तमिलनाडु में सरकार बनाने का संकट :

Submitted by bk on बुध, 01/03/2017 - 11:00

संसदीय लोकतंत्र का पूरी तरह से पर्दाफाश हुआ

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता की मौत के बाद होने वाली घटनाओं से तमिलनाडु के लोगों का गुस्सा बहुत बढ़ गया है। सत्ताधारी पार्टी के भीतर कुत्ते-बिल्ली की लड़ाई, पार्टी पर वर्चस्व रखने वाले गुट द्वारा जन प्रतिनिधियों” का अपहरण किया जाना और विधानसभा में टकराव, इन सब बातों से लोगों के दिलों में बेहद क्रोध पैदा हो गया है।

ए.आई.ए.डी.एम.के. के एक गुट ने, जिसके पास खजाने की चाबी है, उसने वी. पलानिस्वामी को विधायक दल का नया नेता चुना है और उसे नए मुख्यमंत्री की शपथ दिलाई है। कहा जा रहा है कि ऐसा करके संविधान के नियमों के अनुसार सरकार के संकट को हल कर लिया गया है। लेकिन अभी भी गंभीर संकट बना हुआ है।

जिस तरह से तमिलनाडु पर राज चलाया जा रहा है, वह अधिकांश लोगों को मंजूर नहीं है। लोग यह मांग उठा रहे हैं कि समाज को किस तरह से चलाया जाये इसका फैसला करने का अधिकार लोगों को है। वे इस कानून को मानने को तैयार नहीं हैं कि अगले चुनाव में जो कि 2021 में होंगे उसमें वोट देने के अलावा उनकी कोई भूमिका नहीं होगी। वे यह मांग कर रहे हैं कि लोकतंत्र का मतलब केवल हर पांच साल बाद चुनाव के लिये वोट डालने तक सीमित नहीं हो सकता।

संविधान जनता को चुनाव में वोट डालने वाली भेड़-बकरियों से ज्यादा कोई अधिकार और भूमिका नहीं देता है, असलियत में यही तो सारी समस्या की जड़ है। जो कुछ कानूनन “उचित” है, लोगों की नज़र में वही तो सबसे गलत है। इसमें लोगों का कोई दोष नहीं है। यदि कोई दोषी है तो वह संविधान है जो लोगों के फैसले लेने के अधिकार की मांग को पूरा करने के काबिल नहीं है।

असली समस्या यह है कि मौजूदा राज्य, उसका संविधान और प्रतिनिधित्ववादी लोकतंत्र का सारा तंत्र तथा उसकी प्रक्रिया, ये सब इस तरह से बनाये गए हैं कि ये लोगों को सत्ता से कोसों दूर रखते हैं और सारी सत्ता किसी न किसी भ्रष्ट गिरोह के हाथों में पूरी तरह से सौंप देते हैं। ये सारे राजनीतिक गिरोह, हजारों धागों के साथ सबसे अमीर देशी-विदेशी पूंजीपतियों से बंधे हुए हैं।

ये बड़े पूंजीपति चुनाव प्रचार में अपना पैसा ऐसी पार्टी के पीछे लगाते हैं जो उनके अजेंडे को सबसे असरदार तरीके से अमल में ला सकती है और साथ ही बड़ी चालाकी से इस बात को लोगों से छुपा सकती है। इस तरह की पार्टियां चुनाव जीतने और पूंजीपति वर्ग और अपनी पार्टी के गुटवादी हितों की सेवा में सत्ता संभालने के लिए पूरे जोश और एकाग्रता के साथ काम करती हैं। वे खुद अपने आप को “लोगों के जीवन की सांस” और “लोगों की आंखों का तारा” की उपाधि से अलंकृत करती हैं। ये पार्टियां लोगों में दहशत फैलाने के लिए गुंडों का इस्तेमाल करती हैं और कभी-कभी अपने विरोधियों का कत्ल भी करवाती हैं। ये पार्टियां अपने वोट बैंक बढ़ाने और राज्य सत्ता हासिल करने के लिए लोगों के बीच जाति और धर्म के आधार पर नफ़रत फैलाती हैं और टकराव को भड़काती हैं। सत्ता में आने पर ये पार्टियां, पूंजीवादी शोषण और साम्राज्यवादी लूट को और आसान बनाने का काम करती हैं और रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार से अपनी तिजोरियां भरती हैं। ये पार्टियां इस शोषण पर आधारित, अपराधी और भ्रष्ट व्यवस्था के द्वारपाल का काम करती हैं जो बहुसंख्यक लोगों को सत्ता के गलियारों से कोसों दूर रखती हैं।       

यह एक जाल है, पूंजीवादी शोषकों, जमींदारों और अन्य परजीवी तत्वों का, जो इन अपराधी पार्टियों के भ्रष्ट राज नेताओं के साथ मिलकर लोगों पर राज कर रहा है और उनको लूट रहा है। यह बात तमिलनाडु और पूरे हिन्दोस्तान पर लागू होती है। समय-समय पर हुक्मरान वर्ग की एक पार्टी की जगह पर दूसरी पार्टी को सत्ता में बैठाया जाता है, ताकि रास्ता वही रहे, लेकिन लोगों का जनमत” हासिल करने का दावा किया जा सके। आज हमारे देश में 250 इज़ारेदार घराने हैं, जो दुनियाभर की विदेशी इज़ारेदार कंपनियों और साम्राज्यवादी देशों के साथ सांठ-गांठ में देश के जमींदारों और अन्य शोषकों के साथ मिलकर 125 करोड़ मेहनतकश लोगों पर अपनी हुकूमत चला रहे हैं। 

हिन्दोस्तान का संविधान इस आधार पर बनाया गया है कि लोग खुद राज चलाने के काबिल नहीं हैं; और लोगों को केवल अपने ऊपर राज करने वाला चुनने की इजाज़त दी जानी चाहिए। यह संसदीय संप्रभुता” के बर्तानवी सरमायदारों के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके मुताबिक केवल चुने गए प्रतिनिधियों को ही कानून बनाने और बदलने का अधिकार है। लोगों को केवल एक या दूसरी अपराधी और भ्रष्ट पार्टी के हाई कमान द्वारा चयनित किसी उम्मीदवार को वोट देने का ही अधिकार है, इसके अलावा उनका कोई अधिकार नहीं है।

वोट डालते ही, लोग अपनी सारी सत्ता और सारी शक्ति खो बैठते हैं। इसके बाद अगले चुनाव तक वे केवल एक शक्तिहीन दर्शक बन जाते हैं। लोगों के पास न तो चुने गए प्रतिनिधि से हिसाब-किताब मांगने का अधिकार रहता है और न ही उसको किसी भी समय वापस बुलाने का अधिकार।   

विधानसभाओं में ये लोगों के तथाकथित प्रतिनिधि अपनी पार्टी के आदेश को मानने के लिए कानूनी तौर से बंधे रहते हैं। असलियत में ये हमारे प्रतिनिधि नहीं होते हैं बल्कि हुक्मरान पूंजीपति वर्ग के प्रतिनिधि होते हैं और पूंजीपति वर्ग के उस तबके के प्रतिनिधि होते हैं जो उनकी पार्टी का समर्थन करते हैं। यह सब कुछ मौजूदा संविधान और उसके कानून, चुनाव आयोग और उसके नियमों द्वारा जायज़ बनाया जाता है। 

इस तरह से लोकतंत्र की मौजूदा व्यवस्था असलियत में अपने सार में अल्पसंख्यक शोषकों की हुक्मशाही है, जो अपनी किसी एक वफादार पार्टी के हाथों में सत्ता की कमान देकर चलायी जाती है। हुक्मरान वर्ग इस हकीक़त को छुपाने की बहुत कोशिश करता है और ऐसी झूठी धारणा फैलता है कि चुनाव के द्वारा लोग अपना मत जाहिर करते हैं। लेकिन संसदीय लोकतंत्र असलियत में कुछ और नहीं बल्कि परजीवी गिरोह का महज एक मनमाना राज है, संकट के समय में इस बात का पूरी तरह से पर्दाफाश हो जाता है, जैसे कि इस वक्त तमिलनाडु में हुआ है।

शोषकों की वैधता और शोषित लोगों द्वारा अपनी ज़िन्दगी पर काबू पाने की चाहत के बीच जबरदस्त टकराव है। इस अंतर्विरोध, इस टकराव को केवल एक ही तरीके से हल किया जा सकता है, वह है मौजूदा व्यवस्था की जगह पर लोकतंत्र की एक नयी व्यवस्था का निर्माण करना और बसाना, एक ऐसी श्रेष्ठ व्यवस्था जहां फैसले लेने का अधिकार लोगों के हाथों में होगा, न कि किसी निहित स्वार्थ वाली पार्टी के हाथों में।

आज की हालत की पुकार है कि तमिलनाडु के हम सभी प्रगतिशील और जनतान्त्रिक पार्टियां, संगठन और व्यक्ति एकजुट हो जायें। हमें इस सिद्धांत की हिफाज़त में एकजुट होना होगा कि संप्रभुता - यानी फैसले लेने का अधिकार लोगों के हाथों में हो। हमें मौजूदा संसदीय लोकतंत्र से आगे बढ़कर देखना होगा, यह लोकतंत्र जो कि हमारे लिए पराया है, अपना समय पूरा कर चुका है और जो अधिकांश लोगों को फैसले लेने के अधिकार से अलग रखने के लिए बनाया गया है। हमें एक ऐसी नयी व्यवस्था बनानी होगी जहां लोग अपना एजेंडा खुद तय करेंगे और जब वे वोट देंगे तब अपने सारे राजनीतिक अधिकार किसी और के हाथों में सौंप नहीं देंगे। खुद अपने हाथों में सत्ता लेने के बजाय राजनीतिक पार्टी का काम होगा लोगों को खुद अपने हाथों में सत्ता लेने के लिये अगुवाई देना।

जाति, धर्म, लिंग और पार्टी के दायरे से ऊपर उठकर लोगों के सामूहिक संघर्ष के संगठन बनाने के लिए पिछले कुछ वर्षों में तमिलनाडु के लोगों ने कई पहलें की हैं। ये सारी कोशिशें हमारे अपने अनुभव के आधार पर - प्राकृतिक आपदाओं से सामना करते हुए, मानव अधिकार, जनतान्त्रिक अधिकार और राष्ट्रीय अधिकारों की हिफाज़त में संघर्ष करते हुए और भी मजबूत हुई हैं।

लोगों के हाथों में सत्ता देने की दिशा में हमारी सांझी कोशिशों को और भी आगे बढ़ाने की ज़रूरत है और अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए, फौरी मांगों के लिए एकजुट होने की ज़रूरत है। हमें यह मांग करनी होगी कि चुनाव के पहले उम्मीदवार के चयन का अधिकार लोगों के पास होना चाहिए, और चुने गए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार होना चाहिए। किसी भी व्यक्ति या पार्टी द्वारा चुनाव प्रचार के लिए निजी फंड के इस्तेमाल पर रोक लगाने की मांग करनी होगी। हमें यह मांग करनी होगी की राज्य को किसी भी पार्टी को धन नहीं देना चाहिए, बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया को धन प्रदान करना चाहिए।

हमें अपनी फौरी मांगों के लिए सारे संघर्ष एक नए संविधान, एक नए राज्य और एक नयी राजनीतिक प्रक्रिया को बनाने के नज़रिये से चलाने होंगे, जहां संप्रभुता लोगों के हाथों में होगी।

Tag:    जयललिता    जन प्रतिनिधियों    प्रतिनिधित्ववादी    Mar 1-15 2017    Political-Economy    2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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