नोटबंदी और मज़दूरों की तकलीफ़ें

Submitted by bk on बुध, 01/03/2017 - 10:00

पिछले वर्ष 8 नवम्बर को नोटबंदी की घोषणा के बाद, पूरे देश की ज़्यादातर कंपनियों और दुकानों के मालिकों ने पुराने नोटों को निकालने के लिये एक महीने का वेतन पहले ही दे दिया।

21 दिसम्बर को हिन्दोस्तानी सरकार ने वेतन अधिनियम 1936 के तहत एक अध्यादेश पारित किया, जिसमें कि कंपनी मालिक मज़दूरों की सहमति को अनदेखा करते हुए वेतन का भुगतान चेक या डिजिटल ट्रांसफर द्वारा करेंगे।

नगदी की जगह चेक से वेतन दिये जाने का परिणाम यह हुआ है कि बहुत ही देर से वेतन मिला। ज़्यादातर मामलों में मज़दूरों को उनका वेतन 3 सप्ताह से भी ज़्यादा देर से मिला। मालिक द्वारा हर महीने की 7 तारीख को मज़दूरी और वेतन दिया जाना होता है, यह वेतन अधिनियम का बहुत ही बड़ा उल्लंघन था।

अधिकतर मामलों में मज़दूरों को आगे की तारीख का चेक दिया गया, साथ ही मालिक ने शर्त थोपी कि मज़दूर तारीख से पहले और प्रबंधन की अनुमति के बिना चेक अपने बैंक खाते में जमा नहीं कर सकते।

करोड़ों शहरी मज़दूर झुग्गियों में बिना किसी औपचारिक अनुबंध के किराये पर रहते हैं। जो उनसे किराया वसूल करते हैं वे उन्हें किसी भी प्रकार का आवासीय प्रमाण नहीं देते हैं। बिना आवासीय प्रमाण के वे बैंक में खाता नहीं खोल पाते हैं।

कई कंपनी मालिक मज़दूरों को चेक से भुगतान के फायदों से वंचित रखने के लिए तमाम तरह की चालबाजी कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर मज़दूरों को एक फायदा यह हो सकता है कि अब वे मज़दूर जिन्हें न्यूनतम वेतन से कम का भुगतान किया जाता है, अब वे एक बार अपने वेतन में बढ़ोतरी की उम्मीद कर सकते हैं। मज़दूरों को इस लाभ से वंचित रखने के लिए राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली में कंपनी मालिकों ने मज़दूरों के काम के घंटों को 8 से बढ़ाकर 12 घंटे कर दिए हैं और 8 घंटे से अधिक काम का हिसाब ही नहीं रखते हैं, ताकि उन्हें ओवरटाइम न देना पड़े।

यह सब दर्शाता है कि नोटबंदी ने बेरोज़गारी और रोज़गार की असुरक्षा को और भी बढ़ा दिया है। नोटबंदी ने मज़दूरों के शोषण को और बढ़ाने के लिए तमाम नए गैर-कानूनी तरीकों को जन्म दिया है। डिजिटल इंडिया के नाम पर मज़दूरों के बुनियादि अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है और शोषण और रोज़गार की असुरक्षा का पैमाना और भी बढ़ गया है।

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