2017-18 का केन्द्रीय बजट

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:50

पूंजीपतियों की लालच को पूरा करना और लोगों की लूट को बढ़ाना

वित्त मंत्री जेटली ने 2017-18 के केन्द्रीय बजट को ग़रीब-परस्त और किसान-परस्त बजट बतौर प्रस्तुत किया। परंतु इसका असली मकसद कई टैक्स, खर्च और नीति संबंधी कदमों के ज़रिये पूंजीपतियों के मुनाफ़ों को बढ़ाना है।

पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के कदम

वित्त मंत्री ने घोषणा की कि सरकार मौजूदे श्रम कानूनों को चार सांकेतिक खंडों में बांटकर उन्हें और आसान बनाने, युक्तिगत और सम्मिलित करने के लिए वैधानिक सुधार शुरू करने जा रही है। अब तक इनमें जो भी सुधार लाये गये हैं, उन सुधारों के ज़रिये मज़दूरों को उनके लंबे व कठिन संघर्षों से जीते गए अधिकारों से वंचित किया गया है, ताकि पूंजीपति दुनिया की किसी भी और जगह की तुलना में, हिन्दोस्तान में अधिक मुनाफे़ कमा सकें।

बजट में घोषणा की गई कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को 10,000 करोड़ रुपये का अतिरिक्त समर्थन दिया जायेगा ताकि पूंजीपतियों द्वारा न चुकाये गये कर्ज़ों से होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सके।

श्री जेटली ने विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड को रद्द करने की घोषणा की है, ताकि विदेशी पूंजीवादी कंपनियों को हिन्दोस्तान में निवेश करने की और ज्यादा छूट मिले। बीमा, पेंशन फंड, परिसंपत्ति पुनर्निर्माण कंपनियों और स्टॉक एक्सचेंज क्षेत्रों में विदेशी निवेश की नीति में और उदारीकरण करने की योजना बनायी जा रही है। यह प्रस्तावित किया जा रहा है कि हिन्दोस्तान में उत्पन्न खाद्य पदार्थों की बिक्री में 100 प्रतिशत विदेशी मालिकी की इजाज़त दी जाये।

सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का निजीकरण और तेज़ी से किया जायेगा। जबकि वर्तमान वर्ष में 45,000 करोड़ रुपये के विनिवेश का लक्ष्य है, तो आगामी वर्ष के लिए विनिवेश का अब तक का सबसे अधिक लक्ष्य, 72,500 करोड़ रुपये निर्धारित किया गया है।

भारतीय रेल की तीन कंपनियों - भारतीय रेल खानपान व पर्यटन निगम, भारतीय रेल वित्त निगम और इरकॉन इंटरनेशनल लिमिटेड - का आंशिक निजीकरण करने तथा जनरल इंश्योरेंस कंपनियों को स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध करने का प्रस्ताव रखा गया है। मोटरगाड़ी एक्ट में सुधार लाया जायेगा ताकि सड़क परिवहन के क्षेत्र में निजी ऑपरेटरों को और अधिक इजाज़त दी जा सके। दूसरे दर्जे के शहरों में गिने-चुने हवाई अड्डों को, संचालन और रखरखाव के लिए, पी.पी.पी. मॉडल के तहत पूंजीपतियों को सौंपा जायेगा।

छूट” की जोर-शोर से बात करना और चुपचाप जनता को लूटना

वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में कहा कि हिन्दोस्तान में टैक्स और सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात बहुत कम है और सामाजिक न्याय के नज़रिये से, प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष टैक्स का अनुपात सही नहीं है।”

अप्रत्यक्ष टैक्सों से ग़रीब मेहनतकश परिवारों द्वारा नियमित तौर पर बाज़ार से खरीदी जाने वाली वस्तुओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। मेहनतकश लोगों से अधिक से अधिक वसूलना और धनवानों से बहुत कम टैक्स लेना अवश्य ही सही नहीं है। इस समस्या को हल करने के लिये अप्रत्यक्ष टैक्सों का बोझ कम करना होगा, क्योंकि यह ग़रीब परिवारों के लिये बहुत भारी हो जाता है। परन्तु सरकार प्रत्यक्ष टैक्सों के ज़रिये और धन जुटाना चाहती है, न कि अप्रत्यक्ष टैक्सों के बोझ को घटाना।

जैसा कि तालिका 1 में दिखाया गया है, केन्द्रीय बजट में वर्तमान वर्ष में, व्यक्तिगत आयकर से और 88,000 करोड़ रुपये, केन्द्रीय अप्रत्यक्ष टैक्सों से और 75,000 करोड़ रुपये तथा पूंजीवादी कंपनियों से लिये गये कॉरपोरेट टैक्स से मात्र 45,000 करोड़ रुपये वसूलने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

केन्द्र सरकार द्वारा लगाये गये अप्रत्यक्ष टैक्सों में कस्टम्स, आबकारी ड्यूटी और सेवा कर शामिल हैं। राज्य सरकारें वैट और अन्य अप्रत्यक्ष टैक्स वसूलती हैं। परिवार की आमदनी की तुलना में, अप्रत्यक्ष टैक्सों का बोझ ग़रीब परिवारों के लिये ज्यादा भारी होता है। इसका यह कारण है कि कम आमदनी वाले परिवारों में आमदनी का ज्यादा बड़ा हिस्सा उपभोग की वस्तुओं और सेवाओं पर खर्च किया जाता है। ऊंची आमदनी वाले परिवार अपनी आमदनी का बड़ा हिस्सा शेयर, बांड, जमा धन, सोना, इत्यादि जैसे बचत के साधनों में रखते हैं, जिन पर अप्रत्यक्ष टैक्स नहीं लगता है।

आयकर से टैक्स वसूली में जिस वृद्धि का लक्ष्य निर्धारित किया गया है, उसकी उम्मीद मुख्यतः इस बात से की जा रही है कि अब अधिक लोगों को चेक से वेतन मिलेगा और आयकर वापसी भरनी पड़ेगी। कॉरपोरेट टैक्स में वृद्धि की उम्मीद आगामी वर्ष में पूंजीवादी कंपनियों के बढ़ते मुनाफ़ों से की जा रही है।

वित्त मंत्री जेटली ने प्रति वर्ष 2,50,000 रुपए से 5,00,000 रुपए की आमदनी के स्लैब पर आयकर को 10 प्रतिशत से 5 प्रतिशत करने की घोषणा की है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इससे राजस्व में 15,500 करोड़ रुपये की कमी होगी। प्रतिवर्ष 5,00,000 रुपये या उससे अधिक कमाने वाले करदाताओं को इससे प्रतिवर्ष 12,500 रुपये का लाभ होगा। परन्तु अप्रत्यक्ष टैक्सों के बढ़ते बोझ की वजह से इस लाभ का बहुत बड़ा भाग जेब से निकल जायेगा।

किसानों की ज़रूरतों को पूरा करने का दावा फरेबी

श्री जेटली ने किसानों और ग्रामीण जनता की समस्याओं को हल करने के बड़े-बड़े वादे किये हैं परन्तु कृषि और उससे संबंधित कामकाज के लिये बजट में आबंटित धन बहुत कम है।

हमेशा की तरह, इस बार भी केन्द्र सरकार के संसाधनों का सबसे बड़ा हिस्सा लिये गये उधारों पर ब्याज भुगतान और सैन्यीकरण जैसे अनुत्पादक मदों पर खर्च होगा। उत्पादक निवेशों के लिये आबंटित धन में सबसे बड़ी वृद्धि ढांचागत क्षेत्र में है - जिसमें ऊर्जा, परिवहन और दूर-संचार शामिल हैं (तालिका-2)। इससे स्पष्ट होता है कि सरकार हिन्दोस्तानी और विदेशी इज़ारेदार पूंजीपतियों की मांगें पूरी करने पर वचनबद्ध है, क्योंकि ये इज़ारेदार पूंजीपति अपने मुनाफ़े की दरों को तेज़ी से बढ़ाने के इच्छुक हैं। हमेशा की तरह, इस बार भी मज़दूरों और किसानों की मूल ज़रूरतों को पूरा करने के लिये “बहुत कम पैसा बचता है”।

2017-18 के बजट में फसल बीमा और प्रधानमंत्री मुद्रा योजना समेत अनेक योजनाओं पर खर्च बढ़ाये जाने के बजाय वास्तव में घटाये जा रहे हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना के लिये आबंटित धन को 2,135 करोड़ रुपये से घटाकर 1,040 करोड़ रुपये कर दिया गया है। फसल बीमा योजना पर खर्च को 13,240 करोड़ रुपये (2016-17 का संशोधित अनुमान) से घटाकर 2017-18 के बजट में 9,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है।

जबकि महात्मा गांधी ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (मनरेगा) के लिये आबंटित 48,000 करोड़ रुपये को वित्त मंत्री ने बीते वर्ष के बजट लक्ष्य की तुलना में बहुत बड़ी छलांग बताया, तो वास्तव में वह 2016-17 के असली अनुमानित खर्च के लगभग बराबर ही है।

वित्त मंत्री ने वादा किया है कि अगले वर्ष कृषि उधार के लिये आबंटित धन को बढ़ाकर 10 लाख करोड़ किया जायेगा। परन्तु बैंकों से ज्यादा उधार लेने से किसान और भारी कर्जे़ के बोझ तले दब जायेंगे। किसानों के कर्ज़भार को कम करने के लिये मात्र 15,000 करोड़ रुपये आबंटित किये गये हैं जो कि बेहद कम है।

पार्टी फंडिंग में “स्वच्छता लाने” के नाम पर भ्रष्टाचार को डिजिटाइज़ करने की कोशिशें

बजट भाषण में वित्त मंत्री ने कुछ ऐसे कदमों की घोषणा की जिनका तथाकथित मकसद राजनीतिक पार्टियों के फंडिंग की व्यवस्था में स्वच्छता लाना बताया गया है। एक ऐसा कदम है पार्टियों को गैर दस्तावेज़ी स्रोतों से नगदी दान की सीमा को प्रतिदान 20,000 रुपये से 2000 रुपये तक घटा दिया जाना। एक और कदम है चुनावी बांड” नामक एक नये वित्तिय साधन की रचना। कोई भी पूंजीपति किसी निर्धारित बैंक से चुनावी बांड खरीदकर उसे किसी राजनीतिक पार्टी को दान दे सकता है।

वर्तमान व्यवस्था में एक बड़ी समस्या यह है कि चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाले धनबल में बहुत असमानता है। बड़े पूंजीपति जिन पार्टियों का समर्थन करते हैं, उन्हें सैकड़ों करोड़ों रुपयों का दान देते हैं। उन्हीं पूंजीपतियों के अपने कई टीवी चैनल होते हैं जिनमें उन पार्टियों का दिन-रात प्रचार होता है। मज़दूरों और किसानों के हितों के लिये लड़ने वाली पार्टियों की अपेक्षा, ऐसी पार्टियों को बहुत ज्यादा नाजायज़ फायदा मिलता है।

बजट में जो कदम उठाये गये हैं, उनका उद्देश्य इस बड़ी समस्या को हल करना नहीं है। उन कदमों का उद्देश्य है ऐसी व्यवस्था बनाना ताकि पूंजीवादी कंपनियां और आसानी से, कानूनी तरीके से और नगदी के बिना, राजनीतिक पार्टियों और उनके चुनाव अभियानों के लिये बड़ा-बड़ा योगदान दे सकेंगी तथा उन दानों के लिये टैक्स छूट का दावा भी कर सकेंगी। चुनावी बांडों की रचना इसलिये की जा रही है ताकि पूंजीपति, किस पार्टी का समर्थन कर रहे हैं, वह सार्वजनिक किये बिना ऐसा योगदान दे सकेंगे।

 

Tag:    Defeat Privatisation    Feb 16-28 2017    Political-Economy    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

(Click thumbnail to download PDF)

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)

ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

(PDF दस्तावेज को डाउनलोड करने के लिए कवर चित्र पर क्लिक करें)