जी.डी.पी. और श्रम का फल

Submitted by bk on बुध, 01/03/2017 - 02:00

पूंजीपति वर्ग और उसके आर्थिक विशेषज्ञ ऐसी बातें करते हैं जैसे कि सकल घरेलू उत्पाद (जी.डी.पी.) के संवर्धन में बढ़ोतरी की दर देश के आर्थिक स्वास्थ्य की निशानी है। लेकिन ज़िंदगी का अनुभव हमें दिखाता है कि केवल जी.डी.पी. में बढ़ोतरी से मज़दूरों, किसानों, कारीगरों और अन्य मेहनतकशों, जो इस जी.डी.पी. को पैदा करने के लिए अपना पसीना बहाते हैं, उनका जीवन भी बेहतर होगा इसकी कोई गारंटी नहीं है।

बॉक्स-1

जी.डी.पी., यह मानव श्रम द्वारा निर्मित मूल्य को आंकने का गलत तरीका है

सकल घरेलू उत्पाद किसी देश में निर्मित की गयी तमाम वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को जोड़कर और उसमें से उत्पादन प्रक्रिया में इस्तेमाल हुई वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को घटाकर बनता है। इसे जोड़ा गया सकल मूल्य भी कहते हैं।

जी.डी.पी. को आंकने के लिए संयुक्त राष्ट्र की राष्ट्रीय लेखा व्यवस्था द्वारा सूचित मार्गदर्शिका का इस्तेमाल किया जाता है। इस व्यवस्था में एक बड़ी खामी यह है कि इसके तहत प्रशासन और रक्षा कार्य को भी उत्पादक कार्य माना जाता है, जैसे कि ये कार्य भौतिक संपत्ति और राष्ट्रीय खुशहाली में मूल्य का योगदान देते हैं। जबकि ये समाज के लिए ज़रूरी कार्य हैं, कानून को अमल में लाना और देश की सीमाओं को सुरक्षित रखना, ये कार्य नए मूल्य का निर्माण नहीं करते हैं। इस खामी की वजह से जोड़े गए मूल्य को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है।

दरअसल कोई नया मूल्य जोड़ने के बजाय प्रशासन और रक्षा कार्य को असलियत में भौतिक संपत्ति के निर्माण से घटाया जाना चाहिए। इन कार्यों को मूल्य जोड़ने वाले कार्य मानकर जी.डी.पी. के आंकड़े को बहुत बढ़ाकर दिखाया जाता है। इसका पैमाना उन अर्थव्यवस्थाओं में सबसे अधिक है जिनका सबसे अधिक फौजीकरण हुआ है।

इस खामी की वजह से पूंजीवादी व्यवस्था के बढ़ते पैमाने के परजीवी चरित्र को छुपाया जाता है, जहां अधिक से अधिक भौतिक संसाधनों को विनाश के साधन बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, बजाय इसके कि उनका इस्तेमाल उत्पादन के साधन और उपभोग के साधन बनाने के लिए किया जाये।

जोड़े गए मूल्य को मापने की एक वैकल्पिक व्यवस्था समाजवादी सोवियत रूस में विकसित की गयी थी, जिसे असल भौतिक उत्पाद कहा जाता है। इस व्यवस्था के तहत उन सभी कार्यों को गिनती से हटाया गया जिनसे कोई नया मूल्य पैदा नहीं होता - जैसे प्रशासन, रक्षा कार्य, व्यापार और वित्तीय मध्यस्थता।

जब कभी मज़दूरों के वेतन में बढ़ोतरी की दर जीवन के लिए ज़रूरी चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी की दर से कम होती है तो करोड़ों मज़दूर और अधिक गरीब हो जाते हैं। इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता कि जी.डी.पी. 5 प्रतिशत से बढ़ा है या 10 प्रतिशत से।

ऐसा अनुमान है कि पिछले 10 वर्षों में आर्थिक संकट की वजह से 1,00,000 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है। जबकि दुनियाभर में ढिंढोरा पीटा जा रहा है कि हिन्दोस्तान की जी.डी.पी. की दर दुनिया में सबसे ऊंची है।

जी.डी.पी. की दर में बढ़ोतरी का इस्तेमाल इस हकीक़त पर पर्दा डालने के लिए किया जा रहा है कि पूंजीवादी व्यवस्था में श्रम का फल पूंजीपतियों की तिजोरियां भरता है, मज़दूर वर्ग की नहीं। इसका मकसद, इस बात को छुपाना है कि पूंजीवादी विकास से अपरिहार्य तौर पर एक छोर पर संपत्ति का संचय बढ़ता है तथा शोषण और अधिक तीव्र होता है, जबकि दूसरे छोर पर गरीबी और भुखमरी बढ़ती रहती है। इसलिए सभी मज़दूरों, किसानों और वे सभी, जो समाज के भविष्य को लेकर चिंतित हैं के लिये ज़रूरी है कि जी.डी.पी. के नाम पर पूंजीवादी प्रचार के द्वारा बनाये गये भ्रमों को हटाकर सच्चाई को देखें।

जी.डी.पी., यह मानव श्रम द्वारा निर्मित मूल्य को आंकने का गलत तरीका है। (बॉक्स 1 देखिये)  

मज़दूरों, किसानों, कारीगरों और अन्य छोटे उत्पादकों की मेहनत ही हर साल नया मूल्य पैदा करती है और जोड़ती है। लेकिन जिन लोगों के पास निजी संपत्ति बतौर उत्पादन के साधन हैं वे इस पैदा किये गए नए मूल्य का बढ़ते स्तर पर अधिकांश हिस्सा मुनाफे़, ब्याज और किराये के रूप में हड़प लेते हैं।

बड़े पैमाने के उत्पादन के साधनों पर पूंजीपतियों की मालिकी है। इन साधनों पर मज़दूर श्रम करते हैं और केवल श्रम ही उनकी दौलत है। इस तरह से संपत्ति में गैर-बराबरी की वजह से नए उत्पादित किये गए मूल्य के बंटवारे में भी बेहद गैर-बराबरी होती है। अपने मुनाफ़ों को बढ़ाने के लिए पूंजी के मालिक, पूंजीपति मज़दूरों के वेतन को जितना संभव हो सके उतने निचले स्तर पर गिराते हैं।

बॉक्स-2

पूंजीवादी संचय का सामान्य नियम

पूंजीवादी संचय का नियम, जिसे अर्थशास्त्रियों ने एक तथाकथित प्राकृतिक नियम में बदल दिया है, वास्तव में केवल इतना ही कहता है कि खुद संचय के स्वरूप के कारण श्रम के शोषण की मात्रा में कोई ऐसी कमी नहीं आ सकती और श्रम के दाम में कोई ऐसी वृद्धि नहीं हो सकती, जिससे पूंजीवादी संबंधों के उत्तरोतर बढ़ते हुए पैमाने पर निरंतर पुनरुत्पादन के लिए कोई गंभीर खतरा पैदा हो जाये। उत्पादन की एक ऐसी प्रणाली में, जहां भौतिक धन मज़दूर के विकास की आवश्यकता को पूरा करने के लिए नहीं होता, बल्कि इसके विपरीत जहां मज़दूर पहले से मौजूद मूल्यों के आत्मविस्तार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए विद्यमान होता है, ऐसी प्रणाली में और कुछ नहीं हो सकता। जिस प्रकार धर्म के क्षेत्र में मनुष्य पर स्वयं उसके मस्तिष्क की पैदावार शासन करती है, उसी प्रकार पूंजीवादी उत्पादन में स्वयं उसके हाथ की पैदावार उस पर शासन करती है।”

पूंजीवादी समाज के भीतर श्रम की सामाजिक उत्पादिता को बढ़ाने के सारे तरीके मज़दूर का गला काटकर अमल में आते हैं। उत्पादन का विकास करने के सारे साधन उत्पादकों पर आधिपत्य जमाने तथा उनका शोषण करने के साधनों में बदल जाते हैं, वे मज़दूर का अंग-भंग करके उसको मनुष्य का एक अपखंड बना देते हैं, उसको किसी मशीन का उपांग मात्र बना देते हैं, मज़दूर के लिए उसके काम का सारा आकर्षण ख़त्म कर देते हैं तथा उसे एक घृणित श्रम में परिणत कर देते हैं...”

पूंजी के संचय के साथ-साथ इस नियम के फलस्वरूप गरीबी का भी संचय होता जाता है। इसलिए अगर एक छोर पर धन का संचय होता है तो उसके साथ-साथ दूसरे छोर पर - यानी उस वर्ग के छोर पर, जो खुद अपने श्रम की पैदावार को पूंजी के रूप में तैयार करता है - गरीबी, यातनापूर्ण परिश्रम, दासता, अज्ञान, पाश्विकता और मानसिक पतन का संचय होता जाता है।”

(स्रोत: कार्ल मार्क्स, पूँजी, खंड 1, अध्याय 25, पूंजीवादी संचय का सामान्य नियम)

पूंजीपति अपनी आमदनी न केवल मज़दूर के शोषण से कमाते हैं, जिन्हें वे काम पर रखते हैं, बल्कि इसके अलावा किसानों और अन्य छोटे उत्पादकों के साथ गैर-बराबर व्यापार के ज़रिये भी कमाते हैं। इन छोटे उत्पादकों को अपना माल बड़े इज़ारेदार पूंजीपतियों को अपने उत्पादों के मूल्य से भी कम दाम पर बेचने के लिये मजबूर होना पड़ता है।

एक मज़दूर परिवार के लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की जोड़े गए सकल मूल्य में कितनी बढ़ोतरी हुई है। उनको इस बात से वास्ता है कि नौकरियों में कितनी बढ़ोतरी हुई है और प्रति मज़दूर औसतन असली वेतन कितना बढ़ा है। पूंजीवादी विकास से मज़दूरों को न तो रोज़गार की सुरक्षा मिलती है और न ही असली वेतन में बढ़ोतरी। इसके विपरीत पूंजीवादी विकास से बेरोज़गार मज़दूरों की सेना बढ़ती जाती है, जिन्हें किसी भी वक्त बाज़ार के उतार-चढ़ाव के हिसाब से काम पर रखा जाता है या निकाल दिया जाता है। 19वीं सदी में कार्ल मार्क्स ने अपने खोजे गए सिद्धांत के द्वारा यह साबित किया था कि किस तरह पूंजीवादी उत्पादन में एक छोर पर अमीरी बढ़ती जाती है और दूसरे छोर पर गरीबी और भुखमरी। (बॉक्स 2 देखिये)।

जितने बड़े पैमाने पर उत्पादक श्रम को काम पर लगाया जाता है, उतना ही अधिक उसका शोषण किया जाता है और उतना ही अधिक मुनाफ़ा पूंजी के मालिक पूंजीपति की जेब में जाता है। जी.डी.पी. को बढ़ाने में पूंजीपतियों की बहुत रुचि है क्योंकि इससे उनका असली मकसद हासिल होता है, जो कि - अधिकतम मुनाफे़ की दर को हासिल करना है। पूंजी के संचय की दर, पूंजीवादी मुनाफ़े की दर पर निर्भर करती है।

पूंजीपति वर्ग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि किस वस्तु का उत्पादन हो रहा है - वो चाहे खाद्य सामग्री या कपड़ा हो या बंदूकें और बम हों, और वह चाहे घरेलू बाज़ार या विदेशी बाज़ार के लिए बनाया जा रहा हो। उनको सिर्फ इस बात से वास्ता है कि उससे उनको अधिकतम मुनाफे़ हासिल हों। जब उत्पादन में आम मंदी आ जाती है तब वे अधिकतम मुनाफे़ बनाने के लिए अपनी पूंजी को सट्टा बाज़ार में लगाते हैं।

इसके विपरीत मज़दूर वर्ग को इस बात से वास्ता है कि उत्पादन को मेहनतकश लोगों की ज़रूरतों को पूरा करने और उनके जीवन का स्तर ऊंचा करने के मकसद से किया जाना चाहिए। मज़दूरी के फल से मेहनतकश बहुसंख्यक लोगों के जीवन में खुशहाली आनी चाहिए। इसलिए किसी भी देश की प्रगति इस बात से नापी जानी चाहिए कि मेहनतकश परिवारों द्वारा पौष्टिक खाद्य पदार्थों, कपड़ों और अन्य वस्तुओं तथा सेवाओं के उपभोग की दर किसी गति से बढ़ रही है।

पूंजीपति वर्ग उत्पादन और वितरण के बीच के संबंध को छुपाता है। वह कहता है कि अधिक से अधिक उत्पादन करना सभी के हित में है और आगे कहता है कि हां, वितरण भी महत्वपूर्ण है”। इस तरह से वह इस बात को छुपाता है कि उत्पादन के संबंध ही आय के वितरण को तय करते हैं।

उत्पादन के साधनों में गैर-बराबरी ही आय के वितरण में गैर-बराबरी के लिए जिम्मेदार है। इसलिए इसका हल भी उत्पादन के संबंधों को बदलने में है। इसका हल है उत्पादन के सभी साधनों को चंद मुट्ठीभर अल्पसंख्यक पूंजीपतियों के हाथ से छीनकर उनको सभी लोगों के हित में सामाजिक संपत्ति में बदल दिया जाना चाहिए। केवल इसी एक तरीके से श्रम का फल पूरे मेहनतकश जनसमुदाय को प्राप्त होगा और उनकी ज़िंदगी में खुशहाली आएगी।

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पार्टी के दस्तावेज

यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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सिर्फ मज़दूर वर्ग ही हिन्दोस्तान को बचा सकता है! हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की केंद्रीय समिति का बयान, ३० अगस्त २०१२

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