रेलवे की ट्रेड यूनियनों का राष्ट्रीय सम्मेलन

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:49

रेलवे के निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष में एक महत्वपूर्ण अगला कदम

1 फरवरी, 2017 को रेल मज़दूरों के विभिन्न भागों का प्रतिनिधित्व करने वाली यूनियनें, नेशनल प्लैटफॉर्म ऑफ रेलवे ट्रेड यूनियन्स के झंडे तले एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय सम्मेलन में एक साथ आयीं। सम्मेलन का शीर्षक था, “रेल बचाओ, देश बचाओ”।

सम्मेलन में रेल मज़दूरों के सभी हिस्सों - रेल चालकों, गार्डों, स्टेशन मास्टरों, इंजीनियरों तथा रेलवे के सभी तकनीकी मज़दूरों के लड़ाकू जोश की झलक थी। इसमें अलग-अलग भाषाएं बोलने वाले देश के अलग-अलग भागों से आये रेल मज़दूरों के एकताबद्ध संघर्ष करने के दृढ़ संकल्प की झलक थी। इस बात की झलक थी कि वे भारतीय रेल के निजीकरण के मज़दूर-विरोधी, समाज-विरोधी और देश-विरोधी कार्यक्रम को परास्त करेंगे। दक्षिण रेलवे इंप्लॉईज़ यूनियन (डी.आर.ई.यू.), ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टॉफ एसोसियेशन (ए.आई.एल.आर.एस.ए.), ऑल इंडिया गार्डस् कौंसिल (ए.आई.जी.सी.), ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसियेशन (ए.आई.एस.एम.ए.) तथा रेल मज़दूरों की अन्य यूनियनों ने संयुक्त रूप से इस सम्मेलन का आयोजन किया था ताकि निजीकरण के खिलाफ़ संघर्ष में सभी रेल मज़दूरों की एकता मज़बूत हो सके और संघर्ष का रास्ता तय किया जा सके। मज़दूर एकता कमेटी, कॉन्फेडरेशन ऑफ सेन्ट्रल गवर्नमेंट इंप्लॉईज़ एण्ड वर्कर्स तथा भारत संचार निगम लिमिटेड (बी.एस.एन.एल.) एम्प्लाइज़ यूनियन के नेताओं ने सम्मेलन के विचार-विमर्श में सक्रियता से भाग लिया और रेलवे के निजीकरण के खिलाफ़ रेलवे के मज़दूरों के संघर्ष का पूरी तरह समर्थन किया। सम्मेलन के सभी वक्ताओं का मत था कि निजीकरण का अजेंडा हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदारों का अजेंडा है। पिछली संप्रग सरकार की तरह ही मोदी सरकार भी इसी अजेंडे को लागू कर रही है।

रेलवे ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रीय मंच की तरफ से कॉमरेड के.सी. जेम्स ने सहभाग लेने वाले विभिन्न संगठनों को मंच पर आमंत्रित किया।

फिर उन्होंने ऑल इंडिया लोको रनिंग स्टॉफ एसोसियेशन के महासचिव, कॉमरेड एम.एन. प्रसाद को सम्मेलन को संबोधित करने के लिये बुलावा दिया।

कॉमरेड एम.एन. प्रसाद ने अपने वक्तव्य में ध्यान दिलाया कि रेल चालकों तथा रेल मज़दूरों के अन्य हिस्सों द्वारा जोरदार संघर्ष के बावजूद, हम भारतीय रेल के निजीकरण के रास्ते पर रोक नहीं लगा पाये हैं। सरमायदार निजीकरण के रास्ते पर आगे चलते जा रहे हैं। वे निजीकरण की राह पर आगे बढ़ने के लिये रेलवे को अनेक निगमों में बांटने की देबरॉय कमेटी की सिफारिशों को लागू किये जा रहे हैं। रेल बजट का आम बजट के साथ विलयन से साफ संकेत मिलता है कि सरकार का इरादा रेलवे का निजीकरण करना है।

 

कॉमरेड प्रसाद ने कहा कि यह साफ है कि कोई भी एक संगठन निजीकरण के खिलाफ़ अकेले संघर्ष करके इसे रोक नहीं पायेगा। रेलवे की सभी यूनियनों को निजीकरण के खिलाफ़ एक मंच पर आकर एक साथ संघर्ष करना होगा। हमें पता है कि रेलवे के अंदर अलग-अलग यूनियनों के अस्तित्व का मतलब है कि हमारे बीच कुछ भिन्न मत हैं। इन विभिन्नताओं के बावजूद हमें निजीकरण के खिलाफ़ एक झंडे के तले आना होगा, रेलवे को बचाने के लिये और राष्ट्र को बचाने के लिये। बहुत बार हड़ताल का नोटिस दिया जाता है परन्तु बाद में उसे वापस लेना पड़ता है। ए.आई.एल.आर.एस.ए. की तरफ से, मैं वादा करता हूं कि अगर रेल की यूनियनें असलियत में हड़ताल आयोजित करने का निर्णय लेती हैं तो भारतीय रेल के रेल चालक इसकी सफलता सुनिश्चित करेंगे।

कॉमरेड प्रसाद ने कहा कि निजीकरण को रोकने के लिये सभी रेलवे मज़दूरों की लड़ाकू एकता बनाना बहुत ही ज़रूरी है। ऐसे मंच के निर्माण के लिये उन्होंने सम्मेलन को संगठनात्मक कदम लेने का आह्वान दिया।

दिल्ली साइंस फोरम के कॉमरेड डी. रघुनंदन ने देबरॉय कमेटी की सिफारिशों के बारे में विस्तार में बताया। उन्होंने समझाया कि देबरॉय कमेटी का प्रस्ताव है कि निजीकरण का नाम इस्तेमाल किये बिना, वास्तव में निजीकरण ही किया जाये। उन्होंने ब्रिटेन में रेलवे के निजीकरण के नकारात्मक उदाहरण और फ्रांस, जरमनी तथा कुछ और यूरोपीय देशों में रेलवे के निजीकरण के खिलाफ़ हुये संघर्ष के सकारात्मक उदाहरणों पर विस्तार से बात की। इन देशों में रेलवे के मज़दूरों ने रेल सेवा का इस्तेमाल करने वाले आम मज़दूरों का निजीकरण के खिलाफ़ अपने संघर्ष में सफलतापूर्वक समर्थन जुटाया। उन्होंने अपने देश में पानी और बिजली के निजीकरण के खिलाफ़ लोगों के संघर्ष के बारे में भी विस्तारपूर्वक बताया। उन्होंने जोर दिया कि यह ज़रूरी है कि जन सेवाओं के निजीकरण के देश-विरोधी और समाज-विरोधी स्वभाव को उजागर किया जाये। अंत में उन्होंने ध्यान दिलाया कि रेलवे में निजीकरण को रोकने वाला मुख्य कारक रेलवे मज़दूरों का विरोध है।

कॉन्फेडरेशन ऑफ सेन्ट्रल गवर्नमेंट इंप्लॉइज़ एण्ड वर्कर्स के महासचिव कॉमरेड एम. कृष्णन ने ध्यान दिलाया कि रेलवे के निजीकरण पर गौर करने के लिये सरकार द्वारा गठित पिछली सभी समितियों की सिफारिश रही है कि सहायक और समर्थक सेवाओं का निजीकरण किया जाये। देबरॉय समिति ने भारतीय रेल के सबसे महत्वपूर्ण भाग के निजीकरण का प्रस्ताव रखा है, यानी कि रेलगाड़ियों का संचालन। इस सिफारिश पर विस्तार करते हुए, उन्होंने ध्यान दिलाया कि ‘रेलवे की गठरी खोलने’ के नाम पर इसके अंग-अंग का निजीकरण किया जा रहा है।

बी.एस.एन.एल. इंप्लॉइज़ यूनियन के पुराने वरिष्ठ संस्थापक और नेता, कॉमरेड वी.ए.एन. नम्बूदरी ने रेल मज़दूरों को बी.एस.एन.एल. के मज़दूरों का समर्थन दिया। कॉमरेड नम्बूदरी ने ध्यान दिलाया कि नीति आयोग ने बी.एस.एन.एल. सहित, 70 से भी अधिक सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों के निजीकरण की सिफारिश की है। उन्होंने बी.एस.एन.एल. के मज़दूरों के निजीकरण-विरोधी संघर्ष के बारे में विस्तार से बताया। इस संघर्ष के अनुभव से, मज़दूर अपने खुद के निष्कर्षों पर पहुंच रहे हैं कि कौन सी यूनियनें उनके हित में काम करती हैं और कौन सी यूनियनें अधिकारियों की भाषा बोलती हैं। ऐसी ही समझ रेलवे के मज़दूरों के बीच भी बनेगी।

चेन्नई से कॉमरेड अब्दुल सलाम ने इंडियन रेलवेज़ टेक्निकल सुपरवाइसर्स एसोसियेशन की तरफ से बात रखी। उन्होंने 2015 में आई चेन्नई की बाढ़ और हाल के जल्लीकट्टू आंदोलन के दौरान रेलवे मज़दूरों की भूमिका पर ध्यान दिलाया, जो यह दिखाता है कि रेलवे के मज़दूर हमेशा जनसेवा में अपना योगदान देने के लिये तैयार रहते हैं। उन्होंने विश्वास जताया कि हिन्दोस्तान के लोग मौजूदा व्यवस्था का विकल्प पाने के लिये उत्सुक हैं।

ऑल इंडिया स्टेशन मास्टर्स एसोसियेशन के अध्यक्ष कॉमरेड आर.के. उन्नीकृष्णन ने कहा कि उनका संगठन रेलवे मज़दूरों की दूसरी यूनियनों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर निजीकरण के खिलाफ़ सांझे संघर्ष में खड़ा है। निजीकरण के खिलाफ़ सबसे व्यापक एकता बनाने के लिये, इस सम्मेलन द्वारा शुरू की गयी किसी भी पहलकदमी में ए.आई.एस.एम.ए. पूरी तरह शामिल होगा।

मज़दूर एकता कमेटी (एम.ई.सी.) की तरफ से कॉमरेड प्रकाश राव ने इस महत्वपूर्ण सम्मेलन के आयोजन के लिये रेलवे मज़दूरों की पहलकदमी की प्रशंसा की। उन्होंने बताया कि निजीकरण का सिलसिला मॉडर्न फूड्स लिमिटेड और बाल्को के निजीकरणों से शुरू किया गया था। एम.ई.सी. के नेतृत्व में मॉडर्न फूड्स के मज़दूरों ने निजीकरण के खिलाफ़ एक बहादुर संघर्ष लड़ा था। मज़दूरों ने विरोध प्रदर्शन व रैलियां कीं, 500 से भी अधिक दिन धरने पर बैठे और निजीकरण की सफाई में सरकार द्वारा दी गयी कपटी दलीलों का पर्दाफाश किया। जब सरकार ने घोषणा की कि सरकार का काम ब्रेड बनाना नहीं है, तो मज़दूरों ने सरकार से पूछा, “तो क्या है सरकार का काम?” हमने मॉडर्न फूड्स के निजीकरण को न्यायालय में चुनौती दी और ध्यान दिलाया कि ऐसा करना संविधान के नीति निदेशक तत्वों का उल्लंघन है। न्यायालय का जवाब था कि निजीकरण “एक नीतिगत मामला” है जिसे लागू करने के लिये सरकार को पूरी छूट है। कॉमरेड प्रकाश राव ने जोर दिया कि मज़दूरों को इससे उचित सबक लेना चाहिये कि वे न्यायालयों या देश के संविधान के भरोसे नहीं रह सकते।

निजीकरण के खिलाफ मॉडर्न फूड्स और बाल्को के संघर्ष का नतीजा था कि 2004 में आने वाली संप्रग सरकार को विनिवेश मंत्रालय को बंद करना पड़ा। हमने मांग रखी कि निजीकरण को वापस लिया जाये। परन्तु हमें इस कड़वे सच को मानना पड़ेगा कि संप्रग सरकार नये-नये तरीकों से निजीकरण को जारी रखने में कामयाब रही क्योंकि संसद के 60 कम्युनिस्ट सदस्यों ने एक “सांझे न्यूनतम कार्यक्रम” के ज़रिये, संप्रग सरकार के साथ मिलकर काम करने का रास्ता चुना।

अगर हम अपनी ज़िन्दगी के अनुभवों का सच्चाई के साथ मूल्यांकन करें तो हमें यह मानना पड़ेगा कि ऐसा कोई रास्ता नहीं हो सकता जो पूंजीवादी शोषकों और मज़दूर वर्ग, दोनों के लिये हितकारी हो।

हमारे देश में, बड़े इज़ारेदार पूंजीपति अजेंडा तय करते हैं। “समाजवादी नमूने का समाज”, जिसकी बात पिछले एक वक्ता ने की थी, उसका अजेंडा किसने तय किया था? अगर हमें सच कहना है तो कहना होगा कि टाटा, बिरला और कुछ अन्य पूंजीपति ही थे, जिन्होंने टाटा-बिरला प्लान के नाम से प्रसिद्ध एक दस्तावेज़ 1945-46 में तैयार किया था। उस योजना का मकसद था इज़ारेदार पूंजीपतियों को मालामाल करना और मज़दूर वर्ग को इस झांसे में रखना कि यह योजना उनके हित में है। इसी योजना को कांग्रेस पार्टी ने अपनाया था।

हम कह रहे हैं “रेल बचाओ, देश बचाओ”, बी.एस.एन.एल. के मज़दूर कह रहे हैं “बी.एस.एन.एल. बचाओ, देश बचाओ”। अब वक्त आ गया है कि हम मज़दूर हिन्दोस्तान को शासक वर्ग द्वारा अपनाये गये ख़तरनाक देश-विरोधी रास्ते से बचाने का लक्ष्य अपनायें। अगर हम हिन्दोस्तान को बचाते हैं तो हम रेलवे को तथा और बाकी सभी चीजों को बचा सकेंगे।

हिन्दोस्तान को क्रांति की ज़रूरत है। आप जैसे मज़दूरों को इसके लिये नेतृत्व देना होगा। 1857 के महान ग़दर में बागियों ने चपातियों और कमल के फूलों को संकेत देने के लिये इस्तेमाल किया था। आज, अगर हम रेलवे मज़दूर एक छोटा सा पर्चा निकालते हैं और उसे रेल में सफर करने वाले यात्रियों को बांटते हैं तो सोचिये कि कितनी तेज़ी से अपना संदेश लोगों तक फैलाया जा सकता है। हमें लोगों को समझाना है कि रेलवे का निजीकरण देश के हित के विपरीत है, समाज के हित के विपरीत है। अंत में कॉमरेड प्रकाश राव ने कहा कि एम.ई.सी. सभी मज़दूर यूनियनों की एकता बनाने के काम में जुटी है।

ऑल इंडिया गार्डस् कौंसिल के महासचिव, कॉमरेड ए.के. श्रीवास्तव ने घोषणा की कि भारतीय रेल के गार्ड निजीकरण के खिलाफ़ बिन-समझौते संघर्ष के लिये वचनबद्ध हैं। उन्होंने नोटबंदी, जिसकी वजह से ठाणे जिले और मुंबई में लाखों लोगों के रोज़गार का विनाश हुआ, सहित मोदी सरकार के मज़दूर-विरोधी, जन-विरोधी

रास्ते की निंदा की। उन्होंने घोषणा की कि हिन्दोस्तान का मज़दूर वर्ग और लोग सरमायदारों द्वारा अपनाये रास्ते से बगावत करने के लिये उठ खड़े होंगे।

डी.आर.ई.यू. के महासचिव, कॉमरेड मैथ्यू साइरियक ने सम्मेलन का समापन वक्तव्य दिया। उन्होंने जोर दिया कि रेलवे के मज़दूरों का आज़ादी की लड़ाई में सुनहरा इतिहास रहा है। उन्होंने सरकार द्वारा अपनाये गये रास्ते की निंदा की और सभी रेलवे मज़दूर यूनियनों तथा सभी दूसरे मज़दूर वर्ग संगठनों को बुलावा दिया कि इसका करारा जवाब दें। वक्तव्य के अंत में उन्होंने सम्मेलन के संकल्प पढ़े।

डी.आर.ई.यू. के कॉमरेड जानकीरामन ने धन्यवाद प्रस्ताव के साथ सम्मेलन का समापन किया।

Tag:    Defeat Privatisation    Feb 16-28 2017    Struggle for Rights    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)