किसानों पर गंभीर संकट

Submitted by bk on बुध, 01/03/2017 - 21:00

देश के सभी हिस्सों में किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। पूंजीवादी इज़ारेदार कंपनियों का दबदबा, राज्य द्वारा किसानों को मिल रहे समर्थन को उदारीकरण के नाम पर वापस लेना और नोटबंदी की वजह से नगदी की कमी, इन सभी कारणों ने मिलकर किसानों की ज़िंदगी में दुखों को और बढ़ा दिया है। पिछले कुछ सप्ताहों में किसानों की दयनीय हालतों की कई ख़बरें अखबारों में आई हैं।

उत्तर प्रदेश के गन्ना उत्पादक किसान

दुनिया भर में हिन्दोस्तान चीनी के उत्पादन के लिये दूसरे स्थान पर है और दुनियाभर के उत्पादन का 17 प्रतिशत हिस्सा हिन्दोस्तान में तैयार किया जाता है। इसमें उत्तर प्रदेश का हिस्सा 40 प्रतिशत है। जबकि चीनी मिल मालिकों के मुनाफे़ लगातार बढ़ते रहे हैं, गन्ने की खेती करने वाले किसानों की हालत बहुत नाजुक होती रही है। उन्होंने जो गन्ना चीनी मिल मालिकों को अब तक बेचा है, उसका दाम उनको अभी तक नहीं मिला है।

गन्ने की कटाई नवम्बर से शुरू हो चुकी है और पिछले तीन महीनों से किसान चीनी मिलों को गन्ने की आपूर्ति करते आ रहे हैं। लेकिन उन्हें केवल 10 दिन की आपूर्ति के बराबर के दाम का ही भुगतान किया गया है।

घरेलू और विश्व बाज़ार में चीनी के दाम कुछ समय के लिए स्थिर रहने के बाद अब तेज़ी से बढ़ने लगे हैं। चीनी मिल मालिक अपना उत्पादन भंडारों में जमा कर रहे हैं, कीमत और अधिक बढ़ने का इंतजार कर रहे हैं, और किसानों को भुगतान करने में देरी कर रहे हैं। पूंजीपतियों को अधिकतम मुनाफ़ा दिलाने के लिए किसानों को तकलीफ सहनी पड़ रही है।

गन्ना प्रबंधन कमेटी (एस.सी.एम.सी.) जिसका गठन उत्तर प्रदेश की सरकार द्वारा किया गया है, उसका काम है मिल मालिकों और गन्ने की पैदावार करने वाले किसानों के बीच मध्यस्थता करना। गन्ने की पेराई के मौसम में एस.सी.एम.सी. यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक चीनी मिल को उसके इलाके के किसानों से ठीक समय पर गन्ने की पर्याप्त आपूर्ति होती रहे। लेकिन गन्ना किसानों को समय पर उनके माल का भुगतान सुनिश्चित किया जाये इसके लिए यह समिति कोई भी कदम नहीं उठाती है।

प्रधानमंत्री मोदी ने वादा किया था कि वे गन्ना किसानों की समस्याओं को हल करने के लिए कुछ न कुछ ज़रूर करेंगे। लेकिन हकीक़त में ज़मीनी स्तर पर कुछ भी नहीं बदला है। 2016 में स्वतंत्रता दिवस के मौके पर मोदी ने यह झूठा ऐलान किया कि था कि उत्तर प्रदेश में 95 प्रतिशत गन्ना किसानों का बकाया भुगतान किया जा चुका है। उसी दिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश में किसानों ने अपने भुगतान का पैसा न मिलने के विरोध में कई मिलों को बंद करके अपना गुस्सा ज़ाहिर किया था।

महाराष्ट्र के विदर्भ में अरहर पैदा करने वाले किसानों की दुर्दशा

महाराष्ट्र का विदर्भ जिसे अरहर का कटोरा भी कहा जाता है, यहां पर पिछले वर्ष फरवरी में अरहर पैदा करने वाले किसानों को 9000 रुपये प्रति क्विंटल दाम मिला था। लेकिन इस वर्ष यह दाम गिरकर आधे से भी कम 4250 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है, जो कि केंद्र सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम है।

अरहर दाल का हमारे देश में बड़े पैमाने पर उपभोग किया जाता है और पिछले कई वर्षों से इसकी आपूर्ति में साल दर साल भारी कमी देखी गयी है, जबकि इसकी कीमत हर साल बढ़ रही है। कई वर्षों तक सरकार ने इस मसले को हल करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। एक वर्ष पहले केन्द्र सरकार ने प्रभावी खरीदी मूल्य (न्यूनतम समर्थन मूल्य, बोनस सहित) को 4625 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़ाकर वर्ष 2016-17 के उत्पादन मौसम में 5050 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया था। लेकिन यह कदम भी केवल दिखावा साबित हुआ, क्योंकि हकीक़त में किसानों को तथाकथित न्यूनतम मूल्य भी नहीं मिलता है।

2016-17 में देश में अरहर का उत्पादन बढ़ा लेकिन इसके साथ ही आयात भी बढ़ा। इस वजह से व्यापारियों के पास संचित माल (स्टॉक) बढ़ गया है और किसान को मिलने वाले दाम में भारी गिरावट आई है। जिन किसानों ने सरकार की सलाह मानते हुए अधिक ज़मीन पर अरहर की पैदावार की थी, वे सब आज यह महसूस कर रहे हैं कि सरकार ने उन्हें धोखा दिया है।

तमिलनाडु में सूखा

तमिलनाडु के सभी जिलों को अधिकारिक तौर से सूखा-ग्रस्त घोषित किया जा चुका है। जबकि सरकार ने माना है कि 17 किसानों ने आत्महत्या की है, किसानों की यूनियनों का कहना है कि ये आंकड़े़ गलत हैं। उनका कहना है कि पिछले 2 महीनों में 140 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की है।

सरकार ने सूखे के शिकार किसानों को अपने हाल पर छोड़ दिया है। राज्य सरकार सत्ताधारी पार्टी के भीतर के सत्ता संघर्ष और विधानसभा में गड़बड़ी में फंसी हुई है। राज्य की ओर से कोई भी समर्थन न मिलने से किसान बेहद गुस्से में हैं।

नोटबंदी ने किसानों के गुस्से को और बढ़ा दिया है, क्योंकि किसान ऋण के लिए सहकारी बैंकों पर निर्भर हैं। नोटबंदी के बाद रिज़र्व बैंक ने सहकारी बैंकों में पुराने नोटों को जमा करने पर पाबंदी लगायी थी। गरीब किसानों और बड़े पैमाने पर खेती करने वाले किसानों को व्यावसायिक बैंकों में ही अपनी बचत का पैसा जमा करना पड़ रहा है। इसके अलावा पैसा निकालने पर लगाई गयी सीमा इतनी कम है कि खेती का काम करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

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पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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