हिन्दोस्तानी गणतंत्र के 67 वर्ष के अवसर पर

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:38

नयी नींवों पर गणतंत्र का नव-निर्माण करना होगा

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति का बयान, 24 जनवरी, 2017

हिन्दोस्तानी गणतंत्र जो कुछ भी होने का दावा करता है, वास्तव में वह हर मामले में उसका ठीक उल्टा है।

संविधान के पूर्वकथन में ऐलान किया गया है कि “हम, हिन्दोस्तान के लोग” हिन्दोस्तान को एक संप्रभु, समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में गठित करने” का गंभीर फैसला लेते हैं। पर सच तो यह है कि इस संविधान को अपनाने वाले हिन्दोस्तान के लोग नहीं बल्कि एक गैर प्रतिनिधित्ववादी, सांप्रदायिक तौर पर गठित संविधान सभा थी, जिसका गठन बर्तानवी उपनिवेशवादियों की देख-रेख में हुआ था।

संविधान के विशेषज्ञों के अनुसार, समाजवादी गणतंत्र का मतलब है एक ऐसा गणतंत्र जिसमें सभी प्रकार के शोषण, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक, से मुक्ति है”

वास्तव में, अधिकतम हिन्दोस्तानी लोग पूंजीवादी शोषण, साम्राज्यवादी लूट और सामंती अवशेषों के शिकार हैं। उन्हें जाति, लिंग, धर्म, नस्ल और राष्ट्रीयता के आधार पर, नाना प्रकार के सामाजिक शोषण, भेदभाव और दमन का सामना करना पड़ता है।

राज्य के नीति-निदेशक तत्वों में कहा गया है कि राज्य खास तौर पर, निम्नलिखित उद्देश्यों को हासिल करने की दिशा में नीतियां अपनायेगा -

  • कि सभी नागरिकों को, पुरुषों और महिलाओं को समान रूप से, रोज़गार के पर्याप्त साधन का अधिकार हो;
  • कि समुदाय के भौतिक संसाधनों की मालिकी और नियंत्रण का आवंटन इस प्रकार हो ताकि सांझे हितों को सबसे बेहतर तरीके से पूरा किया जा सके;
  • कि आर्थिक व्यवस्था के चलते, दौलत और उत्पादन के साधनों का संकेन्द्रण न हो, जो सांझे हित के लिए बुरा होगा।

परन्तु हकीक़त तो यह है कि 1 प्रतिशत से कम हिन्दोस्तानी लोगों के हाथों में देश की आधी के ज्यादा दौलत संकेन्द्रित है। उत्पादन के साधन कम से कम हाथों में, ज्यादा से ज्यादा हद तक संकेन्द्रित होते जा रहे हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि बीते 67 वर्षों में, जब से इस गणतंत्र की स्थापना हुयी है, समाजवाद नहीं बल्कि पूंजीवाद का विकास हुआ है।

दौलत और उत्पादन के साधनों के संकेन्द्रण को रोकना तो दूर, इस गणतंत्र ने खुद को इंडिया इंकॉर्पोरेटेड कहलाने वाले इज़ारेदार पूंजीपतियों के हाथों में इनके संकेन्द्रण को बहुत आसान बना दिया है और उन्हें इसके लिए हर प्रकार की सुविधा दी है। जैसे-जैसे इज़ारेदार पूंजीपतियों का विस्तार होता जा रहा है, वैसे-वैसे बहुत से छोटे उत्पादक बाज़ार से बाहर धकेले जा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप, पुरानी नौकरियां उतनी ही तेज़ी से नष्ट हो रही हैं जितनी तेज़ी से नयी नौकरियां पैदा की जा रही हैं। अधिकतम नयी नौकरियां अस्थायी ठेके पर हैं, जिनमें मज़दूरों को बहुत कम वेतन पर, लम्बे-लम्बे घंटों तक कड़ी मेहनत करनी पड़ती है, और उनके अधिकारों की कोई कानूनी सुरक्षा नहीं होती। हमारे देश के निर्माण स्थलों पर, करोड़ों-करोड़ों पुरुष, महिलाएं और बच्चे बंधुआ मज़दूर जैसे काम करते हैं।

किसान परिवारों के लगभग तीन-चौथाई भाग के पास दो एकड़ से कम ज़मीन है। इन छोटी जोतों पर आजीविका मुश्किल है, अतः वे अपनी ज़मीन बड़े जमींदारों को किराये पर देने को मजबूर हैं और जमींदारों के खेतों पर वेतन के लिए काम करते हैं या रोज़गार की तलाश में शहरों को चले जाते हैं।

बेरोज़गार और कम रोज़गार वालों की संख्या भी साल-दर-साल तेज़ गति से बढ़ रही है। हाल की नोटबंदी के कारण, करोड़ों और लोग इस श्रेणी में जुड़ गए हैं।

नीति-निदेशक तत्वों में यह भी कहा गया है कि राज्य सुनिश्चित करेगा कि

  • पुरुषों और महिलाओं को समान काम के लिए समान वेतन दिया जायेगा;
  • मज़दूरों, पुरुषों और महिलाओं, के स्वास्थ्य और ताक़त तथा बच्चों की कच्ची उम्र का दुरुपयोग नहीं किया जाएगा और नागरिकों को आर्थिक ज़रूरत के कारण ऐसी नौकरियां करने को मजबूर नहीं होना पड़ेगा, जो उनकी उम्र और ताक़त के लिए अनुचित हों;
  • बच्चों को स्वस्थ तरीके से, मुक्त और सम्मानजनक हालतों में विकसित होने के अवसर और सुविधाएं दी जायेंगी तथा उनके बचपन व जवानी को शोषण और नैतिक व भौतिक लापरवाही से बचाया जायेगा।

पर वास्तव में, महिलाओं को अतिशोषण, भेदभाव और दमन का सामना करना पड़ता है। कई क्षेत्रों में उन्हें पुरुषों से कम वेतन दिया जाता है; इसके अलावा काम की जगह पर और समाज में उन्हें बार-बार अपनी इज्ज़त पर हमलों का सामना करना पड़ता है।

नौजवानों के सामने अंधकारमय और अनिश्चित भविष्य है। 4 करोड़ से अधिक बच्चों को बहुत ही कम उम्र में, अत्यंत खतरनाक हालतों में, काम करना पड़ता है। ग्रामीण इलाकों से जवान लड़कियों को, नियमित तौर पर, वैश्यावृत्ति के लिए बेचा और खरीदा जाता है, या घरेलू श्रम के लिए मजबूर किया जाता है। करोड़ों बच्चों को अपने बचपन से वंचित किया जाता है।

समाजवाद के निर्माण के लिए उत्पादन के साधनों को निजी संपत्ति से बदलकर सामाजिक संपत्ति बनाना पड़ता है। पर हिन्दोस्तानी गणतंत्र में ठीक इसका उल्टा किया जाता है - यानी निजीकरण और विनिवेश के नाम पर, सार्वजनिक संपत्ति को निजी संपत्ति में बदल दिया जाता है। खनिज संपदा, नदियों और तालाबों, वनों और समुद्रतटों को इज़ारेदार पूंजीपतियों को, अधिकतम मुनाफे़ बनाने के लिए, सौंपा जा रहा है। सार्वजनिक संपदा को निजी हाथों में बेचने के सरकार के अधिकार का सुप्रीम कोर्ट ने अनुमोदन किया है, यह कहकर कि यह एक “नीतिगत मामला” है जिसे चुनौती नहीं दी जा सकती है।

बीते 67 वर्षों में, इस गणराज्य में इज़ारेदार पूंजीपतियों के एजेंडे को तथाकथित ‘सबके भले के लिए’ बताया गया है। नेहरू ने टाटा-बिरला योजना को “समाजवादी नमूने के समाज” को बनाने की योजना बतौर पेश किया था। एक के बाद दूसरे प्रधानमंत्री ने बड़े पूंजीपतियों के कार्यक्रम को, तरह-तरह के धोखेबाज नारों से सजाकर बेचा है, जैसे कि गरीबी हटाओ”, “समावेशी संवर्धन” और “सबका साथ, सबका विकास”

जबकि इसे दुनिया का सबसे आबाद लोकतंत्र कहा जाता है, यहां सच्चाई यह है कि 150 पूंजीवादी घराने देश की दिशा तय कर रहे हैं और 130 करोड़ लोगों के भविष्य को तय कर रहे हैं। इस गणतंत्र के सभी संस्थान - विधिपालिका, कार्यकारिणी और न्यायपालिका - बड़े सरमायदारों के कार्यक्रम को लागू करने के लिए काम करते हैं।

अपने धनबल और मीडिया पर नियंत्रण का इस्तेमाल करके, इज़ारेदार घराने चुनावों के नतीजों को प्रभावित करते हैं। पूंजीपतियों और जमींदारों के अलग-अलग तबके खुद को राजनीतिक पार्टियों में संगठित कर लेते हैं, जो सरकार बनाने के लिए आपस में स्पर्धा करती हैं। वे सबके हित के लिए लड़ने का दावा करती हैं, परन्तु सत्ता में आ जाने के बाद, वे बड़े पूंजीपतियों के कार्यक्रम को ही सख्ती से लागू करती हैं। चुनावों के ज़रिये एक पार्टी दूसरे का स्थान ले लेती है, परन्तु गणतंत्र इज़ारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में बड़े पूंजीपतियों की हुक्मशाही ही बना रहता है। 

यह गणतंत्र इज़ारेदार पूंजीपतियों के बड़े से बड़े दावों की हिफाज़त करता है, जबकि यह मज़दूरों और किसानों के अधिकारों को पांव तले कुचल देता है। अपनी पसंद के यूनियन बनाने के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे मज़दूरों को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन्हें “राष्ट्र-विरोधी” तथा “उग्रवादी” बताकर उत्पीड़ित किया जाता है। हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार कम्पनियाँ किसानों और आदिवासियों की ज़मीन का बलपूर्वक अधिग्रहण कर रही हैं। सुरक्षा बलों का इस्तेमाल शोषकों की रक्षा करने और शोषित जनसमुदाय के संघर्षों को अपराधी ठहराने के लिए किया जाता है।

इस गणतंत्र का धर्मनिरपेक्ष होने का दावा बेहद झूठा है, क्योंकि इसमें बार-बार सांप्रदायिक हिंसा के कांड आयोजित किये जाते हैं, जिनमें राज्य के विभिन्न अंगों का सांप्रदायिक चरित्र स्पष्ट नज़र आता है। सुरक्षा बल सांप्रदायिक हिंसा के पीड़ितों की रक्षा करने से बार-बार इंकार करते हैं। न्यायपालिका सांप्रदायिक हत्याकांड आयोजित करने वाले गुनहगारों को सज़ा देने से बार-बार इंकार करती है। वर्तमान राज्य प्रत्येक नागरिक के ज़मीर के अधिकार की रक्षा की गारंटी नहीं देता है। बल्कि, जिनके विचार शासक दल के विचारों से भिन्न हैं, उन्हें “राष्ट्र-विरोधी” करार दिया जाता है। उन्हें या तो जेल में बंद किया जाता है या फर्ज़ी मुठभेड़ों में उड़ा दिया जाता है।

विदेशी खतरों से हिन्दोस्तान की संप्रभुता की रक्षा करने का इस गणतंत्र का दावा भी खोखला है। हम देखते हैं कि विदेशी पूंजीवादी निवेशकों का किस तरह पलक-पावडे़ बिछाकर स्वागत किया जाता है। हिन्दोस्तानी बड़े सरमायदार, अपने साम्राज्यवादी मंसूबों से प्रेरित होकर, दुनिया की सबसे खतरनाक विदेशी ताक़त के साथ नजदीकी के सैनिक और जासूसी सहयोग समेत, रणनैतिक गठबंधन बना रहे हैं। दक्षिण एशिया में अमरीकी साम्राज्यवाद की बढ़ती दखलंदाजी हिन्दोस्तान और इस इलाके के दूसरे देशों की संप्रभुता के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है।

हकीक़त संविधान में किये गए बड़े-बड़े वादों से बिलकुल विपरीत क्यों है?

अनेक पार्टियाँ और तथाकथित विशेषज्ञ यह दावा करते हैं कि संविधान बहुत बढ़िया है परन्तु कुछ भ्रष्ट व्यक्तियों और पार्टियों ने उसका दुरुपयोग किया है। यह हमारे लोगों के साथ एक बहुत बड़ा धोखा है। वास्तव में, संविधान यही साफ-साफ दिखाता है कि इस देश के बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों ने बर्तानवियों द्वारा स्थापित किये गए संस्थानों और शासन के तौर-तरीकों को बरकरार रखने का फैसला किया था। 1950 के संविधान की अधिकतम

धाराओं और खण्डों को भारत सरकार अधिनियम 1936 से पुनर्मुद्रित किया गया था, जिसे बर्तानवी उपनिवेशवादियों ने लिखा था। लूट और दमन के सभी संस्थानों को बरकरार रखा गया, सांप्रदायिक बंटवारे और जातिवादी दमन के ज़रिये शासन करने के तंत्रों और तौर-तरीकों को भी बरकरार रखा गया।

मजदूरों और किसानों ने सभी को खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी देने वाले आज़ाद हिन्दोस्तान के लक्ष्य के साथ संघर्ष किया था। उन्हें बेवकूफ बनाने के लिए, संविधान के निर्माताओं ने राज्य के नीति-निदेशक तत्वों को जोड़ दिया। ये हमेशा के लिए उच्च नीतिगत उद्देश्य मात्र रह जाने वाले थे, जो हमारे लोगों की आँखों के सामने कभी न पूरे होने वाले सपने के रूप में रह जाने वाले थे।

वर्तमान गणतंत्र और इसका संविधान उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष के अनगिनत देशभक्तों और क्रांतिकारी शहीदों के जज़्बातों के साथ विश्वासघात है। उन्होंने नयी नीवों पर एक ऐसे आज़ाद हिन्दोस्तान की स्थापना करने के लिए संघर्ष किया था और कुर्बानी दी थी, जिसमें बर्तानवी शासन के सभी राजनीतिक और आर्थिक संस्थानों से पूरी तरह नाता तोड़ दिया जाएगा। परन्तु 1947 या 1950 में यह नाता नहीं तोड़ा गया। आज यह वक्त की मांग है कि यह नाता तोड़ दिया जाये।

वर्तमान राज्य के किसी भी संस्थान के किसी भी प्रकार के सुधार से राज्य का मूल चरित्र नहीं बदलेगा। यह राज्य उपनिवेशवादी शासन की विरासत है, मुट्ठीभर शोषकों के राज का साधन है। जब तक यह गणतंत्र मौजूद रहेगा, तब तक हमारे लोगों के लिए खुशहाली और सुरक्षा एक दूर का सपना ही रहेगा। हम आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक, सभी प्रकार के शोषण से मुक्त समाज का निर्माण कभी नहीं कर पाएंगे।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सभी लोगों से आह्वान करती है कि वर्तमान गणतंत्र के स्थान पर एक नए गणतंत्र की स्थापना करें, जो संपूर्णतया नयी नींवों पर आधारित हो। नए गणतंत्र के संविधान को यह सुनिश्चित करना पड़ेगा कि संप्रभुता लोगों के हाथ में हो; कि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित कराना राज्य का फर्ज़ हो; कि सभी के मानव अधिकार, लोकतान्त्रिक और राष्ट्रीय अधिकार सुनिश्चित हों।

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Feb 1-15 2017    Statements    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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