आतंकवाद से लड़ने के नाम पर राजकीय आतंकवाद

Submitted by cgpiadmin on गुरु, 16/03/2017 - 19:24

28 अक्तूबर, 2005 को जब तीन बम धमाकों में 67 लोगों की जानें गयीं, उस वक्त तीन कश्मीरी नौजवानों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया। अखबारों और टी.वी. चैनलों ने दावा किया कि इस हत्याकांड के लिए जिम्मेदार लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया है। अब 11 वर्ष बाद, दिल्ली की एक अदालत ने उन तीनों नौजवानों को बरी कर दिया है। पूरे एक दशक से भी अधिक समय तक तमाम तरीके से जिसको बयान भी नहीं किया जा सकता, इस तरह से तड़पाए जाने और जेल में रखे जाने के बाद वे तीन नौजवान बेगुनाह साबित हुए हैं (देखिये बॉक्स)। यहां तक की उनमें से एक नौजवान को इन हमलों का सरगना “मास्टर माइंड” भी घोषित कर दिया गया था, लेकिन सरकार उसके खिलाफ़ इन धमाकों में शामिल होने का कोई भी सबूत पेश नहीं कर पाई।

बेगुनाहों को सज़ा

मोहम्मद रफीक शाह, कश्मीर विश्वविद्यालय का छात्र था उस धमाके के वक्त वह अपनी कक्षा में मौजूद था। रफीक की गिरफ्तारी से तीन सप्ताह तक कश्मीर विश्वविद्यालय पूरी तरह से बंद रहा। विश्वविद्यालय के अधिकारियों ने उसके बेगुनाह होने की कसम खायी।

कश्मीर विश्वविद्यालय के इस्लामिक अध्ययन विभाग के पूर्व विभाग प्रमुख प्रोफेसर नसीम अहमद शाह ने कहा कि हाँ, वह धमाकों के वक्त अपनी कक्षा में था, और उप-कुलपति प्रोफेसर वाहिद अहमद ने उसके कक्षा में होने के अधिकारिक रिकाॅर्ड्स दिल्ली पुलिस को सौंपे थे। इसके बावजूद उसके खिलाफ़ आरोप लगाये गए, और उसकी ज़िन्दगी के 11 बेशकीमती साल बर्बाद किये गए। एक अन्य प्रोफेसर के बताया कि यह हिन्दोस्तान की पुलिस और न्याय व्यवस्था का मजाक है। आप एक बेगुनाह को गिरफ्तार करते हो और उसकी ज़िन्दगी बर्बाद कर देते हो और 10 साल बाद आप उसको सॉरी कहते हो। जो पुलिस अफ़सर इस तरह से बेगुनाह लोगों को झूठे केस में फंसाते हैं उनके खिलाफ़ कार्यवाही की जानी चाहिए।

मोहम्मद हुसैन फाजली श्रीनगर में एक दरी बनाने वाला कारीगर था। फाजली ने बताया कि पहले मुझे श्रीनगर के किसी पुलिस थाने में बुरी तरह से पीटा गया। उसके बाद दिल्ली ले जाया गया जहां मुझसे थर्ड डिग्री टॉर्चर के साथ सवाल जवाब किये गए।नवम्बर 2005 में जब फाजली को दिल्ली की एक अदालत में पेश किया गया, उस समय की एक घटना को बताते हुए फाजली ने कहा कि मुझे पहले फ्रेश किया गया था। फ्रेश का पुलिस के शब्दों में मतलब होता है टॉर्चर करनाइसलिए मुझको पुलिस द्वारा बताई गयी बातों को चुपचाप अदालत के सामने दोहराना पड़ा और यह बात कहनी पड़ी कि मैं इन बम धमाकों में शामिल था

यह कोई अकेला केस नहीं है। एक लम्बी सूची है उन लोगों की जिनको तथाकथित आतंकवादी कार्यवाही के लिए पहले गिरफ्तार किया गया लेकिन बाद में वे बेगुनाह साबित हुये।

गुजरात से उठाये गये 6 मुसलमान नौजवानों को 11 साल तक जेल में बंद रखने के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बेगुनाह बरी कर दिया गया। उन नौजवानों पर गुजरात के “आतंकवाद-विरोधी” दस्ते ने यह आरोप लगाया था कि उन्होंने अक्षरधाम मंदिर पर आतंकवादी हमला आयोजित किया था।

2006 में नौ लोगों पर मालेगांव आतंकवादी हमलों को आयोजित करने का आरोप लगाया गया। दस साल तक उन्हें जेलों में सड़ाया गया और पर्याप्त सबूत न होने के कारण उन्हें रिहा किया गया।

दिल्ली के सरोजिनी नगर में हुए बम धमाके के एक साल बाद सितम्बर 2006 में एक कश्मीरी विद्यार्थी परवेज अहमद राडू को दिल्ली पुलिस के “आतंकवाद-विरोधी” दस्ते ने गिरफ्तार किया। उसे दिल्ली एअरपोर्ट से तब गिरफ्तार किया गया जब वह डॉक्टरेट के डिग्री की पढ़ाई करने के लिए पुणे जा रहा था। उस पर दिवाली के दौरान आतंकी हमले की साजिश रचने का आरोप लगाया गया। सात साल तक तिहाड़ जेल में बंद रखने के बाद वह बेगुनाह साबित हुआ है और उसे रिहा कर दिया गया।

ये सभी तथ्य दिखाते हैं कि बेगुनाहों को आतंकवादी घोषित करना और उनको सज़ा देना, कोई अपवाद नहीं है, बल्कि हिन्दोस्तानी राज्य की यह अलिखित नीति है। खुफिया तरीके से आतंकवादी वारदातों को अंजाम देना और फिर बेगुनाह लोगों को इसके लिए जिम्मेदार बताकर उन्हें गिरफ्तार करना यह सब राजकीय आतंकवाद का हिस्सा है।

80 के दशक से हमारे देश में राजकीय आतंकवाद का एक पूरा तंत्र और तानाबाना खड़ा किया गया है। यह तंत्र नियमित तौर से आतंकवादी घटनाओं को आयोजित करता है और हुक्मरान वर्ग जिसे निशाना बनाना चाहता है उनको गिरफ्तार करने के लिये बहाने तैयार करता है। कश्मीर, असम, पंजाब, मणिपुर, और देश के कई अन्य इलाकों में हिन्दोस्तानी राज्य ने कई ऐसे गुटों को ट्रेनिंग दी है और हथियार दिए हैं। विशेष कमांडो और तथाकथित आतंकवाद-विरोधी यूनिट बनाये हैं और उनको आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देने और फर्ज़ी मुठभेड़ करवाने की ट्रेनिंग दी गयी है। जैसे ही कोई आतंकवादी घटना घटती है वैसे ही झूठा प्रचार करने वाला तंत्र सक्रिय हो जाता है और किसी गुट पर आरोप लगाना शुरू कर देता है, जिसे तथाकथित रूप से पाकिस्तान समर्थन दे रहा है।

हिन्दोस्तानी राज्य की खुफिया एजेंसियों की हिरासत में ऐसे कई लोग होते हैं जिनका इस्तेमाल आतंकवादी कार्यवाही को अंजाम देने के लिए किया जाता है। जब उनका काम खत्म हो जाता है तो उनको भी मार डाला जाता है, ताकि कोई सबूत न बचे। पंजाब, असम, कश्मीर, मणिपुर और देश के अन्य इलाकों के लोगों का यही अनुभव है।

दुनिया को यह दिखाने के लिए कि हिन्दोस्तानी राज्य आतंकवादियों से निपटने के बारे में गंभीर है, आतंकवाद-विरोधी” दस्ता समय-समय पर कुछ बेगुनाह नौजवानों को फर्ज़ी मुठभेड़ों में मार डालता है। कुछ बेगुनाह लोगों को गिरफ्तार किया जाता है और दावा किया जाता है कि पुलिस के पास उनके गुनाह के सबूत हैं। जब तक राज्य के झूठ का पर्दाफाश होता है तब तक कई बेगुनाह मर चुके होते हैं और कई बरसों के लिए जेलों में बंद रहते हैं।

आतंकवाद के लिए लोग या लोगों की आस्था, या किन्हीं सिरफिरों का दल जिम्मेदार नहीं हैं, और न ही हर आतंकवादी हमले के पीछे पाकिस्तान का हाथ होता है, जैसा कि हिन्दोस्तान के हुक्मरान दावा करते हंै। देश के विभिन्न इलाकों में आतंकवादी हमलों का मुख्य आयोजक हिन्दोस्तानी राज्य है।

उत्तर पूर्व और कश्मीर में सेना के राज के खिलाफ़ और अपने राष्ट्रीय अधिकारों की मांग को लेकर चल रहे संघर्षों और दबे-कुचले लोगों के जायज़ संघर्षों को बदनाम करने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य आतंकवाद का इस्तेमाल करता है। सारी मुसीबतों की जड़, बड़े सरमायदारों के राज से लोगों का ध्यान हटाने की लिए, लोगों के दिलों में किसी खास समुदाय के खिलाफ़ शक पैदा करने और नफ़रत भड़काने के लिए, लोगों को सही रास्ते से भटकाने के लिए, हमारे हुक्मरान आतंकवाद के हथियार का इस्तेमाल करते आये हैं।

80 के दशक में देश के किसी भी कोने में हुई आतंकवादी घटना के लिए सिख धर्म के लोगों को दोषी बताया जाता था। 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद से देश के किसी भी हिस्से में हुई आतंकवादी घटना के लिए इस्लाम धर्म के लोगों को दोषी बताया जाता है।

आतंकवाद से लड़ने के नाम पर दमन के खुले और छिपे तरीके, आतंकी वारदात आयोजित करना, यह सब अमरीकी, बर्तानवी और अन्य पूंजीवादी-साम्राज्यवादी राज्यों का स्टैण्डर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (मानक संचालन प्रक्रिया) बन गया है। बड़े हिन्दोस्तानी सरमायदारों के हितों को आगे बढ़ाने के लिए हिन्दोस्तानी राज्य ने भी इन्हीं तरीकों को अपनाया है।

हिन्दोस्तान के बड़े सरमायदार निजीकरण और उदारीकरण के ज़रिये भूमंडलीकरण के रास्ते अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं। आतंकवाद से लड़ने के नाम पर राजकीय आतंकवाद उनका पसंदीदा हथियार बन गया है जिसका इस्तेमाल वे अपने मज़दूर-विरोधी, किसान-विरोधी, समाज-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कार्यक्रम के खिलाफ़ उठ रहे लोगों के प्रतिरोध को कुचलने के लिए कर रहे हैं।

हमारे देश में व्यक्तिगत आतंकवाद और राजकीय आतंकवाद उस समय से ज्यादा बढ़ रहा है, जबसे हमारे हुक्मरानों, बड़े पूंजीपतियों की राजनीतिक सत्ता डांवाडोल होनी शुरू हो गई है। सांप्रदायिक और गुटवादी हिंसा में बढ़ोतरी के साथ बम धमाकों और राजकीय आतंकवाद ठीक उस वक्त हो रहे हैं जब हमारा हुक्मरान वर्ग पुराने तरीके से राज नहीं कर पा रहा है।

बर्तानवी बस्तीवादी राज खत्म होने के बाद, यानी पिछले 67 सालों के अनुभव से यह साफ नज़र आता है कि अपने ही लोगों के खिलाफ़ राज्य की हिंसा बद से बदतर होती गई है। केवल उत्तर पूर्व और कश्मीर ही नहीं, बल्कि देश के सभी इलाकों में - पंजाब, दिल्ली और अन्य इलाकों में सिखों के खिलाफ़ हिंसा, गुजरात, उत्तर प्रदेश और अन्य जगहों में मुसलमानों के खिलाफ़ हिंसा तथा दूसरे इलाकों में ईसाई धर्म और आदिवासी लोगों के खिलाफ़ हिंसा, राजकीय आतंक की यह सूची और भी लंबी हो गई है। यह साफ दिखाता है कि समस्या की जड़ इस राज्य की बुनियाद में ही है जो हमें 1947 में विरासत में मिला था।

मौजूदा हिन्दोस्तानी राज्य बर्तानवी बस्तीवादी राज की ही निरंतरता है तथा यह और अधिक विकसित हुआ है। यह राज्य फूट डालो और राज करो की नीति का हथियार है, दमन व आतंकवाद तथा चुनाव व बन्दूक के ज़रिये शोषक अल्पसंख्यक वर्ग की हुकूमत का हथियार है।

प्राचीन काल से इस उपमहाद्वीप के लोगों ने उस राजनीतिक सिद्धांत को माना है तथा उसकी हिफाज़त की है जिसमें कि प्रजा की खुशहाली और सुरक्षा सुनिश्चित करना राजा का फर्ज़ है। बिना सुरक्षा के खुशहाली संभव नहीं है। यदि राजा अपने इस फर्ज़ को निभाने में नाकामयाब रहता है और उल्टे अपनी प्रजा का दमन करता है, तो ऐसे राजा से मुक्ति पाना, यह प्रजा का अधिकार और फर्ज़ है।

हमारे जीवन का अनुभव दिखाता है कि मौजूदा राज्य लोगों पर दमन और आतंकवाद का हथियार है। यह कभी भी सभी लोगों के लिए सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता। इसलिए यह हमारा अधिकार और फर्ज़ है कि हम इस राज्य को उखाड़ फेंके और उसकी जगह पर एक ऐसे नए राज्य की स्थापना करें जो सभी लोगों को खुशहाली और सुरक्षा की गारंटी देगा।

 

Tag:    Mar 16-31 2017    Political-Economy    Popular Movements     2017   

पार्टी के दस्तावेज

Click to Download PDFइस पुस्तिका के प्रथम भाग में नोटबंदी के असली इरादों को समझाने तथा उनका पर्दाफाश करने के लिये, तथ्यों और गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है। दूसरे भाग में सरकार के दावों - कि नोटबंदी से अमीर-गरीब की असमानता, भ्रष्टाचार और आतंकवाद खत्म होगा - का आलोचनात्मक मूल्यांकन किया गया है। तीसरे भाग में यह बताया गया है कि कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के अनुसार, इन समस्याओं का असली समाधान क्या है तथा उस समाधान को हासिल करने के लिये फौरी कार्यक्रम क्या होना चाहिये।

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यह चुनाव एक फरेब है!हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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यह बयान, ”बड़े पूँजीपतियों के लिये अच्छे दिन का मतलब मजदूर-किसान के लिये दुख-दर्द के दिन“, हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की केन्द्रीय समिति की 31 मई, 2014 को सम्पन्न हुई परिपूर्ण सभा में हुए विचार-विमर्श और मूल्यांकन पर आधारित है।

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हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी के महासचिव, कामरेड लाल सिंह का,

मजदूर एकता लहर के संपादक, कामरेड चन्द्रभान के साथ साक्षात्कार

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हिन्दोस्तानी गणराज्य का नवनिर्माण करने और अर्थव्यवस्था को नई दिशा दिलाने के कार्यक्रम के इर्द-गिर्द एकजुट हों ताकि सभी को सुख और सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके!

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ग़दर जारी है... हिन्दोस्तान की कम्युनिस्ट ग़दर पार्टी की प्रस्तुति

सौ वर्ष पहले अमरिका में हिंदोस्तानियों ने हिन्दोस्तान की ग़दर पार्टी की स्थापना की थी. यह उपनिवेशवाद-विरोध संघर्ष में एक मिल-पत्थर था.

पार्टी का लक्ष था क्रांति के जरिये अपनी मातृभूमि को बर्तानवी गुलामी से करा कर, एक एइसे आजाद हिन्दोस्तान की स्थापना करना, जहां सबके लिए बराबरी के अधिकार सुनिश्चित हो.

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