैश्विक और हिन्दोस्तानी इज़ारेदार कम्पनियां 2017 में नए घरों की बिक्री में अत्यधिक वृद्धि और गाड़ियां खरीदने के लिए सस्ते कर्ज़ों की उम्मीद से बहुत खुश हैं। इज़ारेदार कम्पनियां नोटबंदी से हुए विनाश को अपने हित के लिए, विभिन्न क्षेत्रों में अपने प्रभाव को और विस्तृत करने के लिए इस्तेमाल करना चाहती हैं।

नव वर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री ने जिन तथाकथित छूटों की घोषणा की थी, वे वास्तव में कोई छूटें थी ही नहीं। गरीब किसानों आदि को बैंक कर्ज़ों पर जो कम ब्याज दर दी जा रही है, वह बचत खातों के पैसों पर बैंकों द्वारा दी जा रही ब्याज दर से ज्यादा है। दूसरे शब्दों में, पहले तो लोगों को सस्ती ब्याज दर पर बैंकों में अपना पैसा जमा करने को मजबूर किया जा रहा है, और अब हमें बताया जा रहा है कि हमारा अपना पैसा ही हमें उससे ऊंची ब्याज दर पर कजेऱ् में दिया जाएगा। और इस लूट को नव वर्ष के तोहफे के रूप में पेश किया जा रहा है!

संक्षेप में, नोटबंदी का असली मकसद है कर्जे़ न चुकाने वाले पूंजीपतियों द्वारा पैदा किये गए संकट के बोझ को मेहनतकशों के कन्धों पर लादना, ताकि अति-अमीर तबका और तेज़ी से, और ज्यादा अमीर बन सके। सारी दुनिया में बढ़ावा दिए जा रहे, वित्त क्षेत्र के सुधारों के एजेंडा का यह एक हिस्सा है, जिसके सहारे वित्त पूंजी अपनी मनमर्जी से नागरिकों को लूट सकेगी।

झूठे दावे

8 नवम्बर की मध्य रात्रि को नोटबंदी की घोषणा करते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि यह धन की बढ़ती असमानता के खिलाफ़, भ्रष्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ़ एक जिहाद है। उन्होंने दावा किया था कि इसका मकसद है भ्रष्ट लोगों द्वारा जमा किये गए काले धन को बाहर निकालना और उसे गरीब, मेहनतकश लोगों के हित के लिए इस्तेमाल करना। उन्होंने सभी हिन्दोस्तानियों से अपील की थी कि इन उच्च उद्देश्यों को हासिल करने के लिए, 50 दिन तक कठिनाइयों का सामना कर लें।

पहला झूठ: दौलत की असमानता को कम करना

मोदी की अगुवाई में भाजपा-नीत सरकार उसी “नीचे टपकने” के घिसे-पिटे सिद्धांत की फेरी कर रही है, जिसे मनमोहन सिंह की अगुवाई में कांग्रेस-नीत सरकार ने बढ़ावा दिया था। भूमंडलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण को आज भी सभी आर्थिक समस्याओं को दूर करने की रामबाण दवा बताया जा रहा है। परन्तु तथ्यों से बार-बार यही स्पष्ट होता है कि पूंजीवाद का विकास चाहे तेज़ गति से हो रहा हो या धीमी गति से, अमीर और तेज़ गति से अमीर होते रहते हैं, जबकि मेहनतकश बहुसंख्या गरीब ही रह जाती है या और गरीब होती रहती है।

आंकड़ों से यह दिखता है कि देश के मजदूर वर्ग, किसानों और दूसरे स्वरोज़गार वाले लोगों द्वारा पैदा की गयी दौलत साल दर साल, कम से कम हाथों में अधिक से अधिक संकेंद्रित होती जा रही है (देखिये तालिका-1: अमीर और तेज़ गति से अमीर होते जा रहे हैं)। देश की सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी - लगभग 35 लाख घरानों - के हाथों में देश की दौलत का हिस्सा 2004 में 40 प्रतिशत से बढ़कर 2014 में 49 प्रतिशत हो गया और यह 2016 में 58 प्रतिशत हो गया है। इस हाल की छलांग का यह मतलब है कि 2014 से अमीर और ज्यादा तेज़ गति से अमीर होते रहे हैं, यानी कि संप्रग सरकार के जाने और भाजपा सरकार के आने से दौलत की असमानता के बढ़ते रहने की प्रवृत्ति की न तो दिशा बदली है और न ही गति कम हुयी है।

भाजपा के तरह-तरह के सिद्धान्तकार कहते हैं कि खुशहाली के नीचे टपक कर जनसमुदाय तक न पहुंचने की मुख्य वजह यह है कि ज्यादातर समय तक अत्यधिक भ्रष्ट कांग्रेस पार्टी का शासन रहा है। वे उस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि 2003 से 2008 के बीच पूंजीवादी संवर्धन में चढ़ाव बहुत ही परजीवी था, सट्टेबाजी से बनाये गए संसाधनों के गुब्बारों से प्रेरित था तथा तरह-तरह की भ्रष्ट कार्यवाहियां उस पर हावी थीं। वे उस तथ्य की ओर इशारा करते हैं कि मनमोहन सिंह की पहली सरकार के शासनकाल में जिस आर्थिक संवर्धन की ऊंची गति हासिल की गयी थी, वह आर्थिक संवर्धन “रोज़गार विहीन संवर्धन” था।

भाजपा के इन सिद्धान्तकारों के तर्क में मुख्य गलती यह है कि वे पूंजीवादी विकास के वस्तुगत नियमों पर ध्यान नहीं देते हैं, इस बात का स्पष्टीकरण नहीं करते हैं कि पूंजीवाद अपने उच्चतम व सबसे परजीवी पड़ाव तक पहुंच चुका है। सिर्फ हिन्दोस्तान में ही नहीं बल्कि सभी पूंजीवादी देशों में, अमीर पहले से कहीं ज्यादा तेज़ गति से और अमीर होते जा रहे हैं। अब आबादी की कुल “निवेश करने योग्य दौलत” का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा सबसे अमीर 1 प्रतिशत के हाथों में है (देखिये तालिका-2: दौलत की सबसे अधिक असमानता वाले देशों में हिन्दोस्तान एक)। हिन्दोस्तान में इतनी ज्यादा असमानता इसलिए है क्योंकि यहां पूंजीवादी शोषण के साथ-साथ, सामंतवाद के अवशेष, उपनिवेशवाद और साम्राज्यवाद भी मौजूद हैं। पूंजी का संकेन्द्रण और उसके परिणामस्वरूप सत्ता की इज़ारेदारी बहुत ज्यादा है। राजनीतिक सत्ता का संकेन्द्रण भी बहुत ज्यादा है। कार्यकारिणी को चलाने वाला चाहे भाजपा हो या कांग्रेस पार्टी, इज़ारेदार पूंजीवादी घराने ही देश का एजेंडा तय करते हैं, और उनका एकमात्र उद्देश्य है अपने वैश्विक प्रतिस्पर्धियों की तुलना में ज्यादा तेज़ गति से अमीर बनना।

कांग्रेस पार्टी भाजपा पर कुप्रबंधन का आरोप लगाती है जबकि भाजपा कांग्रेस पार्टी को बढ़ती असमानता के लिए दोषी बताती है। वे दोनों ही बढ़ती आर्थिक असमानता के मूल कारण को छुपाते हैं। बढ़ती आर्थिक असमानता का मूल कारण यह है कि सामाजिक उत्पादन के साधन पूंजीपतियों की निजी संपत्ति हैं। पूंजीवादी मालिकी पर

आधारित उत्पादन की व्यवस्था अपने उच्चतम पड़ाव, इज़ारेदार पूंजीवाद तक पहुंच चुकी है। निजी संपत्ति कुछ एक विशाल इज़ारेदार कंपनियों के हाथों में संकेंद्रित हो गयी है। इसीलिये सामाजिक उत्पादन की पूरी प्रक्रिया इन कंपनियों के मालिकों के निजी मुनाफ़ों को अधिक से अधिक बनाने की दिशा में चलाई जाती है, जिसके लिए मज़दूरों के वेतनों और किसानों की कुल आमदनियों को कम से कम रखा जाता है।

हमारे देश में खुद को इंडिया इंकॉर्पोरेटेड कहलाने वाले इज़ारेदार घराने राज्य के सभी तंत्रों पर नियंत्रण करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि राष्ट्र की दौलत का इस्तेमाल उन्हें और अमीर बनाने तथा दुनिया के सबसे ताक़तवर पूंजीपतियों के दल में शामिल करने के तंग हितों के लिए किया जाए।

बीते दो हफ्तों में, मीडिया में तरह-तरह के आपस में विरोधी आंकड़े और अनुमान पेश किये गए हैं, कि नोटबंदी के ज़रिये केंद्र सरकार कितने करोड़ अतिरिक्त रुपये जुटा पाएगी। मुख्य सवाल यह नहीं है कि कितने रुपये जुटा पायेगी, बल्कि ये रुपये किसके लिए जुटाए जा रहे हैं? इससे किसे फायदा होगा और इसके लिए किससे वसूली की जा रही है?

हर केन्द्रीय बजट में यही देखने में आता है कि लगातार बढ़ते कर्ज़ों का बोझ मेहनतकश जनसमुदाय पर ही लाद दिया जाता है, जबकि वसूले गए धन का इस्तेमाल मुख्यतः इजारेदार पूंजीपतियों के हित में ही किया जाता है।

“नगदी विहीन अर्थव्यवस्था” की ओर जाने से मज़दूर वर्ग की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो जायेगी। अगर बैंक खाते या मोबाइल भुगतान खाते में पैसे ही नहीं हैं, तो उस खाते का कोई फायदा नहीं है। हर मज़दूर का सम्मानजनक मानव जीवन सुनिश्चित करने के लिए राज्य को रोज़गार का अधिकार, उपभोग की वस्तुओं की कीमतों की वृद्धि के साथ-साथ बढ़ते हुए न्यूनतम वेतन और सभी वेतनभोगी मज़दूरों को मिलने वाले सभी मूल

अधिकारों को सुनिश्चित करना होगा। राज्य को किसानों के लिए कृषि की आवश्यक वस्तुओं को पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध कराना होगा, और उसके साथ-साथ, स्थाई व लाभकारी दामों पर किसानों की फसलों की खरीदी सुनिश्चित करनी पड़ेगी। राज्य को उदारीकरण, निजीकरण और बड़ी-बड़ी कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण को रोकना पड़ेगा।

वर्तमान राज्य और मोदी सरकार इसकी उल्टी दिशा में काम कर रहे हैं। वे हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी निवेशकों के हित के लिए मज़दूरों और किसानों की रोजी-रोटी और अधिकारों पर हमले कर रहे हैं।

नोटबंदी की वजह से उत्पादक ताक़तों का बहुत विनाश हुआ है, तथा मज़दूरों, किसानों, छोटे व्यापारियों और अन्य स्वरोज़गार वालों को बहुत कष्ट झेलना पड़ा है। भविष्य में इससे फायदा मुख्यतः इज़ारेदार पूंजीवादी घरानों को ही होगा। रियल एस्टेट जैसे क्षेत्रों में छोटे और मंझोले कारोबारों का विनाश और उनकी जगह पर हिन्दोस्तानी और विदेशी विशाल इज़ारेदार कंपनियों की स्थापना होने से दौलत के बढ़ते संकेन्द्रण की प्रवृत्ति और तेज़ी से आगे बढ़ेगी।

अमीरों से धन लेकर गरीबों को देना तो दूर, नोटबंदी का मकसद इसका बिलकुल उल्टा है। नोटबंदी का असली मकसद है अति-अमीर पूंजीपतियों के हित के लिए मेहनतकश जनसमुदाय की बचत के धन को लूटना।

दूसरा झूठ: भ्रष्टाचार को मिटाना

बीते 50 दिनों में तरह-तरह के भ्रष्ट अभ्यासों की रिपोर्टें आई हैं, जिनसे यह भ्रम, कि नोटबंदी भ्रष्टाचार के खिलाफ़ एक जिहाद है, चकनाचूर हो जाता है।

देश के कई भागों से रिपोर्टें आई हैं कि कालाबाज़ारी का धंधा करने वाले लोग कुछ कमीशन लेकर पुराने नोटों के बदले नये नोट देने का काम कर रहे हैं। राज्य के अंदर ऊंचे पदों पर बैठे कुछ भ्रष्ट लोगों के सहयोग से इन कालाबाज़ारी करने वालों को नये नोट मिले हैं। पुराने नोटों को कुछ आदिवासी इलाकों में ले जाना, जहां के निवासियों को आयकर से छूट मिलती है, यह धंधा भी चला है।

इन सभी घटनाओं से स्पष्ट होता है कि भ्रष्टाचार हिन्दोस्तानी राज्य के अंदर इतनी गहराई तक और इतने विस्तृत तौर पर फैला हुआ है कि इसी राज्य द्वारा चलायी गई भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम एक बहुत बड़ा धोखा ही है। भ्रष्ट अफसर और मंत्री नगदी के बिना भी रिश्वत वसूलने के तरीके ढूंढ लेंगे। नोटबंदी से भ्रष्टाचार तो मिटेगा नहीं, बल्कि धन जुटाने के और नये-नये भ्रष्ट तरीके शुरू हो जायेंगे।

आयकर विभाग, जो बैंकों में जमा किये गये बेहिसाब धन का पता लगाने और उस धन के मालिकों से टैक्स और जुर्माने वसूलने का मुख्य तंत्र है, वह खुद ही बेहद भ्रष्ट है।

भ्रष्टाचार की परिभाषा है निजी लाभ के लिये सरकारी पद का दुरुपयोग करना। हमारे देश में निजी लाभ के लिये सरकारी पदों का तरह-तरह से दुरुपयोग किया जाता है और उन सब में यह ज़रूरी नहीं है कि किसी नगदी या काले धन की लेन-देन हो।

लगभग 85 बड़े पूंजीपतियों ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से कई लाखों-करोड़ों रुपयों के कर्जे़ लिये हैं, जिन्हें वे चुकाने से इंकार कर रहे हैं। यह आजकल चल रहे सबसे बड़े भ्रष्टाचार के कांडों में से एक है। यह कर्ज़ लेने वाली कंपनियों के मुखियों और राज्य के उच्चतम पदाधिकारियों के बीच मिली-भगत को साफ-साफ दिखाता है।

प्रधानमंत्री जिस विकसित हिन्दोस्तान” का सपना दिखा रहे हैं, वह अमरीका के जैसा पूरी तरह पूंजीवादी समाज का सपना है। अमरीका के समाज में, हिन्दोस्तान की तुलना में, नगदी का कम इस्तेमाल होता है परन्तु इसका यह मतलब नहीं है कि वहां भ्रष्टाचार कुछ कम है। वहां सिर्फ भ्रष्टाचार के तौर-तरीके अलग हैं।

मिसाल के तौर पर, हिन्दोस्तान में भ्रष्टाचार का जो खास रूप देखने में आता है, उसमें इस बात की झलक है कि 1947 में कोई क्रांति नहीं हुई थी, अतः हमारा राज्य बर्तानवी उपनिवेशवादी शासन की विरासत है। सरकार और प्रशासन के सभी अंग ऊपर से नीचे तक भ्रष्ट हैं।

अमरीका में सरमायदारों ने गृहयुद्ध के ज़रिये आज़ादी पाई थी और एक सरमायदारी लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की थी। 20वीं सदी में वह राज्य एक साम्राज्यवादी राज्य बतौर उभरकर सामने आया और सारी दुनिया पर अपना वर्चस्व जमाने की कोशिश करने लगा। उस राज्य में भ्रष्टाचार उच्चम स्तरों पर संकेन्द्रित है, जबकि निचले स्तरों में नहीं पाया जाता है।

अंतरराष्ट्रीय तौर पर जब अलग-अलग देशों में भ्रष्टाचार की तुलना की जाती है, तो अमरीका में भ्रष्टाचार के स्तर को वैश्विक औसतन स्तर से कम दिखाया जाता है। परन्तु इसकी वजह सिर्फ यही है कि अमरीका के सरमायदारों ने भ्रष्टाचार के लगभग सभी तौर-तरीकों को वैधता दे रखी है। मिसाल के तौर पर, वहां पूंजीवादी कंपनियों द्वारा चुनाव के परिणामों को प्रभावित करना और खास विधेयकों या नीतियों का समर्थन या विरोध करने के लिये लॉबिंग कंपनियों (जो उस विधेयक या नीति के पक्ष या विरोध में समर्थन जुटाने का काम करती हैं) की सेवाओं का इस्तेमाल करके निर्वाचित प्रतिनिधियों को धन देना पूरी तरह वैध है।

पूंजी का जितना ज्यादा संकेन्द्रण होता है, राजनीतिक सत्ता उतनी ज्यादा संकेन्द्रित होती है, और भ्रष्टाचार का स्तर उतना ही ऊंचा होता है।

भ्रष्टाचार का मतलब है निजी लाभ के लिये सरकारी पद का फायदा उठाना। इस नज़रिये से देखा जाये तो अमरीका का समाज सबसे ज्यादा भ्रष्ट समाज माना जा सकता है, जिसमें सामाजिक जीवन के सभी पहलुओं पर चंद इज़ारेदार पूंजीपतियों का संपूर्ण वर्चस्व है। सार्वजनिक क्षेत्र में बड़े-बड़े अरबपतियों के निजी हितों का पूरा बोलबाला है। राजनीतिक प्रक्रिया में उन अरबपतियों के पैसों से समर्थित उन दोनों पार्टियों के अलावा, किसी और पार्टी के लिये कोई जगह नहीं है।

भ्रष्टाचार को मिटाने वाला जिहाद होना तो दूर, नोटबंदी अपने-आप में ही बहुत बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का मामला है, क्योंकि तंग निजी हितों को पूरा करने के लिये एक मुख्य सार्वजनिक फैसला लिया गया है। यह फैसला प्रभावशाली इज़ारेदार पंूजीवादी घरानों के मुखियों द्वारा, बंद दरवाज़ों के पीछे लिया गया है, जिसके बाद

प्रधानमंत्री को उसे लागू करने तथा जनता-परस्त जिहाद के रूप में उसकी फेरी करने का काम सौंपा गया है। आखिरी पड़ाव पर इस योजना को मंत्रीमंडल के सामने पेश किया गया। भारतीय रिज़र्व बैंक के बोर्ड, जिसके सदस्य कई हिन्दोस्तानी और विदेशी पूंजीवादी इज़ारेदार कंपनियों के प्रति वफादार उच्च अफसर व गिन-चुने “विशेषज्ञ” होते हैं, ने इस योजना पर मोहर लगायी।

तीसरा झूठ: आतंकवाद का मुकाबला करना

8 नवंबर को नोटबंदी की घोषणा करते हुये, प्रधानमंत्री ने कहा था कि बाहरी ताक़तें हिन्दोस्तान में आतंकवादी हरकतें करवाने के लिये जाली नोटों में पैसा देती हैं और नोटबंदी का मकसद है उन जाली नोटों को हटाना।

वैश्विक स्तर पर आतंकवाद को आयोजित करने वाली ताक़तें धन देने के लिये अनेक आधुनिक साधनों का इस्तेमाल करती हैं। वे आतंकवादी हरकतों को धन देने के लिये जाली नोटों पर निर्भर नहीं करती हैं। इसके अलावा, सरकार के अपने ही अनुमानों के अनुसार, संचालन में जाली नोटों का कुल मूल्य मात्र 400 करोड़ रुपये है, जबकि 15 लाख करोड़ रुपये के पुराने नोटों को बंद कर दिया गया है। यानी 3000 में से एक से भी कम ऐसा जाली नोट होगा।

अगर आतंकवाद के विरोध में गंभीरता पूर्वक अभियान चलाना है तो इसका निशाना उन प्रमुख और सबसे शक्तिशाली राज्यों पर होना चाहिये जो इस इलाके में आतंकवादी गतिविधियों को आयोजित करते हैं। ढेर सारे सबूत यह दिखाते हैं कि दक्षिण एशिया समेत, सारी दुनिया के अनेक देशों और इलाकों में क्रियाशील हथियारबंद आतंकवादी गिरोहों के सबसे बड़े आयोजक और वित्त दाता अमरीका व उसके खुफिया संस्थान ही हैं।

गुप्त रूप से आतंकवाद का आयोजन करके तथा आतंकवाद से लड़ने के नाम पर खुलेआम जंग छेड़कर, अमरीका ने अपना वर्चस्व जमाने के इरादों के अनुसार, अनेक राष्ट्रों को तबाह कर दिया है और अनेक इलाकों को बांट दिया है। जिन-जिन देशों की सरकारें अमरीका के साथ कदम मिलाकर चलने से इंकार करती हैं, उन सभी देशों को आतंकवादी हमलों का संभावित निशाना बनाया जा रहा है और उनमें बाहर से गृहयुद्ध भड़काया जा रहा है या लोकतंत्र परस्त” व भ्रष्टाचार विरोधी” आंदोलन उकसाये जा रहे हैं।

जब-जब हिन्दोस्तान और पाकिस्तान की सरकारें आपस में मिलकर कोई कदम उठाने की कोशिश करती हैं, तब-तब अमरीका या उसके मित्रों की खुफिया एजेंसियां आतंकवादी हमले आयोजित करती हैं। इसका यही परिणाम है कि हिन्दोस्तान और पाकिस्तान हमेशा ही आपस में लड़ते रहते हैं और अपने-अपने पक्ष में अमरीका का समर्थन मांगते रहते हैं।

अमरीकी साम्राज्यवाद और एशिया पर वर्चस्व जमाने के उसके हमलावर कदमों की वजह से हमारे देश के सामने जो खतरा है, उससे देश की रक्षा करने के बजाय, हिन्दोस्तान की सरकार अमरीका के साथ रणनैतिक गठबंधन बनाने चली है और आतंकवाद के इस सबसे खतरनाक आयोजक के साथ खुफिया व सैनिक सहयोग को और मजबूत करती जा रही है। इस तरह वह हमारे देश को और ज्यादा खतरे में डाल रही है।

जिस तरह अमरीका आतंकवाद से लड़ने के बहाने अपने हमलावर, कब्ज़ाकारी युद्धों को जायज़ ठहराने की कोशिश करता है, ठीक उसी तरह हिन्दोस्तान के शासक आतंकवाद विरोध का बहाना देकर, मेहनतकश जनसमुदाय पर वित्तीय कमखर्ची थोप रहे हैं।

नोटबंदी का असली मकसद न तो आतंकवाद से लड़ना है और न ही भ्रष्टाचार से। इसका असली मकसद गरीबों के हित में राष्ट्र के धन का इस्तेमाल करना भी नहीं है। इसका असली मकसद है जनता को अपनी बचत के सारे पैसे को बैंकांे में जमा करने तथा डिजिटल लेन-देन करने को मजबूर करना, जिससे सिर्फ देश के सबसे अमीर और सबसे बड़े पंूजीपतियों को ही लाभ होगा। इसका अंतिम लक्ष्य है संपूर्ण जनता की बचत के धन को इज़ारेदार पूंजीपतियों के नियंत्रण में लाना।

नोटबंदी हिन्दोस्तानी और अंतरराष्ट्रीय इज़ारेदार वित्त पूंजी के अजेंडा का एक निहित भाग है। यह पूंजीवादी अरबपतियों के तंग इरादों को बढ़ावा देने के लिये, मेहनतकश लोगों की रोज़ी-रोटी और अधिकारों पर एक हमला है।

असली समाधान के लिये

मीडिया पर नियंत्रण करने वाली इज़ारेदार पूंजीवादी कंपनियां नोटबंदी के खिलाफ़ जनता के बढ़ते गुस्से और प्रतिरोध को जानबूझकर छिपा रही हैं। देश के अनेक भागों में लोगों ने गुस्से में आकर ए.टी.एम. मशीनों व बैंकों की शाखाओं पर हिंसक हमले किये हैं।

वित्त कमखर्ची के कार्यक्रम के खिलाफ़ संघर्ष में बैंक कर्मियों ने केन्द्रीय भूमिका निभाई है। वे नोटबंदी के सबसे दयनीय पीड़ितों में हैं क्योंकि उन्हें बिना मुआवज़ा के, लंबे-लंबे घंटों तक ओवरटाइम काम करना पड़ा है। इसके अलावा उन्हें जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा है और उस झूठे प्रचार का भी, कि नये नोटों पर पाबंदी को भंग करने और ब्लेक मार्किट में नये नोटों को बेचने के लिये बैंककर्मी जिम्मेदार हैं।

बैंक कर्मियों के यूनियन कई वर्षों से बड़े सरमायदारों के वित्त क्षेत्र के सुधारों” के अजेंडा के खिलाफ़ डटकर संघर्ष करते आ रहे हैं। उन्होंने कर्ज़े न चुकाने वाले सबसे बड़े पूंजीपतियों के खिलाफ़ सख्त कदम उठाये जाने की मांग की है और यह दावा किया है कि न चुकाये गये कर्ज़ों की समस्या को हल करने का बैंकों के पास यही एकमात्र जायज़ तरीका है। उन्होंने सभी प्रकार के निजीकरण का विरोध किया है और यह मांग की है कि समाज के आम हितों को पूरा करना ही बैंकिंग का काम होना चाहिये, न कि निजी मुनाफ़ों को अधिक से अधिक बढ़ाते रहना।

आज बैंक कर्मियों की यूनियनें यह मांग कर रही हैं कि भरतीय रिज़र्व बैंक को नोटबंदी के बारे में सच्चाई पर पर्दा नहीं डालना चाहिये। उन्होंने यह मांग की है कि किस बैंक को कितने नये नोट सप्लाई किये गये हैं और आगामी महीनों में कितने और नये नोटों की सप्लाई की योजना है, इसके बारे में पूरी जानकारी दी जाये।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी बैंक कर्मियों के संघर्ष और मांगों को पूर्णतया जायज़ मानती है और सभी पार्टियों तथा मजदूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के सभी संगठनों से आह्वान करती है कि बैंक कर्मियों को बिना शर्त, पूरा समर्थन दिया जाये।

इज़ारेदार पूंजीवादी बैंकिंग की जगह पर सामाजिक बैंकिंग को लागू करना, यह हमारे समाज की समस्याओं को वास्तविक तौर पर हल करने के कार्यक्रम का एक मुख्य भाग है।

मेहनतकश बहुसंख्या की बचत के धन समेत, देश के सभी वित्तीय संसाधनों को सामाजिक नियंत्रण में लाना होगा और निजी शोषकों द्वारा लूट से बचाना होगा। मजदूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को बैंकों में जमा किये गये अपने धन की सुरक्षा की गारंटी की मांग करनी चाहिये और इसके लिये कानून बनाने की मांग करनी चाहिये। बड़े पूंजीपतियों ने ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को संकट में डाला है। उनसे ही अदायगी की जानी चाहिये, मेहनतकश जनता से नहीं!

कर्ज़ न चुकाने वाले पूंजीपतियों से अदायगी करें! मज़दूर वर्ग और लोगों पर थोपी गई वित्तीय कमखर्ची के खिलाफ़ एकजुट विरोध संघर्ष का यही नारा है।

पिछले वर्ष सितंबर में उदारीकरण, निजीकरण और बड़ी कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण के खिलाफ़ आयोजित की गई आम हड़ताल में 17 करोड़ से अधिक मज़दूरों ने भाग लिया था। वर्तमान स्थिति में मज़दूर वर्ग के एकजुट विरोध को और मजबूत करने तथा आगे ले जाने की ज़रूरत है। इसके लिये बड़े सरमायदारों के हमले के खिलाफ़ मज़दूरों, किसानों और सभी मेहनतकशों की एकता को बनाना और मजबूत करना होगा।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी कम्युनिस्टों, सभी पार्टियों और मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के संगठनों से आह्वान करती है कि अर्थव्यवस्था को नई, मानव-केन्द्रित दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हो जायें। नोटंबदी के बारे में सच्चाई को सामने लाने और उसके बारे में फैलाये जा रहे झूठों का खंडन करने के लिये हम एकजुट अभियान शुरू करें।

हमें सरमायदारी संसदीय राजनीति के जाल में नहीं फंसना चाहिये। हमारा मकसद भाजपा की जगह पर कांग्रेस पार्टी या पूंजीवादी पार्टियों के किसी दूसरे गठबंधन को बिठाना नहीं है। हमारा मकसद है पूंजीपति वर्ग के शासन की जगह पर सभी मेहनतकशों और अब तक उत्पीड़ित लोगों के साथ गठबंधन बनाकर मज़दूर वर्ग का शासन स्थापित करना।

दौलत की बढ़ती असमानता तब खत्म होगी जब बड़े उत्पादन और विनिमय के साधनों को इज़ारेदार पूंजीपतियों के हाथों से निकाल लिया जायेगा और उन्हें जनता के हित में इस्तेमाल करने के लिये सार्वजनिक संपत्ति में बदल दिया जायेगा।

भ्रष्टाचार का अंत तभी होगा जब वर्तमान राज्य, जो कि उपनिवेशवाद की एक विरासत है, की जगह पर एक नया राज्य स्थापित किया जायेगा, जिसमें फैसले लेने की ताक़त मज़दूर वर्ग की अगुवाई में जन समुदाय के हाथों में होगी।

आतंकवाद का अंत तभी होगा जब सी.आई.ए. की सभी गतिविधियां बंद की जायेंगी और अमरीकी साम्राज्यवाद को दक्षिण एशिया से जड़ से उखाड़ दिया जायेगा।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की यह गंभीर राय है कि हमारे सामने सबसे अहम काम है उस संपूर्ण क्रांति की तैयारी करना, जो हमारे समाज को सभी प्रकार के शोषण, दमन, परजीविता, भ्रष्टाचार और मानव सम्मान व अधिकारों के हनन से मुक्त करने के लिये बेहद ज़रूरी है।

क्रांति की तैयारी करने का मतलब है मेहनतकश जनसमुदाय के एकजुट संघर्ष के संगठनों को बनाना व मजबूत करना। इन संघर्ष के संगठनों में मजदूर एकता कमेटियां, मजदूर किसान कमेटियां और रिहायशी इलाकों में लोगों को सत्ता में लाने वाली कमेटियां शामिल हैं। राजनीतिक एकता के इन सभी संगठनों को बनाना और मजबूत करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि ये सभी उस नई राजनीतिक सत्ता के संभावित तंत्र हैं जिसकी स्थापना करना बहुत ज़रूरी है।

हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के हमारे वैकल्पिक कार्यक्रम के इर्द-गिर्द हम एकजुट हो जायें। यह एक नये राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया स्थापित करने का कार्यक्रम है, जिससे लोग सत्ता में आयेंगे और अर्थव्यवस्था को सभी की ज़रूरतें पूरी करने की नई दिशा दी जायेगी!

आइये, आज हम संघर्ष को उस क्रांति के नज़रिये से आगे बढ़ायें, जो सभी प्रकार के शोषण, दमन, भ्रष्टाचार, भेदभाव और मानव सम्मान व अधिकारों के हनन को पूरी तरह मिटा देगी!

इंक़लाब ज़िन्दाबाद!

   
Tag:    Jan 16-31 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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