हमारे देश की टैक्स व्यवस्था के बारे में सच्चाई और झूठ

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:34

वित्त मंत्री और पूंजीपति वर्ग के दूसरे सरकारी वक्ता और विचारक जानबूझकर इस सच्चाई को छिपाते हैं और तोड़-मरोड़ कर पेश करते हैं कि मज़दूर, किसान और अन्य मेहनतकश लोग ही देश की सारी दौलत का उत्पादन करते हैं जिसे पूंजीपति और जमींदार हड़प लेते हैं, कि राज्य अति-विशाल और लगातार बढ़ते जा रहे टैक्स बोझ के ज़रिए मेहनतकशों को और भी ज्यादा लूटता है।

शासक वर्ग के वक्ता बार-बार यह झूठ फैलाते रहते हैं कि हमारे देश में टैक्स वसूली का आधार बहुत छोटा है। वे कहते हैं कि थोड़े से लोग ही टैक्स देते हैं, जबकि अधिकतम ग़रीब और मध्यम आमदनी वाले लोग बिना टैक्स दिए, जन सेवाओं का तथाकथित लाभ उठा रहे हैं। यह सरासर झूठा प्रचार है।

प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर-प्रणाली

कार्ल मार्क्स

(क) कर-प्रणाली के रूप में कोई भी संशोधन श्रम तथा पूंजी के बीच संबंध में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन नहीं ला सकते।

(ख) फिर भी यदि कर-प्रणाली के दो रूपों में से कोई एक चुनना हो तो हम अप्रत्यक्ष करों की पूर्ण समाप्ति तथा प्रत्यक्ष करों के आम प्रतिस्थापन की सिफ़ारिश करते हैं।

चूंकि अप्रत्यक्ष कर माल की क़ीमतें बढ़ाते हैं, इसलिए उन क़ीमतों में व्यापारी अप्रत्यक्ष करों की राशि ही नहीं, वरन उनके भुगतान के लिए अदा की जाने वाली पूंजी में ब्याज तथा मुनाफ़ा भी जोड़ देते हैं।

चूंकि अप्रत्यक्ष कर व्यक्ति से वह रक़म छुपाता है जो वह राज्य को अदा करता है, जबकि प्रत्यक्ष कर अप्रच्छन्न होता है, खुले रूप में दिया जाता है तथा वह अज्ञानी व्यक्ति को भी भ्रम में नहीं डालता, इसलिए प्रत्यक्ष कर-प्रणाली प्रत्येक व्यक्ति को सरकार पर नियंत्रण करने के लिये प्रेरित करती है जबकि अप्रत्यक्ष कर-प्रणाली स्वशासन की दिशा में सारी प्रवृत्तियां नष्ट कर देती है।

(स्रोत - कार्ल कार्ल मार्क्स, फ्रेडरिक एंगेल्स, संकलित रचनायें (हिन्दी), खंड 2 भाग 1, अस्थायी जनरल कौंसिल के डेलिगेटों के लिये निर्देश, प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष कर-प्रणाली, पृष्ठ 100, प्रगति प्रकाशन-मॉस्को।)

जब सरमायदारों के अर्थशास्त्री और नेता कहते हैं कि टैक्स वसूली का आधार बहुत छोटा है, तो वे जानबूझकर सिर्फ प्रत्यक्ष टैक्सों की बात करते हैं, जो कंपनियों के मुनाफ़ों पर और प्रति वर्ष 2.5 लाख रुपए से अधिक कमाने वाले व्यक्तियों पर लगाये जाते हैं। परन्तु ग़रीब से ग़रीब समेत, सम्पूर्ण जनसमुदाय से प्रतिदिन, अप्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये जो बहुत बड़ी धनराशि वसूली जाती है, उसका वे जिक्र तक नहीं करते।

प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष टैक्स

प्रत्यक्ष टैक्स मुख्यतः कारपोरेट आयकर और व्यक्तिगत आयकर हैं। 2014-15 में कारपोरेट आयकर बतौर 4.5 लाख करोड़ रुपये तथा व्यक्तिगत आयकर बतौर 2.8 लाख करोड़ रुपये इकट्ठे किये गये थे। कारपोरेट आयकर मज़दूरों के श्रम से निचोड़े गये मुनाफ़ों पर लगाये जाते हैं और कंपनियों से वसूले जाते हैं। व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम वसूली उन वेतनभोगी मज़दूरों से की जाती है जिनकी वार्षिक आमदनी 2.5 लाख रुपये से ऊपर है।

अप्रत्यक्ष टैक्स में कस्टम्स ड्यूटी, केन्द्रीय आबकारी शुल्क, सेवाकर, राजकीय वैट, शराब की बिक्री पर राजकीय आबकारी शुल्क, मनोरंजन टैक्स, इत्यादि शामिल हैं। 2014-15 में केन्द्र और राज्य सरकारों ने मिलकर, अप्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये कुल 15 लाख करोड़ रुपये इकट्ठे किये थे।

2014-15 में 22.5 लाख करोड़ रुपये के कुल टैक्स राजस्व का एक-तिहाई भाग प्रत्यक्ष टैक्सों तथा दो-तिहाई भाग अप्रत्यक्ष टैक्सों से इकट्ठा किया गया था। 2009-10 में कुल टैक्स राजस्व का 62 प्रतिशत अप्रत्यक्ष टैक्सों से था। अगले 5 वर्षों में यह हिस्सा बढ़कर 67 प्रतिशत हो गया है।

प्रत्यक्ष टैक्सों का विक्रय वस्तुओं की कीमतों पर कोई असर नहीं होता है, परन्तु अप्रत्यक्ष टैक्सों से बाज़ार में विक्रय वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। मिसाल के तौर पर, जब एक वर्ष पहले दुनियाभर में पेट्रोलिय की कीमत बहुत घट गई थी, तो हिन्दोस्तान की सरकार ने इसकी प्रतिक्रिया बतौर, पैट्रोलियम उत्पादों पर अप्रत्यक्ष टैक्सों को इतना बढ़ा दिया था कि हमारे लोगों को वैश्विक क़ीमत के घटने से कोई लाभ नहीं प्राप्त हुआ। राज्य ने अप्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये, हमारे नागरिकों को तेल की वैश्विक क़ीमतों के घटने से होने वाले लाभ को लूट लिया।

बाज़ार मंे विक्रय वस्तुओं के विक्रेता खरीदारों से अप्रत्यक्ष टैक्स वसूलते हैं। विक्रेता इसे इकट्ठा करके टैक्स के रूप में सरकार को देते हैं, जबकि इसका बोझ वास्तव में खरीदार उठाते हैं। यह अप्रत्यक्ष टैक्स वसूली का एक तरीका है जिसमें यह छिप जाता है कि टैक्स का बोझ वास्तव में कौन उठा रहा है। इस टैक्स का बोझ उठाने वाले सरकार के खातों में टैक्स दाताओं के रूप में दर्ज़ नहीं होते हैं।

हर विक्रेता के लिये प्रतिमाह सरकार को अप्रत्यक्ष टैक्स का भुगतान करना आवश्यक होता है, बेशक उसे उस समय तक बेची गई वस्तुओं का भुगतान न प्राप्त हुआ हो। इसीलिये पूंजीवादी कंपनियां अपनी विक्रय वस्तुओं की कीमतों में न सिर्फ अप्रत्यक्ष टैक्सों को जोड़ती हैं बल्कि पैसा मिलने से पहले भुगतान करने से होने वाली ब्याज की क्षति को भी जोड़ देती हैं।

मज़दूर और किसान राज्य द्वारा वसूले गये टैक्सों के मुख्य और लगातार बढ़ते जा रहे बोझ को उठाते हैं। परन्तु, इसका अधिकतम हिस्सा अप्रत्यक्ष है, अतः टैक्स देने वाले लोग खुद ही अपने आप को टैक्स दाता नहीं मानते हैं। वे खुद नहीं जानते कि किस दर से उनसे टैक्स वसूला जा रहा है। लोगों की इस अज्ञानता का फायदा उठाकर, शासक वर्ग और उसके सरकारी वक्ता यह झूठा प्रचार फैलाते हैं कि राज्य अधिकतम ग़रीब हिन्दोस्तानी लोगों को सबसिडी दे रहा है।

हर साल बजट प्रस्तुत करते समय, पूंजीपति वर्ग और उसके राजनीतिक प्रतिनिधि लोगों को खुश करने के लिये व्यक्तिगत आयकर छूट की सीमा, जो इस समय 2.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष है, को बढ़ाने का वादा करते हैं। वे इसे एक तथाकथित मज़दूर वर्ग परस्त व ग़रीब परस्त कदम बतौर पेश करते हैं। यह एक बहुत ही क्रूर धोखा है क्योंकि इस कदम से किसी ग़रीब मेहनतकश परिवार को आयकर में जो बचत होती है, उससे कहीं ज्यादा लगातार बढ़ते अप्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये उससे वसूल लिया जाता है।

निष्कर्ष

हमारे देश की टैक्स व्यवस्था पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था की सेवा में है। पूंजीवादी आर्थिक व्यवस्था पूंजी द्वारा श्रम के शोषण पर आधारित है। टैक्स व्यवस्था पूंजी के हित के लिये श्रम को और लूटने का काम करती है।

बड़े पैमाने पर उत्पादन के साधनों की निजी मालिकी की वजह से, एक अल्पसंख्यक शोषक तबका मेहनतकशों के श्रम से उत्पन्न बेशी मूल्य को हथिया लेता है। टैक्स व्यवस्था मुख्यतः अप्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये, हर ज़रूरत की वस्तु की कीमत को बढ़ाकर, मेहनतकशों को और भी लूटती है।

राज्य द्वारा मुख्यतः मेहनतकशों से वसूला गया सारा राजस्व पूंजीपति वर्ग के हितों को पूरा करने के लिये खर्च किया जाता है। राजस्व का बहुत ही कम और अपर्याप्त हिस्सा स्कूली शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा, पेयजल, शौच प्रबंध, इत्यादि जैसी आवश्यक सेवाओं पर खर्च किया जाता है, जिन्हें प्रदान करना राज्य का फर्ज़ होना चाहिये।

मज़दूरों और किसानों को फायदा होगा अगर उन्हें टैक्स दाता की मान्यता दी जाती है। इस समय वे टैक्स दे रहे हैं परन्तु ऐसा दिखाया जाता है कि वे कोई टैक्स नहीं देते हैं! अगर अप्रत्यक्ष करों को पूरी तरह हटाया जाता और सभी टैक्स प्रत्यक्ष रूप में वसूले जाते, तो मेहनतकश लोग टैक्स दाता होने के नाते राज्य से यह मांग करते कि उनसे वसूले गये टैक्स के बदले राज्य उन्हें आवश्यक सेवायें मुहैया कराए।

हम मेहनतकशों को इस असूल के लिये संघर्ष करना होगा कि राज्य को समाज में उत्पन्न बेशी मूल्य से अपने खर्चों को पूरा करना चाहिये, मेहनतकशों की आमदनी को लूटकर नहीं। हमें फौरी तौर पर अप्रत्यक्ष टैक्सों को घटाने की मांग करनी चाहिये तथा अप्रत्यक्ष टैक्सों को पूरी तरह रद्द करने के लिये संघर्ष करना चाहिये।

Tag:    Feb 1-15 2017    Political-Economy    2017   

पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)