अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2017 :

Submitted by bk on गुरु, 02/03/2017 - 01:00

एक नए राज्य और व्यवस्था के निर्माण के लिए महिलाओं को अपना संघर्ष तेज़ करना होगा!

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का आह्वान, 27 फरवरी, 2017

आज जब हम 8 मार्च की ओर बढ़ रहे हैं, हिन्दोस्तान और दुनियाभर की सभी महिलाओं द्वारा अपने अधिकारों और समाज में सभी के मानव अधिकारों की हिफाज़त के लिए चलाये जा रहे बहादुर और अथक संघर्ष को कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी सलाम करती है। 

100 वर्ष पहले : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर

8 मार्च, 1917 को रूस के पेत्रोग्राद शहर में हजारों महिलाएं सड़कों पर उतर आईं। उनमें कुछ मज़दूर थीं, तो कुछ सैनिकों की पत्नियां। ये सभी महिलाएं मांग कर रही थीं कि हमारे बच्चों के लिए रोटी दो” और हमारे पतियों को जंग के मैदान से वापस बुलाया जाए”। उस वक्त तक महिलाओं के लिए मताधिकार” का नारा ज़ारवादी रूस में चारों ओर फैल चुका था।

उस वक्त प्रथम विश्व युद्ध के चलते पूरे यूरोप में मेहनतकश लोगों की हालत असहनीय हो चुकी थी। 1915 से शुरू होकर पूरे जर्मनी में विद्रोह की लहर फैल चुकी थी। ऑस्ट्रिया, इंग्लैंड, फ्रांस, जर्मनी और रूस में गृहणियों की बग़ावत” तेज़ी से और बार-बार होने लगी। अक्तूबर 1915 में रूस के कपड़ा उद्योग के गढ़ के नाम से मशहूर बोगोरोड्स्क में बाज़ार के दिन विद्रोह शुरू हो गया। 12,000 से अधिक महिलाओं ने हड़ताल शुरू की और यह कई सप्ताह तक चली।

जून 1916 में रूस के गोर्दीव्का शहर में करीब 1000 महिलाओं के जनसमूह ने विद्रोह शुरू कर दिया। हर एक दुकान के सामने जाकर उन्होंने दुकानदारों को अपने गोदामों को खोलने के लिए कहा। अगस्त 1916 में जर्मनी में सैनिकों की पत्नियों के एक समूह ने हैम्बर्ग सीनेट (संसद) से शांति समझौते के समर्थन की मांग करते हुए ज्ञापन लिखा। उन्होंने लिखा हम चाहते हैं कि हमारे पति और हमारे बच्चे जंग के मैदान से वापस आयें, हम और भूखे नहीं रह सकते”

इस दौर में महिलाओं का सबसे प्रसिद्ध प्रदर्शन 8 मार्च, 1917 को रूस में हुआ। हजारों महिला मज़दूरों और गृहणियों ने पुलिस को टक्कर दी। उन्होंने ज़ार की सेना के जवानों को अपने साथ एकजुट हो जाने का आह्वान दिया। अगले दिन 2 लाख महिला और पुरुष मज़दूर हड़ताल पर गए। समय के साथ लोगों की मांगें और अधिक राजनीतिक होती गयीं और लोग नारे लगाने लगे “जंग, मुर्दाबाद!”, “ज़ारशाही, मुर्दाबाद!”। पेत्रोग्राद छावनी के सैनिकों ने लोगों को गोलियों और बंदूकों से दबाने के अपने अधिकारियों के आदेश को ठुकरा दिया।

100 वर्ष पहले 8 मार्च को रूस की महिलाओं ने जो बहादुरी का काम किया, उसने जन-विद्रोह को और भी भड़का दिया और ज़ार का तख्ता पलट किया, जिसे फरवरी क्रांति के नाम से जाना जाता है। (रूसी कैलेंडर के अनुसार फरवरी का महीना)।

दुनियाभर में पूंजीवाद, साम्राज्यवादी जंग, नस्लवाद, राजकीय आतंकवाद और तमाम तरह के दमन और इंसानों के बीच भेदभाव के खिलाफ़ संघर्ष में महिलाएं सबसे आगे की कतार में खड़ी रही हैं। वे मज़दूरों की हड़तालों का हिस्सा हैं, वे किसानों और नौजवानों के आन्दोलनों का हिस्सा हैं। बहुराष्ट्रीय कंपनियों और साम्राज्यवादी देशों द्वारा राष्ट्रीय अधिकारों पर दमन के खिलाफ़ संघर्ष में वे सबसे कार्यशील सहभागी हैं। अमरीकी साम्राज्यवाद और उसके मित्र देशों द्वारा दुनियाभर में चलाई जा रही अन्यायपूर्ण जंगों के विरोध में वे डट कर खड़ी हैं। जंग की वजह से बहुत बड़े पैमाने पर बर्बादी हो रही है और हजारों लाखों लोगों को जंग के इलाकों से शरणार्थी बनकर भागना पड़ रहा है।

हिन्दोस्तान में भूमंडलीकरण, निजीकरण और उदारीकरण के खिलाफ़ लगातार चल रहे जन-आंदोलनों में महिलाएं सबसे आगे रही हैं। काम की सभी जगहों, बड़ी कंपनियों से लेकर बेगारी की छोटी दुकानों तक, सरकार द्वारा श्रम कानूनों में मज़दूर-विरोधी बदलाव के खिलाफ़ वे उठ खड़ी हुई हैं। शिक्षक, नर्स, आंगनवाड़ी और आशा कार्यकर्ताएं, सभी महिलाएं, मज़दूर बतौर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही हैं।

हमारे देश की महिलाओं और नौजवान लड़कियों ने सामंती रिवाज़ों और दकियानूसी विचारों को चुनौती दी है, जो महिलाओं को समाज में नीच और दूसरे दर्जे़ का मानते हैं। वे एक ऐसे आधुनिक कानून की मांग कर रही हैं जो उनके महिला बतौर और इंसान बतौर अधिकारों की गारंटी दे सके।

सांप्रदायिक हिंसा और राजकीय आतंकवाद के खिलाफ़ संघर्ष में महिलाएं सबसे आगे की कतार में खड़ी रही हैं। चाहे वो कश्मीर हो, उत्तर-पूर्व हो, छत्तीसगढ़ हो या अन्य कोई “अशांत क्षेत्र”, महिलाओं ने हर क्षेत्र में सेना के राज के खिलाफ़ बहादुरी के साथ लड़ाई की है।   

हमारे जीवन के अनुभव ने हमें बार-बार दिखाया है कि यह राज्य और आर्थिक व्यवस्था, यह राज्य जिसकी हिफ़ाज़त करता है, महिलाओं की मुक्ति की राह में मुख्य रुकावट हैं। पुलिस और राज्य के अन्य सशस्त्र बल महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं करते हैं, बल्कि इसके विपरीत वे खुद महिलाओं के खिलाफ़ सबसे वहशियाना अपराध करते हैं, अपनी हिरासत में महिलाओं पर बलात्कार करते हैं। न्यायालय पीड़ि़तों के लिए न्याय सुनिश्चित नहीं करते। महिलाओं के खि़लाफ अपराध करने वालों को सज़ा देने के बजाय इस हिन्दोस्तानी जनतंत्र की सभी संस्थाएं उन गुनहगारों की हिफाज़त करती हैं।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का उद्गम

1910 में कोपेनहेगन, डेनमार्क में आयोजित समाजवादी महिलाओं के द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की परंपरा की शुरुआत की गई थी। 17 देशों से आई 100 से अधिक महिला प्रतिनिधियों ने इस अधिवेशन में एकमत से इस फैसले का अनुमोदन किया था, और इनमें फिनलैंड की संसद में पहली बार चुनी गयी 3 महिलाएं भी शामिल थीं। जर्मनी की कम्युनिस्ट नेता क्लारा जेटकिन ने इसका प्रस्ताव रखा था। 1907 में स्टुटगार्ट में आयोजित समाजवादी महिलाओं के प्रथम अंतर्राष्ट्रीय अधिवेशन में उन्होंने दुनिया भर की मेहनतकश महिलाओं के संघर्ष और महिला अधिकारों के समर्थन में हर साल प्रदर्शन आयोजित करने का प्रस्ताव रखा था।

इस प्रस्ताव में कई बातों समेत यह कहा गया कि दुनिया भर में महिला आन्दोलन.... अपना संघर्ष सरमायदारी महिला अधिकार कार्यकर्ताओं के साथ नहीं, बल्कि समाजवादी पार्टियों के साथ गठबंधन में चलाता है, और महिलाओं के लिए मताधिकार हासिल करने का संघर्ष सर्व व्यापक मताधिकार के जनतांत्रिकीकरण करने के लिए असूल और अभ्यास दोनों ही नज़रिये से सबसे अधिक महत्वपूर्ण है”

आगे कहा गया कि राजनीतिक मताधिकार के संघर्ष को आगे ले जाने के लिए दुनिया भर के देशों की सभी समाजवादी महिलाओं का फर्ज़ है कि आंदोलन को उपरोक्त असूलों के मुताबिक मेहनतकश लोगों के बीच चलायें; महिलाओं की राजनीतिक मुक्ति की ज़रूरत पर चर्चा और साहित्य के द्वारा उनको जागरुक करने के हर मौके का इस्तेमाल करें। इसके प्रचार के लिए उन्हें खासतौर से हर एक राजनीतिक और सार्वजनिक मंच और संस्था के चुनाव का इस्तेमाल करना चाहिए” 

अधिवेशन में आये प्रतिनिधियों ने फैसला लिया कि “इसके लिए समाजवादी महिलाओं को अपने वर्ग हित के बारे में जागरुक मेहनतकशों के सभी राजनीतिक और ट्रेड यूनियन संगठनों के साथ मिलकर विशेष रूप से महिला दिवस आयोजित करना चाहिए और इसमें सबसे पहले महिलाओं के लिए मताधिकार के प्रचार को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। इस मांग को समाज में समाजवादी नज़रिये से महिलाओं के सवालों पर चर्चा का विषय बनाया जाना चाहिए”।

वर्तमान राज्य के भीतर ही सत्ता में आने के लिये आपस में प्रतिस्पर्धा करने वाली पार्टियां तमाम तरह की सामाजिक बुराइयों को मिटाने का वादा तो करती हैं, लेकिन एक बार सत्ता में आ जायें तो सिर्फ बड़े सरमायदारों के हितों की सेवा में लग जाती हैं। सबसे बड़े इज़ारेदार घरानों को और अधिक अमीर बनाने के लिए ये पार्टियां उसी महिला-विरोधी और जन-विरोधी पूंजीवादी कार्यक्रम को लागू करती हैं। 

“दुनिया के इस सबसे बड़े जनतंत्र” में सारी राजनीतिक सत्ता चंद मुट्ठीभर अमीर लोगों के हाथों में सिमटी हुई है, जो अपने खुदगर्ज़ हितों के लिए बहुसंख्यक महिलाओं और पुरुषों का शोषण करते हैं। मौजूदा आर्थिक व्यवस्था उत्पादन के साधनों की निजी मालिकी पर आधारित है, जो मानव श्रम का अत्याधिक शोषण करती है, छोटे उत्पादकों को लूटते हुए और प्राकृतिक संसाधनों को बर्बाद करते हुए सबसे अधिक पूंजीवादी मुनाफ़े बनाने के लिए काम करती है। महिलाओं का निचला दर्ज़ा और उनका अत्याधिक शोषण इस आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था में निहित है।    

जो लोग यह दावा करते हैं कि महिलाओं की मुक्ति के संघर्ष और मज़दूरों के संघर्ष में कोई भी संबंध नहीं है, वे सरासर झूठ बोल रहे हैं, ताकि महिलाओं की मुक्ति के संघर्ष को ख़त्म कर सकें। दरअसल हर वर्ष 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने की पहल उन मेहनतकश महिलाओं ने की थी जो समाजवाद और कम्युनिज़्म के आन्दोलन की नेता थीं।

आज से 100 वर्ष पहले 8 मार्च, 1917 को रूस की महिलाएं युद्ध, भुखमरी और ज़ार के तानाशाही राज को ख़त्म करने की मांग को लेकर पेत्रोग्राद और अन्य शहरों में सड़कों पर उतर आई थीं। महिलाओं के इस विरोध प्रदर्शन ने ज़ारशाही को ख़त्म करने के क्रांतिकारी आन्दोलन को जबरदस्त हवा दी। आगे चलकर रूस की महिलाओं ने रूसी क्रांति में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की जहां मज़दूर वर्ग ने किसानों और सैनिकों के साथ गठबंधन में महान अक्तूबर क्रांति को अंजाम दिया और राजनीतिक सत्ता अपने हाथों में ली। नए समाजवादी समाज के निर्माण में महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया।

रूस के क्रांतिकारी अनुभव ने यह साबित कर दिया कि श्रमजीवी क्रांति और समाजवाद का रास्ता ही महिला मुक्ति का एकमात्र रास्ता है। उस समय से आज तक दुनियाभर के सरमायदार महिलाओं को महिला बतौर एकजुट होने और मज़दूर वर्ग तथा सभी शोषित-पीड़ित लोगों के साथ एकजुट होने से रोकने के लिए नित नए तरीके बनाते रहे हैं। महिला आंदोलन को गुमराह करने के लिए वे यह धारणा फैलाते हैं कि महिलाओं के असली दुश्मन पुरुष हैं और महिलाओं का असली संघर्ष अपने परिवार के भीतर बराबरी के लिए संघर्ष करना है।

हमारे देश के हुक्मरान बड़े सरमायदार, बड़े जमींदारों और अन्य धनवान तबकों के साथ मिलकर, लोगों को बांटने और उन पर राज करने के लिए, अपने आकाओं बर्तानवी उपनिवेशवादियों से सीखे गये तमाम तरीकों का इस्तेमाल करते आये हैं। वे जानबूझकर धर्म, जाति, राष्ट्रीयता और जनजातीय पहचान के आधार पर लोगों को एक दूसरे के खिलाफ़ भड़काते आये हैं। अलग-अलग जातियों और समुदायों को आरक्षण के द्वारा उनमें से धनवान और बलवान लोगों को अपने खेमे में शामिल करने का तरीका अपनाते आये हैं।

मोदी सरकार भी महिलाओं के लिए संसद और राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का वही पुराना घिसा-पिटा वादा दोहरा रही है। सत्ता का यह गाजर 1996 से महिला आंदोलन को लगातार दिखाया जाता रहा है। इसका मकसद है, संघर्ष कर रही महिलाओं को मौजूदा व्यवस्था के साथ समझौता करने के लिए राजी करना। इसका मकसद है चंद मुट्ठीभर महिलाओं को वर्तमान सत्ता व्यवस्था में शामिल करके सभी महिलाओं की लड़ाकू एकता को तोड़ना।

हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी का यह मानना है कि हिन्दोस्तान की महिलाओं को इस खतरनाक जाल से बचना चाहिए जो हुक्मरान वर्ग हमारे लिए बिछा रहा है। मौजूदा संसद में कुछ आरक्षित सीटें हासिल करना यह महिला आंदोलन का लक्ष्य नहीं है। महिला आंदोलन का लक्ष्य है इस “बातों की दुकान” संसद की जगह पर एक ऐसी संस्था का निर्माण करना जो असली मायने में मेहनतकश महिलाओं और पुरुषों का प्रतिनिधित्व करेगी। हमारा लक्ष्य एक ऐसे नए राज्य और राजनीतिक प्रक्रिया की नींव डालना है, जहां सत्ता की बागडोर मेहनतकश लोगों के हाथों में होगी, न कि कुछ कुलीन राजनेताओं के पास जिनके पीछे मुट्ठीभर बड़े सरमायदार और तमाम अन्य शोषक हैं। केवल ऐसा ही राज्य सभी के लिए खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी दे सकता है, एक ऐसा राज्य जहां कोई भी किसी औरत के अधिकार और उसके मान-सम्मान का उल्लंघन करने की जुर्रत नहीं कर सकता। 

महिलाओं को अपने मोहल्ले और काम की जगहों पर, एक औरत बतौर और समाज से सभी तरह के शोषण को ख़त्म करने के लिए मज़दूर वर्ग के आंदोलन के एक दस्ते बतौर, एकजुट होना होगा। हम सभी मेहनतकश महिलाओं और पुरुषों को, लड़कियों और लड़कों को अपने काम की जगहों पर, कॉलेजों में और रिहायशी इलाकों में अपनी समितियां बनानी होंगी। अपने अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए हमें खुद अपने देश और समाज के हुक्मरान बनने की तैयारी करनी होगी।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस एक ऐसा मौका है जब हम सब महिलाएं एक ऐसी दुनिया बनाने का प्रण दोहराती हैं जहां अन्यायपूर्ण जंग नहीं होगी, जहां शोषण और दमन नहीं होगा, जहां लिंग के आधार पर या किसी भी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं होगा।  

आओ, हम सब हिन्दोस्तान के नव-निर्माण के लिए, एक आधुनिक जनतांत्रिक राज्य के निर्माण के लिए एकजुट हों, जहां फैसले लेने का अधिकार, संप्रभुता लोगों के हाथों में होगी! हमारे जनतांत्रिक, उपनिवेशवाद-विरोधी, सामंतवाद-विरोधी और साम्राज्यवाद-विरोधी संघर्ष को पूरा करने के लिए तथा पूंजीवाद का तख्ता पलटने के लिए एकजुट हों! आओ, हम सब क्रांति के द्वारा समाजवाद के निर्माण के लिए एकजुट हों!

हम उन सभी महिलाओं को, जो समाज की प्रगति के लिए वचनबद्ध हैं को आह्वान देते हैं कि वे कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी में शामिल हों तथा मज़दूर वर्ग के अगुवा दस्ते को और कम्युनिज़्म के लिए क्रांतिकारी आन्दोलन को मजबूत बनायें!

महिला मुक्ति का संघर्ष ज़िन्दाबाद!

इंक़लाब ज़िंदाबाद!

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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