मानेसर स्थित मारुति कारखाने में 2012 में हुई हिसा का सत्य

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:43

मारुति के सैकड़ों मज़दूरों को गिरफ्तार करने के चार वर्ष बाद, जैसे-जैसे अदालत का मामला अंतिम पड़ाव पर पहुंच रहा है, सच्चाई सामने आ रही है। तथ्य दिखा रहे हैं कि इसके लिये पूंजीपति जिम्मेदार हैं, न कि मज़दूर।

जनवरी 2017 के अंतिम सप्ताह में मुलजिम मज़दूरों की तरफ के वकीलों ने विभिन्न तथ्य उजागर किये। यह मामला 18 जुलाई, 2012 को मारुति कंपनी के दफ्तर में आग लगने से मारे गये एक वरिष्ठ प्रबंधक से संबंधित है। घटना उस वक्त हुई थी जब अनुचित तरीके से निकाले गये एक मज़दूर को नौकरी पर वापस लेने के लिये, मज़दूर आंदोलन कर रहे थे और मारुति कंपनी प्रबंधकों और मज़दूरों के बीच बातचीत चल रही थी। मज़दूरों पर दंगा-फसाद और आगजनी के साथ-साथ, प्रबंधक की हत्या करने का भी आरोप लगाया गया।

मज़दूरों के बचाव पक्ष के वकीलों द्वारा सामने रखे तथ्यों पर गौर करने की ज़रूरत है।

  • घटना के दिन पुलिस को बुलाया गया था पर उन्हें कारखाने के बाहर ही इंतजार करते रहने दिया गया था, जबकि मज़दूरों की वर्दी में कंपनी के गुंडे (बाऊंसर) कंपनी के अंदर घूम रहे थे।
  • घटना स्थल पर लगे सी.सी.टी.वी. कैमरों की रिकॉर्डिंग कंपनी ने यह कह कर उपलब्ध नहीं कराई कि सिस्टम काम नहीं कर रहा था।
  • विभिन्न आरोपों में 148 मज़दूरों को गिरफ्तार किया गया। प्रथम सूचना रिपोर्ट के अनुसार मज़दूर “बेलचे, लाठियां और सलाखों” जैसे हथियार लिये हुये थे, जो कंपनी के परिसर में उपलब्ध ही नहीं थे। बाद में अभियोग पक्ष ने दावा किया कि वे गाड़ी के दरवाज़ों की डंडियां और शोकर्स जैसे गाड़ियों के पुर्जे़ लिये हुए थे। बाद में इन पुर्जों को मज़दूरों के घरों में छिपाया गया और पुलिस द्वारा बरामद कराया गया।
  • सरकारी वकील ने बयान दिया कि हरियाणा सरकार गिरफ्तार किये गये मज़दूरों को जमानत देने के खिलाफ़ है। गिरफ्तार मज़दूरों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग हैं जो घटना के दिन कंपनी में मौजूद ही नहीं थे परन्तु उन्हें भी 3 से 4 वर्षों तक जमानत से वंचित रखा गया है। जमानत न दिये जाने वालों में नियमित मज़दूर भी शामिल हैं जिनके खिलाफ़ कुछ भी गलत करने के प्रमाण नहीं हैं।
  • गिरफ्तार किये गये मज़दूरों में अधिकांश अस्थायी मज़दूर हैं जिनके नाम चार ठेकेदारों ने दिये हैं। इन चारों ठेकेदारों में से एक भी इन मज़दूरों को चेहरे से नहीं पहचान पाया है। जिस बेतरतीब और मनमाने ढंग से इन मज़दूरों के नाम दिये गये हैं उससे यह पता चलता है कि हरेक ठेकेदार द्वारा दिये गये नाम अंग्रेजी वर्णमाला के क्रमशः अक्षरों से शुरू होते हैं। इससे पता चलता है कि ठेकेदारों की मज़दूर सूचियों में से इन नामों को कुछेक पन्नों से मनमाने ढंग से उठा लिया गया है।

इन तथ्यों से पता चलता है कि मारुति कंपनी के मालिकों और हरियाणा सरकार ने झूठ बोला जब उन्होंने दंगों, आगजनी और हत्या के लिये मज़दूरों को जिम्मेदार बताया था। पूंजीवादी मीडिया ने मालिकों के मत का व्यापक प्रसार किया है और मज़दूरों को खलनायकों के जैसे पेश किया है। असली परिस्थिति बहुत अलग है। मज़दूर अपने अधिकारों के लिये लड़ते आये हैं। वे अपने लड़ाकू संगठन बना रहे हैं और उन्हें मज़बूत कर रहे हैं। वे सभी मज़दूरों की एकता बनाने की कोशिश कर रहे हैं - नियमित मज़दूरों, ठेका मज़दूरों और प्रशिक्षुओं की। मज़दूरों की यूनियन द्वारा उठाई गई अस्थायी मज़दूरों के अधिकारों की मांग से यह साफ दिखता है।

मज़दूरों की बढ़ती एकता और संगठन से मालिकों को घातक रूप से डर होता है। प्रबंधक की मौत का इस्तेमाल करके, उन्होंने मज़दूरों पर जबरदस्त हमला किया। हजारों मज़दूरों को काम से निकाला और सैंकड़ों को फर्ज़ी आरोपों में गिरफ्तार करवाया। यूनियन के नेताओं को धमकियां दीं और उनका पीछा करवाया। बेकसूर मज़दूरों को सालों-साल जेल में डलवाया जिससे उनके परिवारों को अत्याधिक मुश्किलों का सामना करना पड़ा।

यह एकदम संभव है कि जिस कमरे में मज़दूरों और प्रबंधन के प्रतिनिधि बहस कर रहे थे उसमें आग लगाने का काम मालिकों ने ही करवाया हो, ताकि मज़दूरों की बढ़ती एकता को तोड़ा जा सके और उनके संघर्ष को कानून-विरोधी बताया जा सके।

इतनी मुश्किल परिस्थिति बनाये जाने के बावजूद, मज़दूरों द्वारा प्रतिरोध को जारी रखना, यह बहुत प्रेरणादायक है। जेल में बंद मज़दूरों के लिये उन्होंने समर्थन समूह बनाया ताकि पीड़ित मज़दूरों को अलग-अलग तरह की सहायता दी जा सके।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मारुति के मज़दूरों के बहादुर संघर्ष को सलाम करती है और मांग करती है कि पूंजीपति मालिकों और सरकार की पूरी भूमिका की जांच की जाये, सच को सबके सामने लाया जाये और असली गुनहगारों को कड़ी से कड़ी सज़ा दी जाये।

Tag:    Feb 16-28 2017    Struggle for Rights    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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