राजकीय आतंकवाद और कश्मीर के लोगों का विराग

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/03/2017 - 19:20

सेना प्रमुख, जनरल बिपिन रावत ने हाल ही में चेतावनी जारी की है कि जो सेना की कार्यवाही का समर्थन नहीं करते हैं या मुठभेड़ में बाधा डालते हैं, उन्हें सेना आतंकवादियों का खुलेआम समर्थक मानेगी और उन पर गोलियां चलाएगी। कश्मीर में फर्ज़ी मुठभेड़ों, सेना और अर्ध-सैनिक बलों द्वारा किये जा रहे अत्याचारों में निर्दोष लोगों की हत्या के खिलाफ़ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किये जा रहे हैं, जिनमें लाखों की संख्या में नौजवान और महिलाएं हिस्सा ले रहे हैं। सेना प्रमुख का इशारा इन प्रदर्शनकारियों की ओर था।

जनरल रावत की यह धमकी कश्मीर के लोगों के प्रति हिन्दोस्तानी राज्य के नज़रिये को संक्षिप्त और सही रूप से दर्शाती है। इस बात की पुष्टि तब हुई, जब रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने सेना प्रमुख की लाइन पर अपना पूरा समर्थन जताया। केन्द्र सरकारों के ठीक इसी नज़रिये की वजह से कश्मीर में वर्तमान स्थिति पैदा हुई है। हिन्दोस्तानी राज्य ने कश्मीर की समस्या को “कानून और व्यवस्था की समस्या” की नज़र से देखा है, जिससे सशस्त्र बलों द्वारा बर्बर दमन के ज़रिये निपटा जाता है।

पिछले साल ही, मुठभेड़, हत्याओं और सेना के अत्याचारों के खिलाफ़, लगातार बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए हैं जिनमें दसों-हजारों लोगों ने हिस्सा लिया है। सैकड़ों लोग मारे जा चुके हैं और हजारों गिरफ्तार किये गए हैं। सेना द्वारा पैलेटगनों के इस्तेमाल से, सैंकड़ों लोगों की आँखों में गंभीर चोटें आई हैं और कई लोग अंधे भी हो गए हैं। हाल के दिनों में, जब भी सेना युवाओं को आतंकवादी बताकर गिरफ्तार करने की कोशिश करती है, गांवों के लोग बड़े पैमाने पर इन युवाओं की रक्षा करने और उनकी सुरक्षित रिहाई के लिए बहादुरी से सेना को चुनौती देते हैं। ऐसे टकरावों के दौरान कई ग्रामीण लोगों की मौतें हुई हैं, इस बात से साफ पता चलता है कि सेना की कार्यवाहियों के प्रति लोगों के बीच में कोई भी समर्थन नहीं है।

कश्मीर के लोग हिन्दोस्तानी संघ से इतने अलग क्यों हो गए हैं? ऐसा क्यों है कि, फर्ज़ी मुठभेड़ों में हत्या, निर्दोष लोगों पर गोलीबारी और अत्याचार की किसी भी घटना के बाद, सेना और अर्ध-सैनिक बलों के आदेशों के खिलाफ़, मौत का सामना करते हुए, दसों-हजारों की संख्या में नौजवान सड़कों पर उतर आते हैं? इसका कारण कश्मीर और उसके लोगों के प्रति हिन्दोस्तानी राज्य का बर्बर तरीका है।

बंटवारे के समय, हिन्दोस्तानी राज्य ने कश्मीर के लोगों को आत्म-निर्धारण के अधिकार का वादा किया था, लेकिन बाद में उसे पूरा नहीं किया। हिन्दोस्तानी संघ के साथ राज्य के संबंध पर सवाल उठाने वाले किसी भी कश्मीरी को हिन्दोस्तान का दुश्मन बताकर बदनाम किया जाता है, जेलों में बंद किया जाता है, सताया जाता है और फिर मार डाला जाता है। शिक्षा और रोज़गार के लिए हिन्दोस्तान के अन्य राज्यों में जाने वाले कश्मीरी नौजवानों को सताया जाता है। हिन्दोस्तान के बाकी लोगों के बीच, लगातार कश्मीरी लोगों के खिलाफ़ प्रचार किया जाता है और उन्हें “राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय अखंडता” के लिए खतरा बताया जाता है।

हिन्दोस्तानी राज्य और इज़ारेदार पूंजीपतियों का मीडिया लगातार प्रचार करते हैं और कश्मीर के लोगों के राष्ट्रीय और मानव अधिकारों के संघर्ष को “राष्ट्र-विरोधी” और “पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित” करार देते हैं। सेना के राज और राजकीय आतंकवाद को सही साबित करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। लगभग 27 वर्ष से कश्मीर सेना के राज के अधीन रहा है, जहां सशस्त्र बल (विशेष अधिकार) अधिनियम (ए.एफ.एस.पी.ए) के तहत सेना द्वारा लोगों को मारने, बलात्कार करने और सभी प्रकार के अत्याचार करने की पूरी छूट दी गयी है।

कश्मीर के लोगों की समस्याओं को ”कानून और व्यवस्था” की समस्या मानना, जिसका ”हल” क्रूर दमन के ज़रिये किया जायेगा, इस तरह हिन्दोस्तानी राज्य एक आतंकवादी होने की भूमिका अदा कर रहा है। जिन समस्याओं का सामना कश्मीर और वहां के लोग कर रहे हंै, वे राजनीतिक समस्याएं हैं। वे इसके राजनीतिक समाधान की मांग कर रहे हैं। राजकीय आतंकवाद और सेना के राज को तुरंत खत्म कर देना चाहिए, ए.एफ.एस.पी.ए. को रद्द कर देना चाहिए और सेना को वापस बैरकों में भेज दिया जाना चाहिए। तभी कश्मीर की समस्या का राजनीतिक समाधान हो सकता है, जो कश्मीर के लोगों की आकांक्षाओं का सही मायने में सम्मान होगा।

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Mar 16-31 2017    Political-Economy    Popular Movements     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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