गुजरात जनसंहार के 15 वर्ष

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 01:58

हिन्दोस्तानी राज्य के सांप्रदायिक स्वभाव का खुलेआम पर्दाफाश

गुजरात में राज्य द्वारा आयोजित जनसंहार के बाद 15 वर्ष गुज़र गये हैं। हालांकि हिन्दोस्तान और विदेश में तरह-तरह के निहित स्वार्थों ने उस मुद्दे को दरकिनार करने और भुला देने की खूब कोशिश की है, परंतु पीड़ितों को इंसाफ न मिलना आज भी एक ज्वलंत विषय बना हुआ है। उस जनसंहार के पीड़ित लोग तथा सभी ज़मीर वाले पुरुष और महिलाएं आज भी सच्चाई को सामने लाने और इंसाफ दिलाने की मांग को उठाते आ रहे हैं।

अब तक कुछ बातें निर्विवादित रूप से स्थापित हो चुकी हैं :

  • हथियारबंद गिरोहों ने पेट्रोल बम और त्रिशूलों से लैस होकर, मुसलमानों के घरों और दुकानों को लूटा और जलाया था। पुरुषों और नौजवान लड़कों का कत्ल किया था। महिलाओं और जवान लड़कियों का बलात्कार किया था।
  • कम से कम दो महीने पहले से सांप्रदायिक जनसंहार के लिए तैयारी शुरू हो गयी थी। वोटरलिस्ट के आधार पर अहमदाबाद और अन्य शहरों में मुसलमानों के नाम और पतों की जानकारी ली गई थी। गुंडों को देने के लिए पेट्रोल और दूसरे हथियार इकट्ठे किये गये थे।
  • 28 फरवरी, 2002 को गोधरा रेलवे स्टेशन पर अयोध्या से वापस आते हुए 58 कारसेवकों को ट्रेन के अंदर जिंदा जला दिया गया था। यह पता लगाये बिना ही कि ट्रेन को कैसे आग लगी, स्थानीय मुसलमानों को उसके लिए दोषी ठहराया गया और गुजरात में सत्ता पर बैठी भाजपा ने बदला लेने का नारा दिया।
  • तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐलान किया कि हर क्रिया की समान प्रतिक्रिया होती है” उनकी अगुवाई में राज्य सरकार ने गोधरा में मारे गये कारसेवकों की लाशों की, गोधरा से अहमदाबाद तक, परेड आयोजित की।
  • कुछ ही दिनों के अंदर हजारों का कत्लेआम किया गया, लाखों-लाखों लोग बेघर शरणार्थी बन गये, दसों-हजारों बच्चे अनाथ बन गये। वरिष्ठ पुलिस अफ़सरों और अधिकारियों को आदेश दिया गया था कि प्रतिक्रिया” को पूरी इजाज़त दी जाये और कातिलाना गिरोहों से पीड़ितों की रक्षा न की जाये।
  • कुछ ही हफ्तों बाद गुजरात विधानसभा के चुनावों में खुलेआम हिन्दू उग्रधार्मिक मंच पर, भाजपा बहुमत से जीती।
  • इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि लोगों की हत्या के लिए खुफिया एजेंसियों की नाकामयाबी” का बहाना सरासर झूठा है। अहमदाबाद और नई दिल्ली की सरकारें अगर चाहतीं तो उस सांप्रदायिक हिंसा को रोक सकतीं थीं। पास ही, पाकिस्तान की सीमा पर सेना की कई टुकड़ियां तैनात थीं। यह स्पष्ट है कि कमान पर बैठे अधिकारियों ने लगातार कई दिनों तक सांप्रदायिक कातिलाना गिरोहों को खुली छूट दे दी थी। राज्य की पुलिस मूक दर्शक बनी रही, हमलावर गिरोहों की मदद करने के लिए तैयार रही परंतु पीड़ितों की रक्षा करने के लिए नहीं।

2002 में गुजरात में हुई सांप्रदायिक हिंसा कामयाब नहीं होती अगर उस राज्य में तथा हिन्दोस्तान में सत्ता पर बैठी ताक़तें उसे रोकना चाहतीं। खुफिया एजेंसियों की नाकामयाबी” की बात करना या उसे एक सांप्रदायिक दंगा कहना, बदले की स्वतः स्फूर्त प्रतिक्रिया की छवि पेश करना - ये सब इस बुनियादी सच्चाई को छुपाने के असफल प्रयास हैं, कि उस जनसंहार से हिन्दोस्तान के शासकों को फायदा हुआ। न सिर्फ भाजपा को राज्य विधानसभा में बहुमत से जीतकर सरकार बनाने का लाभ हुआ, बल्कि मज़दूर वर्ग और मेहनतकशों को राजनीतिक तौर पर गुमराह करके व बांटकर, बड़े पूंजीपतियों के शासक वर्ग को लाभ हुआ। भटकाववादी, बंटवारे की सांप्रदायिक राजनीति की आड़ में, बड़े पूंजीपतियों ने पूंजीवादी सुधारों के दूसरे दौर को लागू किया और ज्यादा हमलावर तरीके से निजीकरण तथा घरेलू व अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के और भी पूर्ण रूप से उदारीकरण को बढ़ावा दिया।

गुजरात जनसंहार से लगभग 20 वर्ष पहले से, हिन्दोस्तान में बड़े पैमाने पर आयोजित सांप्रदायिक हिंसा के कांड बार-बार तथा जल्दी-जल्दी होने लगे थे। असम में 1983 का नेल्ली हत्याकांड, दिल्ली और अन्य शहरों में 1984 में सिखों का जनसंहार, 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद हिन्दुओं और मुसलमानों का जनसंहार, इनमें से कुछ बहुत ही बीभत्स कांड थे। गुजरात जनसंहार के बाद भागलपुर, अलीगढ़, मुज्ज़फरनगर, इत्यादि में सांप्रदायिक हिंसा के बहुत सारे कांड हुए हैं।

इन सभी कांडों में कुछ समान तौर-तरीके अपनाये गये हैं। सभी कांडों में राजनीतिक पार्टियां व उनके निर्वाचित प्रतिनिधि हिंसा को आयोजित करने और अंजाम देने में सक्रिय रहे हैं। सरकारी सुरक्षा बलों ने पीड़ितों की रक्षा नहीं की, इत्तफाक से नहीं बल्कि सुनियोजित तरीके से। जनसंहार पूर्व आयोजित थे और पेशेवर क्रूरता के साथ किये गये थे। सरकारी प्रचार के अनुसार, लोगों पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया गया जबकि राज्य और उसके अधिकारियों को ‘मसीहों’ के रूप में पेश किया गया जो सांप्रदायिक सद्भावना बहाल करने की तथाकथित कोशिश कर रहे थे।

बीते 15 वर्षों में कांग्रेस पार्टी और भाजपा ने बारी-बारी से केन्द्र में राज्य सत्ता को संभाला है। हरेक पार्टी ने दूसरे को उसके अपराधों के लिए सज़ा देने का वादा किया है। कई जांच आयोग बिठाये गये हैं तथा कई विशेष जांच दल (एस.आई.टी.) बनाये गये हैं, जिन्होंने कई सालों तक काम करके लंबी-लंबी रिपोर्टें दी हैं। परंतु आज तक सिर्फ कुछ निचले दर्जे़ के अफसर और एक नेता (जिसकी वर्तमान में कोई राजनीतिक भूमिका नहीं रह गयी है) को सज़ा दी गई है। सांप्रदायिक हिंसा के प्रमुख आयोजकों को ऊंचे-ऊंचे राजनीतिक पदों से पुरस्कृत किया गया है।

नवम्बर, 1984 के जनसंहार और 2002 के गुजरात के जनसंहार के बीच बहुत समानता है। दोनों कांडों में एक रहस्यमय घटना होती है, जो हत्याकांड शुरू करने का बहाना बन जाती है। 1984 में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या वह घटना थी। 2002 में गोधरा में ट्रेन की बोगी में आग लगना वह घटना थी। विदित है कि दुनियाभर में इसी प्रकार की रहस्यमय घटनाओं को सांप्रदायिक धर्मयुद्ध और साम्राज्यवादी जंग छेड़ने का बहाना बनाया जा रहा था। 21वीं सदी की शुरुआत न्यूयार्क में 11 सितम्बर, 2001 के आतंकवादी हमले के साथ हुई थी, जिसे अफगानिस्तान और इराक पर अमरीका की अगुवाई में की गई जंगों का बहाना बनाया गया था।

बर्तानवी उपनिवेशवादी काल से लेकर उसके बाद के हिन्दोस्तान में आज तक, सांप्रदायिक हत्याकांडों का इतिहास यह दिखाता है कि सांप्रदायिक तौर पर लोगों को बांटना, एक-एक समुदाय को निशाना बनाकर, उस पर हमला करना और अलग-अलग समुदायों को एक-दूसरे के खिलाफ़ भिड़ाना, यह सत्ता चलाने वाले शोषक अल्पसंख्यक वर्ग के शासन का पसंदीदा तरीका है। बर्तानवी राज्य ने “बांटो और राज करो“ की रणनीति को सुनियोजित तरीके से विकसित किया था। पूंजीवादी इज़ारेदार घरानों की अगुवाई में, हिन्दोस्तानी शासक वर्ग ने उसी रणनीति को विरासत में पाया है, उसका पोषण करके उसे और विकसित किया है।

ऐतिहासिक अनुभव से एक अहम सबक यह है कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का स्रोत लोगों के किसी तबके में या उनके धार्मिक विचारों में नहीं है। सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का स्रोत हिन्दोस्तानी राज्य के सांप्रदायिक व बंटवारा करने वाले स्वभाव और सत्तारूढ़ वर्ग के शोषक व समाज-विरोधी स्वभाव में है। राज्य में एक या दूसरी पार्टी या गठबंधन के नियंत्रण में कार्यकारिणी, विधिपालिका, न्यायपालिका और कानून व व्यवस्था लागू करने वाले सभी दमनकारी बल शामिल हैं। बड़े सरमायदार इस राज्य पर नियंत्रण करते हैं और मेहनतकश बहुसंख्या को बांटकर उन पर शासन करने के लिए राज्य का इस्तेमाल करते हैं।

इस सांप्रदायिक राज्य को चलाने वाली पार्टियों को सांप्रदायिक और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों में बांटने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बड़े सरमायदार अपनी मीडिया के ज़रिये ऐसी धारणाएं फैलाते हैं ताकि लोग इस या उस प्रमुख सरमायदार पार्टी के पीछे लामबंध हो जायें।

इतिहास बहुत भली-भांति साबित करता है कि भाजपा और कांग्रेस पार्टी, दोनों ही लोगों को बांटने और वर्तमान व्यवस्था की गुलाम बनाकर रखने के लिए, सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा का इस्तेमाल करती हैं। इनमें से एक खुलेआम सांप्रदायिक है जबकि दूसरी छुपे रूप से सांप्रदायिक है। परंतु दोनों धर्मनिरपेक्षता की कसम खाती हैं। वे दोनों बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों की अगुवाई में, पूंजीपति वर्ग की पार्टियां हैं। आपस में कभी सहयोग करना तो कभी टकराना, यह उनका स्वभाव है। मज़दूर वर्ग, किसानों और सांप्रदायिकता व सांप्रदायिक हिंसा के अन्य पीड़ितों को भाजपा और कांग्रेस पार्टी की आपसी दुश्मनी में इस या उस पक्ष का साथ देने से कोई फायदा नहीं होगा बल्कि भारी नुकसान ही होगा।

राज्य द्वारा आयोजित सांप्रदायिक हिंसा का बार-बार आयोजित किया जाना और गुनहगारों को कभी सज़ा न दिया जाना, यह उस झूठ का पर्दाफाश करता है कि हिन्दोस्तान का संविधान धर्मनिरपेक्ष बुनियादों पर आधारित है। हमें बार-बार कहा जाता है कि हमारा संविधान सांप्रदायिकता के खिलाफ़ है, कि समस्या कुछ लोगों और पार्टियों के रूढ़िवादी विचारों में है। वास्तव में, संविधान में हिन्दोस्तानी समाज को हिन्दू बहुसंख्या और अनेक धार्मिक अल्पसंख्यकों से बना हुआ माना गया है, जो कि सांप्रदायिक नज़रिये पर आधारित है। संविधान में वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था को वैधता दी गई है, जिसके चलते, सत्ता में बैठी ताक़तें बलपूर्वक सांप्रदायिक हिंसा आयोजित करती हैं और उन्हें कभी सज़ा नहीं मिलती।

बांटो और राज करो की उपनिवेशवादी विरासत को खत्म करने के इच्छुक लोगों की क्रांतिकारी एकता बनाना ही इस स्थिति को बदलने का एकमात्र रास्ता है। हमारे जीवन के अनुभव ने बार-बार दिखाया है कि मौजूदे चुनावी प्रक्रिया के ज़रिये शासक पार्टी को बदलने से कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं होता है। हमारे अनुभव ने यह भी दिखाया है कि जो भी पार्टी मौजूदे चुनावी प्रक्रिया के ज़रिये अपने हाथों में सत्ता लेना चाहती है, वह बड़े सरमायदारों की बांटो और राज करो की रणनीति का हिस्सा बन जाती है।

कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मज़दूर वर्ग और सभी उत्पीड़ित लोगों को एक ऐसा नया राज्य व राजनीतिक प्रक्रिया स्थापित करने के उद्देश्य से अगुवाई दे रही है, जिसमें संप्रभुता लोगों के हाथ में होगी, न कि किसी पार्टी या गठबंधन के हाथ में। अपने हाथों में राज्य सत्ता लेकर, मेहनतकश लोग यह सुनिश्चित कर सकेंगे कि अर्थव्यवस्था लोगों की बढ़ती ज़रूरतों को पूरा करने की दिशा में चलायी जाये, न कि बड़े पूंजीपतियों की लालच को पूरा करने के लिए। ऐसा राज्य सुनिश्चित करेगा कि सांप्रदायिक हत्याकांड और हमारे लोगों के खिलाफ़ इस प्रकार के दूसरे भयानक अपराधों को आयोजित करने वाले गुनहगारों को फौरन कड़ी से कड़ी सज़ा दी जायेगी, ताकि कोई भी लोगों के अधिकारों का हनन करने की हिम्मत न कर सके। हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के इस राजनीतिक लक्ष्य और कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट होना मजदूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों के हित में है, ताकि सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।

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Feb 16-28 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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