पूंजीवादी लालच और सांप्रदायिक हिन्दोस्तानी राज्य ने उत्तर प्रदेश को तबाह कर दिया है!

Submitted by cgpiadmin on शुक्र, 17/02/2017 - 02:04

मज़दूरों और किसानों का राज और हिन्दोस्तान का नव-निर्माण - यही विकल्प है!

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के अवसर पर हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का आह्वान, 1 फरवरी, 2017

उत्तर प्रदेश की 403 सदस्यीय विधानसभा के चुनाव अभियान में वही पुराने, लोगों को बांटने वाले और लोगों का ध्यान भटकाने वाले नारे सुनने में आ रहे हैं, जिनके चलते बीते दिनों में सांप्रदायिक कत्लेआम और जातिवादी अत्याचार होते रहे हैं।

सत्ता के लिए स्पर्धा करने वाली मुख्य पार्टियों को सांप्रदायिक झगड़े भड़काने से रोकने के लिए न तो निर्वाचन आयोग कुछ कर रहा है, और न ही अदालतें। अयोध्या में राम मंदिर बनाने के पुराने वादे को फिर से उठाया जा रहा है, जिसके साथ-साथ, हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक भावनाएं उकसाई जा रही हैं। चारों मुख्य प्रतिस्पर्धी पार्टियों ने सांप्रदायिक और जातिवादी आधार पर अपने उम्मीदवार चुने हैं। हमें बताया जाता है कि सभी उम्मीदवारों को आचार संहिता का पालन करना चाहिए, परन्तु बड़े-बड़े धनवानों द्वारा समर्थित मुख्य पार्टियाँ खुलेआम धर्म और जाति के आधार पर अपने-अपने वोट बैंक बना रही हैं। इससे वर्तमान हिन्दोस्तानी राज्य और उसकी चुनाव प्रक्रिया का सांप्रदायिक स्वभाव स्पष्ट होता है।

उत्तर प्रदेश में असली संघर्ष विपरीत आर्थिक हितों वाले वर्गों के बीच में है। एक तरफ हैं मजदूर, किसान, कारीगर, पेशेवर लोग तथा स्व-रोज़गार वाले लोग। दूसरी तरफ हैं चंद शोषक, पूंजीपति, जमींदार, साहूकार, भ्रष्ट मंत्री और अफ़सर, जिनकी अगुवाई करने वाले वही इज़ारेदार घराने हैं, जो इंडिया इंकॉरपोरेटेड के नाम से जाने जाते हैं। उत्तर प्रदेश के मेहनतकश लोगों के श्रम से हिन्दोस्तान की आवश्यक खाद्य फसलों तथा अनेक औद्योगिक वस्तुओं का उत्पादन होता है व बहुत सी आधुनिक सेवाएं प्रदान की जाती हैं। परन्तु उस धन के उत्पादक ग़रीब रह जाते हैं, और ग़रीब होते रहते हैं, रोज़गार की तलाश में इधर-उधर भटकने को मजबूर होते हैं। दूसरी ओर, शोषक अल्पसंख्यक दिन-ब-दिन और अमीर होते रहते हैं।

शोषक अल्पसंख्यक प्रतिस्पर्धी गुटों और राजनीतिक पार्टियों में बंटे हुए हैं। ये पार्टियां बारी-बारी से आकर राज्य को संभालती हैं। शोषित बहुसंख्या के वर्ग संघर्ष को भटकाने, बांटने और नष्ट करने के लिए, सांप्रदायिक और जातिवादी झगड़े भड़काना और आयोजित करना, उनके शासन का एक पसंदीदा तरीका है।

उत्तर प्रदेश के लोगों!

हमें बार-बार साम्प्रदायिकता और साम्प्रदायिक हिंसा का शिकार बनाया जाता है, ताकि हम अपने सांझे शोषकों और जालिमों के खिलाफ़ एकजुट न हो पाएं। हमें इसलिए निशाना बनाया जाता है क्योंकि अपने सांझे लक्ष्य को हासिल करने के लिए धर्म और जाति की दरारों को तोड़कर एकजुट होने का हमारा लंबा और बहादुर इतिहास रहा है।

मजदूरों, किसानों और सैनिकों ने 1857 में बर्तानवी उपनिवेशवाद के खिलाफ़ एकजुट संघर्ष किया था। बहादुर शाह ज़फर, रानी लक्ष्मीबाई, तात्या टोपे, रानी हजरत महल और दूसरे देशभक्त शासकों ने हिन्दुओं और मुसलमानों से यह आह्वान किया था कि एकजुट होकर विदेशी अत्याचारियों से लड़ो और उन्हें बाहर भगाओ। उन्होंने हिन्दू-मुसलमान झगड़ों को भड़काने की बर्तानवी कार्यनीति के बारे में लोगों को चेतावनी दी थी।

वर्तमान शासक वर्ग और उसकी प्रतिस्पर्धी पार्टियां, जिनमें मुख्य हैं कांग्रेस और भाजपा, बर्तानवी उपनिवेशवादियों के पदचिन्हों पर ही चल रही हैं। वे राज्य का इस्तेमाल करके, शोषित और उत्पीड़ित बहुसंख्या को बांटकर राज कर रही हैं।

रामप्रसाद ‘बिस्मिल’, अशफ़ाक उल्ला खान, शचीन्द्रनाथ सान्याल, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह, राजगुरु, जैसे हमारे क्रांतिकारी वीरों और शहीदों ने बर्तानवी हिन्दोस्तानी राज्य को नष्ट करके, उसकी खंडहरों पर एक नया राज्य स्थापित करने के लिए संघर्ष किया था। हमारे क्रांतिकारी शहीदों के लक्ष्य और कार्यक्रम को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के जनवरी 1925 के घोषणापत्र में अत्यंत स्पष्ट रूप से बताया गया था। घोषणापत्र में ऐलान किया गया था कि:

क्रांतिकारी पार्टी का फौरी राजनीतिक लक्ष्य है संगठित और सशस्त्र क्रांति के ज़रिये संयुक्त राज्य हिन्दोस्तान के संघीय गणराज्य की स्थापना करना। उस गणराज्य के संविधान की रचना और घोषणा उस समय की जाएगी जब हिन्दोस्तान के प्रतिनिधियों के पास अपने फैसलों को लागू करने की ताक़त होगी। परन्तु उस गणराज्य के बुनियादी असूल होंगे सर्वव्यापक मताधिकार और इंसान द्वारा इंसान के शोषण की सभी व्यवस्थाओं को खत्म करना। मिसाल के तौर पर, रेलवे और परिवहन व संचार के अन्य साधनों, खदानों और इस्पात व जहाजों के विनिर्माण जैसे बड़े-बड़े उद्योगों का राष्ट्रीयकरण किया जाएगा।

उस गणराज्य में मतदाताओं को अपने प्रतिनिधियों को वापस बुलाने का अधिकार होगा, अगर वे ऐसा करना चाहें तो। उसके बिना, यह लोकतंत्र एक मज़ाक बन जाएगा। उस गणराज्य में कार्यकारिणी पर विधिपालिका का नियंत्रण होगा, और जब-जब ज़रूरत हो, कार्यकारिणी के सदस्यों को बदल दिया जाएगा...

क्रांतिकारी पार्टी राष्ट्रीय नहीं बल्कि अंतर्राष्ट्रीय है, यानी कि उसका अंतिम उद्देश्य है अलग-अलग राष्ट्रों के विविध हितों का आदर करके तथा उन्हें सुनिश्चित करके दुनिया में सामंजस्य लाना। उसका उद्देश्य है अलग-अलग राष्ट्रों और राज्यों के बीच स्पर्धा नहीं बल्कि सहयोग स्थापित करना। इस मामले में वह हमारे गौरवपूर्ण अतीत के महान हिन्दोस्तानी ऋषियों और वर्तमान युग में बोल्शेविक रूस का अनुसरण करती है... ”

हमारे शहीदों के इस लक्ष्य और कार्यक्रम के साथ बड़े पूंजीपतियों और बड़े जमींदारों ने 1947 में विश्वासघात किया था। एक नयी व्यवस्था और राज्य की रचना करने का मौका खो दिया गया। उपनिवेशवादी विरासत के साथ पूरी तरह नाता तोड़ने के बजाय, बांटो-और-राज-करो के उन्हीं संस्थानों, तंत्रों और तौर-तरीकों को बरकरार रखा गया। 1947 में उपनिवेशवादी और सांप्रदायिक राज्य को विरासत में पाने वाले नए शोषकों के हितों के लिए उनका इस्तेमाल किया जाता रहा है।

हमारे जीवन का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि सांप्रदायिकता और सांप्रदायिक हिंसा की जड़ लोगों और उनके धार्मिक विचारों में नहीं है। उसकी जड़ राज्य के सांप्रदायिक चरित्र में है। कोई खास पार्टी या पार्टियां समस्या का कारण नहीं हैं। संपूर्ण राज्य और उसके सभी विभाग और तंत्र लोगों को बांटकर रखने, अधिकारियों के सामने बेबस और गुलाम बनाकर रखने का काम करते हैं।

उत्तर प्रदेश में रहने वाले 20 करोड़ लोगों की ग़रीबी और असुरक्षा की वजह यह शोषक और परजीवी हिन्दोस्तानी पूंजीवादी व्यवस्था है। यह बर्तानवी उपनिवेशवादी लूट की व्यवस्था की निरंतरता है, जिस पर लगभग 150 हिन्दोस्तानी इज़ारेदार घरानों का नियंत्रण है, जो विदेश में अनेक इज़ारेदार पूंजीपतियों तथा देश में अनेक पूंजीपतियों व जमींदारों के साथ मिले हुए हैं। हिन्दोस्तान के मज़दूरों और किसानों का अधिक से अधिक शोषण करके वे अपने निजी मुनाफ़ों को बढ़ाते रहते हैं।

पूंजीवादी लालच से प्रेरित आर्थिक विकास की वजह से करोड़ों गरीब किसान और खेत मज़दूर तबाह हो गये हैं। भूमंडलीकरण और उदारीकरण की वजह से कुछ अमीर किसान भी बुरी तरह कर्जे़ में डूब गये हैं और बहुत कठिनाई में हैं। नोटबंदी से लोगों का दुख और बढ़ गया है। नगदी की कमी के कारण लाखों-लाखों मज़दूरों और किसानों को अपनी रोज़ी-रोटी से हाथ धोना पड़ा है।

चुनाव के ज़रिए सरकार बनाने वाली पार्टी को बदलने से राज्य के लोगों को दबाने और बांटने के स्वभाव में कोई परिवर्तन कभी नहीं आया है और कभी नहीं आयेगा। राज्य की पूंजी-केन्द्रित आर्थिक दिशा में भी कोई परिवर्तन नहीं आयेगा।

सांप्रदायिकता, वर्ग शोषण और जातिवादी दमन समेत हमारी सारी समस्याओं का समाधान है - बड़े पूंजीपतियों के शासन को खत्म करना और उसकी जगह पर मज़दूरों और किसानों का शासन लाना। सिर्फ पार्टी बदलने से कोई बदलाव नहीं आयेगा। पूरी राजनीतिक व्यवस्था और अर्थव्यवस्था की दिशा को बदलना होगा।

हमारे क्रांतिकारी वीरों और शहीदों के रास्ते पर चलने का मतलब यह है कि हमारा राजनीतिक लक्ष्य एक नयी व्यवस्था और राज्य की स्थापना करने के लक्ष्य से कम नहीं हो सकता है। इस नयी व्यवस्था और राज्य को उपनिवेशवादी विरासत से पूरी तरह नाता तोड़ना होगा। एक नया संविधान बनाना होगा जो इन असूलों पर

आधारित होगा कि संप्रभुता लोगों के हाथ में होगी और सभी की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य का फर्ज़ होगा।

किसी भी चुनाव से पहले मज़दूरों, किसानों, महिलाओं और नौजवानों को अपने उम्मीदवारों का चयन करने का अधिकार होना चाहिए। चुने गये प्रतिनिधियों के हाथों में पूरी ताक़त नहीं बल्कि कुछ ताक़त ही सौंपनी चाहिए। लोगों को अपने हाथों में यह ताक़त रखनी होगी कि चुने गये प्रतिनिधि से उसके काम का हिसाब मांग सकें तथा उसे किसी भी समय वापस बुला सकें। लोगों को कानून और नीतियां प्रस्तावित करने का अधिकार होना चाहिए। बाकी सभी ताक़तें लोगों के हाथों में होनी चाहिएं, जिनमें संविधान को फिर से लिखने का अधिकार भी होना चाहिए।

अपने हाथों में राजनीतिक सत्ता लेकर हम मज़दूर और किसान अर्थव्यवस्था को नयी दिशा दिला सकते हैं ताकि शोषण को खत्म किया जा सके और सभी के लिए सम्मानजनक मानव जीवन की ज़रूरतें पूरी हो सकें। हम पूंजी पर श्रम की जीत, स्पर्धा पर सहयोग की जीत को सुनिश्चित करेंगे। जबकि इस समय ग़रीब और मंझोले किसानों को भूमि और अन्य संसाधनों के लिए आपस में स्पर्धा करनी पड़ती है, हम एक ऐसी व्यवस्था स्थापित करेंगे जिसमें वे आधुनिक प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करके, सैकड़ों एकड़ पर सहकारी कृषि को चलाने के लिए आपस में सहयोग करेंगे। मज़दूरों और किसानों का नया राज्य उन्हें इसमें पूरा समर्थन देगा।

अपने सभी अधिकारों को सुनिश्चित करने वाले नये राज्य की स्थापना करने के नज़रिये से हम ठेका मज़दूरी, निजीकरण, मज़दूरों के अधिकारों पर सभी हमलों, संविदा कृषि, बड़ी कंपनियों द्वारा भूमि अधिग्रहण और किसानों पर सभी हमलों के खिलाफ़ अपना संघर्ष तेज़ करें।

हिन्दोस्तान के शासक बनने और देश का नव-निर्माण करने के नज़रिये के साथ हम अपने फौरी संघर्षों को आगे बढ़ायें और इस तरह अपने शहीदों के लक्ष्य को पूरा करें। अपनी संघर्षरत एकता को बनायें व मजबूत करें और लोगों को बांटने की शासक वर्ग की साजिशों को नाकामयाब करें।

मजदूर-किसान की है यह मांग - हिन्दोस्तान का नव-निर्माण!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

Tag:    Feb 16-28 2017    Voice of the Party    2017   

पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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