चार सार्वजनिक दवा कंपनियों का निजीकरण

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:28

सार्वजनिक संपत्ति की बिक्री व निजीकरण का विरोध करें!

28 दिसंबर, 2016 को केन्द्र सरकार के मंत्रीमंडल ने चार सार्वजनिक दवा कंपनियों को बेचने का फैसला किया। जिन कंपनियों का निजीकरण किया जायेगा उनमें शामिल हैं - हिंदुस्तान एंटीबायोटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.), इंडियन ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (आई.डी.पी.एल.), राजस्थान ड्रग्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (आर.डी.पी.एल.) और बंगाल केमिकल्स एंड फार्मास्युटिकल्स लिमिटेड (बी.सी.पी.एल.)। इन दवा कंपनियों के निजीकरण के पीछे सरकार ने यह बहाना दिया है कि इससे जो धन आयेगा उसे जन कल्याण के लिये लगाया जायेगा।

सरकार ने स्पष्ट किया है कि देनदारियों को पूरा करने के बाद आई.डी.पी.एल. और आर.डी.पी.एल. को बंद करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। जबकि एच.ए.एल. और बी.सी.पी.एल. की बिक्री के रणनीतिक विकल्प तलाशे जाएंगे।

दवा कंपनियों का किसी भी बहाने से निजीकरण किया जाना या उन्हें बंद किया जाना लोगों के स्वास्थ्य सेवाओं को पाने के अधिकारों पर सीधा हमला है। ये दवा कंपनियां ऐसी कंपनियां हैं जो कई गंभीर बीमारियों के लिये सस्ती दवायें बनाती हैं। देश के अनेक सरकारी अस्पतालों में इन्हीं कंपनियों की बनाई गई दवाइयों की सप्लाइ होती है, जहां से करोड़ों लोगों को गंभीर बीमारियों के उपचार के लिये सस्ती कीमत पर दवाइयां उपलब्ध होती हैं।

एक तरफ तो सरकार ने लोगों को उचित इलाज सुविधायें देने से इंकार कर दिया है और स्वास्थ्य बजट में लगातार कटौती की है। तो दूसरी तरफ सरकार द्वारा इन कंपनियों को बंद किये जाने के पीछे असली मकसद है - ग़रीब और मेहनतकश जनसमुदाय के लिये सस्ती दवाइयों की सप्लाई को रोक देना और निजी कंपनियों से महंगी दवायें खरीदने को मजबूर करना। दवा बनाने वाली देशी और विदेशी निजी इज़ारेदार पूंजीवादी कंपनियों के लिये हिन्दोस्तान एक बहुत बड़ा और मुनाफे़दार बाज़ार है।

इन दवा कंपनियों को बेचने के लिये सरकार यह भी बहाना दे रही है कि ये कंपनियां भारी कर्जे़ में हैं और इन कर्ज़ों को चुकाने के लिये इनका निजीकरण ज़रूरी है। इसको न्यायोचित ठहराने के लिये यह तर्क दिया जा रहा है कि “इस तरह राष्ट्रीय परिसंपत्तियों का राष्ट्रीय हित में सबसे अच्छा इस्तेमाल हो सकेगा”।

50 के दशक में, हिन्दोस्तानी राज्य ने इन दवा कंपनियों को स्थापित करते समय यह दावा किया था कि दवा समाज के लिये ऐसी ज़रूरी चीज है जिसका उत्पादन निजी कंपनियों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता है। लोगों को निःशुल्क या मुनासिब दाम पर स्वास्थ्य सुविधायें प्रदान करना, उपचार के लिये सुलभ साधन उपलब्ध कराना राज्य का दायित्व है। परन्तु राज्य अपने इस दायित्व से लगातार पीछे हट रहा है। स्वास्थ्य सेवा के बढ़ते निजीकरण का यही परिणाम हमारे सामने है कि मजदूर मेहनतकश व ग़रीब लोगों को अपने इलाज के लिये अपने ही हाल पर छोड़ दिया जाता है और मुनाफ़ाखोर निजी पूंजीपतियों की लालच का शिकार बनने को मजबूर किया जाता है।

वास्तव में काफी अरसे से इन सार्वजनिक दवा कंपनियों को घाटे में डालने तथा बर्बाद करने में राज्य का पूरा हाथ रहा है। निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों के ज़रिये सार्वजनिक संपत्ति देशी-विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों को बेचने और उनके मुनाफे सुनिश्चित करने का काम लगातार किया है। दवा कंपनियों का निजीकरण इस दिशा में एक और कदम है।

निजीकरण और उदारीकरण का हमारा अनुभव दिखाता है कि सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों को बर्बाद करना और फिर उन्हें “नुकसान बनाने वाली” कंपनी घोषित करके उनका निजीकरण करने का रास्ता खोलना, यह हमारे हुक्मरानों का एक पसंदीदा तरीका है। हमने वर्ष 2000 में देखा कि मॉडर्न फूड्स इंडिया लिमिटेड की बिक्री को सही साबित करने के लिए यही तरीका इस्तेमाल किया गया था। बड़े पैमाने पर यह प्रचार चलाया जाता है कि ये कंपनियां राजकोष पर एक बड़ा बोझ बन गई हैं और ऐसे प्रचार के ज़रिये निजीकरण के समर्थन में जनमत तैयार किया जाता है। उसी तरीके का इस्तेमाल करके इन दवा कंपनियों का निजीकरण किया जा रहा है।

हिन्दोस्तानी और विदेशी बड़ी इजारेदार दवा कंपनियां सार्वजनिक क्षेत्र की दवा कंपनियों पर अपनी लालची नजरें लगाये हुई हैं। ये कंपनियां हिन्दोस्तानी बाज़ार में महंगी दवायें बेचकर अधिकतम सुनिश्चित मुनाफा बनाने की उम्मीद लगाये बैठी हैं। इज़ारेदार कंपनियां इन दवा कंपनियों की पूरे देश में फैली सैकड़ों एकड़ ज़मीन को कौड़ियों के दाम पर हड़पने के लिये भी गिद्ध की तरह निगाहें गड़ाये बैठी हैं।

सरकार के इस फैसले से उन कंपनियों में काम कर रहे मजदूरों की नौकरियां खतरे में पड़ गई हैं और उन पर रोजी-रोटी का खतरा मंडरा रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के इन उपक्रमों में से मज़दूरों को निकालने के लिये स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना (वी.आर.एस.) स्वैच्छिक पृथक्करण योजना (वी.एस.एस.) को लागू किया जाएगा। यह मज़दूरों को बेरोज़गार करने का एक कदम है। इसके खिलाफ़ अनेक यूनियनों ने अपना विरोध प्रकट करना शुरू कर दिया है।

दवा कंपनियों का निजीकरण मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी है। यह मज़दूर वर्ग और पूरे समाज पर हमला है। हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सार्वजनिक दवा कंपनियों के निजीकरण व बिक्री की कड़ी निन्दा करती है और मजदूर वर्ग से आह्वान करती है कि अपने अधिकारों की हिफ़ाज़त में तथा सार्वजनिक संपत्ति का निजीकरण किये जाने के विरोध में अपना संघर्ष तेज़ करें।

Tag:    Defeat Privatisation    Feb 1-15 2017    Political-Economy    2017   

पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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