सैनिक राज और नाकेबंदी के चलते मणिपुर में चुनाव कराना लोगों का अपमान है!

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 02:03

मज़दूरों और किसानों की हुकूमत और स्वेच्छा पर आधारित हिन्दोस्तानी संघ के लिये संघर्ष करें!

मणिपुर विधानसभा चुनाव के अवसर पर हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का आह्वान, 11 फरवरी, 2017

मणिपुर की 60 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव के लिये निर्वाचन आयोग ने 4 और 8 मार्च की तारीख तय की है। चुनाव प्रक्रिया एक असाधारण मुश्किल परिस्थिति में हो रही है जब केन्द्रीय सशस्त्र बलों के आंतक वाले फासीवादी राज के साथ-साथ लंबे अरसे से चल रही नाकेबंदी और नोटबंदी का भी दुष्प्रभाव है।

अपनी ही धरती पर अपराधी माने जाने के अलावा मणिपुर के लोगों को आज ज़रूरी दवाइयों व खाद्य सामग्रियों के घोर अभाव का सामना करना पड़ रहा है। यह युनाइटेड नगा कौंसिल द्वारा पिछले तीन महीनों से आयोजित आर्थिक नाकेबंदी का नतीजा है। न तो कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व की राज्य सरकार ने और न ही केन्द्र की भाजपा के नेतृत्व की सरकार ने समस्याओं का समाधान करके, वस्तुओं की सप्लाई की व्यवस्था को सामान्य बनाने की कोशिश की है। वे बड़े सुनियोजित तरीके से इस परिस्थिति का इस्तेमाल करके नगाओं, मैतियों व अन्य लोगों को आपस में बांटने की राजनीति के ज़रिये अपने वोट बैंक बनाने में लगे हैं।

सैनिक राज, फासीवादी कानून सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए.) और हाल की आर्थिक नाकेबंदी की परेशानी के साथ-साथ नोटबंदी ने नकदी की तंगी पैदा करके बहुत से लोगों की आर्थिक बरबादी और दुखों को बढ़ाया है। बैंक, जो राजधानी के बाहर बहुत दूर-दूर हैं, उनके सामने हर दिन लंबी लाइनें लगी रहती हैं। बहुत सी महिलाएं जो सब्ज़ियां बेचकर अपनी जीविका कमाती थीं, अब अपनी जीविका खो बैठी हैं।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी मौजूदा हालातों में विधानसभा चुनाव कराने के निर्णय को मणिपुर के लोगों का अपमान और उनके लोकतांत्रिक अधिकारों पर और भी बड़ा हमला मानकर इसकी निन्दा करती है!

विधानसभा चुनाव कराने का तथाकथित मकसद है जनमत को जानना। इसमें लोगों को फैसले लेने के सबसे ऊंचे निकाय में अपने प्रतिनिधियों को चुनने के लिये शामिल होना चाहिए। मणिपुर में अधिकतर लोग जानते हैं कि विधानसभा सर्वोच्च फैसले लेने वाला निकाय नहीं है।

बीते समय में जब विधानसभा के सभी सदस्यों ने ए.एफ.एस.पी.ए. को रद्द करने की एकमत से मांग की थी तब ऐसा नहीं किया गया क्योंकि केन्द्र सरकार नहीं चाहती थी कि “अपने सैनिकों के मनोबल पर बुरा असर पड़े”। केन्द्र सरकार के लिये उनके सैनिकों का मनोबल ज्यादा महत्वपूर्ण है, न कि मणिपुर के लोगों के जीने के अधिकार सहित उनके मानव अधिकारों की रक्षा।

ऐसी परिस्थिति में, आने वाला चुनाव लोगों में सिर्फ गुस्सा और घृणा ही पैदा कर रहा है। ए.एफ.एस.पी.ए. को रद्द करने और सैनिक शासन को खत्म करने की मांग को लेकर कई संगठन और निर्दलीय उम्मीदवार इस चुनाव में खड़े हो रहे हैं। परंतु हमेशा की तरह, कांग्रेस पार्टी व भाजपा के उम्मीदवार, जिनके पास सबसे ज्यादा धनबल है, वे ही चुनाव में हावी हैं। इनमें से एक या दूसरी पार्टी से अपना टिकट लेने के लिये खुदगर्ज़ राजनेता लाइनें लगा रहे हैं। ऐसी रिपार्टें आ रही हैं कि जैसे ही कांग्रेस पार्टी या भाजपा अपने उम्मीदवारों की एक अधूरी सूची भी निकालती है तो बड़ी संख्या में टिकट न पाने वाले नेता, पुरानी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी से टिकट पाने की आशा में, दल बदल देते हैं।

यह चुनाव पूंजीवादी होड़ का एक खेल है। यह मणिपुर के लोगों के शोषकों, लुटेरों और हत्यारों के बीच कुत्ते-बिल्ली के जैसी लड़ाई है, कि अगले पांच वर्षों के लिये जनता को लूटने का मौका किसे मिलेगा। इसका ”जनमत“ से कोई संबंध नहीं है। मणिपुर के लोगों के बीच फूट डालने और अपने असली दुश्मनों से उनका ध्यान हटाने का यह एक तरीका है। इसका मकसद, तथाकथित जनादेश” प्राप्त निर्वाचित सरकार की आड़ में, केन्द्र की तानाशाही और राजकीय आतंकवाद को वैधता देना है।

मणिपुर के लोग मौजूदा हालातों का समर्थन नहीं करते हैं। वे नहीं चाहते कि “निर्वाचित” सरकार, जिसे तथाकथित जनादेश मिला है, उस दिखावे की आड़ में केन्द्रीय सशस्त्र बलों का राज कायम रहे।

आज वहां पूंजीपति शोषकों की तानाशाही चल रही है, जो बर्तानवी उपनिवेशवादियों की तानाशाही से अलग नहीं है। हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों को किसी के भी राष्ट्रीय हित की फिक्र नहीं है। उनकी फिक्र सिर्फ इलाकों पर अपना कब्ज़ा जमाकर रखने की है ताकि अपने निजी मुनाफ़ों के लिये वे भूमि की लूट और श्रम के शोषण को अधिकतम कर सकें। अपनी लालची साम्राज्यवादी दौड़ में वे राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं, समुदायों और व्यक्तियों के अधिकारों को कुचलने के लिये हमेशा तैयार रहते हैं। हिन्दोस्तान के बड़े पूंजीपतियों की पूर्व की ओर देखो” नीति का उद्देश्य दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों में अपने बाज़ारों व प्रभाव क्षेत्रों को बढ़ाना है, न कि हिन्दोस्तान के पूर्वोत्तर के लोगों की आर्थिक ज़रूरतों को पूरा करना।

हिन्दोस्तान के अंदर विभिन्न राष्ट्रीय मूल व पहचान के लोगों की एकता को तोड़ने की ”फूट डालो और राज करो“ की शासकीय नीति, असलियत में, बाहरी हितों द्वारा हिन्दोस्तान के टुकड़े-टुकड़े करने का ख़तरा बढ़ाती है। अतः यह नयी दिल्ली के शासक और उनकी फूट डालने की राजनीति ही है, जो देश-विरोधी है, न कि मणिपुरी या किसी अन्य लोगों का अपने राष्ट्रीय अधिकारों के लिये जायज़ संघर्ष।

हिन्दोस्तानी उपमहाद्वीप पर बर्तानवी उपनिवेशवादी कब्जे़ के बहुत पहले से ही मणिपुर एक स्वतंत्र राजनीतिक राज्य रहा है। इम्फाल घाटी और आसपास के पहाड़ी इलाकों के लोगों ने अपना राजनीतिक राज्य और संविधान स्थापित किया था। जब नेहरू के नेतृत्व में अंतरिम सरकार ने 21 सितम्बर, 1949 को महाराजा बोधचंद्र सिंह को शिलांग में नज़रबन्द किया था और उनसे जबरदस्ती विलयन के समझौते पर हस्ताक्षर कराये थे, तब मणिपुर के राज्य व संविधान को सोच-समझकर दरकिनार कर दिया गया और सत्ताहीन बना दिया गया।

1950 में, हिन्दोस्तानी गणराज्य के संविधान के अपनाये जाने के बाद, मणिपुर में उपनिवेशवादी राज खत्म नहीं हुआ। हथियारों के बल पर, वहां की जनता पर एक जन-विरोधी शासन को जारी रखा गया है। मणिपुर के लोग इन उपनिवेशवादी हालातों को स्वीकार नहीं करते। वे स्वीकार नहीं करते कि उन्हें ऐसे राजनीतिक अधिकारों से भी वंचित रखा जाये जो अधिकांश हिन्दोस्तानियों को दिये गये हैं।

मणिपुर के एक अशांत इलाका” बने रहने का कारण वहां के लोगों को राष्ट्रीय व लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित रखना तथा उनके मानव अधिकारों का खुल्लम-खुल्ला उल्लंघन करना है। यहां लंबे समय से लगातार चलने वाला लोकतंत्र व राष्ट्रीय मुक्ति के लिये आंदोलन, जिसे हिन्दोस्तानी शासक वर्ग बग़ावत” करार देता है, यह उनके अधिकारों को दबाने का नतीजा है।

हिन्दोस्तानी शासक वर्ग की कांग्रेस पार्टी, भाजपा व अन्य पार्टियां सच्चाई को पलट देती हैं। वे जानबूझकर कारण और प्रभाव को पलटकर पेश करते हैं, जब वे बग़ावत” को कारण बताते हैं और लोगों के अधिकारों को कुचलने के लिये सेना के राज को जायज़ ठहराते हैं।

जब तक ए.एफ.एस.पी.ए. को रद्द नहीं किया जाता और केन्द्रीय सशस्त्र बलों का राज खत्म नहीं किया जाता, तब तक मणिपुर में न लोकतंत्र हो सकता है और न ही सामान्य हालत या शांति बहाल हो सकती है।

मणिपुर के लोगों!

हम लंबे अरसे से हिन्दोस्तानी राज्य के सैनिक फासीवादी राज और समय-समय पर चुनावों के पाखंड से पीड़ित हैं। हम इस परिस्थिति से तंग हो चुके हैं।

हिन्दोस्तान के हर कोने में मज़दूर, किसान, महिलायें और नौजवान मौजूदा व्यवस्था और राज्य से तंग आ चुके हैं। केन्द्र सरकार की हुक्मशाही और मानवीय, लोकतांत्रिक व राष्ट्रीय अधिकारों के हनन के खिलाफ़ कई आंदोलन ज़ोर पकड़ रहे हैं, सिर्फ पूर्वोत्तर में ही नहीं बल्कि तामिलनाडु और कई दूसरे राज्यों में।

हम सभी का संघर्ष एक ही सांझे दुश्मन के खिलाफ़ है - पूंजीवादी इज़ारेदार घरानों के नेतृत्व में हिन्दोस्तानी शासक वर्ग के खिलाफ़। यह संघर्ष मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ, जो पूंजीवादी तानाशाही और साम्राज्यवादी विस्तार का साधन है, उसके खिलाफ़ है। मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ विभिन्न राष्ट्रों का कारागार है और एक उपनिवेशवादी विरासत है। अगर हम सब अपनी ताक़त को मिलाकर संघर्ष करें, तो हम इस दुश्मन को हरा सकते हैं।

किसी भी जन-विरोधी ताक़त द्वारा गुलाम बनाये जाने से इनकार करने का हम मणिपुरी लोगों का गौरवमय इतिहास है। आज वक्त है कि उस क्रांतिकारी परम्परा से प्रेरणा लें और मणिपुर के लोगों तथा हिन्दोस्तान के अन्य सभी दबे-कुचले लोगों के राष्ट्रीय व सामाजिक मुक्ति के संघर्ष में अपना योगदान दें।

काॅमरेड इराबोत के शब्दों और कार्यों को याद करें, जिन्होंने हिन्दोस्तान के मज़दूर वर्ग व किसानों के साथ मणिपुर के लोगों की एकता बनाकर उन्हें संगठित किया था ताकि सांझे दुश्मन को हराया जा सके।

मौजूदा हिन्दोस्तानी संघ, जिसे उपनिवेशवादी नींव पर स्थापित किया गया है, वह हमारा सांझा दुश्मन है। हमें इस संघ को नयी नींव पर पुनर्गठित करना होगा। हमें एक नये संविधान की ज़रूरत है जो इस उपमहाद्वीप में सदियों से बसे हुये सभी राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और लोगों के अस्तित्व और उनके अधिकारों को मान्यता देगा। उसे मणिपुर और अन्य राष्ट्रों के संघ से अलग होने के अधिकार को भी मान्यता देनी होगी। ऐसा एक संघ स्थायी और मज़बूत होगा क्योंकि यह स्वेच्छा पर आधारित होगा।

अपने देश के हर हिस्से में, हर राष्ट्र, राष्ट्रीयता और लोगों में, मज़दूर और किसान आबादी की बहुसंख्या है। हमें मज़दूरों और किसानों के स्वेच्छा पर आधारित संघ की स्थापना करनी होगी जो सभी की खुशहाली और सुरक्षा दिलाने के लिये वचनबद्ध हो। सभी लोगों की संस्कृतियां और भाषाएं फलनी-फूलनी चाहियें; और अंग्रेजी भाषा की अहम भूमिका का अंत किया जाना चाहिये। ऐसे संघ में हरेक राष्ट्र, राष्ट्रीयता और लोग स्वेच्छा से शामिल होंगे और उसकी रक्षा करेंगे क्योंकि इसमें रहने का लाभ सभी को मिलेगा।

यही आधुनिक मज़दूर वर्ग का नज़रिया है। आधुनिक मज़दूर वर्ग बहुराष्ट्रीय और बहुभाषीय है। आइये, हम एकजुट हो जायें और मज़दूरों व किसानों की हुकूमत व स्वेच्छा पर आधारित संघ के निर्माण के लिये हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के कार्यक्रम के इस नज़रिये को आगे रखकर, संघर्ष करें।

Tag:    Feb 16-28 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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